उज़्मा कलाम की कहानी ‘काली बिल्लियों के साये में चटोरी चुड़ैल’

उदयपुर में रमा मेहता ट्रस्ट द्वारा आयोजित कहानी लेखन कार्यशाला में युवा लेखिका उज़्मा कलाम ने यह कहानी सुनाई थी। कहानी अच्छी लगी तो आपसे साझा कर रहा हूँ-

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1.

बानो अप्पी के घर से निकलकर हम ऐसे भागे, जैसे एक छलांग में पूरी दूरी पार कर लेना चाहते हो। वैसे हम सभी के घर वहाँ से सौ-डेढ़ सौ कदमों की दूरी पर थे। गली के एक तरफ़ से लगी हुई मैदान की ख़स्ताहाल छोटी सी दीवार के पार पुरानी मस्जिद की मीनार साफ़ दिखती। रोज़ दोपहर ज़ुहर से लेकर अस्र तक वक़्त हम मस्जिद के मदरसे में ही गुज़ारते। मस्जिद हमारे लिए कोई नयी जगह नहीं थी। लेकिन आज बानो अप्पी ने मस्जिद से जुड़ी जो दास्तां सुनाई तो हमारे होश फ़ाख़्ता हो गए। यह कुछ कदमों का रास्ता जैसे पहाड़ हो गया।

मैदान में खड़े पेड़ों से छन के आती हुई साँय-साँय हवा और झिंगुरों की आवाज़ से ही दिल दहलने लगा। बरसात से उग आयी ऊँची-ऊँची घास में अचानक ही सरसराहट होने लगी। कहीं दूर, शायद मस्जिद वाली गली में तीन-चार कुत्तों ने एक साथ सुर मिलाकर भोंकना शुरू किया। रात में कुत्तों का भौंकना भी कम भयानक नहीं होता। शमा की अम्मा कहतीं है, “इनको रात में रूहें दिखाई देती है।” कम्बख़्त दिन में सोते है और रात में रूहें देखने के लिए इधर-उधर फिरते है।

मस्जिद में दो काली बिल्लियां है। यह तो हम जानते थे, मगर वह जिन्न है..! यह हमे आज ही पता चला। दौड़ते हुए मस्जिद की मीनार पर मेरी निगाह गयी। वहाँ टिमटिमाता हुआ एक बल्ब लटक रहा था। वह बल्ब मुझे चारो तरफ़ फैले अँधेरे के बीच शैतान की एक आँख जैसा लटकता महसूस हुआ मानो हमें घूर रहा हो। मैंने फट से आँखे बंद कर ली और गपाक से मेरा पैर नाली फ़लाँगते हुए उसी में घुस गया। फिर जैसे-तैसे अधखुली आँखों से घर के तरफ़ लपके।

वैसे तो बानो अप्पी ने बताया, ‘मस्जिद में रहने वाले जिन्न, अच्छे जिन्न है। कुछ बुरे जिन्न भी होते है। अच्छे जिन्न अगर पास से गुज़र जाए तो खुशबू का झोंका सा गुज़रता है।’ वह सही कह रही थी। मस्जिद में तो अक्सर ही ऐसा होता था। मन में हज़ारो ख़्याल एक साथ डुबकियां मारे जा रहे थे और हम घर की तरफ़ लपक रहे थे। ख़ैर जिन्न अच्छे हो या बुरे हम किसी भी तरह के जिन्न से मिलने की क़तई ख़्वाहिश नहीं रखते थे। दरवाज़े पर पहुँचते ही हम गड़ाप से घर के अंदर और पल भर में, मैं और गुड्डू दादी के लिहाफ़ में।

“का हुआ? काहे इतने डरे हो? कहाँ थे?”

“बानो अप्पी के घर।”

“रात में काहे जाते हो?”

“कहानी सुनने। ऐ दादी पुरानी मस्जिद में जिन्न रहते है का?”

“कौन बताइस?”

“बानो अप्पी।”

“ऐ..हे पागल है वह, कोई जिन्न-विन्न ना होते।”

“होते है दादी। अच्छे और बुरे जिन्न, मस्जिद की दोनों काली बिल्ली जिन्न है!!”

बावर्चीखाने में बर्तन गिरने की आवाज़ से दादी चीखी, “अनवरी देख बिल्ली घुस गयी। सारा दूध सत्यानाश।” हम दोनों और लिहाफ़ में दुबक गए। “देख लेओ यह बिल्ली जिन्न होत है, आउर दूध पिये को घर-घर घूमत है” दादी हँसती हुई बोली। उधर अम्मी ने बिल्ली को एक डंडा चिपकाया और वह म्याऊं-म्याऊं करके पिनपिनाती सी भागी। दादी और अम्मी ने मिलकर हमारे सारे रोमांच पर पानी फेर दिया। बिल्ली की ऐसी बुरी गत देख, हमें नींद आ गयी।

2.

सुबह की रौशनी में जिन्न, भूत, चुड़ैल का डर छु मंतर हुआ। स्कूल के बाद मदरसे का वक़्त आया और फिर बदन में झुरझुरी उठी। ना जाने का बहाना किया तो दादी भड़क गयी, “तो का भरे उजाले में जिन्न चुड़ैल घुमीहे।” यह दादी भी अजीब है। एक बात पर टिकती ही नहीं। कभी साफ़ मना कर दे, कि ऐसा कुछ ना होता और फिर कुछ शिगूफ़ा छोड़ देती। यानि भूत होते है, लेकिन उजाले में नहीं घूमते। उफ़..क्या करे और क्या ना करे ?

आज मदरसे में हम सब ने बिल्लियों को बड़े ध्यान से देखा। दोनों ने बगीचे में उधम-चौकड़ी मचा रखी थी। जिन्नों वाली कोई ख़ास बात तो हमे दिखी नहीं। कोई संजीदगी, कोई सहूर नहीं, बस जंगलीपन।  अब अच्छे जिन्न ऐसे जँगली तो नहीं होते होंगे।  इनमें बस एक खूबी थी, पूरी काली और आँखें पीली।  हमारे घर पर दूध पीने वाली बिल्लियाँ भूरी, सफ़ेद या चितकबरी होती पर यह बिल्कुल अलग।  इस फ़र्क़ ने फिर हमें डराने के साथ रोमांचित भी किया। हम सभी को ख़ुद पर फ़ख़्र महसूस हुआ कि हमारे सामने जिन्न अठखेलियाँ कर रहे है जो क़तई मामूली बात तो नहीं है।

शाम को बानो अप्पी के घर फिर बैठक जमी।  बानो अप्पी का हर किस्सा डरावना होता और ना चाहते हुए भी हम वहाँ खिचे चले जाते। यूँ तो बानो की उम्र अठारह-उन्नीस  साल ही होगी, लेकिन बच्चों के बीच में वह किसी बुज़ुर्ग नानी दादी से कम ना थी। आज किस्सा राजकुमारी से शुरू हुआ। लेकिन ख़त्म होते-होते चुड़ैल आ ही गयी। वह भी ऐसी चुड़ैल जो बरसो से हमारे ही मोहल्ले में रह रही थी। यह सच्चा क़िस्सा बानो अप्पी ने अपने अब्बू से सुना बक़ौल उनके। यह और बात थी की बानो के पैदा होते ही उनकी अम्मी और एक साल बाद अब्बू सिधार गए थे। बानो को बुआ ने पाला, जो अब बहुत बुज़ुर्ग हो चली थी।

“अब्बू कहते थे कि पहले लोगो के घर में कुछ भी पके तो वह सबके घर बाँटते थे और मैदान में भी रख आते जिससे चुड़ैल खा लेती। लेकिन अब तो माहौल ही बदल गया कोई किसी को देता ही नहीं” बानो अप्पी अपने चेहरे पर फ़िक्रमंदी और संजीदगी की लकीरों को गहराई देते हुए बोलती रही, “अरे ना देयो किसी को, पर चुड़ैल के लिए तो निकालो। जैसे कुछ भी अच्छा बनने पर मस्जिद भेजते है जिन्नो के लिए।”

“नहीं अप्पी! वह तो मौलवी साहब के लिए भेजते है” मैं बीच में बोल पड़ी।

“यह बाते तुम लोग को बहलाने के लिए है। भेजा तो जिन्नों को जाता है। लेकिन चुड़ैल को देना तो सब भूल ही गए। किसी दिन गुस्सा गई तो खून ही पीयेगी सबका।” हमारे तो रोंगटे खड़े हो गए। मेरे दिमाग़ में विचार कौंधा, ‘पता नहीं कितने जिन चुड़ैल है इस छोटे से मोहल्ले में। सब इन्ही को बाँट दे तो हम क्या खाएंगे।’

बानो अप्पी भवें चढ़ाकर आहिस्ता से आगे बोली, “कल रात ढाई बजे मेरी आँख खुली। पायल की आवाज़ सुनाई दी। बरामदे की खिड़की से झाँककर देखा तो!! अरे!! क्या कहे!! गोटा, सितारा जड़ा लहंगा चोली पहने ठुमक-ठुमक के चल रही थी। एड़ी आगे और पंजे पीछे। मेरी तो सांस रुक गयी।”

घिघियाते हुए हमने पूछा “कौन”

“चुड़ैल”

उड़े हुए चेहरों के रंग में से एक सवाल और आया, “चेहरा कैसा था?”

“अरे! अँधेरे में चेहरा थोड़े दिखा। अब चुड़ैल थी, तो खतरनाक ही होगा।”

अभी तो हम जिन्नो से नहीं उबरे थे यह चुड़ैल भी पैदा हो गयी।

“ऐ ऊषा कल क्या पका था तुम्हारे घर” बानो अप्पी ने अचानक सवाल उछाला।

“है” ऊषा सकपका गयी, “कुछ नहीं बस दाल चावल।”

“कुछ तो बना होगा तभी तुम्हारे दरवाज़े में झाँक रही थी।”

“कौन अप्पी?”

“अरी! चुड़ैल।”

“हाय! अप्पी”

उषा ने दिमाग पे ज़ोर डाला, “हाँ..पापड़ और बड़ियाँ बनायीं थी मम्मी ने।”

“हाँ तो आयेगी ही। यहीं सब तो पसंद है उसको और तुम्हारे यहाँ” सवाल मेरी तरफ़ उछाल दिया गया।

“आलू का भरता और रोटी। हाँ..नीम्बू का आचार भी।”

“तभी तो तेरे घर की तरफ़ भी गयी थी।”

“अप्पी अब क्या करे हम” मैंने घबराते हुए सवाल किया।

“कुछ नहीं थोड़ा चुड़ैल को दे दो। सब ठीक हो जायेगा।”

“कैसे?”

“अरे तुम लोग ना दे पाओगे। वह भरी दुपहरिया में थोड़े आएगी । तुम लोगो के बस का नहीं। आधी रात को देना पड़ेगा” बानो भवें तानकर माथे पर हथेली चिपकाते हुए बोली। मानो बहुत भारी काम उसके सर आ पड़ा हो।

सुबह ही आचार, बड़ियाँ, पापड़ बानो अप्पी के घर पहुँचा दिया गया। मस्जिद के जिन्नो को तो बिरयानी, कोरमा, ज़र्दा, फिरनी जब भी बने तो पहुँचा दी जाती थी। लेकिन मोहल्ले की चुड़ैल की तरफ़ तो किसी का ध्यान ही नहीं गया। भला हो बानो अप्पी का जो उन्होंने इस मुसीबत से निबटने की ज़िम्मेदारी ली। साथ ही हम मासूम बच्चो पर भी अपने घरवालो को चुड़ैल के पंजो से बचाने की बड़ी ज़िम्मेदारी आ गयी। हम सभी अपनी माँओं से छुपाकर चुड़ैल की पसंद का खाना बानो अप्पी के घर पहुँचा देते और आगे की ज़िम्मेदारी उनकी रहती।

3.

“ऐ अनवरी! पुरानी मस्जिद वाले मोली साहब का बेटा ख़त्म हो गया।”

मौलवी साहब की उम्र तो सही-सही किसी को नहीं मालूम थी। लेकिन अक्सर मोहल्ले के बुज़ुर्ग कहते, ‘सौ तो पूरे कर चुके होंगे।’ बिल्लियाँ भी हमेशा ही उनके साथ थी तो उनकी भी उम्र का भी बस अंदाज़ा ही था। मौलवी साहब बिल्कुल रुई की तरह सफ़ेद और बेदाग़ थे। सफ़ेद कुरता-पायजामा, काली टोपी, पैरो में काला जूता। जूता वह तभी पहनते जब कभी-कभार मस्जिद से बाहर निकलते। एक काली छतरी भी उनके पास ज़रूर होती, जब वह किसी काम से बाहर जाते। मौलवी साहब के पास एक बड़ा सा संदूक था जो मस्जिद के बरामदे में एक कोने में रखा रहता। आस-पास के दर्जनो लोग अपना क़ीमती सामान ज़ेवर, रूपये उसी में रख जाते और जब चाहे ले जाते। उस संदूक में कभी ताला नहीं लगा और ना ही कोई सामान चोरी हुआ।

“हाँ अम्मा, दो दिन हो गए।”

“मोली साहब जनाज़े में भी नहीं गए?”

“अरे नहीं अम्मा” आवाज़ अचानक थोड़ी धीमी हो गयी और हमारे कान खड़े हो गए। “अरशद बता रहा था, उनके गांव के लोग बोले कि मोली साहब वहाँ आये थे और जनाज़े को कंधा दिए।”

“हैं!! लेकिन बच्चे तो रोज़ मदरसे जा रहे है पढ़ने।”

मेरे दिल से भी दर्द भरी आवाज़ निकली, ‘मोली साहब का लड़का भी मर गया, तब भी छुट्टी नहीं दिए।’

आवाज़ और धीमी हुई, “यहीं तो सब कह रहे है, दो दिन से एक बिल्ली नहीं थी मस्जिद में, वही मोली साहब का भेस धर के जनाज़े में शामिल हुई।”

“या अल्लाह! बड़ी पाक़ रूह है, मोली साहब। जिन्न तो उनकी मुट्ठी में है” दादी आँखों में गहराई और चेहरे पे संजीदगी लाते हुए बोली ।

“वह तो ठीक है अम्मा, लेकिन खुद ही चले जाते जनाज़े में तो का बुरा होता। इकलौता लड़का था।”

“ऐ..चुपकर” दादी नाराज़गी से और अगले ही पल ठंडी साँस खींचकर “जैसी उनकी मर्ज़ी।”

हमारे कानो तक सारी चर्चा पहुँच गयी। साथ ही हमारे बदन में झुरझुरी उठी और रोंगटे खड़े हो गए। एक शक़ मेरे और गुड्डू के दिलो-दिमाग़ में हिचकोले खाने लगा, ‘कहीं ऐसा तो नहीं की मोली साहब जनाज़े में गए हो और एक बिल्ली मोली साहब बनकर हमें पढ़ा रही हो।’ इतना सोचते ही मेरे पेट में मरोड़ उठने लगे, ‘या अल्लाह! घर तो बदलेगा नहीं लेकिन इन जिन्नो, चुड़ैलों के बीच ज़िन्दगी कैसे कटेगी।’

4.

बानो अप्पी ने हमें आयत-अल-कुरसी याद करने को कहा और उषा को हनुमान चालीसा। आयत-अल-कुरसी इस्लाम में तमाम आयतों की सरदार मानी गयी है। जिन्नो और शैतानो से बचाव का यह अचूक बाण है। दूसरी तरफ़ हनुमान चालीसा का भी यहीं काम है। “तुम लोगो को यह आयतें और चैपाइयां याद रहेंगी तो भूत चुड़ैल आस-पास नहीं फटकेंगे। रात को पढ़कर सो। जहाँ कहीं कोई साया मिल जाए ज़ोर-ज़ोर से पढ़ो। कम्बख़त डर के भाग जायेंगे। अब रहना तो यहीं है और सुक़ून से रहना है तो फटा-फट रट डालो” बानो अप्पी ने समझाने और धमकाने के लहज़े में सलाह दी।

बात तो सही कही अप्पी ने लेकिन क्या करे? डेढ़ पन्ने की आयत-अल-कुरसी याद ही नहीं हो रही थी, चार दिन से। चार लाइन रटते आगे बढ़ते तो पीछे की खा जाते। एक भी लफ़्ज़ के मायने तो समझ नहीं आ रहे थे। वैसे रटने में हम माहिर थे लेकिन एक भी लफ़्ज़ का मतलब ना समझते हुए रटना मुश्किल हो गया। मायने तो दादी को भी नहीं पता थे पर पूरी रटी थी उन्हें। जब उन्हें पता चला की हम बानो अप्पी के कहने पर आयतें याद कर रहे है, तो अचानक ही दादी के मुँह से पहली बार बानो के लिए दुआएं निकली, “ऐ.. हे बड़ी समझदार बच्ची है। खूब सवाब कमाएगी अच्छा सा शौहर मिले उसको। बेचारी यतीम लड़की है।” इससे पहले मोहल्ले की बड़ी-बूढ़ियाँ सिर्फ़ उसे गाली ही देती थी। सबका कहना था कि अब तक की मोहल्ले की पहली बिगड़ैल लड़की है।

मैं ऊषा के घर की तरफ़ भागी, यह जानने के लिए की वह रटने में कहाँ तक पहुँची। उषा अपनी हिंदी की कॉपी में पूरा हनुमान चालीसा लिखे रट चुकी थी। हनुमान चालीसा तुलसीदास जी ने अवधी बोली में लिखा था। कुछ लफ़्ज़ों को छोड़कर पूरा हनुमान चालीसा आसानी से समझ में आ रहा था। यह देखकर मुझे बड़ी जलन हुई। जिन्न, चुड़ैल सबके लिए एक ही है । लेकिन उससे बचने के लिए ऊषा के पास आसान रास्ता और हमारे पास मुश्क़िल। यह नाइंसाफी मुझे अच्छी ना लगी और मैने भी हनुमान चालीसा रट डाला।

“ऐ भाई तुम लोगो को आयतें याद हो गयी और उषा तुम्हे चालीसा?”

हम पाँच मुसलमान बच्चो के चेहरे उतर गए। कोई भी दो चार लाइनों से आगे नहीं बढ़ पाया था। ऊषा इठला कर बोली, “हाँ अप्पी मैने पूरा रट लिया।” हमने खा जाने वाली नज़रों  से ऊषा को देखा। फिर मैं बोल पड़ी, “अप्पी मैने भी हनुमान चालीसा याद कर लिया। आयत-अल-कुरसी बहुत मुश्किल है।”

“हाँ.. तो तुम हनुमान चालीसा पढ़ोगी” बानो अप्पी नाराज़गी से बोली।

“तो क्या? भूत चुड़ैल ही तो भगाने है। हनुमान चालीसा से भाग जायेगा न?” मैंने मासूमियत से सवाल किया।

“तुम्हारे पढ़े से नहीं भागेगा” बानो अप्पी गुस्से में सिर हिलाकर ऐंठते हुए बोली।

“और उषा के पढ़ने से?” मैंने गुस्सा ज़ाहिर करते हुए सवाल किया।

“वह हिन्दू है और तुम मुस्लमान ।”

“तो भूत चुड़ैल को इससे क्या लेना देना।”

बानो अप्पी लाजवाब हुई तो तुनक कर बोली, “तुम्हीं पूछ लेना जब चुड़ैल सामने आ जाए।”

अब मेरे पास कोई जवाब नहीं बचा। कई मामले ऐसे होते है जहाँ कुछ समझ नहीं आता, फिर चुप ही रहना सही लगता है। हम सभी को ऊषा से चिढ़ तो हो रही थी, पर कर भी क्या सकते थे।

5.

आज कहानी शुरू हुई एक अंधे भिखारी से।  लेकिन पहुँच गयी भूतों के एक झुण्ड में।  जो बानो अप्पी के अब्बू को मस्जिद के बाहर रात के बारह बजे मिले थे। कहानी अपने पूरे ख़ुमार से चल रही थी। रात ठंडी थी। तारो के झुण्ड अपनी नरम-नरम चमक के साथ टिमटिमा रहे थे। चाँद आधा था और बादल के पीछे छुपकर झाँक रहा था। सात सितारा बहने ठीक हमारे सिर पर चमक रही थी। रात की नमी बटोरे हुए हवा ठंडी हो गयी थी और हमारे कानों के पास से गुनगुनाती हुई गुज़र रहीं थी। तभी गुड्डू अपनी जगह से उछला।  मैंने उसे पकड़कर वहीं दबा कर बिठा लिया। क्यूंकि माहौल ही ऐसा था। उस वक़्त कहानी के अलावा कुछ सुनने का दिल नहीं था। कुछ ही सेकेण्ड में शमा महीन आवाज़ में चीखी और चारपाई की तरफ़ इशारा करने लगी।  हम सब एक ही चारपाई पर बैठे थे।

हम सब की निगाह शमा पर टिक गयी और हमने उसकी ऊँगली के इशारे को देखा नहीं बल्कि महसूस किया। हम सब ने चारपाई के नीचे से अपने जिस्म पर चुभती हुई कुछ उँगलियाँ महसूस की। सबकी आवाज़ें बंद हो गयी। सन्नाटा हमारे जिस्मों मे गहराई तक घुस गया। किस के चेहरे पर कैसा भाव था, यह मैंने देखा नहीं।  बस रगों में खून थम सा गया। कहीं कोई आहट नहीं थी। बानो अप्पी की बुआ की खर्राटों की आवाज़ भी गायब हो गयी थी। सन्नाटा गहरा हो गया और हमें अपने कूल्हों पर उँगलियाँ चुभती महसूस होती रही। यह मैं नहीं जानती किसने कितनी बार और कितना तीखा इसे महसूस किया।  लेकिन सन्नाटा बहुत कुछ कह रहा था। फिर अचानक एक हल्की आवाज़ उभरी। बानो अप्पी ने आयत-अल-कुरसी पढ़ना शुरू कर दिया। उनकी आवाज़ से हिम्मत पाकर ऊषा हनुमान चालीसा पढ़ने लगी। मैं हनुमान चालीसा पढ़ने वाली थी कि सेकण्ड भर में मुझे बानो अप्पी का कहा याद आ गया, ‘तुम्हारे पढ़े से नहीं भागेंगे।’ फिर मैंने अल्हम्दु शरीफ़ पढ़ना शुरू किया। क्यूंकि मुझे बस यहीं एक आयत पूरी याद थी।  यह पूरी आयत अल्लाह की तारीफ़ करती है।  मुझे यह नहीं पता कि इससे मुसीबत टलेगी या नहीं लेकिन मैं पूरे जोश से पढ़ रही थी।

गुड्डू ने ज़ोर-ज़ोर से अलिफ़, बे, ते, पढ़ना शुरू किया। मस्जिद में तो मोली साहब की छड़ी खाकर भी उसकी आवाज़ नहीं निकलती थी। मुझे लगता कि यह तेज़ पढ़ नहीं सकता। लेकिन आज यह भ्रम भी ख़त्म हुआ। अलिफ़-बे-ते यह तो सिर्फ़ अरबी के हरूफ़ थे माने अक्षर। अब क्या इससे भी भूत भागेगा। इतने डर के बाद भी कुछ बातें मेरे ज़हन में टहल कर चली गयी। हम जो भी पढ़ रहे थे उसमे हमारा जोश क़ायम रहा और करिश्मा हुआ।

इस माहौल में मुझे यह एहसास हुआ कि ऐसे वक़्त पर अल्लाह ही याद आता है। वैसे तो मुझे 1857 की क्रांति मे मंगल पांडेय की भूमिका और अलग-अलग जगहों पर सैनिकों  की भूमिका मय तारीख़ रटी हुई थी पर उस वक़्त मेरे मुँह से एक पैराग्राफ का अल्हम्दु शरीफ़ ही निकला। जैसे-तैसे वह वक़्त गुज़र गया लेकिन उसकी छाप अभी भी दिल और दिमाग पर है।

जिस दिन बानो अप्पी की शादी हुई उस दिन हम सभी बच्चो पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा।  हमें बस एक डर था कि अब भूत चुड़ैल से हमें कौन बचाएगा। घर के बड़ों को तो हमारी बातें बहुत मामूली लगती और वह हमको झिड़क कर बोल देते, ‘ऐसा कुछ नहीं होता।’ वैसे यह आमतौर पर हर घर की कहानी है।  बानो अप्पी बिदाई के वक़्त मुझसे लिपटकर रोई और मेरे कान के पास आकर बोली ” चुड़ैल से मत डरना उसको हम साथ लिए जा रहे।” मुझे इस बात से ख़ुशी भी हुई और अफ़सोस भी। जाने वह कब तक अपने साथ उस चुड़ैल को रख पायेगी और वह सिर्फ़ एक चुड़ैल को ले गयी थी बाकि सब यहीं थे आस-पास।

पुरानी मस्जिद में अब भी दो काली बिल्लियां मंडराती है। मौलवी साहब अल्लाह को प्यारे हो गए है। लोग कहते है वह मरे नहीं पर्दा कर गए है। मतलब दुनिया की नज़र में तो उनका जनाज़ा उठ गया है लेकिन वह यहीं है। मैंने बाँध की बुनी चारपाई पर बैठना छोड़ दिया है। अब बानो अप्पी की जगह मैंने ले ली है लेकिन मैं लकड़ी के मज़बूत तख़्त पर बैठकर कहानियाँ सुनाती हूँ।

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