अनुशक्ति सिंह की (अ)कविताएँ

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम हज़ारों तरह की परिस्थितियों से गुज़रते हैं। लेकिन एक वक़्त आता है, जब यह ‘गुज़रना’ हमारा अनुभव बन जाता है। उन अनुभवों को लिखना उतना ही मुश्किल है, जितना एक रूह को पैकर देना। अनुशक्ति की कविताएँ ज़िंदगी के नए ‘डायमेंशन’ की तरफ़ इशारा करती हैं। जहाँ सबकुछ घट चुकने के बाद भी प्रेम अपने वास्तविक स्वरूप में शेष रह जाता है। आइए पढ़ते हैं अनुशक्ति सिंह की (अ)कविताएँ – त्रिपुरारि

१)

उस महीने जब पेड़ से पत्ते बिखर रहे होते हैं
कुछ टूटता जाता है हमारे अंदर भी
मार्च की बीतती अफरा तफरी में
दिन कुछ अजीब सा होता जाता है
जैसे खीरे की जड़ मे कुछ कड़वा सा रह जाता है…
छूट जाते हैं मोह के रास्ते
नेह के दरवाज़े किर्र-किर्र करने लग जाते हैं।
सब पा लेने की ज़िद मे
बहुत कुछ छूटता जाता है…
जैसे निवेश की कोई पर्ची भरने को रह गयी हो,
लग गया हो उम्मीद पर उम्मीद से ज़्यादा टैक्स।
इसी महीने जब अकाउंट्स वाले
सब निबटा रहे होते हैं…
हमारे भीतर का भी कुछ जल रहा होता है
पार्क में जलाए जा रहे सूखे पत्तों के साथ…

२)

नीम अकेलेपन में
जब मैं खो चुकी होऊँगी
दूर जा चुकी होऊँगी
सारे ख़यालों से
किसी फ़िल्मी सीन में
अपने आप को ढूँढ रही होऊँगी
तब क्या तुम्हें मेरी याद आ रही होगी?
कुछ गाने बज रहे होंगे,
कुछ तेज़, कुछ धीमें
तुम भी कुछ गुनगुना रहे होगे
पर मैं नहीं होऊँगी…
तुम्हें सुनने को…
क्या तुम तब भी गुनगुनाओगे?

​३)

कभी कभी मैं चाहती हूँ ‘तुम’ हो जाना
जब मैं ‘तुम’ बन जाऊँ, तुम ‘मैं’ बन जाना
जब तुम ‘मैं’ बन जाओगे
थोड़े से झक्की भी हो जाओगे
थोडे निर्भीक, थोड़े आशिक़
जब तुम ‘मैं’ बन जाओगे
प्यार करना भी सीख जाओगे।
तब पता है मैं क्या करूँगी?
मैं ‘तुम’ बनकर ख़ुद पर हँसूँगी…
दूर से तुम्हें देखूँगी
और पलट कर खो जाऊँगी,
किसी भीड़ में…
जहाँ मुझे वापस ‘तुम’ न होना पड़े।

४)

सखियों ने कहा था मुझसे,
प्रेम को इतना न पगो सखी
यह तो महज़ स्वर्ण मृग है
कनक आवरण में,
रत्नों का श्रृंगार महज़ छलावा है…
विनाशकारी है,
इस मायाजाल के मोह में बंधना
पर हे प्रिय, मैं तो उसी सीता के कण से उत्पादित हूँ
प्रेम के रज से भी प्रेम करने को आतुर
मुझे तो स्वर्ण मृग भी सत्य ही दिखता है…
उस सत्य को पकड़ लेना चाहती हूँ मैं,
उसके आवरण को बिछा देना चाहती हूँ,
तुम्हारे पांवों के नीचे…
ताकि जंगल-जंगल भटके तुम्हारे पाँव,
जब मेरे प्रेम के आवरण पर सुकून पाएं,
मेरी भ्रान्ति को भी स्वर मिल जाए…

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