डेनिश औरतें अनगिनत कन्वेंशनल बक्सों से आज़ाद हैं!

पूनम दुबे के यात्रा वृत्तांत हम पढ़ते रहे हैं, उनक एक उपन्यास ‘चिड़िया उड़’ प्रकाशित हो चुका है। इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उनका यह लेख पढ़िए- जानकी पुल।

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तकरीबन आठ महीने हो गए मुझे डेनमार्क शिफ्ट हुए. इन आठ महीनों में मैं स्कॅन्डिनेवियन देशों (नॉर्वे फ़िनलैंड स्वीडन डेनमार्क और आइसलैंड) की अनूठी सभ्यता से कुछ हद तक रूबरू हुई हूँ. यहाँ के सभ्यता की कितने ही बातें की मुझे हक्का-बक्का कर जाती हैं. उनमें सबसे अनोखी बात जो मुझे लगती है वो है, यहाँ की औरतों का रहन सहन, उनका व्यवहार और जिंदगी के प्रति उनका बेबाक रवैया.

यहाँ आने से पहले मैं यह जान गई थी कि डेनिश लोग रोजमर्रा की जिंदगी में कम्यूट करने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं. यही कारण था कि कोपेनहागन शिफ्ट होने से पहले ही मैं साइकिल सीखकर आई थी. जो बचपन काम में अधूरा रहा गया था, वह यहाँ आकर पूरा हो गया.

यहाँ मौसम चाहे जैसा भी हो, ठंड या बारिश नौजवान, बुजुर्ग स्त्रियों, पुरुषों या मदर्स को बच्चों के साथ साइकल चलाते देखना एक आम सी बात है. लेकिन हैरत मुझे उस दिन हुई जब पहली बार सड़क पर करीब आठ महीने प्रेग्नेंट स्त्री (मेरे अनुमान से) को मैंने साइकल पर सवार देखा. मेरे रोंगटे खड़े हो गए. कानों में हेडफ़ोन लगाए वह बड़ी बेफिक्री से गुनगुनाते हुए सड़क पार कर मेरे पास से गुजर गई. ऐसा नजारा मैंने पहले अपने देश में नहीं देखा था. न ही टर्की या अमेरिका में इसकी झलक मिली थी. “क्या इन्हें बिलकुल भी डर नहीं?” सबसे पहले यही ख्याल आया था मन में. हमारे यहाँ तो गर्भवती स्त्रियों को कितनी ही हिदायतें दी जाती हैं प्रेगनेंसी के दौरान सावधानी बरतने के लिए.

उस दिन भी कम हैरानी नहीं हुई थी जब पहली बार मैं अपने जिम क्लास गई.  हर उम्र की स्त्रियां थी वहां, पंद्रह से लेकर सत्तर तक. अपने से उम्र में कई साल बड़ी मम्मी और चाची सरीखे औरतों को हेवी वेट के साथ सहजता से वेट ट्रेनिंग और पुश अप करते देखा. मुझे अपने आप पर थोड़ी शर्म आ गई, लेकिन हौसला भी बढ़ा, उम्र कोई रुकावट नहीं नहीं थी इनके लिए. मन ही मन अपने आप से कहा ‘अब कोई बहाना नहीं चलेगा.’ ये कोई एथलीट नहीं थी, न ही कोई सेलेब्रिटी. यह हमारी तुम्हारी तरह ही हैं. स्त्री के नाजुक और कोमल शरीर से संबंधित सारे स्टेरीओटिपिकल थिंकिंग को चकनाचूर करती लगी मुझे यहाँ की औरतें.

ठीक कहा है एलेनोर रूज़वेल्ट ने ‘औरत टी-बैग की तरह होती है. वह कितनी सशक्त है इसके बारे में आप तब तक कुछ नहीं कह सकते जब तक कि आप उसे गर्म पानी में न डाल दें.

इस्तांबुल में थी तो वहां पर औरतों के सजे-धजे चेहरे और पहनावे देखकर मुझे कभी-कभी ताज्जुब होता था. यह बात मैंने न्यूयोर्क में भी नोटिस की थी, ऐसा लगता था वे हमेशा ही रैंप वाक के लिए तैयार हैं. मानों परफेक्ट बॉडी और ब्यूटी स्टैंडर्स की होड़ सी लगी हो. लेकिन डेनिश औरतें अपने लुक्स, शरीर और पहनावे को लेकर मुझे इतनी निश्चिंत लगी कि उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि होंठों पर लिपस्टिक है या नहीं. ऐसा लगता हो जैसे कि उन्होंने कन्वेंशनल ब्यूटी स्टैंडर्स को भी जैसे मात दे दी हो, और अलादीन के चिराग के जिन सरीखा मेकअप बॉक्स को तोड़कर बाहर आ गई हो. क्या यहाँ के आदमी उन्हें यह फील नहीं करवाते कि उनके स्तन का आकर छोटा है, या उनकी नाक टेढ़ी है या फिर उन्होंने ने बहुत दिनों से वैक्सिंग नहीं करवाई है. या फिर वह खुद ही परफेक्ट ब्यूटी के जाल से मुक्त हो गई हैं!  एक तरह की आजादी ही तो है कि आप किसी की देखा-देखी या दबाव में आकर नहीं बल्कि अपने मन मुताबिक कम्फर्ट के हिसाब से फैशन कर रहें हैं.

सबसे मजेदार बात तो मुझे इनका डेटिंग स्टाइल लगा. यहाँ अकसर मैंने देखा अगर किसी डेनिश लड़की को कोई लड़का अच्छा लग रहा है तो वह खुद पहले जाकर उससे बात करने से कतराएगी नहीं. वह इसका वह इंतज़ार नहीं करेगी कि पहले लड़का पहल करे जैसा कि मैंने अब तक के अपने भारतीय सभ्यता में देखा सुना और समझा है. अमेरिका में तो औरतें अब तक “फर्स्ट आस्किंग आउट के गेम” से जूझ रही हैं.  डेनिश औरतें किसी दबाव में नहीं दिखती मुझे. वह अपनी जरूरतों से बखूबी वाकिफ़ हैं और बिना किसी जजमेंट के डर के वह अपने फैसले भी ले लेती हैं. क्या इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि नहीं कि उनपर ‘कुछ ज्यादा ही एडवांस या मॉर्डन लड़की’ का टैग लग जाएगा या फिर समाज में स्लट शेमिंग होगी. क्या वह इस डर से भी परे हैं!

ऐसा कौन सा जादुई मंत्र हैं इन औरतों के पास जो यह अपने आस-पास बने इन अनगिनत बक्सों को तोड़कर उससे आज़ाद हो गई हैं. यह सब कुछ इन्होंने अकेले ही हासिल कर लिया या फिर पुरुष और समाज भी साझीदार रहा हैं इस जर्नी में. मेरी कोशिश अब तक जारी है कि किसी तरह उस मंत्र का पता चल जाए. फिलहाल तो नाकामयाबी ही हाथ लगी है.

डेनमार्क शिफ्ट होने से पहले इंटरनेट पर स्कॅन्डिनेवियन देशों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा था. पता चला था कि ये देश हैप्पीनेस इंडेक्स के मामले टॉप नंबर्स पर रहते है. और इन देशों को डेवेलप्ड कंट्रीज़ भी माना जाता है. हालाँकि शुरुआती दिनों में डेनमार्क के मौसम और इंफ़्रास्ट्रक्चर को देखकर मुझे दोनों ही बातों पर थोड़ा संशय हुआ था. कोई हाई राइज बिल्डिंग नहीं, न ही कोई चमक-धमक. मन ही मन सोचा इससे ज्यादा चमक-धमक तो दुबई में है उनके पास तो दुनिया कि सबसे बड़ी इमारत बुर्ज ख़लीफ़ा भी है. मौसम भी यहाँ का इतना विषादपूर्ण (ग्लूमी) कि साल के करीब नौ महीने बारिश, ठंड और अँधेरा ही छाया रहता हैं.

यह सोचते हुए मुझे माँ कि एक बात याद आ गई, वह कहती है कि पुराने समय में किसी भी घर की आर्थिक स्थिति का अंदाजा उस घर के औरतों के कपड़े और गहने देखकर लगाया जाता था.

तो क्या हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक समय में किसी भी देश के उन्नति का अंदाजा वहां के स्त्रियों की अवस्था से लगाया जा सकता है.

अगर ऐसा है तो इन देशों में जेंडर एक्वालिटी सबसे हाई है, यहाँ कि औरतों की एजुकेशन रेट भी हाई है. वुमन सेफ़्टी की तो मैं बात ही क्या कहूं. वीकेंड पर देर रात जब कभी कहीं बाहर से आती हूँ तो मेट्रो या ट्रेन में बियर और अलकोहल की स्ट्रांग गंध इस कदर फैली होती है कि मानों पार्टी वहीं हो रही हो, लेकिन क्या मजाल है कि कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री को अनचाही नज़र से देख भी ले. यही हाल सड़कों का भी है कोई फर्क नहीं पड़ता कि औरत ने कितने कपड़े पहने है. यहाँ नज़रों की पाबंदी और घूरना जैसे बैन है, ईव टिजिंग तो दूर की बात है.

अगर यहीं निशानियाँ है देश के उन्नति कि तो वाकई में यह देश विकसित है, और सही मायने में इनका समाज परिपक्व है.

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