मुआशरे को मुर्दा होने से बचाने वाली शायरी


कल जाने-माने शायर राजेश रेड्डी का जन्मदिन था। इस मौक़े पर पढ़िए मशहूर युवा शायर इरशाद ख़ान सिकन्दर का यह लेख, यह लेख पहले उर्दू में रावलपिंडी, पाकिस्तान से छपने वाली उर्दू पत्रिका ‘चहार सू’ के जनवरी 2023 अंक में प्रकाशित हुआ था, पत्रिका का यह अंक राजेश रेड्डी विशेषांक था। आप भी पढ़ सकते हैं-

========================

किसी दिन जिंदगानी में करिश्मा क्यों नहीं होता
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िन्दा क्यों नहीं होता

इस शेर के ख़ालिक़ है जनाब राजेश रेड्डी. ये बात सौ फ़ीसद सच है कि शेर की तशरीह करने से शेर के मानी सिमट जाते हैं इसलिए कोई तशरीह नहीं, सिर्फ़ इस शेर के दो लफ़्ज़ ‘मैं और ‘क्यों’ पर आपको ग़ौरो-फ़िक्र की दावत देना चाहता हूँ. अगर आपके जिस्म में एक दिल है और वो दिल धड़क भी रहा है अगर आप अभी तक ज़हनी तौर पर अपाहिज नहीं हुए हैं अगर आपकी आँखें अपने होने का पता देती हों, ख़्वाह आप आम आदमी हों कि ख़ास, आपको इस ‘मैं’ और ‘क्यों’ पर बार-बार ग़ौर करना चाहिए, लेकिन अगर आप मुर्दा हैं तो ये शेर आपके लिए नहीं है, कि शायरी मुर्दों के लिए नहीं बल्कि मुआशरे को मुर्दा होने से बचाने के लिए होती है, और राजेश रेड्डी साहब इस बचाव-अभियान में पूरे तौर पर जी जान से जुटे हुए नज़र आते हैं न सिर्फ़ जुटे हुए बल्कि उनकी ग़ज़लें पढ़कर महसूस होता है कि जैसे कोई शख़्स गलियों-गलियों ‘जागते रहो’ की सदा बुलन्द करता हुआ फिर रहा हो और इस सफ़र में जगह-जगह बक़ौल शुजाअ ख़ावर ‘एक मंज़र ठीक मेरी आँख पर आकर लगा’ की कैफ़ियत से दो-चार हो रहा हो-
बाद में डूबी होगी नाव
पहले दिल डूबे होंगे
बारहा राजेश रेड्डी के अन्दर का शायर भी इस दिल और नाव के डूबने से दुखी हो जाता है, हो भी क्यों न? शायर जो है?
वो आफ़ताब लाने का देकर हमें फ़रेब
हमसे हमारी रात के जुगनू भी ले गया
मायूसी तब और ज़ियादा बढ़ जाती है जब सुबह की आमद भी ख़ाली हाथ होती है
कुछ न बदला सुबह के ऐलान से
तीरगी ही आयी रौशनदान से
लेकिन यहाँ ये शायर थक-हार कर बैठता नहीं बल्कि कुछ ही देर बाद अपनी आँखों से बहती आंसुओं की धार को पोंछकर कमर कस लेता है उसे फिर नयी उमीदें नये रास्ते सुझाई देने लगते हैं,
हद्दे-नज़र से आगे लगातार देखना
ज़िन्दां में आ गया पसे-दीवार देखना
राजेश रेड्डी साहब फ़रमाते हैं ‘अल्लाह जानता है कि काफ़िर नहीं हूँ मैं’ यक़ीनन वो ख़ुदा-ए-सुख़न मीर साहब के इस शेर पर पूरी तरह ईमान ला चुके हैं
शेर मेरे हैं गो ख़वास पसन्द
पर मुझे गुफ़्तगू अवाम से है
ग़ज़ल के मानी अगर महबूब से बातें करना है तो राजेश रेड्डी का महबूब पूरा मुआशरा है उनकी तमाम शायरी समाज के दुःख दर्द में एक हमदर्द की तरह साथ खड़ी और समाज को तकलीफ़ पहुँचाने वालों के ख़िलाफ़ खड़ी नज़र आती है और इस शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि इसका लहजा करख़्त नहीं है, शायरी को शायरी ही रखना उसे तक़रीर होने से बचा लेना राजेश रेड्डी का कमाले-फ़न है. एक शेर में फ़रमाते हैं
आप कहते हैं जिसको ख़ामोशी
हम तो शायर उसी ज़बान के हैं
मेरी थोड़ी सी समझ के मुताबिक़ यही तो है कमाले-फ़न.
अगर मैं अपनी बात करूँ तो मैं ग़ज़ल का एक बहुत अदना सा तालिबे-इल्म हूँ. अक्सर कुछ सीखने की तलब में दानिश्वरों को देखता सुनता पढ़ता रहता हूँ लेकिन मुझे हैरत होती कि आजकल हिंदुस्तान में जब ग़ज़ल की बात होती है तो अमूमन लोग हिंदी उर्दू की बहस में उलझे पाए जाते हैं. और ये बहस किसी भी तरह मुक़द्दमा जीत लेने के मक़सद से की जाती है. आमतौर पर देखने में आता है कि उर्दू ग़ज़ल यानी ऐसी फ़ारसी तराकीब और अलफ़ाज़ का ज़ख़ीरा कि बग़ैर लुग़त आप लफ़्ज़ी मानी तक भी न पहुँच पायें बल्कि आप ही क्या ईरानी भी न पहुँच पायें तो कोई हैरत की बात नहीं, और हिंदी ग़ज़ल यानी एक ऐसा शोर चीख़ चिल्लाहट कि पढ़ते ही आँख कान ही नहीं मुमकिन है धडकनें भी बन्द होने लगें. तमाम जोड़-घटाव के बाद मुआफ़ कीजियेगा मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि वीर रस का स्वाद लेने के लिए हिंदी ग़ज़ल से बेहतर है आल्हा सुन लिया जाय. (ये मेरी निजी राय है किसी की दिल-आज़ारी मेरा मक़सद नहीं) हो सकता है ये शायरी की बड़ी ख़ूबियाँ हों मगर मेरे जैसा बौड़म तालिबे-इल्म इन ख़ूबियों को समझने से क़ासिर है सो फ़ुज़ूल सर-खपाई से ख़ामोशी भली-
वापस लौटते हैं राजेश रेड्डी साहब पर. हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी साहब (जिन्होंने ज़बान की नोक-पलक सँवारने में पूरी उम्र ख़र्च कर दी) का एक मतला है
जमुना में कल नहाकर जब उसने बाल बाँधे
हमने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे
इस मतले की याद यूँ आयी कि राजेश रेड्डी साहब ने भी इस ज़मीन में शेर कहे हैं और क्या ख़ूब शेर कहे हैं,
ऐसा लगा कि जैसे दुनिया ही बाँध ली हो
कुछ इस अदा से उसने ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे

जब तक मिरे सुख़न की आँखें नहीं खुली थीं
मैंने भी शायरी में हिज्रो-विसाल बाँधे
सिर्फ़ हज़रते-मुसहफ़ी ही नहीं और भी बुज़ुर्गों की ज़मीनों में राजेश रेड्डी साहब ने ख़ूबसूरत ग़ज़लें कही हैं.
बेशतर रवायत और जदीदियत के मिलाप से उनकी शायरी में नग़मगी और मूसीक़ियत की सी कैफ़ियत पैदा हो गयी है सो आप पढ़ते-पढ़ते गुनगुनाने भी लगते हैं
जो नया है वो पुराना होगा
जो पुराना है नया था पहले
***********
जाने कितनी उड़ान बाक़ी है
इस परिंदे में जान बाक़ी है
***********
घर से निकले थे हौसला करके
लौट आये ख़ुदा-ख़ुदा करके

राजेश रेड्डी की शायरी ख़ुदा की शायरी नहीं बन्दों की शायरी है वक़्त से आँखें चुराने की नहीं वक़्त से आँखें मिलाने की शायरी है बेपरवाई नहीं बेदारी की शायरी है इंसान के ‘वुजूद’ और हुक़ूक़ की शायरी है इंसानियत के ‘उड़ान’ की शायरी है, मुआशरे को मुर्दा होने से बचाने वाली शायरी है- और मुआशरे को अभी इस शायरी की बेहद ज़रुरत है.
मेरे लब तो अभी खुले ही नहीं
और तू कह रहा है बात समेट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify WooCommerce Abandoned Cart Recovery – Email – SMS Learnomatic – Udemy Affiliate Plugin for WordPress Simpley – Isotope Gallery WordPress plugin Contact Form 7 Emoji Reaction Contact Form 7 Email Add on Pro Accordion FAQ – WordPress FAQ Plugin WordPress Expire Passwords Herd Effect – fake notifications that stimulate user action Logo Showcase for Elementor WordPress Plugin HT Slider Pro For Elementor