जसिंता केरकेट्टा की कुछ कविताएँ

जसिंता केरकेट्टा झारखंड में रहती हैं और उनकी कविताओं में मूल निवासी समाज का दर्द, संघर्ष नज़र आता है। आज उनकी कुछ कविताएँ पढ़ते हैं जो उनके शीघ्र प्रकाशित होने वाले कविता संग्रह ‘ईश्वर और बाज़ार’ से है, जिसका प्रकाशन राजकमल से होने वाला है – मॉडरेटर

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1.
 
राष्ट्रवाद
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जब मेरा पड़ोसी
मेरे ख़ून का प्यासा हो गया
मैं समझ गया
राष्ट्रवाद आ गया ।
 
2.
 
जहाँ कुछ नहीं पहुंचता
……………………………
 
पहाड़ पर लोग पहाड़ का पानी पीते हैं
सरकार का पानी वहाँ तक नहीं पहुँचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुँचता
अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं पहुंँचता
बिजली नहीं पहुँचती इंटरनेट नहीं पहुँचता
वहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता
 
साब! जहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता
वहाँ धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना ज़हर कैसे पहुँचता है?
 
 
3.
 
पहाड़ और पहरेदार
……………………
पहाड़ के पहरेदार
जन्म से पहाड़ को जानते हैं
सूंघ कर जंगल की गंध बताते हैं
नाड़ी छूकर उसकी देह का ताप
और उसके चेहरे के बदलते रंग बताते हैं
पहाड़ों, पेड़ों, झरनों यहां तक कि
मिट्टी के नीचे दबे कंद मुल के नाम जानते हैं
वे पहाड़ के सीने में दिल की तरह बसते हैं
जिनके धड़कने से पहाड़ बचे रहते हैं
 
पहाड़ों की उम्र क्या है
पूछने पर वे क्या कहते हैं?
उनका प्यार ही पहाड़ की उम्र है
यह प्यार उनके पुरखों के पुरखों के पुरखों से
शुरू होता है
पहाड़ की नसों में पीढ़ी दर पीढ़ी
उनका ही प्यार खून की तरह बहता है
इसलिए पहाड़ सदियों तक जिंदा रहता है
 
पर एक दिन शहर के चौकीदार
अपने मालिक का इशारा पाकर
पहाड़ पर आते हैं
और कई दिनों से भूखे खोजी कुत्ते की तरह
पहाड़ पर अकेली घूमती स्त्री को देख लार टपकाते हैं
स्त्रियों को मांस का लोंधा समझने को अभिशप्त
ये जंगल की स्त्रियों के मांस पर टूट पड़ते हैं
और भोर उठकर पेड़ से शलप उतारने जा रहे
उनके प्रेमियों को गोली मार देते हैं
ये शहर लौटकर गर्व से चिल्लाते हैं
देखो, जंगल से हम माओवादी मारकर आते हैं
 
ये पहाड़ पर अपने तमगे की तलाश में भटकते हैं
और आदमियों का शिकार कर लौटने के बाद
उनकी लाश बिछाकर, शहर से सम्मान लेते हैं
ये कौन हैं?
ये उस जमात के लोग हैं
जो जानवरों का नाम लेकर सदियों से
आदमियों को मारने के अभ्यस्त हैं
काग़ज़ के टुकड़ों के आगे जो
मालिकों के इशारे पर जीवन भर नाचते हैं
और देह के भीतर अपनी ही आत्मा का मुंह
कस कर पट्टियों से बांधते हैं
 
पहाड़ जानते हैं
जीवित आत्माओं का संघर्ष
आत्मा विहीन ऐसी लाशों से है
जिन्होंने खुद को अनवरत बेचा है
जीवन को जुगाड़ ही देखा है
नौकरी करते हुए गुलामी कमाई है
और ऊपर से आदेश आते ही हमेशा
पहाड़ की समृद्ध संस्कृति पर गोली चलाई है
 
ये पहाड़ के कभी नहीं थे
न कभी हो सकेंगे
ऐसे लोगों से पहाड़ के लोग लड़ते हैं
सिर्फ़ इसलिए
कि वे पहाड़ से प्यार करते हैं ।
 
4.
 
सेना का रुख़ किधर है ?
…………………………
युद्ध का दौर खत्म हो गया
अब सीमा की सेना का रुख़ उधर है
मेरा स्कूल-कॉलेज, गांव-घर, जंगल-पहाड़ जिधर है
 
कौन साध रहा है अब
चिड़ियों की आंख पर निशाना ?
इस समय ख़तरनाक है सवाल करना
और जो हो रहा है उस पर बुरा मान जाना
क्योंकि संगीनों का पहला काम है
सवाल करती जीभ पर निशाना लगाना
 
खत्म हो रही है उनकी
बातें करने और सुनने की परंपरा
अब सेना की दक्षता का मतलब है
गांव और जंगल पर गोलियां चलाना
और सवाल पूछते विद्यार्थियों पर लाठियां बरसाना
 
यह दूसरे तरीके का युद्ध है
जहां संभव है
गांव में बहुतों के भूखे रह जाने का
किसानों के आत्महत्या कर लेने का
और शहर में आधे लोगों का
बहुत खाते हुए , तोंद बढ़ाते हुए
अपनी देह का भार संभालने में असमर्थ
एक दिन नीचे गिर जाने का
और अपनी ही देह तले दबकर मर जाने का
 
किसी युद्ध में बम के फटने से
यह शहर धुआँ-धुआँ नहीं है
यह तो विकास करते हुए
मंगल ग्रह हो जाने की कहानी है
इस विकास में न बच रहे जंगल -पहाड़
न मिल रही सांस लेने को साफ़ हवा
और लोग ढूंढ रहे कि कहां साफ़ पानी है
 
कोई युद्ध न हो तब भी सेना तो रहेगी
आख़िर वह क्या करेगी ?
वह कैंपों के लिए जंगल खाली कराएगी
जानवरों की सुरक्षा के लिए
गांव को खदेड़ कर शहर ले जाएगी
और शहर में सवाल पूछते
गांव के बच्चों पर गोली चलाएगी
 
आख़िर क्यों सीमा की सेना का रुख़ उधर है
मेरा स्कूल-कॉलेज, गांव-घर, जंगल-पहाड़ जिधर है?
 
5.
 
बच्चे अपने पिता को माफ़ न कर सके
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हिटलर की मौत के बाद भी लंबे समय तक
कई घरों में छिड़ी रही एक लंबी लड़ाई
जहां चुप रहने और विरोध न करने के लिए
कई बच्चे अपने पिता को माफ़ न कर सके
वे माफ़ न कर सके उन पड़ोसियों को भी
जो बंद रहे अपने घरों में चुप
दूसरों के लिए सड़कों पर निकल न सके
 
एक दिन युवा सड़कों पर उतरे
अपने पिता और पड़ोसियों के
चुप रहने, प्रतिरोध न कर पाने का प्रायश्चित करने
जिनके लिए उनके पिता न लड़ सके
विश्वविद्यालयों से उनके बच्चे बाहर निकले
मारे गए लोगों को उनका हक दिलाने
 
और फिर एक दिन
जहां ढह गया था युद्ध में
हिटलर का पुराना दफ़्तर
युवाओं की मांगों ने ठीक उसी जगह
मारे गए हर आदमी के नाम का
पत्थर की सिल्लियों वाला विशाल स्मारक बनवाया
 
कुछ लोगों ने मिलकर हर उस घर को ढूंढा
जहां मारे गए लोगों में से कभी कोई रहता था
फिर ऐसे हर घर के सामने
उनके नाम का लोहे का प्लेट लगवाया
और फिर से उनकी यादों को जिंदा करवाया
 
एक आदमी जिसे जर्मनी ने पहले प्यार किया
फिर उसी आदमी से नफरत भी किया
जिसने देश को पूरी तरह गर्त में पहुंचाया
आज ठीक वैसा ही एक आदमी
जगह और समय बदलकर
एक सी घटनाओं के साथ फिर नजर आया
 
इससे पहले कि वह आदमी
फिर से किसी देश को गर्त में ले जाए
इससे पहले कि पीढ़ियों को सदियों तक
उसके पापों का प्रायश्चित करना पड़े
इससे पहले कि बच्चे अपने पिता
और पड़ोसियों को
चुप रहने और प्रतिरोध न करने के लिए
कभी माफ़ न कर सके
उस आदमी में बसे हिटलर को
पूरी ताकत के साथ
उसकी असली जगह दिखा देनी चाहिए ।
 
© जसिंता केरकेट्टा

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