‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ और होली का त्यौहार

पिछले दिनों वाणी प्रकाशन से एक किताब आई ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’. नीलिमा चौहान की इस किताब ने जैसे हिंदी साहित्य की तथाकथित मर्यादा की परम्परा से होली ही खेल दी, स्त्रीवादी लेखन को उसकी सर्वोच्च ऊंचाई पर ले जाने वाली इस किताब में दो प्रसंग होली से भी जुड़े हुए हैं. गज़ब की खिलंदड़ भाषा में स्त्री-अनुभवों का एक नया लोक रचने वाली इस किताब के इन अंशों के साथ जानकी पुल की तरफ से होली मुबारक- मॉडरेटर

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ग़ालिब छुटी शराब

हाँ तो जनाब ए आली किस्सा यह कि मैंने होली जैसे मौके पर चंद घूँट भाँग पी। जब वीमेन फ्रेंडली रेड वाइन या ब्रीज़र से भी काम चल सकता था तो भी भाँग पी। शराब के नशे में डूबी औरत को तोहमतों, बदनामियों, अफवाहों, किस्सों के सैलाब में डुबाकर काफिर करार कर देने को आमादा माहौल में पी। शौहरों की बग़लों से चिपटी इज़्ज़्तदार घरैतिनों  के शरीफाना जलसे में पी। डी जे की धुन पर पैर थिरकाती पर निगाहें  पूरे  शामियाने में दौड़ाती लुगाइयों के बीच पी। शराबे असली नहीं, शराबे जौ नहीं, शराबे अंगूरी भी नहीं। बेड़ाग़र्क कर देने वाली  भाँग पी। अजी पी क्या अपनी जान पर खुद ही आफत बुलवाई। हाँ ! सुन रही हूँ मैं। आप बिलावजह फिक्र न करें। बचपन से पीती आई है। पिए ही रहती है। पक्की आवारा है। मौजी  है। खिलंदड़ी है। मर्दों पर डोरे डालने वाली औरत है।

अरे रे रे!! आपको ग़लतफहमी हुई है अगर आप मुझे कच्ची और कमजोर मान रहे हैं। ग़र ऎसा होता तो मैं भी तोहमतों के तूफान के हवाले होने से बचती होती और ठंडाई और लिमका के साथ कोने में खड़ी लाचार थोबड़ा बनाकर पकौड़ियाँ खाती पाई जाती। पर नहीं जी औरत होकर भाँग पीने के साइडइफेक्ट्स  मुझे डरा नहीं सके। पर मीलार्ड भाँग पीकर मरने के साइड इफेक्ट्स अपनी जान पर झेलकर अब मैं बेतरह डर गई हूँ। मर्दों के सुरूर पर तमाम शायरों ने भरपूर शेरो शायरी नहीं भी की होती तो भी नशे में डूबे मर्द को कैसा लगता है यह सारा ज़माना जानता होता। नशे में डूबे मर्दों की ज़ुबान, हरकतें और हंगामे। शरीफाई के पर्दों  को फाड़कर फड़फड़ाती हुई मर्दानी शराबसाज़ी। मै, मैखाने , मैकशी। शराबे तहूर की वाहवाही में महीन से महीन शायरी। पर औरत की मैकशी और औरत के सुरूर पर किसी काबिल शायर ने शायरी नहीं की। अजी शायरों की छोड़िए। आपने खुद भी कभी नशे में टल्ली, मदहोश ,बेफिक्र और बिंदास होकर बकती हुई औरतें देखी हैं क्या? मदहोशी के सैलाब में बहती हुई हर रंजोग़म से ऊपर उठकर जन्नत के नज़ारों का मज़ा पाने जैसा नशा क्या औरतों को भी होता होगा? मुझे तो नहीं लगता कि  मैकशी का ऎसा खूबसूरत अंजाम किसी औरत की किस्मत में होता होगा।

तौबा तौबा! मुझे याद है भाँग का वो ज़ालिम नशा। अनजानी अदृश्य ताकत जैसे खींचकर दुनिया से परे ले जा रही हो। उफ! लाचारी, बेबसी  का वह बेहद खौफज़दा कर देने वाला अहसास। अपने पति बच्चों और घरबार को छोड़कर न मरने की मेरी ज़िद के आगे लगातार जीतता हुआ। कुछ दिन और जीने की मोहलत के लिए तड़पते हुए यह देख पाना कि जवान होते मासूम बच्चों के सिर से माँ का साया उठ जाने पर दुनिया उनपर कितना तरस खाएगी। मेरे बिना न जाने उनको दुनिया की कितनी ठोकरें खानी पड़ॆगीं। कितनी रुसवाइयाँ झेलनी पड़ॆंगी। मैं बेतहाशा चीख रही थी कि यह नशा नहीं है ज़हर पी लिया है मैंने। एक एक साँस के लिए मौत से लड़ती रही क्योंकि मुझे इस तरह बेवक्त, बेवजह, बेकसूर नहीं मरना था। नशे से मरने वाली औरत कहलाई जाने की ज़िल्लत लिए हुए नहीं मरना था। भगवान को हाज़िर नाज़िर मानकर कहती हूँ जनाब शराबखोरी का यह मेरा पहला गुनाह था। यकीनन मैं किसी भगवान को नहीं मानती रही थी पर दिल कह रहा था मुझे किसी मसीहाई ताकत के आगे अपना यह संगीन जुर्म कुबूल करना है। अपनी पहले वाली हसीन और सीधी-सादी ज़िंदगी वापिस पानी है। लोग कितने नाकाबिले मुआफी जुर्म करके भी बेधड़क घूमते हैं मेरा तो जुर्म ही बहुत छोटा-सा है। बस एक बार अपने बच्चों की जिंदगी की ख़ातिर मुझे अपनी ज़िंदगी दोबारा हासिल हो जाए। मेरी मत मारी गई थी या मुझ पर कोई जुनून सवार था। आखिर मैं पाना क्या चाहती थी जी? कहाँ है वह जन्नत? वो बेपरवाही? वो रूहानी सुकून जिसके लिए लोग पीते हैं? बार- बार पीते हैं । जेबें हल्की करके पीते हैं। अपनों को रुसवा करके पीते हैं। ग़म ग़लत करने के बहानों से पीते हैं।

कहीं ऎसा तो नहीं कि मर्दों की बराबरी की सनक में बहकी हुई थी मैं। हो सकता है कि रूहानी आज़ादी हासिल करने की और खुलेपन को जीकर देखने की तमन्ना से भड़की हुई थी मैं। नहीं जी नहीं मैं जैसी हूँ, जो हूँ, जहाँ हूँ , वहीं ठीक हूँ। अपनी छोटी –सी दुनिया की खुशियों और ग़मों के नशे की लत में तारी हुई। आलमपनाह मैं तौबा करती हूँ कि आज के बाद दोबारा इस ऎब को करने का ख़याल तक अपने दिल में नहीं आने दूँगी।

अरे है कोई मसीहा! जो मुझे इस तरह से आज़ाद होने के ख़याल से ही आज़ाद कर दे?

हाय!  बेहद बुरी साबित हुई ये बला। शराबे खाना खराब।

उफ ! ग़ालिब छुटी शराब !!

निगोड़ी होली के हवाले

होली है ही एक ऎसा मुरादी मौका है जब हम बीवियाँ हर ऎरे- ग़ैरे की भाभीजान बन जाया करती हैं। ऐसा हो-हुल्लड़ वाला करामाती दिन जब  गली-मोहल्ले, कुनबे के मज़े के मुरीद तमाम छोटे-बड़े छोकरे, शोहदे और लफंग से लेकर कई सज्जन तक भाभीबाज़ देवर का अवतार ले बैठते हैं।

बरखुर्दार!  यह एक ऎसा मुकद्दस  त्यौहार जब पूरे माहौल में लुगाइयों और भौजाइयों से खिलवाड़ करने की सांस्कृतिक इजाज़त हुआ करती है। अरे भाई  माना कि भौजाइयाँ भी खिलन्दड़ी कम नहीं होती पर इतनी  हिम्मती भी नहीं होती कि अपने खिलंदड़पने  की आड़ में दिल के कोनों में छिपी अपनी भड़ास को पूरा कर लें जैसा कि अक्सर मर्द करते पाए ही जाते हैं। बुरा न मानो होली है की टैग लाइन अपने माथे पर लिए मँडराते हुए होली खेलते देवरों, पति के दोस्तों, मुहल्ले भर के लौंडों की टोली। दूसरी ओर इनसे रंग पुतवाने के लिए शर्मीली, लजीली, सँभली हुई घरवालियों की जमात अपने पूरे होशोहवास में मुस्तैद। एक दिन क्या एक मिनट का जुनून भी महँगा पड़ सकता है इसलिए रंगने और बचने की एक पूरी कवायद। अजी नहीं ये लुगाइयाँ अपनी महफूज़ और पाक खोल से नहीं निकलने वालीं। अपने रुखसार के रंगे जाने के जवाब में बराबरी से रंग लगाने की सोच भी नहीं सकतीं। जी हाँ! अपने लिए बदनामियों को बुलावा देने जैसी बेवकूफाना हरकत ये नहीं कर सकतीं। ये मस्त हैं पर चौकन्नी भी। अपने पर ही नहीं  हर औरत पर है इनकी बारीक़ नज़र। भीगी हुईं  रंगी हुई और “रंग बरसे भीगे चुनर वाली” की ताल पर थिरकती हुई शीलवती लुगाइयाँ।

अरे देखो एक शाइस्ता जनानी की बेख़बरी का नाजायज़ फायदा उठाने वाले देवर ने कैसे  उसे पीठ पीछे से ही रंग से सराबोर कर डाला। और वो देखो कैसे नीमजान सी दिखने वाली उस  मंगलसूत्र धारी तमीज़दार जनानी ने देवरनुमा रंगबाज़ को सस्ते ही में जाने दिया। गाल, बाल और गर्दन पर मले गए रंग की रगड़ के जवाब में शरीफाना लाचारगी की नौटंकी करती लुगाई अगर अपने खिलंदड़ेपन पर उतर आई तो उसकी सालों की कमाई इज़्ज़त ज़मीदोज़ न हो जाएगी? अब तक नेकनामी कमाने में सर्फ होती ऎसी रंगीन मिजाज़ जनानी मर्दों को बराबरी से जवाबी रंग लगाने के जुर्म में जमात बाहर कर दी जाएगी । रंगबाज़ देवरसाहब की बीवी साहिबा की कत्लेआम का ऎलान करती नज़रों का कहर बरसेगा सो अलग। होली तो आई गई हो जाएगी पर मोहल्लेबाज़िनों को महीने भर की चटख़ारेदार बिचिंग का भरपूर असबाब मिल सकता है आज के दिन। तज़ुर्बेकार् ज़नानियाँ जो किसी मातमपुर्सी में भी अपनी एक्स रे सरीख़ी निगाहों को तीन सौ साठ डिग्री के मोड पर चालू रखे हुए रहती हैं। जो अपनी शिकारी नज़रों से उड़ती चिड़िया के पर तक  गिनने की कला जानती होती हैं और जनाब ज़रूरत आन पड़ने पर कतरने का फन भी रखती होती हैं। इनके पास पूरा हिसाब मिलेगा कि  देवर का अवतार लिए हुए किस औरतमार मर्द और भाभी के वेश में अपने अरमान पूरे करती किस मर्दमार लुगाई का शरीर किस-किस कोण पर कितने डिग्री मिला, कैसा सटा और कितनी देर बाद अलग हुआ ।

पिंड दी कुड़ियों!  अगरचे खेलो तो ऎसी होली कि रंगखोर लल्लाओं  की रंगाई और रैगिंग दोनों से बाज़ न आओ। देह से कमसिन कली होने और थोबड़े पर बेचारगी की रंगत ओढ़े रहने के दिन अब लद गए। चुनाँचे खुलकर होली खेलो। खिलंदड़ी हो लो।

 होली के हुड़दंग में अपनी हुड़क को रोकना क्या।

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