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  • स्मरण
  • रवीन्द्रनाथ की संगीत प्रतिभा अद्वितीय थी

    आज रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती है. सम्पूर्ण कलाकार का जीवन लेकर आये उस महान व्यक्तित्व के संगीतकार पक्ष पर हिंदी में बहुत नहीं लिखा गया है. बांगला साहित्य के विद्वान् उत्पल बैनर्जी का यह लेख गुरुदेव की संगीत प्रतिभा को लेकर लिखा गया है जो पढने और संजोने लायक है- मॉडरेटर

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    रवीन्द्रनाथ की प्रतिभा का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है, उनका संगीत। उनकी प्रतिभा का उत्कर्ष देखिए कि कविताओं के अलावा उन्होंने 2000 से ज़्यादा गीत लिखे और उनकी धुनें भी तैयार कीं। ये गीत और उनकी धुनें कोई साधारण स्तर की नहीं हैं, उन्हें दुनिया के किसी भी श्रेष्ठ संगीत की बराबरी में रखा जा सकता है। बंगाल के विख्यात संगीतज्ञ एवं समाजशास्त्री श्री धूर्जटिप्रसाद मुखोपाध्याय ने अपनी पुस्तक ‘शब्द और सुर’ में ‘रवीन्द्र संगीत’ निबंध में लिखा है — ‘‘हिन्दुस्तानी सुरपद्धति के विमूर्त चरित्र को मूर्त करके, सुरों का मानवीयकरण (Humanization) करते हुए रवीन्द्रनाथ ने अनोखे सुर से मिश्रित रचनाएँ की थीं, हालाँकि उन्होंने कला के उच्चस्तर से उन्हें नीचे नहीं आने दिया था। मैंने सुना और पढ़ा है कि विदेश में बीथोवन ने ऐसा काम किया था। अगर यह सच है तो फिर रवीन्द्रनाथ की तुलना उन्हीं के साथ की जा सकती है। हमारे देश में उनकी बराबरी का कम्पोज़र पैदा नहीं हुआ है।’’

    रवीन्द्रनाथ के गीतों की केवल संख्या ही विस्मयकर नहीं है, उनके गीतों की शक्ति और उनका सौन्दर्य भी हमें चकित कर देता है। शक्ति का तो मोटे तौर पर इसी बात से हम अनुमान लगा सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ को इस दुनिया से गए हुए 76 साल बीत चुके हैं किन्तु आज भी दोनों बंगाल में उन्हें देवता की तरह पूजा जाता है। दोनों बंगाल की फ़िज़ा उनके गीतों से लगातार महक रही है। वस्तुतः बंगाल की चेतना का अभिन्न अंग बन गए हैं रवीन्द्रनाथ। धर्म, जाति, वर्ण, अमीर, ग़रीब के भेदों को मिटाकर उनका संगीत शाश्वत अनुभूति का पर्याय बन गया है।

    उनके गीतों के वैभव के बारे में अंदाज़ लगाना हो तो उनकी सांगीतिक पृष्ठभूमि की जानकारी का होना बेहद ज़रूरी है। इसके लिए हमें रवीन्द्रनाथ के संगीत-सृजन तथा उनके संगीत-जीवन को उसके विकास के क्रम में बाँटकर देखना होगा। हमें यह समझना होगा कि शास्त्रीय संगीत और बंगाल के लोक-संगीत की परंपरा को रवीन्द्रनाथ ने किस प्रकार ग्रहण किया था और अपने असाधारण संगीतबोध, अनूठी कल्पनाशक्ति और नवोन्मेषी प्रतिभा के बल पर उन्होंने इन दो धाराओं के संश्लेषण से किस तरह संगीत की निजी शैली विकसित की थी, जिसे हम रवीन्द्रसंगीत के नाम से जानते हैं। उनकी इसी संपदा के कारण हम उन्हें न केवल सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ भारतीय संगीत-सर्जक मानते हैं बल्कि जब हम समूचे विश्व की ओर देखते हैं तो एक ही व्यक्ति के भीतर उनके स्तर का कवि, गद्यकार, चित्रकार, विचारक और संगीतकार हमें कोई और नहीं दिखाई देता, जिसे उसकी माटी देवता की तरह पूजती हो।

    रवीन्द्रनाथ के जन्म से लगभग सौ वर्ष पूर्व बंगाल में रामनिधि गुप्त नामक एक बड़े ही गुणी कवि और संगीतकार हुए थे, जिन्हें हम निधुबाबू के नाम से जानते हैं। वे शास्त्रीय संगीत में पारंगत थे और बहुत अच्छे संगीतकार भी थे। उस दौर में उनके लिखे और संगीतबद्ध किए गीत समूचे बंगाल में बड़े ही लोकप्रिय थे। उन्होंने मूल रूप से टप्पा शैली में गाए जाने वाले प्रेमगीतों की रचना की थी। इसके अलावा उन दिनों वहाँ रामप्रसाद सेन के कालीकीर्तन का भी ख़ासा चलन था। घर-घर में उनका संगीत गाया जाता था। इसके साथ ही भटियाली, बाउल, देवी दुर्गा के आह्वान गीत तथा कई प्रकार के कीर्तनों का भी प्रचलन था। रवीन्द्रनाथ की शुरुआती संगीत रचनाओं में निधुबाबू और रामप्रसाद के संगीत का प्रच्छन्न प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है लेकिन उनका तथा उनके गीतों का भावजगत, अपने पूर्ववर्ती कवि-संगीतकारों से पूरी तरह भिन्न है। इस मामले में वे सबसे अलग और अकेले दिखाई देते हैं। रवीन्द्रनाथ पर बचपन से उनके बड़े भाई ज्योतिरिन्द्रनाथ ठाकुर के संगीत का गहरा प्रभाव पड़ा था। ज्योतिरिन्द्रनाथ कंठ और वाद्य दोनों ही संगीत में निपुण थे और बहुत ही मार्मिक संगीतरचना किया करते थे। उन दिनों के लोकप्रिय गीतकार अक्षय चौधुरी के गीतों को वे संगीतबद्ध करते थे, जो एक अनोखे संगीत का आस्वाद कराता था। पाश्चात्य संगीत पर भी उनका असाधारण अधिकार था। रवीन्द्रनाथ के समकालीन गीतकार-संगीतकार के रूप में बंगाल में द्विजेन्द्र लाल राय, अतुलप्रसाद सेन और रजनीकान्त सेन का भी बंगाल में काफ़ी प्रभाव था। बंगाल में उस समय संगीत की यही परंपरा थी। संगीत की इसी परंपरा की खाद से रवीन्द्रनाथ के गीत-संगीत की फ़सल लहलहाई थी, परंपरा से बहुत कुछ लेते हुए भी वे अपनी अनोखी प्रतिभा की बदौलत ऐसी विस्मयकारी मधुर और मौलिक रचनाएँ रच गए हैं, जिसे मूल भाषा में तथा बिना आस्वाद के समझ पाना संभव ही नहीं।

    हम जानते ही हैं कि आरम्भ से ही उनका पैतृक घर साहित्य, संगीत तथा विभिन्न कलानुशासनों की प्रयोगशाला रहा है। वे इसी वातावरण में बड़े हुए। वह घर ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों की मिलनस्थली था। उनके यहाँ कवि, कथाकार, बुद्धिजीवी, संगीतकार, गायक, कलाकार, चित्रकार, दार्शनिक, समाज सुधारक…. सभी का आना-जाना था। घर में समसामयिक मुद्दों पर सार्थक बहसें होती थीं। गीत रचे जाते थे, उन्हें स्वरबद्ध कर गाया जाता था, नाटक लिखे जाते, अभिनय किया जाता था। उच्चकोटि के संगीत से सारा घर गूँजता रहता था। रवीन्द्रनाथ के सबसे बड़े भाई द्विजेन्द्रनाथ विख्यात कवि, दार्शनिक, गणितज्ञ और संगीतज्ञ थे। दूसरे भाई सत्येन्द्रनाथ संस्कृत के विद्वान थे और बँगला के जाने-माने लेखक और अनुवादक थे। पाँचवें भाई ज्योतिरिन्द्र भी प्रखर बुद्धिजीवी, नाटककार, संगीतकार और कवि थे। बहन स्वर्णकुमारी देवी बँगला की जानीमानी लेखिका और संगीतज्ञ थीं। ऐसे सुन्दर वातावरण में रवीन्द्रनाथ बड़े हुए।

    बचपन में उन्होंने उन दिनों के विख्यात गायक पं. विष्णुचंद्र चक्रवर्ती और श्रीकंठ सिंह से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन की विधिवत शिक्षा ली थी। विष्णुचंद्र चक्रवर्ती से रवीन्द्रनाथ ने ध्रुपद, ख़याल तथा टप्पा की तालीम ली थी। उनका गायन काफ़ी भावपूर्ण होता था। रवीन्द्रनाथ ने उनके इसी गुण को विशेष रूप से ग्रहण किया था। उत्तर भारतीय शास्त्रीय गायन के विषय में उन्होंने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि इसमें केवल राग के व्याकरण और फ्रेम को लेकर ही सोचा जाता है। गीतों की भाषा और भाव यहाँ पूरी तरह उपेक्षित रहते हैं। आज के कुछ-कुछ संगीतकार फिर से इन्हीं सवालों को लेकर संजीदा दिखाई देते हैं कि राजाओं तथा नवाबों को प्रसन्न करने के लिए भोग-विलास की प्रशंसा में रचे गए गीतों को आज के युग में भी चारण की तरह गाने की क्या मजबूरी है! रवीन्द्रनाथ की आपत्ति का आशय भी यही था कि यदि साहित्य समाज का दर्पण है (और ज़ाहिर है कि वह है) तो उसे अपने समकाल को रचनाओं के माध्यम से व्यक्त करना ही होगा।

    संगीतसृजन के शुरुआती दिनों में रवीन्द्रनाथ ने मुख्य रूप से हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति का अनुसरण करते हुए शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों की रचना की थी। इस दौर के उनके गीतों की विषयवस्तु गंभीर क़िस्म की हुआ करती थी। उन पर ध्रुपद का गहरा प्रभाव दिखता है। इसके बाद जब वे अपनी यूरोप यात्रा से लौटे और उस दौर में उन्होंने जिन गीतों को संगीतबद्ध किया उन पर पाश्चात्य संगीत का असर हमें स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनके प्रसिद्ध नाटक ‘काल मृगया’ और ‘वाल्मीकि प्रतिभा’ के गीतों पर हम इस प्रभाव को बख़ूबी महसूस करते हैं। इन नाटकों के कुछ गीतों पर ऑपेरा म्यूज़िक का असर भी सहज रूप से दिखाई देता है, हालाँकि इस दौर में उन्होंने रागों पर आधारित जिन गीतों की रचना की, उनमें एक ख़ासियत यह है कि उनमें वे पूरी तरह राग की शुद्धता की फ़िक्र नहीं करते। यहीं से हमें इस बात के संकेत मिलने लगते हैं कि रवीन्द्रनाथ राग की शुद्धता के बंधन के साथ तमाम तरह के प्रयोग करने लगे थे और कुछ नया करने की बेचैनी उन्हें सर्वथा निजी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित कर रही थी। इसके बाद के गीतों में हम रवीन्द्रनाथ को संगीत की प्रचलित परंपरा को अतिक्रमित कर सर्वथा निजी प्रतिभा के बूते संगीत रचना में नवीन प्रयोग करते देखते हैं। इन दिनों उन्होंने कीर्तन तथा बाउल संगीत पर आधारित गीतों की भी रचना की। उन्होंने स्वरों के विविध प्रकार के मिश्रण द्वारा सर्वथा एक नए प्रकार के संगीत का सृजन किया था। हालाँकि इस दौर को हम उनके संगीत-सृजन का सर्वश्रेष्ठ दौर नहीं कह सकते। इसके बाद रवीन्द्रनाथ ने शास्त्रीय संगीत के साथ बड़े ही साहसी प्रयोग किए हैं। उन्होंने इस बार बंगाल की माटी के लोक स्वरों को शास्त्रीय संगीत के सुरों के साथ मिलाकर अनोखे संगीत की सर्जना की है। बाउल, भटियाली संगीत की मिठास जब राग-रागिनियों के साथ मिली तो एक विस्मयकारी संगीत ने जन्म लिया था। शास्त्रीय संगीत के कड़े अनुशासन से मुक्त कर उन्होंने राग के सुरों को ग्राम्य संगीत के रस के साथ मिलाकर ऐसा रसायन तैयार किया, जिसने उनके काव्य को अमर कर दिया है। उनके गीतों में मींड का बहुत ही सुन्दर प्रयोग मिलता है। सुरों के विन्यास जिस मधुरता की सृष्टि करते हैं, वह उनके भावों को विदेह नहीं रहने देती, हमारी चेतना में तमाम भाव काया धरकर आते और तब हम उनके रूप, रस और गंध को महसूस कर पाते। सुरों के मिश्रण में रवीन्द्रनाथ लाजवाब थे। उन्होंने सुबह के रागों के साथ शाम या रात के रागों का ही मिश्रण नहीं किया, उन्होंने अलग-अलग ठाटों के रागों के सुरों को इस तरह मिलाया कि उससे उपजा संगीत हमें सर्वथा नया अनुभव देता है। यही उनकी संगीत सर्जना का सर्वोत्तम दौर था। इसी में उनकी मौलिक प्रतिभा का सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य हमें दिखाई देता है। यहीं उनके संगीत का असली स्वरूप और उसकी विशिष्टता के प्रमाण दिखते हैं। यहाँ तक आते-आते यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वे शब्द और सुर के आत्मीय संश्लेषण से उपजे संगीत के ही पक्षधर थे। यही कारण है कि गीतों को संगीतबद्ध करते हुए उनके मन से कभी भी गीतों के भाव उपेक्षित नहीं हुए। उन्होंने हमेशा गीतों के भाव के अनुरूप ही सुरों की रचना की।

    यह रवीन्द्र-प्रतिभा के बूते की ही बात थी कि उन्होंने जितने भी गीत लिखे, लगभग सभी की उन्होंने धुन भी बनाई। इसके उलट कई बार ऐसा भी हुआ कि उन्हें कोई धुन सूझी तो तुरंत उन्होंने उसके लिए गीत भी लिख डाला। शुरू के लगभग सभी गीतों की धुन उन्होंने विशुद्ध रूप से भारतीय शास्त्रीय रागों के आधार पर तैयार की थीं और वे धुनें कमाल की हैं। उन्होंने इन रचनाओं के द्वारा उस समय के प्रचलित संगीत की एकरूपता को तोड़ते हुए संगीत का सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा था। ‘संगीत की मुक्ति’ निबंध में उन्होंने लिखा है — ‘‘मैं जिस भी तरह से गीतों की रचना क्यों न करूँ, राग-रागिनियों का रस उसमें मिला ही रहेगा। ’’ यानी उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि राग-रागिनियों की उपेक्षा कर अच्छे गीत नहीं लिखे जा सकते। उन्होंने जब ध्रुपद शैली में गीत लिखे तो ध्यान रखा कि ताल की प्रबलता गीतों के मिज़ाज पर किसी तरह का प्रतिकूल प्रभाव न डाले। अपने ज़बर्दस्त संगीतबोध और अनोखी कल्पनाशक्ति की बदौलत उन्होंने ऐसी धुनें बनाईं जो हमें विस्मय से भर देती हैं। उनके द्वारा किए गए रागों और सुरों के मिश्रण में कुछ ऐसी मौलिकता और विशिष्टता थी कि उनके गीत इतने मर्मस्पर्शी बन सके हैं। गीतों में छन्दों का प्रयोग भी एक उल्लेखनीय वस्तु है। हालाँकि उन्होंने छन्द के चलन को कठोर नियमों के बंधनों में नहीं बाँधा और यही कारण है कि उनके रचे गीतों के मिज़ाज को किसी तरह की क्षति नहीं पहुँची है। धुन बनाते समय भी उन्होंने बहुत सावधानी से गीत के भावों की रक्षा की है। यूरोप यात्रा के दौरान तथा बाद की कई धुनों पर पश्चिमी संगीत का असर दिखाई देता है, लेकिन वे धुनें हमारी संगीत परम्परा का भावबोध लेकर ही रूपाकार ग्रहण करती हैं। बड़ी उम्र में उनका यह भावबोध और भी परिपक्व होता दिखता है। इस समय के गीतों में स्वरों और शब्दों के संयोजन में जो विविधता और प्रयोगशीलता दिखाई देती है, वह रवीन्द्रनाथ की विलक्षण प्रतिभा के उत्कर्ष का निदर्शन कराती है। आखि़र-आखि़र में वे संगीत की भी मुक्ति की बात कहने लगे थे। वे गीतों को तमाम नियमों के बंधनों से मुक्त करके हृदय के साथ, प्राणों के साथ जोड़ देना चाहते थे और इसी सुसंगति में उन्हें संगीत की मुक्ति दिखाई दी थी। इस मुक्ति का अर्थ स्वेच्छाचारिता नहीं था, इसका अर्थ था — स्वाधीनता। इसी स्वाधीनता ने उनके गीतों को नया जन्म दिया था।

    धूर्जटिप्रसाद मुखोपाध्याय का मत था कि इस देश में रवीन्द्रनाथ-जैसा कम्पोज़र कोई और पैदा नहीं हुआ। हम उनकी बात को और भी आगे ले जाकर कहना चाहते हैं कि उन-जैसा बहुआयामी कम्पोज़र केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में कोई नहीं दिखाई देता। उनकी थोड़ी-बहुत तुलना बीथोवन के साथ की जाती है लेकिन रवीन्द्रनाथ हमें अन्यतम ही मालूम होते हैं। पश्चिम में बीथोवन, मोत्सार्ट, सैबेस्टियन बाख़-जैसे संगीतज्ञों ने अद्भुत संगीत रचनाएँ कीं। लेकिन उनकी रचनाएँ मूल रूप से वाद्यवृंद रचनाएँ हैं, यानी वहाँ हमें एक प्रकार का सुरों का अमूर्तन ही मिलता है। इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ के संगीत में अनोखे गीतों की सुसंगति ने अमूर्त को मूर्त कर दिया है। जीवन की विविध रूपच्छटाओं की बहुआयामी अभिव्यक्ति ने उनके संगीत को इतनी ऊँचाई प्रदान की है। संगीत का ऐसा मानवीयकरण ¼Humanization½ हम विश्व में कहीं और नहीं देखते। साहित्य और संगीत के इस अनोखे मिलन ने रवीन्द्रनाथ को पूरी दुनिया में सबसे अलग स्थान प्रदान किया है। वे दुनिया में अकेले ऐसे कवि हैं, जिनके लिखे गीत दो देशों के राष्ट्रगान हैं।।

    रवींद्र की रचनाओं के ठीक-ठीक अनुवाद न होने और उनके रचनाकार व्यक्तित्व को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत न कर पाने के कारण आज पश्चिमी साहित्य और संगीत के दिगंत में हमारा यह अनूठा रवि अस्त हो गया है। पश्चिम की दुनिया उन्हें समझने से चूक गयी है। इससे भी बड़ा दुःख तो यह है कि हम ही बंगाल के बाहर रवीन्द्रनाथ को कितना पढ़ और समझ पाए हैं, हम आज भी उन्हें विश्व कवि माने बैठे हैं, जबकि उनकी विश्वकवि की छवि तो विस्मृति के घटाटोप में कब की बिला चुकी है!  हम जब तक उन्हें उनकी मूल भाषा में नहीं पढ़ेंगे, तब तक हम उनकी असली ताक़त और रंगत को कभी नहीं समझ पाएँगे। अनुवादों के ज़रिये बक़ौल रसूल हमज़ातोव `हम कालीन को पीछे की ओर से देख कर उसके असली रंगरूप को देखने से चूक जायेंगे’।

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    उत्पल बैनर्जी

    उत्पल बैनर्जी

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    डेली कॉलेज कैम्पस,  इन्दौर – 452 001, मध्यप्रदेश।

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