धर्म जनता की अफीम है- कार्ल मार्क्स

अपने नॉर्वे प्रवासी डॉ प्रवीण झा का लेखन का रेंज इतना विस्तृत है कि कभी कभी आश्चर्य होता है. उनके अनुवाद में प्रस्तुत है आज कार्ल मार्क्स के उस प्रसिद्ध लेख का अनुवाद किया है जिसमें मार्क्स ने लिखा था कि धर्म जनता की अफीम है- मॉडरेटर

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यह लेख कार्ल मार्क्स के १८४३-४४ ई. में लिखे ‘हेगेल’ के दर्शन की आलोचना के रूप में लिखा गया। हालांकि यह लेख जर्मन में लिखा गया, और जर्मनी के संदर्भ में लिखा गया पर इसकी एक पंक्ति लोकप्रिय हुई, जिसमें धर्म को जनता की अफीम कहा गया। हालांकि इस लेख के कई अन्य पहलू है, परंतु इसकी प्रारंभिक भूमिका का सार का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है, जिसमें यह पंक्ति है।

हेगेल के दर्शन की आलोचनात्मक संक्षिप्त व्याख्या

लेखन: कार्ल मार्क्स, १८४३-१८४४

प्रथम प्रकाशन: ड्यूश फ्रैंजोशिशे य्हारबूकर, १८४४

श्रोत: marxist.org archive

अनुवाद: प्रवीण झा

मानव, जो स्वर्ग में एक महामानव की खूबसूरत कल्पना करता है, और वहाँ कुछ नहीं पाता, सिवाय उसके अपने प्रतिबिम्ब के; अब अपने प्रतिबिम्ब की खोज के लिए बाध्य नहीं, बल्कि एक नश्वर वस्तु की खोज करे, और अवश्य करे, और वो है परम सत्य।

अधार्मिक आलोचना का आधार है कि- मनुष्य धर्म का निर्माण करता है, धर्म मनुष्य का निर्माण नहीं करता। धर्म उस मनुष्य की आत्म-चेतना और आत्म-गौरव है, जिसने स्वयं को नहीं पाया या स्वयं को खो दिया। पर मनुष्य कोई ऐसा जीव नहीं, जो विश्व के बाहर प्रवास करता हो। मनुष्य संसार का वासी है, राज्य का, समाज का। यही राज्य, यही समाज, धर्म का निर्माण करता है, जो कि ऊर्ध्व-विश्वचेतना है, क्यूँ कि यह एक ऊर्ध्व-विश्व (उल्टा संसार) है। धर्म विश्व का एक सिद्धांत है, एक विश्वकोषीय संग्रह है, एक लोकप्रिय रूप में तर्क है, एक आध्यात्मिक सम्मान-बिंदु है, सांसारिक उत्साह है, नैतिक सहमति है, विधिपूर्ण पूरक है, सांत्वना और औचित्य का सार्वभौमिक स्नोत। यह मनुष्य के जीवन-सार का खूबसूरत अहसास है क्यूँकि जीवन का सार परम-सत्य नहीं है। धर्म के विरूद्ध संघर्ष इसलिए परोक्ष रूप से उस दुनिया की लड़ाई है जिसमें धर्म एक आध्यात्मिक सुगंध है।

धार्मिक संकट एक ही समय में असल संकट की अभिव्यक्ति भी है और विरोध भी। धर्म उत्पीड़ीत प्राणी का उच्छ्वास है, एक हृदय-विहीन दुनिया का हृदय है, आत्माहीनों की आत्मा है। यह जनता की अफीम है।

जो धर्म भ्रामिक खुशी देता है, उसे समाप्त कर वास्तविक खुशी की माँग करनी है। मौजूदा परिस्थितियों के भ्रम को त्यागने की माँग एक ऐसी स्थिति को त्यागने की माँग है जिसमें भ्रम की आवश्यकता होती है। इसलिए भ्रूण रूप में, यह उस अश्रु-घाटी की आलोचना है जिसका धर्म प्रभामंडल है।

इस आलोचना ने उस काल्पनिक पुष्प-माला को तोड़ दिया है ताकि मनुष्य भले ही धूमिल, अनलंकृत माला पहने, पर उस माला को हिलाकर जीवित पुष्प चुन सके। धार्मिक भ्रमों की आलोचना का लक्ष्य यह है कि मनुष्य अपने कर्म और मष्तिष्क से तर्क कर सके, और एक आत्म-सत्य का निर्माण करे, और अपने सत्य के सूर्य की परिक्रमा कर सके। धर्म मात्र एक भ्रामक सूर्य है, जो तब तक उसकी परिक्रमा करता है, जब तक वह स्वयं अपने सत्य की परिक्रमा करने में अक्षम हो।

इसलिए इतिहास का कार्य यह है कि दुनिया जब सत्य से परे हो गई है, तो वहाँ सत्य की स्थापना हो। दर्शन का तात्कालिक कार्य, जो इतिहास का उत्तरदायित्व है, कि जब मनुष्य के आत्म-विरोध के पवित्र रूप से परदा हट गया हो, तब उसके अात्म-विरोध के अपवित्र रूप से परदा हटे। इस प्रकार स्वर्ग की आलोचना दरअसल पृथ्वी की आलोचना में परिवर्तित होती है, धर्म की आलोचना विधानों की आलोचना में, और धर्म-शास्त्र की आलोचना राजनीति की आलोचना में।

आलोचना का अस्त्र कभी भी, सत्यत: अस्त्रों द्वारा आलोचना की जगह नहीं ले सकता। भौतिक ताकतों को भौतिक ताकतें ही उखाड़ सकती है। लेकिन एक सिद्धांत भी भौतिक ताकत का रूप ले लेती है, अगर जनता ने उसे आत्मसात कर लिया हो। हालांकि सिद्धांत में जनता पर कब्जा करने की ताकत होती है, और तभी यह कट्टरपंथ को जन्म देती है। कट्टरपंथी होने के लिए सिद्धांत की जड़ तक पहुँचना होता है। पर मनुष्य का जड़ तो मनुष्य स्वयं है। जर्मन सिद्धांतों के और इसकी प्रायोगिक शक्ति की कट्टरता का स्पष्ट प्रमाण यह है कि इसकी शुरूआत धर्म के सकारात्मक उन्मूलन से होती है। धर्म की आलोचना इस शिक्षा से समाप्त होती है कि मनुष्य ही मनुष्य के लिए महामानव है, इसलिए वो सभी संबंध उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है जो मनुष्य को गुलाम, नीच और दलित बनाते हैं।

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