प्रशांत किशोर “लीजेंड” बनते बनते रह गए या बन ही गए?

कल से कांग्रेस की शर्मनाक हार और रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर स्टेटस लिखे जा रहे हैं, चुटकुले बनाए जा रहे हैं. कल वे ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे थे. प्रतिष्ठा सिंह ने अपनी किताब ‘वोटर माता की जय’ में पीके के बारे में भी लिखा था. पीके ने जब बिहार चुनाव में नीतीश कुमार के चुनाव की जिम्मेदारी संभाली थी तो उनकी टीम में प्रतिष्ठा सिंह ने भी काम किया था. अब उनका यह कहना है, “प्रशांत किशोर एक “लेजेंड” बनते बनते रह गए या बन ही गए? अगले चुनाव तक कोई नहीं कह सकता की उनका पत्ता दोबारा किसी पार्टी पे चल भी पाएगा या नहीं। प्रशांत ने नीतीश को नहीं जिताया? यदि यह कहना ग़लत होगा, तो यह कहना क्या सही होगा की प्रशांत ने अखिलेश एंड राहुल को हराया?” आप वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘वोटर माता की जय’ का अंश पढ़िए जिसमें पीके और उनकी रणनीति के बारे में काफी दिलचस्प अंदाज़ में लिखा है प्रतिष्ठा सिंह ने- मॉडरेटर

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प्रशांत किशोर – दी “मेंटौर”

यदि आप मुँह टेढ़ा करके बोलने वाली अंग्रेज़ी से अछूते हैं तो शायद उन्हें “मेंटर” कह बैठेंगे। परन्तु वो ग़लत होगा। बिहार चुनाव में अंग्रेज़ी हो तो ऐसी ही हो, वरना भोजपुरी से भी काम तो चल ही जाता है।

पटना के ‘एगजीबीशन’ रोड पर अब्दुल हाई कॉम्पलैक्स में आईपैक का “वॉर रुम” यानी “युद्ध कक्ष” बनाया गया था। कौन कहता है कि जंग कमरे में बैठ कर नहीं लड़ी जाती? प्रशांत की टीम से पूछिये। रात-रात भर सिगरेट के धुएँ और कम्प्यूटर की रौशनी से धुँधलाए ये सभी अगले दिन की रणनीति बनाने में मशरुफ़ रहते थे। अनुमान वाली राजनीति से परे ये लोग “रियल फ़ैक्टस” पर ध्यान केंद्रित किये हुए थे। मोदी की किसी भी रैली से पहले हमने देखा है उनको सवालों की एक झंडी ट्विट करते हुए। जहाँ रैली होनी हो, वहाँ के बड़े एजेंडे उठाकर मोदी से जवाब माँगते सवाल इंटरनेट पर बैठे शहरी वर्ग को नींद से जगाने का प्रयास थे। तब भी, शहरी लोग आसानी से अपना मत नहीं बदलते। तथ्यों के प्रभाव में तो हरगिज़ नहीं। हाँ बदलना हो तो किसी व्हाट्सऐप मैसेज के बेतुके तर्क पर बदल सकते हैं।

आईपैक में टीम कुछ इस तरह बँटी थी की “मैंटौर” के बाद १२ डॉयरैक्टरस थे। लेकिन ये दिल्ली में स्थानांनतरित थे। आईपैक से पूर्व सिटिज़न फ़ॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस नामक एक संस्था दिल्ली में बनाई गयी थी। बिहार चुनाव में तीन-चार ही काफ़ी थे: प्रतीक, ऋषि, विनेश एवं ईशा। इनके बाद “कोर मेमबर्स” थे, संगठन का ह्रदय। ये शुरुआत में ६०-६५ थे परन्तु धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ कर १५० तक पहुँच गई थी। ये इस बात का प्रमाण तो है ही कि काम ज़ोरों पर चल रहा था मगर इस बात का भी कि प्रशांत ने भी शुरु में नहीं सोचा था कि इतने लोगों कि आवश्यकता पड़ेगी। ख़ैर, कोर मेमबर्स तक का ये प्रशासनिक ढाँचा आईपैक का स्थाई भाग था। इसके नीचे के सभी कर्मचारी केवल बिहार चुनाव तक ही उनके साथ थे। यानी कम्पनी की ओर वफ़ादारी की ज़्यादा उम्मीद इनसे नहीं थी। लेकिन हमने हर ओर यही पाया कि ये निचले स्तर के कर्मचारी पूरी दर्ढ़ता एवं ईमानदार से काम करने के लिए मैदान में उतरे थे। कम-स-कम शुरुआती दौर में तो ये कार्यकुशलता थी ही। बाद में काफ़ी बुझती रही। अब इसे “मैंटौर” की कमी न माना जाए तो बेहतर होगा क्योंकि वे तो इनसे कभी मिले तक नहीं थे! प्रशांत किशोर इनके लिए एक ख्याली पुलाव थे जिन्हें रोज़ सुबह कोर मेमबर्स इनके सामने परोसते थे। “मेरी अभी प्रशांत से बात हुई है और वो आपके काम से बहुत ख़ुश है लेकिन अभी और भी बहुत कुछ है करने को!” या फिर “प्रशांत ने साफ़ मना कर दिया है! साईकल चलाने वालों को पेमेंट हम अभी नहीं कर सकते! उन्हें कहिये एक-दो दिन रुक जाएँ!” या “आज तो प्रशांत ने ‘थैंक्स’ लिखा है व्हाट्सऐप ग्रुप पर! तु तो बहुत ख़ुश होगी… नींद आई थी रात को?” वग़ैरा…। शायद “मैंटौर” की महिमा तभी तलक अपरंपार रहती है जब तलक वो मायावी प्रतीत होता है। रोज़-रोज़ दिखने, बोलने वाले से मंत्रमुग्ध होना थोड़ा मुश्किल है।

प्रशांत के बारे काफ़ी सारे क़िस्से मशहूर हैं। जैसे कि अमित शाह वाला क़िस्सा। बात लोक सभा चुनाव की अभूतपूर्व विजय के बाद की है। कहा जाता है कि मई के चुनावी नतीजों के बाद जून तक धीरज रख चुके प्रशांत ने एक दिन शाह से पूछ ही लिया, “अब तो जून भी आ गया! आगे का क्या प्लान है?” उनका इशारा स्वयं के लिए कोई प्रतिष्ठित पद पाने की ओर रहा होगा पर शाह ने मासूमियत में जवाब दिया,” जुलाई आएगा, और क्या होगा?” शाह के मासूम जवाब की बड़ी कमी ये बताई जाती है कि वे इतना कहकर हँस पड़े थे। प्रशांत को ठेस लगी और वे घायल मन से भाजपा से किनारा कर लिए।

फिर बिहार में अपने दफ़्तर के बारे में उन्होंने पहले ही नीतिश को साफ़ कर दिया था कि वे एक नम्बर अणे मार्ग यानी मुख्यमंत्री निवास पर ही डेरा जमाएँगे। यानी रहना, खाना और दफ़्तर, सब वहीं रहेगा। हम भी उनसे यहाँ पर मिले थे। बड़ा सा कमरा था और दो अर्दली भी थे। चाय भी पूछी गई थी, वो तो हम ही नहीं पीये।

“हर घर, हर मन” नारा कामयाबी का मानो बिगुल बन गया था। लेकिन इससे पहले आईपैक की बड़ी जीत थी “डी.एन.एे.” कैम्पेन। चुनाव प्रचार के पहले जुलाई २०१५ ही में मोदी ने कुछ ऐसा कह दिया कि उनके घर पर एक लाख से अधिक बाल एवं नाख़ून के सैम्पल पहुँच गए। नीतिश (और इसलिए प्रत्येक बिहारी) के डी.एन.ऐ. को ख़राब बताकर मोदी ने प्रशांत को अपनी क्षुधा शांत करने का अवसर प्रदान किया। ऑफ़िस में हमें कईयों ने बताया कि किस तरह सभी को प्रेरित किया गया कि वे “बाहरी” मोदी को दिखा दें के बिहारी ख़ून में कितना दम है।

फिर मामला आया बेनामी पर्चे बँटवाने का। इनमें जातिय समिकर्णों को इस तरह दिखाया गया था मानो सभी नीतीश के साथ हों। ये पर्चे जगह जगह पड़े पाए जाते थे पर इसकी कोई पुष्टी तो नहीं हुई। हालाँकि दफ़्तर में चर्चा थी कि “मैंटौर” जीत के कितने प्यासे थे।

कहते हैं मुहब्बत और जंग में सब कुछ जायज़ है। फिर जब मुहब्बत ख़ुद से हो तो क्या कहिए। “मैंटौर” महत्वकांक्षी हैं और ये एक बढ़िया बात है। जिस ख़ूबी से वे अपनी राजनैतिक सोच को दरकीनार कर किसी भी पार्टी के लिए पूरी शिद्दत से मेहनत करते हैं, उसे प्रेरणात्मक भी माना जा सकता है। लेकिन स्वयं राजनेता में भी कोई बात तो होनी ही चाहिए, है न?

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