वीभत्स रस और विश्व सिनेमा

युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर इन दिनों बहुत रोचक ढंग से नौ रस के आधार पर विश्व सिनेमा का अध्ययन कर रहे हैं. आज वीभत्स रस के आधार पर विश्व सिनेमा की कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों का विश्लेषण प्रस्तुत है- मॉडरेटर 
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इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1.                  भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र : http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html
2.                   भयावह फिल्मों का अनूठा संसार: http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html

इसी में तीसरी कड़ी है वीभत्स रस की विश्व की महान फिल्में।
अब आगे :-
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वीभत्स रस औरविश्व सिनेमा

वीभत्स रस पर चर्चा करने से पहले कुछ आपत्तियों को खारिज कर देना उचित होगा। सौंदर्यशास्त्री श्रीयुत कोहल ने पत्र लिख कर अपनी आपत्ति से अवगत कराया है कि जैसा कि पहले के लेख में लिखा है कि नाटक  बुराई पर अच्छाई की विजय का उद्घोष लिए, ज्ञान का मशाल लिए, सत्य का जयगान लिए कल्याणकारी संगीत है, इससे वह पूरी तरह असहमत हैं। न केवल असहमत हैं वरन उनका कहना है कि प्राचीन भारतीय सौंदर्यशास्त्र का मानक ग्रंथ, यानि भरतमुनि का पाँचवा वेद नाट्यशास्त्र इस विचार के विपरीत अच्छे-बुरे का पक्ष नहीं लेता। इसी सिद्धांत पर यह फिल्मों पर भी कतई लागू नहीं हो सकता।

मैं उनकी आपत्ति को पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। नाट्यशास्त्र के अनुसार जब मानव स्वभाव इसके दु:ख-सुख के साथ अनुभावों के द्वारा दर्शाये जायेंगे, तब वह नाटक कहलायेगा। ब्रह्मा के अनुसार नाटक दैत्य और देवों, दोनों के लिये अच्छा या बुरा हो सकता है। फिर भी मैं अपनी कही बात रखना चाहूँगा कि तरह-तरह ज्ञान से मानव अच्छाई ही तो ग्रहण करता है। यह किसी

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