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  • जौन एलिया का लेख ‘मर्द बुर्का ओढ़ें’

     जौन एलिया के इस लेख का अनुवाद किया था इरशाद ख़ान सिकंदर ने। उन्होंने इस लेख का लिप्यंतरण नहीं किया बल्कि अनुवाद किया।  जौन एलिया साहब ने अपनी पत्रिका “इन्शा” के लिए ये आर्टिकल एक फ़र्ज़ी नाम (ज़हीना साएकी) से सितम्बर 1961 में लिखा था।) आज जौन एलिया की जयंती पर आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
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    चन्द महीने पहले की बात है कि ‘’सद्र अयूब के नाम एक खुला ख़त’’ के शीर्षक से ‘इन्शा’ (पत्रिका) में मेरा एक लेख छपा था। जिसमें अज्ञानता, दक़ियानूसी विचारों और महिलाओं के अधिकारों की तरफ़ माननीय राष्ट्राध्यक्ष महोदय का ध्यान आकृष्ट कराया गया था। क़ौम की भयानक ग़रीबी दुर्दशा और मौलवियों की बुद्धि से शत्रुता का रोना रोया गया था। उसके बाद मेरा एक और लेख ‘’क्या पाकिस्तान में सिर्फ़ मर्द रहते हैं’’ ‘’इन्शा’’ में ही प्रकाशित हुआ। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि निर्धनता,अज्ञानता, दक़ियानूसी विचार और मौलवियों की संवेदनहीनता और बेज़मीरी का गिला करना ऐसा जुर्म है कि जिसके मुजरिम को क्षमा ही नहीं किया जा सकता और अजीब बात ये है कि मेरी चन्द बहनें ही मुझसे इस सिलसिले में सबसे अधिक नाराज़ हैं। मैंने अज्ञानता और असभ्यता का विशेष तौर पर गिला किया था। क्या यह अज्ञानता और असभ्यता की पराकाष्ठा नहीं कि स्वंय महिलाएं ही महिलाओं के अधिकार का विरोध करना अपना पवित्र कर्तव्य समझ रही हैं? क्या ये मानसिक दीवालियापन की हद नहीं है कि आदमी स्वंय अपनी ही इच्छाओं और भावनाओं के विरुद्ध ज़हर उगलने लगे और ये भी न समझ सके कि वो कह क्या रहा है? काश लेखन का यह ज़ोर और प्रेम और विवेक की यह ईर्ष्या पैदा कर देने वाली कर्मठता किसी उचित एवं आवश्यक काम में ख़र्च होती, क्या ले देकर अब यही काम रह गया है कि हमारी बहनें बेपर्दगी और बेबाकी के ख़िलाफ़ बवाल करें और जिन सभ्य महिलाओं ने परदे जैसी दक़ियानूसी और मूर्खतापूर्ण रस्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द की है उनके लिए कुफ़्र के फ़तवे लागू करें?
    उन लोगों पर कभी आपका मुँह नहीं खुलता जो जनता को लूट रहे हैं।जब समाज की अस्मिता सड़कों पर भीख माँगती है तब आपको लेशमात्र भी लज्जा का अनुभव नहीं होता। आपको ग़ुस्सा आता है तो सिर्फ़ इस बात पर कि फ़लां बेपर्दा है फ़लां बेबाक है। आप सोचिये कि आप किस दौर और किस माहौल में ज़िन्दगी गुज़ार रही हैं। दुनिया के क्या तक़ाज़े हैं और आपने इन्हें कहाँ तक पूरा किया है?
    मेरी एक बहन ने चिट्ठी में लिखा है कि ‘’हमारी पर्दानशीं बूढ़ियाँ और इज़्ज़तदार लड़कियां अब भी बेपर्दगी और बेबाकी को लानत समझती हैं। वो मर्द के दबाव के तहत या किसी चाल या मक्कारी के कारण परदा नहीं करतीं बल्कि सच्चे मन से इसको अपने औरतपन का अछूतापन समझती हैं” । मेरे लिए उचित तो नहीं है कि इस संबंध में कुछ कहने का साहस करूँ लेकिन फिर भी ये कहे बिना नहीं रह सकती कि हमारी पर्दादार बहनें परदे के नाम से समाज को धोका देने की पुरानी आदत अब त्याग दें। अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं रही। जब हमारे जेंडर की तरफ़ से इस क़िस्म की बातें सुनने में आती हैं उस वक़्त हममें से हर बुद्धिजीवी औरत इस बात को स्वीकार करने पर मजबूर हो जाती है कि औरतों में अज्ञानता के अतिरिक्त दोगलापन,मक्कारी और फ़रेब जैसे व्यवहारिक और इंसानी अवगुण भी मर्दों से कुछ अधिक ही पाये जाते हैं। वो हमेशा उन बातों का दावा करती हैं जिनसे दूर का भी वास्ता नहीं रखतीं केवल यही नहीं बल्कि दिल ही दिल में उन बातों की घोर विरोधी होती हैं लेकिन इसके बजाए कि उन अवगुणों को दूर करने की कोशिश करें जब सच्ची बात कही जाती है, उस वक़्त उलटी-सीधी बातें करना शुरू कर देती हैं जो सत्य बोलने का साहस जुटाता है उसके पीछे पड़ जाती हैं। संभवतः इसलिए कि यह साहस उनमें क्यों नहीं। चलिए मैं अपनी इच्छाएं त्यागती हूँ। आप शौक़ से परदा कीजिए लेकिन ख़ुदा के लिए परदे के नाम पर धोका तो न दीजिये परदा करने का ऐसा ही शौक़ है तो सचमुच का परदा कीजिए। वाक़ई अगर आपने परदा करना छोड़ दिया तो हमारी क़ौम दुनिया को किस तरह मुँह दिखा सकेगी। यह परदा ही तो है जिसकी बरकत से आज आपकी क़ौम दुनिया की सर्वाधिक ‘’शिक्षित’’ ‘’संपन्न’’ ‘’सुसंस्कृत’’ और ‘’प्रगतिशील’’ क़ौम समझी जाती है। आपने ज्ञान और कला के हर क्षेत्र में दुनिया को पीछे छोड़ दिया है। सोचने की बात है अगर परदा न होता तो ये चमत्कार भला किस प्रकार प्रकट होते। यदि बुरा न लगे तो मैं अपनी पर्दादार और लज्जावान बहनों से बहुत विनम्रतापूर्वक यह पूछना चाहती हूँ कि…
    क्या आप सचमुच परदा करती हैं?
    क्या आपने आज तक किसी ग़ैर पर नज़र नहीं डाली?
    झूट ज़िन्दगी की बहुत बड़ी ज़रूरत है लेकिन अगर कभी कभी सच भी बोल लिया जाय तो कोई बुरी बात नहीं है। मैं पूछती हूँ कि जब हमारी लज्जावान,इज़्ज़तदार और पर्दानशीं बीबियाँ पैदल या सवारी में बाज़ारों से गुज़रती हैं,दुकानों में जाती हैं,सिनेमा देखती हैं,क़व्वाली और धार्मिक सभाओं में शामिल होती हैं, मेलों और नुमाइशों में घूमती हैं, जलसों और जुलूसों का नज़ारा करती हैं तो क्या इस अवधि में उनकी आँखें बन्द रहती हैं? आख़िर वो बात क्यों कही जाए जिसको सुनकर लोग मज़ाक़ उड़ायें। सच पूछें तो परदा भी मर्द ही करते हैं आप नहीं करतीं, कर ही नहीं सकतीं, ये कहीं आपके बस की बात है? क्या ख़ूब परदा है कि आप तो नक़ाब की जालियों से बड़े इत्मीनान के साथ अपनी आँखें सेंकती रहें और मर्द की आँख भी पड़ जाए तो पहाड़ सर पे उठा लें। सीधी सी बात है कि आप परदे को बिल्कुल इस तरह प्रयोग करती हैं जिस तरह मर्द गहरे रंगीन चश्मे को, मक़सद दोनों का आँखें बचा बचाकर ताड़ना ही है। मैं क़ौम के व्यवस्थापकों से गुज़ारिश करुँगी कि परदे को उसकी अस्ल सूरत में लागू किया जाय। पुण्य ही कमाना है तो फिर जी खोलकर कमाया जाय। परदे के तरफ़दारों को चाहिए कि वो मर्दों से भी बुर्क़ा ओढ़ने की अपील करें ताकि परदे का उद्देश्य पूरा हो और ‘‘पर्दादार, पवित्र परहेज़गार महिलाओं को सम्पूर्ण आनंद प्राप्त हो सके और उनके मोक्ष प्राप्ति में रत्ती भर भी संदेह बाक़ी न रहे’’।
    हमारे महलों और हवेलियों की दास्तानें साक्षी हैं कि परदे के पीछे कैसे-कैसे नाटक खेले गये हैं। क्या परदे ने ‘’ढांकने’’ के अतिरिक्त कोई और भी फ़र्ज़ अंजाम दिया है? परदे के ज़रिये सिर्फ़ पर्दा डालने की कोशिश की गयी है और अगर इस कोशिश को आइन्दा भी जारी रखने की कोशिश की गयी तो इससे फ़ज़ीहत और रुसवाई के इलावा और कोई नतीजा नहीं निकलेगा। हमें अपने तबक़े की व्यवहारिक और मानसिक पराजय का जायज़ा लेना चाहिए और सोचना चाहिए कि इस परदे ने हमारी सीरत को किस क़दर शर्मनाक बना दिया है। हमारी शख़्सियत दोग़ली होकर रह गयी है। कौन नहीं जानता कि हमारी लड़कियां समाज के इस दिशाहीन, अव्यौहारिक रवैये के भय से बुर्क़ा ओढ़कर तो निकलती हैं लेकिन जब कॉलेज या युनिवर्सिटी में पहुँचती हैं तो वह बुर्क़ा हिफ़ाज़त के साथ ‘’कॉमन रूम’’ में पहुँचा दिया जाता है या हमारी बहुत सी बेगमात अपने शौहरों के साथ शॉपिंग के लिए बाज़ार जाती हैं तो पड़ोसियों को दिखाने के लिए चेहरे पर नक़ाब डाले हुए निकलती हैं लेकिन घर से ज़रा आगे बढ़कर जब सवारी में बैठती हैं तो ये बुर्क़ा अख़बार में लपेटकर एक तरफ़ रख दिया जाता है और ये बात तो बहुत ही आम है कि बुर्क़ा ओढ़े हुए हैं और नक़ाब उल्टा हुआ है। इस दोग़लेपन ने इनके ज़हन व ज़मीर को बुरी तरह गन्दा कर दिया है।
    हक़ीक़त तो ये है कि इस ज़मीं पर कोई ऐसी औरत पैदा नहीं हुई जिसने परदा किया हो। सिर्फ़ ज़ाहिरी परदा रह जाता है। तो मैं कहूँगी कि इस रस्म को शुरू हुए दिन ही कितने हुए हैं और ये रस्म भी उन क़बीलों तक सीमित रही है जहाँ मर्द औरतों को एक जीती-जागती घटिया बदबूदार गन्दगी समझकर ज़मीन में दफ़्न कर देते थे ताकि समाज उनकी दुर्गन्ध से सुरक्षित रहे। उस माहौल की औरतों ने परदे जैसी रस्म को अपना फ़र्ज़ और अपना भाग्य समझ स्वीकार लिया। आज वो ये दावा करती हैं कि उन्होंने इस यातना को स्वेच्छा से स्वीकार किया है और बड़ा तीर मारा है। हैरत है कि ये उस समाज की वकालत करती हैं जिसने उन्हें परदा करने पर नहीं सती हो जाने पर मजबूर कर दिया था और इन्होंने उसे भी क़ुबूल किया। हमारी बहनों को चाहिए कि अपने आपको धोखा देने की पुरानी आदत को अब त्याग दें जिसने उनके अन्दर धोखेबाज़ी और मक्कारी पैदा कर दी है। उन्हें खुलकर अपनी बहनों का साथ देना चाहिए जो बिना किसी मानसिक उलझाव के ज़िन्दगी में मर्दों के कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं जिन्होंने समाज की आधी ज़िम्मेदारियों को पूरे तौर पर क़ुबूल कर लिया है और इस तरह अपना फ़र्ज़ अंजाम दिया है। जो घर में बैठकर नाज़-नखरे करने के बजाय ज़िन्दगी की गम्भीर और ख़तरनाक हक़ीक़तों का सामना कर रही हैं। आप कान खोलकर सुन लीजिये कि मर्द की कामवासना भर शान्त कर देने से हक़ अदा नहीं हो जाता। जो औरतें मर्द की कामवासना शान्त करने के बाद अपने आपको मर्द की दौलत का हिस्सेदार समझने लगती हैं उनमें और तवायफ़ों में आख़िर क्या फ़र्क़ है? अगर कोई फ़र्क़ है तो मात्र ये कि एक साहसी है और ऐलानिया अपनी हैसियत क़ुबूल करती है और दूसरी ढिठाई से अपनी इज़्ज़त और पवित्रता का ढिंढोरा पीटती है। पूरब की मासूमियत और शर्मो-हया के प्रशंसागान पढ़कर ओछी मानसिकता, हरामख़ोरी और दोग़लेपन का कोई जवाज़ नहीं पैदा किया जा सकता। वक़्त गुज़र चुका है और वो वैल्यूज़ समाप्त हो चुकी हैं जिनके सहारे आजतक हक़ीक़तों को झुठलाने की नाकाम कोशिश की गयी।
    एक मोहतरमा ने मेरे आर्टिकल के ख़िलाफ़ बड़े ही प्रेम से ये लिखा कि…
    ‘’क्या उनकी ख़्वाहिश (यानी मेरी ख़्वाहिश) ये है कि हर मर्द के साथ औरत भी कमाए ताकि शराब का ख़र्च पूरा हो’’ इन शब्दों से हम अपनी कष्टदायक अज्ञानता और दुर्भाग्य का पूरी तरह अन्दाज़ा लगा सकते हैं। जिन मोहतरमा ने ये शब्दरचना की है उनके जैसा दिल एवं गुर्दा शायद ही किसी और का हो। बड़ी हिम्मत है उनके अन्दर! वो शायद ज़मीन पर नहीं आसमान पर रहती हैं और ये कि चश्मे-बद दूर उनके पास ख़ुदा का दिया सबकुछ है जो उन्हें मुबारक हो। लेकिन वो भूख से त्रस्त और प्रताड़ित जनता का मज़ाक़ तो न उड़ायें जो अल्लाह की इस ज़मीन पर अल्लाह के चन्द श्रेष्ठ पुत्रों की कृपा से सिसक सिसक कर ज़िन्दगी के दिन पूरे कर रहे हैं। उन मोहतरमा को मालूम होना चाहिए कि इस मुल्क की 80 प्रतिशत आबादी भूख से निढाल है। क्या इन महोदया के विचार में उनकी क़ौम अब इतनी संपन्न हो चुकी है कि अगर आज मर्दों के साथ औरतें भी कमाने लगें तो ये आमदनी रोटी कपड़ा मकान शिक्षा इत्यादि ख़र्च के बाद बच जायेगी और शराब के इलावा इसका और कोई उपयोग नहीं रहेगा? क्या इस मुल्क के अवाम की सारी ज़रूरतें पूरी हो रही हैं और अब उसे केवल शराब के लिए रूपये दरकार हैं। मोहतरमा आपके इस साहस और वीरता का भला मुक़ाबला कोई कर सकता है? इनकी सूचना के लिए निवेदन कर दूं कि इनकी क़ौम के बूढ़े और जवान सुबह को कहीं चाकरी करते हैं और दोपहर को कहीं और जाकर काम करते हैं और रात को कहीं और ड्यूटी देते हैं और फिर भी एक वक़्त के खाने का ख़र्च नहीं निकलता। क्या आपने सड़कों पर अपनी इज़्ज़त-आबरू को भीख माँगते नहीं देखा?
    लेकिन इन मोहतरमा का कोई क़ुसूर नहीं वो जिस समाज में ज़िन्दगी गुज़ार रही हैं उसकी बरकत से इन्सान की अक़्ल को नष्ट हो जाना ही चाहिए इस समाज का सबसे बड़ा कारनामा ये है कि इसने इन्सान को जानवर बना दिया है और इस जानवर की विशेषता ये है कि वो अतीत के उन्माद और दरिंदगी के साथ श्रद्धा और एक दूसरे के साथ नफ़रत और दुशनी से पेश आये और यही उसका पथ एवं धर्म है जो कोई इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाये वो काफ़िर है लेकिन अब इस फ़तवेबाज़ी के दिन पूरे हो चुके हैं। अब हम मुल्लाओं और मुल्लानियों के नाम पर मूर्ख बनने के लिए तैयार नहीं हैं।हरगिज़ हमारा कर्तव्य मार्ग वो नहीं है जो इन मदारियों ने हमपर थोप रखा था। हमारे ज़रूरी कर्तव्य ये हैं कि हम ग़रीबी,अज्ञानता,संकीर्णता,ग़ुलामसोच और लूट-खसोट के ख़िलाफ़ खुलकर बोलें। समाजी नाइंसाफ़ियों को दूर करें और इन तथाकथित इज़्ज़तदारों के बने-बनाये ढाँचों को नेस्तनाबूद करें जहाँ मासूम इन्सानियत झूठे सिक्कों के बदले अपनी सच्चाई और शराफ़त को बेचने पर मजबूर कर दी गयी है।

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