युवा लेखक पल्लव के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘बनास जन’ का हर अंक संग्रहणीय होता है। इस बार इस पत्रिका का अंक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई पर केंद्रित है। इसी अंक में प्रकाशित एक लेख पढ़िए। लिखा है अवंतिका शुक्ल ने, जो महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में पढ़ाती हैं।
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आज़ादी के बाद अगर भारत के प्रमुख लेखकों पर चर्चा करें, तो हरिशंकर परसाई का नाम अग्रणी पंक्ति में होगा. अपने व्यंग्य से बड़ी से बड़ी बात को सहज रूप से कह देने की कला परसाई जी की खासियत है. बिहारी के दोहों के लिए कहा जाता रहा है कि देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर या गागर में सागर . परसाई की रचनाओं के लिए भी यह उक्ति अतिशयोक्ति न होगी. परसाई जी ने अपना लेखन छोटी छोटी कहानियों, आलेखों, व्यंग्यों के माध्यम से किया है , लेकिन छोटे होने के बावजूद उनके एक एक शब्द का असर अपनी पूरी ताकत के साथ होता है. इतना कि व्यक्ति बेचैन हो जाए, तिलमिला जाए और अपने गिरेबान में झांकने को मजबूर हो जाए. परसाई जी ने भारत की आज़ादी के बाद मनुष्यों, संस्थाओं, राजनीति, अर्थ तंत्र आदि में आये बदलावों और विचलनों का बहुत सूक्ष्म तरीके से समझा और उसे अपने लेखन का प्रमुख तत्व बनाया है. समाज में फैले भ्रष्टाचार, स्वार्थपरक राजनीति, जातिगत विभेद, पूंजीवादी नीतियाँ, झूठे समाज सेवक, लालची परिवारीजन, हर समय अपने लाभ की चिंता करते और दूसरों की जेब काटते लालची लोग परसाई जी के लेखन में प्रमुखता से उपस्थित हैं. रवीन्द्र त्यागी की यह टिप्पणी कि स्वन्त्रतापूर्वक साहित्य का जायजा लेना हो तो प्रेमचंद का साहित्य और स्वातंत्रयोत्तर भारत का जायजा लेने के लिए हरिशंकर परसाई का साहित्य हमारा सहायक हो सकता है (वर्मा, 2019 ) , एकदम सटीक है.
हरिशंकर परसाई के लेखन में स्त्रियों को प्रमुखता से शामिल किया गया है. आधी आबादी के जीवन के त्रास, उनकी दयनीय स्थिति, उनके बेकद्री, समाज में व्याप्त स्त्री विरोधी व्यवहार के साथ साथ उनके सपने, आकांक्षाओं और प्रतिरोध पर परसाई जी ने बहुत संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ कलम चलाई है. प्रस्तुत आलेख में परसाई जी के लेखन के इसी पक्ष पर प्रकाश डाला गया है.
परसाई जी का जीवनकाल 1924 से 1995 के बीच रहा है. इस काल पर विचार करें तो यह समय बहुत महत्वपूर्ण रहा है. परसाई जी ने आज़ादी से पहले का समय देखा, आजादी की लड़ाई में शामिल लोगों के संघर्षों और सपनों को देखा, आज़ादी के बाद उन सपनों को टूटते और लोगों को स्वार्थ में संलिप्त होते भी देखा. आज़ादी के लिए क्रांतिकारियों के बहे खून पर लोगों की झूठ और मक्कारी देखी. एक नये उभरते भारत को भी देखा जिसमें युवा पीढी अपने देश में बदलाव के लिए अपने आस पास बदलाव हेतु सक्रिय हो रही थी. उन्होंने यह भी देखा कि धीरे धीरे पूंजीवादी व्यवस्था किस प्रकार से अपने पैर पसार रही है और लोगों को अपनी गिरफ्त में ले रही है.
यह दौर स्त्री की अधीनता और उस अधीनता से स्त्री के निकलने के प्रयासों का भी रहा है. आज़ादी के बाद भारतीय स्त्रियों की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए काफी प्रयास किये गए. स्त्रियों को पुरुषों के बराबर लाने के लिए अलग अलग प्रयास प्रारम्भ किये गए. सरकारी नीतियों, कानूनों के साथ महिला आन्दोलन ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन सांस्कृतिक क्रांति या बदलाव के बगैर उनकी भूमिकाओं में बहुत ज्यादा सुधार न हो पाया. स्त्रियाँ परिवार में बोझ समझी ही जाती रहीं. दहेज़ के नाम पर अपमानित की जाती रहीं, जलाई जाती रहीं, मारी पीटी जाती रहीं. उनकी सार्वजनिक जीवन में भागीदारी भी सीमित रखी गयी और सारा जोर एक अच्छी मां और पत्नी की भूमिका निभाने में ही रह गया. परसाई जी ने बारीकी से समाज और स्त्री जीवन के इस ताने बाने को पकड़ा और स्त्री की समाज में हाशिये की भूमिका में वर्ग और जाति के अंतर्संबंधों की पड़ताल की.
स्त्री जीवन के हाशियाकरण और अधीनता के एक महत्वपूर्ण कारक दहेज़ का समाज में जातिगत भेदभाव से कितना गहरा सम्बन्ध है परसाई जी हमें इससे अवगत कराते हैं. इस प्रकार स्त्री अधीनता और जातिगत भेदभाव् से मुक्ति के लिए वह अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह की पुरजोर हिमायत करते हैं, जो बिना लेन देन किये संपन्न हों. स्त्री अधीनता के बारे में परसाई जी कहते हैं कि “हमारे समाज में कुचले हुए का उपहास किया जाता है. स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम रही. उसका कोई व्यक्तित्व बनने नहीं दिया गया. वह अशिक्षित रही ऐसी रही. तब उसका मज़ाक बनाना सेफ हो गया”. इस बात से हम परसाई जी की स्त्री मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता जान सकते हैं तथा जाति, वर्ग और जेंडर के अंतर्संबंधों को उन्होंने किस गहराई से समझा है यह भी देख सकते हैं. प्रस्तुत आलेख में परसाई जी के लेखन के माध्यम से उनकी स्त्री दृष्टि को समझाने का प्रयास किया गया है. स्त्री के दोयम दर्जे के जीवन, वस्तुकरण, दहेज़, यौन उत्पीड़न आदि एवं अन्य मुद्दों के साथ साथ महिलाओं के प्रति देश, समाज और परिवार के नजरिये पर परसाई जी ने अपने विचार व्यक्त किये हैं. इन विचारों को कुछ बिन्दुओं के माध्यम से इस आलेख में सामने लाया गया है.
जातिगत भेदभाव का विरोध एवं अंतरजातीय विवाह का समर्थन
परसाई जी जातिगत भेदभाव के कट्टर विरोधी थे. वह जाति व्यवस्था को समाज के लिए बहुत घातक मानते थे. जातिगत विभेद खान पान और कामकाज में कम होने के बाद किस तरह से विवाह संस्था में केन्द्रित हो गया है, हमें परसाई जी के कहानियों में दिखता है. बाबा साहेब अम्बेडकर ने जाति को समाप्त करने का प्रमुख माध्यम अंतरजातीय विवाह बताया है और परसाई जी बाबा साहब की इस बात के प्रबल समर्थक हैं. उन्होंने ढेरों कहानियां अंतरजातीय और अंतर धार्मिक विवाहों पर लिखी हैं और जाति व्यवस्था के नाश की बात कही है. परसाई जी ने अंतरजातीय विवाह के साथ अंतर्धार्मिक विवाह के मुद्दे को भी उठाया है. परसाई जी इन विवाहों का समर्थम करते हुए बताते हैं कि वर्गीय समानता आने के बाद भी लोगों के मन में विवाह को लेकर बहुत मजबूत विभाजन है, जिसमें अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह को लेकर नकार है. पर नयी पीढ़ी इन ढकोसलों से दूर सिविल मैरिज के माध्यम से अपने जीवन का निर्णय ले रही है. वह अपना धर्म नहीं बदल रही बल्कि कोर्ट में विवाह के माध्यम से अपने धर्म के साथ एक अन्य धर्म के व्यक्ति से वैवाहिक रिश्ता बना रही है. इस रिश्ते में जितनी भागीदारी लडके की है उतनी ही लड़कियों की भी. अपने जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय वे अपने विवेक से ले रही हैं.
परसाई जी की कहानी मौलाना का लड़का-पादरी की लड़की कहानी इसका एक उदाहरण है. इस कहानी में रफीक के घर के एक हिस्से में गरीबों के लिए अलग से चर्च खुली है. इससे उसके पिता की आमदनी होती है. बेला के पिता पादरी हैं. बेला और रफीक एक दूसरे से प्रेम करते हैं. उन दोनों के पिता इस बात से खुश हैं कि हर एक को लगता है कि उनका पुत्र या पुत्री विवाह के लिए दूसरे का धर्म परिवर्तन करा देगा. पर दोनों धर्म परिवर्तन की राह न चुनकर सिविल मैरिज के कार्यालय की राह चुनते हैं. परसाई जी भारतीय युवा के जीवन साथी के चयन के निर्णय की धर्म और जाति के परे वकालत करते हैं और अपने धर्म को बदले बिना अंतर धार्मिक विवाह के समर्थन में खड़े होते हैं (परसाई, 2019).
जातिगत भेदभाव के समाज में गहरे रूप से व्याप्ति को लेकर परसाई जी की एक महत्वपूर्ण कहानी है जाति.परसाई जी की लघु कथा जाति में उन्होने एक महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। समाज में वर्गीय समानता होने के बावजूद जातिगत असमानता की व्याप्ति। जाति कहानी में परसाई जी जी बताते हैं कि फैक्टरी में काम कर रहे ब्राह्मण और ठाकुर के बीच साथ साथ एक जगह काम करने और आस पास रहने की स्थिति है लेकिन जब उनके शिक्षित, समझदार बेटा बेटी एक दूसरे से प्रेम करते हैं तो उनकी अलग अलग जातियों के कारण विवाह की स्वीकृति दोनों परिवारों में नहीं बन पाती है। ठाकुर साहब तो इस बात को भी स्वीकार कर लेते हैं कि अगर उनके बीच व्यभिचार या विवाह के बाहर संबंध हो भी तो उन्हें कोई आपत्ति नही है क्योंकि ऐसे सम्बन्धों से जाति प्रथा पर कोई आंच नही आती है, पर विवाह से आती है (परसाई ह. , जाति, 2019 )। विवाह एक ऐसी संस्था है जो सीधे सीधे जाति व्यवस्था से जुड़ी है और जाति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विवाह के माध्यम से ही स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण किया जाता है, जो जाति की स्थापना के लिए अनिवार्य तत्व है. विवाह के माध्यम से ही उत्तराधिकार भी सुनिश्चित किया जाता है. परसाई जी की कहानी वर्ग, जाति और जेंडर के बीच के आपसी संबंध एवं प्रतिच्छेदी क्षेत्र का उदघाटन करती है
किन्तु प्रेम विवाह के समर्थक परसाई जी लड़कियों को आगाह भी करते हैं कि प्रेम के नाम पर किसी पर भी भरोसा करना उचित नहीं है क्योंकि उसमें ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो लड़कियों को फुसलाने का काम भी करते हैं. अपनी कहानी क्या कहा? में परसाई जी ऐसे ही एक धोखेबाज प्रेमी का पर्दाफ़ाश करते हैं. जो एक साथ पांच लड़कियों को अपने झूठे प्रेम के जाल में फंसा कर रखता है. हर लड़की को लगता है कि वह उसी से प्रेम करता है, पर जब वे सब अपने प्रेमी की फोटो को एक ही व्यक्ति की फोटो पाती हैं तो उन्हें अपने ठगे जाने का अहसास होता है. यह कहानी बताती है कि प्रेम की राह में धोखेबाजों की उपस्थिति भी कम नहीं है. इसलिए अपने साथी का चयन बहुत ध्यान से करना जरूरी है (परसाई ह. , क्या कहा?, 2019).
दहेज़ कुरीति का पुरजोर विरोध
परसाई जी ने अपने लेखन के माध्यम दहेज़ प्रथा का ओउरजोर विरोध किया है. इस समस्या पर उनकी कई कहानियां मिलती हैं. अपने आलेख में भी उन्होंने इस समस्या को बहुत गंभीरता से उठाया है.
दहेज की समस्या पर उनका आलेख दहेज और विवाह पूर्व आत्महत्या बहुत ही संवेदनशीलता से लिखा गया है। इस आलेख में उन्होने दहेज की विकरालता और भयावहता को उजागर करते हुए बताया है कि लड़की के विवाह के लिए दहेज देने की अनिवार्यता ने कितनी ही अविवाहिताओं को मौत की नींद सुला दिया। परसाई जी कानपुर और पालघाट की घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि पिता की आर्थिक स्थिति और विवाह के लिए दहेज देने की अक्षमता को देखते हुए परिवार की तीन बेटियों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। ऐसे ही कई घटनाओं के उदाहरण हमारे सामने आज भी हैं। परसाई जी कहते हैं कि दहेज के दबाव के कारण बेटी का जन्म एक अभिशाप में तब्दील हो गया है। लोग नहीं चाहते कि उसके घर बेटी पैदा हो । वो एक ऐसा बेटा चाहते हैं जिससे उन्हें दहेज की प्राप्ति हो। परसाई जी इस समस्या से बचने के लिए स्त्री के अकेले रहने के भी हिमायती नहीं हैं। वे अकेले रहने को भी समस्या का समाधान नहीं मानते क्योंकि वह स्त्री की भावनात्मक एवं दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी आवश्यक मानने हैं ।परसाई जी नारी मुक्ति की संकल्पना में स्त्रियों का सबसे दूर होकर आत्मकेंद्रित होना भी नही मानते । उन्हें यह नारी की मनुष्यता से ही मुक्ति लगती है। परसाई जी इसके समाधान के रूप में प्रेम विवाह पर चर्चा करते हैं। अगर शिक्षित साथ पढे, लिखे नवयुवक एवं नवयुवतियाँ प्रेम विवाह करते हैं तो काफी हद तक दहेज की समस्या पर काबू पाया जा सकता है। पर परसाई जी यह भी देख रहे हैं कि युवा पीढ़ी पानी पिछली पीढ़ी से भी ज्यादा लोभी हो गई है । समाज की पतनशीलता का प्रभाव युवा वर्ग पर भी पड़ा है। इस बात को हम आज के संदर्भ में भी मौजूं पाते हैं और दहेज की विकरालता के स्वरूप को देख सकते हैं । आज की युवा पीढ़ी प्रेम विवाह करती है लेकिन दहेज के साथ। प्रेम के साथ वह यह भी प्रयास करते हैं कि विवाह माता पिता की सहमति से पारंपरिक रीतिरिवाज के साथ हो। इस पारंपरिकता में दहेज की अपेक्षा अंतर्निहित होती है। परसाई जी स्त्री मुक्ति के लिए स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता की भी बात करते हैं (परसाई ह. , दहेज और विवाह पूर्व आत्महत्या, 2013)।
दहेज की समस्या पर ही एक दूसरे आलेख बाजारभाव पति का में परसाई जी कड़े व्यंग्य करते हैं। ग्रीक विदेश मंत्री की पत्नी भारत के महिला संगठनों के सदस्यों के बीच दिल्ली पहुंची थीं। वहाँ वह कहती हैं कि दहेज प्रथा ग्रीस में भी है। इस बात पर परसाई जी बहुत खफा होते हैं और इस आलेख में व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि क्या दहेज कोई महान परंपरा है, जिसे प्राचीनता सभ्यता से रिश्ता जोड़ कर उसका जिक्र आवश्यक है ? क्या यह लड़कों का मनोबल बढ़ाने के लिए कहा गया है? क्या यह सुकरात या अरस्तू की ज्ञान परंपरा जितना महान है, जिसका जिक्र ग्रीस के संदर्भ में किया जाये। क्या वह महिला ग्रीस में लड़कों के सौदे का तरीका भारत में बताना चाहती हैं? परसाई जी के मन में दहेज को लेकर इतना ज्यादा गुस्सा और घृणा है कि जब कोई पिता कहता है कि हमने अपने लड़के को इतना ज्यादा पढ़ाया लिखाया, काबिल बनाया तो परसाई जी कहते हैं कि अगर विवाह न होता तो क्या वे अपने लड़के को गंवार बना कर रखते? क्या बेटा पैदा ही दहेज के लिए किया गया था? क्या माँ अपने गर्भ में 9 महीने लड़के को रखने की भी कीमत वसूलेगी? (शायद परसाई जी को नहीं पता होगा कि उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में लड़के की माँ लड़की वालों से दूध पिलाई का नेग दुल्हन को अपने दरवाजे पर उतारते समय लेती है।) परसाई जी उस ग्रीस युवती से यह भी पूछते हैं कि क्या ग्रीस में भी दहेज न लाने पर लड़कियां जला दी जाती हैं? क्या वहाँ भी मिट्टी के तेल की सप्लाई अच्छी है। परसाई जी महिला संगठनों पर भी नाराज़ होते हैं कि क्या ज्यादा संख्या में लड़कियां जला दी जाएंगी तभी वे संसद के सामने प्रदर्शन करने जाएंगी? परसाई जी युवकों की छद्म प्रगतिशीलता और चालाकी पर भी सवाल उठाते हैं कि लड़के कहते हैं मैं तो दहेज के खिलाफ हूँ पर पिता नहीं माने। मैं पता का बहुत आदर करता हूँ। या लड़के स्कूटर रेडियो, टीवी के लिए मंडप में ऐसे रूठ जाते हैं जैसे वे कोई छोटे बच्चे हों और टॉफी के लिए रूठ रहे हों। परसाई जी दहेज के खिलाफ बहुत मुखर रहे हैं और कहते हैं कि यह लड़कों के लिए भी बहुत दुखद है कि अब उन्हें लेकर ऐसी भाषा चल पड़ी है कि कौन लड़का कितने में पड़ेगा। लड़कों की कीमत लगाना, उनकी सौदेबाजी लड़कों का उत्थान नहीं बल्कि उनके पतन की ओर इशारा करता है। कई बार ऊंची बोली लगाते लगाते जब कोई खरीदार नही मिलता तो कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि लड़का सेल के दाम दे दिया जाता है। अगर लड़का प्रेम विवाह कर लेता है तो वह परिवार के किसी काम का नहीं रहता क्योंकि उसने उनके आर्थिक लाभ को खतम कर दिया। इस प्रकार परसाई जी लड़कों की भी समाज में हैसियत बताते हैं कि वह इस दहेज रूपी दानव वाले समाज में एक बिकाऊ माल से ज्यादा कुछ नहीं हैं और यह बोली उनके ही जन्मदाता लगाते हैं (परसाई, बाजारभाव पति का, 2013) ।
इसी प्रकार प्रहरी में 2 जनवरी 1949 को परसाई जी ने एक बेहद महत्वपूर्ण आलेख हमारे समाज में वर विक्रय नाम से लिखा. इस आलेख में परसाई जी ने तलाक पर क़ानून बनाने से ज्यादा दहेज़ पर रोकथाम के लिए कानून बनाने की बात की है. परसाई जी दहेज़ की विकरालता के बारे में बताते हैं कि विवाह सा पवित्र बंधन जो पारस्परिक प्रेम बढ़ाकर दो परिवारों को एक करता है पर हमें अपनी जातिगत दुर्बलता के कारण ही जब अपनी भुजाओं पर विश्वास नहीं रहा तब हममें मुफ्त का माल खाने की घृणित प्रवृत्ति आयी है. वह व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि अब वह समय दूर नहीं जब वर का पिता लड़की वालों से टेंडर बुलावायेगा और अधिक से अधिक कीमत वाले को अपना लड़का देगा.
परसाई जी दहेज़ को महिलाओं के पालन पोषण में होने वाले भेदभाव के लिए बहुत बड़ा कारण मानते हैं. इसी के कारण बच्चियों को ऐसे समाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जो उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना देती है. परसाई जी ने इस पर पर सूक्ष्मता से बात की और कहा कि कभी विचार किया है कि घर में मुन्ना को चुपड़ी रोटी और मुन्नी को सूखी रोटी मिलने का क्या कारण है? मुन्ना को पुचकार मुन्नी को फटकार के कारण पर भी विचार किया है? मुन्ना को छींक आने पर ही डॉक्टर आ जाता है पर मुन्नी की दो चार दिनों की बीमारी भी डॉक्टर को क्यों नहीं बुला सकती? मुन्ना के रेशमी और मुन्नी के सूती का क्या रहस्य है? मुन्ना को पुचकार और मुन्नी को फटकार के कारण पर कभी विचार किया है? लड़की के प्रति माता पिता का ही अन्यायपूर्ण बर्ताव हमारे सारे आदर्शों , हमारे सिद्धांतों के मुख पर कालिख पोत देता है. और इसका बड़ा कारण है दहेज़. साथ ही परसाई जी उस युवा पीढी की भी आलोचना करते हैं जिसमें इस कुरीति के खिलाफ खडा होने का साहस नहीं है (परसाई ह. श., हमारे समाज में वर विक्रय , 2013 ).
परसाई जी ने एक और महत्वपूर्ण बात बतायी है कि दहेज़ देने का मुख्य कारण अपनी ही जाति में विवाह है, जो योग्य वर की उपलब्धता सीमित कर देता है. परसाई जी ने दहेज़ की समस्या को जाति के भीतर विवाह से जोड़कर देखने की पहल की है. समाज में जातिगत भेदभाव इतना जबरदस्त है कि कोई अपनी जाति से बाहर अपनी संतान का विवाह नहीं करना चाहता. यह उसके लिए डूब मरने की बात है. इस कारण योग्य वरों की संख्या सीमित हो जाती है. उन वरों को पाने के लिए दहेज़ के रूप में लड़कों की बोली लगाई जाती है.
दहेज़ प्रथा पर परसाई जी की कहानियां भी बहुत झकझोरने वाली हैं.
सूअर कहानी में परसाई जी ने दहेज़ के लालचियों की धन लोलुपता की पराकाष्ठा दिखाई है. पहले वर पक्ष को लड़की वालों का घर बहुत खराब जगह लगता है, जहां सूअर घूमते हैं और और वे उस इलाके में बारात ले जाना तो क्या शादी के बाद खुद जाना भी पसंद नहीं करेंगे, पर दहेज़ की मोटी रकम में 35 हजार मिलने का बाद बरात स्थल के भीतर आ गया सूअर का बच्चा भी उन्हें बड़ा प्यारा लगाने लगता है और ससुर जी सूअरों की तारीफ़ में कसीदे पढ़ने लगते हैं और सूअर के बच्चे को इतने प्यार से सहलाते हैं जैसे वह उसके बाप हों (परसाई ह. , सूअर , 2019 ). परसाई जी दहेज़ लोलुप व्यक्ति को निकृष्टतम श्रेणी में रखते हैं.
परसाई जी की कहानियों में युवा पीढी के भीतर दहेज़ प्रथा का विरोध भी मिलता है. और युवा उसके विरोध में अलग अलग तरीके से अपने जीवन का फैसला लेते हैं.
सुशीला कहानी में परसाई जी सुशीला के द्वारा एक महत्वपूर्ण फैसला लेना दिखाते हैं, अंतरजातीय विवाह करने का. सुशीला के पिता के पास दहेज़ के नाम पर उनका प्रोविडेंट फंड ही है. अपनी ही जाति के लडके के लिए वह भटक रहे हैं. लेकिन अपनी ही जाति में शादी के लिए दहेज़ की मांग बहुत ज्यादा है. तब सुशीला चुपके से अंतरजातीय विवाह कर अपने पिता को पत्र लिखती है कि मैंने दूसरी जाति के उस लड़के से शादी की है जिसका व्यवहार आपको बहुत पसंद था. लोग आपको ताने देंगे पर आपको गर्व होना चाहिए कि आपकी बेटी ने आपका प्रोविडेंट फंड बचा दिया. अन्यथा इस विवाह में आपका सारा जमा पैसा चला जाता. अभी आपको छोटे भाई की भी परवरिश करनी है और उसे योग्य बनाना है. आपको अपनी बेटी सुशीला के इस फैसले पर गर्व होना चाहिए. ऐसी लड़कियां भाग्य में कहाँ होती हैं (परसाई ह. , सुशीला , 2019 )? सुशीला बहुत मार्मिक कहानी है . एक लड़की अपने पिता को अपने विवाह के लिए कंगाल होने की प्रक्रिया देख रही है. वह दुखी है विवश पर अपने पिता को कंगाली से बचाने के लिए वह यह फैसला लेती है. यहाँ यह भी गौर करने की बात है कि लोगों को तमाम अंतरजातीय लडके मिलते हैं, जो योग्य हैं, सुदर्शन हैं, उनकी पुत्री को खुश भी रख सकते हैं , दहेज़ भी नहीं चाहते पर जाति प्रथा की संकीर्णता के चलते यह रिश्ते फलीभूत नहीं हो पाते. पर सुशीला अपने जीवन का एक बड़ा निर्णय मजबूती से लेती है और खुद को और अपने परिवार को दहेज़ के चंगुल से मुक्त करती है. इस बदलाव में युवकों की भी बराबर भागीदारी है.
तिवारी जी की कथा कहानी में तिवारी जी के इंजीनियर पुत्र अविनाश के मजबूती से दहेज़ विरोध के लिए गए फैसले पर केन्द्रित है. पांडे जी की योग्य पुत्री रजनी जो कि परिवार में सभी को पसंद थी, से विवाह तय करने के लिए तिवारी जी अपने बेटे का सौदा ३० हजार में करते हैं. रजनी के घर वालों के पास इतने पैसे नहीं हैं और उनके लिए घरबा र बेचने की नौबत आ जाती है. अविनाश सारी स्थिति देख कर रजनी से कोर्ट मैरिज कर लेता है और पिता को पत्र लिखकर कहता है कि रजनी के मां बाप आपकी मांग मान भी लेते, पर आप जीवन भर के लिए मेरी पत्नी की नजर से नीच ,दुष्ट और लोभी व्यक्ति के रूप में नीचे गिर जाते और एक पुत्र के रूप में मैं यह कभी नहीं चाहूंगा. इसलिए बिना कुछ लिए मैंने कोर्ट में शादी कर ली (परसाई ह. , तिवारी जी की कथा , 2019 ). यह कहानी शिक्षित और बदलाव पसंद युवाओं को केंद्र में लाती है . उन्हीं की हिम्मत से इस दहेज़ रूपी कुरीति को मिटाया जा सकता है. अविनाश युवा पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत है. इस कहानी में बेहद महत्वपूर्ण बात कही गयी है कि मर खप कर लड़की वाले दहेज़ की मांग को पूरा तो कर देंगे, लेकिन लड़की के मन में ससुराल वालों के प्रति कभी भी सम्मान पैदा नहीं हो पायेगा. शायद यही कारण है कि तमाम लड़कियों के मन में ससुराली जनों को लेकर एक घृणा का भाव दबा रहता है. वह अपने विवाह के लिए ससुराली जनों द्वारा किये अपने मायके वालों के अपमान, दहेज़ की लेन देन की कड़वी बातें और अपनी विवशता को कभी भुला नहीं पाती और विवाह के बाद अपने अलगाव और दुर्व्यवहार से वह अपना गुस्सा और घृणा जाहिर करती है. अविनाश ने एक बड़ा कदम उठा कर अपने परिवार को अपनी पत्नी की घृणा से बचा लिया.
परसाई जी अपने लेखन से युवा पीढी के लिए एक सन्देश देते हैं कि उन्हें इन मुद्दों पर नेतृत्व में आना चाहिए, ताकि वाइब्स आर नॉट फॉर बर्निंग जैसे नारे सिर्फ नारे ही बनकर न रह जाए.
विज्ञापन में महिलाओं के वस्तुकरण के खिलाफ
महिलाओं के विज्ञापनों में प्रयोग को लेकर परसाई जी ने पुरुषों पर तीखे व्यंग्य किये हैं. हर तरह के विज्ञापनों खासतौर पर पुरुषों के उपयोग की वस्तुओं में भी महिलाओं की उपस्थिति को वह पुरुषों की कम अकली के रूप में देखते हैं . विज्ञापन में बिकती नारी आलेख में वह कहते हैं कि क्या पुरुषों के पास इतनी भी समझ नहीं है कि वे अपनी पसंद का सामान खरीदने पायें . उसके लिये भी विज्ञापन में एक स्त्री से कहलवाना पडेगा? ट्रक सरदार जी चला रहे हैं पर ख़ास टायर खरीदने का विज्ञापन स्त्री से कराया जा रहा है. लड़कों को किस कंपनी के कपड़े पहनने चाहिए ,ताकि वे आकर्षक लगें इसका विज्ञापन लड़कियां कर रही हैं , लड़कों के ख़ास ब्रांड की सिगरेट पीने से ही लड़कियां उन पर मुग्ध हो पाएंगी अन्यथा नहीं . परसाई जी कहते हैं कि लगता है इस देश की सारी सुन्दर स्त्रियाँ कंपनियों की नौकरानियां हैं और उनका काम कंपनियों के हित में पुरुषों को फुसलाना है. आगे परसाई जी यह भी कहते हैं कि क्या कभी महिलाओं की जरूरत की किसी वस्तु का विज्ञापन किसी पुरुष को करते देखा है? स्त्री अपने उपयोग के किसी सामान में पुरुषों का दखल नहीं देने देती. वह साड़ी अपनी इच्छा से खरीदेगी पर पुरुष को टायर अपनी इच्छा से नहीं खरीदने देगी. वह कहते हैं कि भारत का पुरुष बौड़म है उसे किसी चीज़ की परख नहीं स्त्री की सौन्दर्य शक्ति उससे कुछ भी रददी खरीदवा सकती है. स्त्रियों के विज्ञापनों में इतने भीषण इस्तेमाल से परसाई जी का मानना है कि सुन्दर स्त्री का आकर्षण किसी पुरुष से न होकर उसके द्वारा किये जा रहे सामान से होता है. अगर वह उस सामान का प्रयोग ना करे तो विज्ञापन के अनुसार स्त्रियाँ उसे नकार देंगी. टूथपेस्ट जैसे विज्ञापन में महिलाओं की भरमार बताती है कि शायद् कम्पनियां यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि पुरुषों के भी दांत साफ़ हो सकते हैं या वे भी अपने दांतों को साफ़ करते होंगे (परसाई ह. , विज्ञापन में बिकती नारी, 2009).
इस प्रकार अपने आलेख विज्ञापन में बिकती नारी में परसाई जी ने महिलाओं के वस्तुकरण पर तो तीखा व्यंग्य किया है, पुरुषों को भी आईना दिखाया है कि कोई भी व्यावसायिक कंपनी भारतीय पुरुषों को लेकर क्या नजरिया रखती है. स्त्रियों की तस्वीर से मोहित होकर सामान खरीदने का विचार बताता है कि पूंजीवाद की दृष्टि में अगर स्त्री माल बेचने का साधन है, तो पुरुष मूर्ख और अपनी काम भावना का शिकार व्यक्ति है जिसे लड़कियों के आकर्षण में फंसवाकर कुछ भी खरीदवाया जा सकता है.
पतियों के मानसिक द्वंद्व से जूझती स्त्री के संघर्ष
परसाई जी ने एक बेहद महत्वपूर्ण निबंध ‘ वो ज़रा वाइफ हैं न’ के मार्फ़त महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश पर पतियों के द्वंद्व पर बात की है. इस निबंध में उन्होंने पतियों की दोहरी मानसिकता पर कटाक्ष किया है. जो यह तो चाहते हैं कि उनकी पत्नी पढी लिखी हो, साहित्य लिखे, आत्मनिर्भर बने पर वह उसके सार्वजनिक जीवन में आने से भयभीत रहते हैं और कोशिश में लगे रहते हैं कि आत्मनिर्भरता के सारे अवसर वे अपनी पत्नी को घर में ही लाकर दे दें. स्त्री को बाहर के लोगों खासतौर पर मिलने जुलने वाले पुरुषों से जितना हो सके दूर रखा जाए. परसाई जी इस निबंध में कई उदाहरण देते हैं.
एक पति महोदय परसाई जी से कबीर समझना चाहते हैं ताकि घर जाकर वे अपनी पत्नी को समझा सकें, जो अभी परीक्षा में बैठने की तैयारी कर रही है. दूसरे पति महाशय पत्नी की कविताओं को परसाई जी के पास लेकर जाते हैं ताकि वह उसमें सुधार बता दें और उनकी पत्नी उन कविताओं को सुधार सके. जब परसाई जी कहते हैं कि यह कोई गणित का सवाल नहीं कि किसी को भी समझा दिया जाए जिसने लिखा है उसी को समझना होगा तो पति महोदय झिझकते हुए कहते हैं कि वो ज़रा वाइफ हैं न. मतलब पत्नी हैं तो बाहर नहीं आ जा सकती. अपनी जरूरतों या महत्वाकांक्षाओं के अनुसार लोगों से मिलजुल नहीं सकतीं. परसाई जी सोचते हैं कि क्या यही बात वह डॉक्टर से भी कहता होगा कि पत्नी की जगह उसे ही देख ले और दवा दे दे. बहुत से थियेटर से जुड़े पुरुष महिला कलाकार न मिलने से परेशान रहते हैं. पर जब उनसे कहा गया कि आप अपनी पत्नियों या परिवार की महिलाओं को भी इन भूमिकाओं के लिए चुन सकते हैं, तो इस पर थोड़ी नाराजगी दिखाते हुए कहते हैं कि वो ज़रा वाईफ हैं न वो कैसे आयेंगी. (परसाई ह. , वो ज़रा वाईफ हैं न, 2007 )?
परसाई जी इसी दुविधा पर व्यंग्य करते हैं. पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष की चाह तो यही रहती है कि उसकी पत्नी घर के सीमित दायरे में ही रहे लेकिन एक शिक्षित, सुरुचिपूर्ण, तरक्की पसंद और आत्मनिर्भर स्त्री का पति कहलाना भी पुरुष की महत्वाकांक्षा बन चुका है. परसाई जी कहते हैं कि आगे बढी हुई पत्नी का गौरव बहुत स्वस्थ और जायज है. मगर वह बढे कैसे? कुछ लोग उसकी आँखों पर पट्टी बांधकर उसे पीठ पर लादकर आगे ले जाकर रख देना चाहते हैं. जब पट्टी खुले तो वह कहे कि आह हम तो इतने आगे बढ़ गए. पर यह कुलीगिरी से ज्यादा कुछ नहीं होगा (परसाई ह. , वो ज़रा वाईफ हैं न, 2007 ). इस प्रकार परसाई जी स्त्री की मदद करने के नाम पर बैसाखी देने की सख्त खिलाफत करते हैं. स्त्री की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है और इस भागीदारी में पैर जमाने के लिए प्रयास उसे खुद करने देने होंगे. उस पर, उसकी काबिलीयत पर भी विश्वास रखना होगा.
परसाई जी की सन 1956 में वसुधा में प्रकाशित कहानी ‘घेरे के भीतर’ भी पतियों के भीतर के इसी द्वंद्व पर बात करती है. यह द्वंद्व घरेलू हिंसा में कब तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता. परसाई जी के अनुसार घरेलू हिंसा समाज में इतनी सहजता से व्याप्त है कि वह पुरुष के प्रेम, देखभाल और जिम्मेदारी का परिचायक मान ली जाती है. लेकिन लगातार हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए मृत्यु से बदतर स्थिति बन जाती है. पुरुष स्वयं हर तरह के वर्जित अनुभव लेना अपना अधिकार समझता है, वहीं महिलाओं के लिए इसके बारे में सोचना या इसका भ्रम ही पैदा होना महिलाओं के लिए एक बड़ी हिंसा का कारण बन जाता है. घरेलू स्त्री अपने सामने अपने पति को किसी दूसरे का होते हुए देखती है तो अपने रास्ते तलाशती है, उसे वापस अपने करीब लाने के. लेकिन वापसी के बाद भी संबंधों में व्याप्त असमानता और वर्चस्व की स्थिति उन्हें सुकून में रहने नहीं देती है. महिलाओं के विरूद्ध हिंसा का बड़ा कारण संबंधों में असमानता और वर्चस्व की ही स्थिति है, जो किसी भी संबंध को घुन की तरह खा सकती है.
इस कहानी में पति कम पढी लिखी पत्नी को फुसलाकर अपनी प्रेमिका को लगातार पत्र लिखता रहता है. जब पत्नी को शक होता है तो वह शब्द मिलाकर पढ़ना सीखती है और पति के सारे ख़त पढ़ लेती है. जब पत्नी इन खतों में याद की जारी स्त्री के बारे में जानना चाहती है तो उसे पति बहन बताता है. पत्नी जब पति के जबाव से संतुष्ट नहीं होती तो उसके साथ मारपीट शुरू कर देता है. हर बार शक करने पर मारपीट और ताने कि तुम संबंधों का गलत अर्थ लगा रही हो. स्त्री जब पति को जलाने के लिए किसी भाई को गलत पते पर बेहद सामान्य भाषा में एक झूठा ख़त लिखती है तो उस ख़त को देखकर भी पति उसके साथ मारपीट करता है और चरित्रहीन कहता है. वह कहती है अगर तुम्हारी बहन है तो मेरा भी तो कोई भाई हो सकता है और तो अपने भाई को बहुत सामान्य भाषा में ख़त लिखा है. लेकिन पति के भीतर अपनी पत्नी के मन में किसी दूसरे पुरुष के ख़याल की बेबुनियाद कल्पना ही उसे एक गहरी हीनता में ले जाती है. जिस अपमान हीनता और क्षोभ और घृणा की अनुभव पत्नी कर रही थी, वही उसने अपने पति के चेहरे पर भी देखा. इस भाव से उस स्त्री के भीतर एक संतोषपैदा होता है जो उसके चहरे की चमक बढ़ा देता है. वह अपने पति के भीतर यह बदलाव भी देखती है कि वह अब उसे ज्यादा समय देता है. उसकी निगरानी करता है और बीच बीच में कुल्टा कहकर उसे पीटता भी है. पर हर मार में पत्नी अपनी जीत महसूस करती है क्योंकि वह अपने पति के चेहरे पर एक ग्लानि और क्षोभ देखती है. इसी विजय की खुशी में वह और ज्यादा ख़ूबसूरत होती जा रही है (परसाई ह. , घेरे के भीतर , 2019). इस कहानी के एक घरेलू स्त्री के प्रतिरोध की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है
वसुधा के नवम्बर 1957 के अंक में प्रकाशित कहानी उपदेश में परसाई जी ऐसे विद्वानों पर करारा व्यंग्य करते हैं. जो नारी अधिकारों के समर्थन की मंचों से तो बड़ी बड़ी बातें कहते हैं पर असल जिन्दगी में अपने परिवार की महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में सहभागिता या उनके अधिकारों के प्रबल विरोधी होते हैं. सेवक जी महिला स्वतंत्रता के लिए काफी संघर्ष करते हैं और शहर में काफी चर्चित हैं. पर जब उनकी पत्नी महिला मंडल की बैठक में जाने के लिए कहती है तो उसे डांटते हैं कि मुंह उठा के कहीं भी चल दोगी क्या? कुछ शर्म लिहाज है या नहीं? जब उनका बेटा पूछता है कि अभी तो आप मंच से बोले थे कि महिलाओं को घर से बाहर आना चाहिये तो जबाव देते हैं कि इस बात का मतलब है कि दूसरों के घर की औरतों को बाहर निकलना चाहिए, अपनी नहीं (परसाई ह. , उपदेश, 2019).
इस प्रकार परसाई जी पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों के भीतरी द्वंद्व को सामने लाते हैं कि वे अभी स्त्री को सार्वजनिक जीवन में लाने , न लाने या अपनी जायदाद समझाने और इंसान समझने के बीच पेंडुलम की तरह झूल रहे हैं. इस संक्रमण का दौर में वे खुद नहीं समझ पा रहे हैं कि वे क्या चाहते हैं या कहें कि बेहद स्पष्ट हैं कि सारी स्त्री मुक्ति दूसरों के घर की औरतों के लिए. अपने घर की स्त्री को वे उसी पारंपरिक भूमिका में ही देखना चाहते हैं, जिसमें वह सदियों से है.
महिला स्वास्थ्य के प्रति सरोकार
परसाई जी ने महिलाओं के स्वास्थ्य को भी अपने लेखन में शामिल किया है. महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य की चिंता करती परसाई जी की 1953 की एक महत्वपूर्ण कहानी है पड़ोसी के बच्चे . यह कहानी वैसे तो एक ऐसे पुरुष पर आधारित है जो बहुत गरीब है. छोटी मोटी नौकरी से अपनी जिन्दगी काट रहा है ,लेकिन लगातार बच्चे पैदा करके उन बच्चों को भगवान की मर्जी कहकर गरीबी के दलदल में जीने के लिए झोंकता जा रहा है. बच्चे भूखे फिर रहे हैं. सड़क पर लोगों का सामान छीन छीन कर खा रहे हैं. दिन भर घर में खाने के दानों के लिए कलह मची रहती है, पर बच्चे पैदा होने बंद नहीं हो रहे हैं. आठवें बच्चे को पैदा करते हुए उसकी पत्नी की हालात बहुत ज्यादा नाजुक हो जाती है. घर में न पैसे हैं, न कुछ खाने को तो पड़ोस की औरत अपनी गाय का बचा हुआ गुड और चना उसकी पत्नी को भिजवाती है और गुस्से में कहती है कि अरे पापी तू तो उसकी जान ही ले डालेगा. अंत में परसाई जी बहुत मार्मिक बात कहते हैं कि लोग समानाधिकार की बात करते रहते हैं. आदमी आदमी की समानता की बात तो अभी दूर है, पशु के सामान अधिकार तो मिल जाएँ आदमी को (परसाई ह. , पड़ोसी के बच्चे , 2019 ).
इस कहानी में परसाई जी ने महिलाओं को बच्चे पैदा करने वाली निर्जीव मशीन समझाने वाले पुरुषों की जाहिलता, भगवान की देन के नाम पर बच्चे दर बच्चे पैदा करने की सोच पर चोट करते हैं. गरीबी के शिकार परिवार में लगातार बच्चे पैदा करती स्त्री को उसके ज़िंदा रहने के लिए आवश्यक पोषण का भी अभाव रहता है. जानवर तक को वह पोषण मिल जाता है पर इंसान को नहीं मिल पाता. महिलाओं की जानवर से बदतर स्थिति पर परसाई जी की यह कहानी झकझोरने वाली है.
इसी प्रकार 1949 में प्रहरी में प्रकाशित परसाई जी की कहानी ‘भीतर का घाव’ गरीब घर से ससुराल आयी लड़की के ऊपर परिवार वालों के जुल्म और दानवीय व्यवहार को बयान करती है. बहु की इज्ज़त उसके प्रेमपूर्ण व्यवहार या परिवार के प्रति उसके कर्तव्यबोध से नहीं होगी, वह केवल उसके घर से लाये जाने वाले दहेज़ से ही होगी. जो दुल्हन दहेज़ लायेगी उसे घर में इज्ज़त मिलेगी अन्यथा उसे मरने के हाल पर ले जाया जाएगा और मरने के बाद किसी पैसे वाले नए शिकार को फंसाने की तैयारी शुरू हो जायेगी. दहेज़ का दानव् मनुष्यों की मनुष्यता छीन कर उन्हें राक्षसों की श्रेणी में खड़ा करता जा रहा है. बड़े से बड़े धार्मिक और पाप पुन्य का लेखा जोखा रखने वाले, नेम धर्म करने वाले भी इस लालच की आग से नहीं बच पा रहे हैं और हत्यारे बनाते जा रहे हैं.
ऐसे ही परिवार में एक गरीब शिक्षक की लड़की का विवाह होता है. दहेज़ मिलता नहीं है और इसी कारण वह सास ससुर की आँख का काँटा बन जाती है. उसका तिरस्कार करने में परिवार की महिलायें अव्वल रहती हैं. पति प्रेम करता है पर वो रोजी रोटी कमाने में ही व्यस्त रहता है. दिन भर हाड तोड़ काम करने वाली बहू को न पौष्टिक भोजन मिलता है न बीमारी पर इलाज. जब उसका पति इलाज कराने की प्रयास करता है तो उसकी लाई दवाईयों को भी नाली में फेंक कर पानी भर दिया जाता है. या आलमारी में छिपा दिया जाता है.ताकि बहू मर जाए और वे लड़के की नयी शादी कर सकें . दवा न मिलाने से बहू देह त्याग देती है और तीसरे दिन ही लडके की नयी शादी पर बात चलने लगती है, जिससे 5000 रूपये मिलने की आशा है. माता पिता का यह दानवी रूप छोटा बेटा देख लेता है .जब वह भाभी के स्वर्गवास की असली वजह बड़े भाई को बताता है तो बड़ा भाई दुःख और निराशा में कहीं चला जाता है और किसी को नहीं मिलता. वह जीवित या नहीं पता नहीं चल पता. पूरा घर दुःख के सागर में डूब जाता है. दहेज़ का दानव खुशहाल जोड़े को ख़तम कर देता है और माता पिता के ऐसे रूप को सामने लाता है, जिसकी कल्पना भी औलाद नहीं कर सकती (परसाई ह. , भीतर का घाव , 2019 ).
घर परिवार महिलाओं को लेकर कितने अमानवीय हो सकते हैं, इस कहानी में उसकी पराकाष्ठा दिखाई गयी है. दूसरे के घर से आयी लड़की से किसी को मोह नहीं, परवाह नहीं. वह एक ऐसी मशीन है जो दिन भर घर में भूखी प्यासी काम करती रहे या बच्चे जानती रहे. बीमार होने पर उसके जल्दी मरने की दुआ माँगी जाए, ताकि नयी औरत को घर में लाया जा सके. परसाई जी इस मुद्दे को अपनी पूरी भयावहता के साथ अपने लेखन में हमारे सामने लेकर आते हैं और हमारे तथाकथित सभी समाज को आईना देखा देते हैं.
महिलाओं के यौन उत्पीड़न के प्रति संवेदनशीलता
परसाई जी ने महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की तकलीफ को भी अपने लेखन में शामिल किया है. 1951 के प्रहरी में प्रकाशित कहानी ‘किताब का एक पन्ना’ एक भिखारी मां और उसकी विवशता का मजाक उड़ाते उस पर कुदृष्टि रखते लोगों की कहानी है. कैसे एक अभागी, अकेली, गरीब औरत लोगों की दूषित नज़रों का सामना करती है. अपने बच्चे के लिए भीख मांगती है. औरतें उसके छूने भर से ही खुद को अपवित्र और अपमानित महसूस कर रही हैं, वहीं उनके पति उस औरत को अपनी फ़ैली टांगों से छूने की भरसक कोशिश कर रहे हैं. जब वह गाकर भीख मांगती है तो उसे पुरुषों का एक समूह इशारा करके अपने पास हारमोनियम के साथ गाने को बुलाता है. वह अपनी विवशता पर भीतर से इतनी आहत हो जाती है कि जब एक पुरुष उसे चवन्नी दे रहा होता है तो कहती है कि पहले हारमोनियम पर गा लूँ तब पैसा देना. इस पूरे वाक्य में स्त्री की विवशता लोगों के दंभ पर कालिख सी मल देती है.उस स्त्री पर पुरुष टूटे से पड़ रहे हैं और वह गाती है देखा करो भगवान गरीबों का तमाशा (परसाई ह. , किताब का एक पन्ना , 2019 ).
राग विराग कहानी एक ऐसे सन्यासी के बारे में बात करती है, जो महिलाओं को अपने करीब बैठने की पाबंदी रखता है. जब बस में एक स्त्री उसकी बगल में बैठ जाती है तो वह पहले अपने सन्यासी होने का हवाला देता हुआ मना करता है ,पर जब स्त्री कहती है कि आप पिता तुल्य हैं, सन्यासी हैं. आपके पास हम सुरक्षित बैठ सकते हैं तो वह बेमन से हाँ कर देता है. पर थोड़ी देर बाद ही बस में धीरे धीरे उसके सन्यासी रूप के पीछे छिपे कामी पुरुष का भाव सामने आ जाता है और वह बगल में बैठी स्त्री को अनचाहे स्पर्श से लगातार परेशान करता रहता है. बार बार मना करने के बावजूद इतना परेशान कर देता है कि वह स्त्री उस सन्यासी को थप्पड़ लगा कर कंडक्टर से कहती है कि मुझे कहीं और बिठाओ (परसाई ह. , राग विराग , 2019 ). इस कहानी में परसाई जी ने सन्यासी के रूप में समाज में भरोसा पाए पुरुषों के भीतर की कामी प्रवृत्ति को उजागर किया है. चलती बस में बीसीयों लोगों के सामने एक आदमी की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती है कि वह पास बैठी या खड़ी महिला से यौन दुर्व्यवहार करे, जबकि वह स्वयं एक सम्मानित स्थान प्राप्त व्यक्ति है. क्या इसी सम्मान की आढ़ लेकर महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार किया जाता है? महिलाओं के साथ दैनंदिन जीवन में होने वाले यौन उत्पीड़न को सामने लाने का काम परसाई जी ने इस कहानी के माध्यम से किया है.
ऐसे ही परसाई जी ने कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न को सामने लाने का प्रयास किया है. कहानी है मेनका का तपोभंग. इसमें एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया गया है, जो तमाम सारी समाज सेवी संस्थाओं से जुड़ा है.महिला उत्कर्ष मंडल, विस्थापित संघ आदि का अध्यक्ष है, नारी जाति की सेवा कर रहा है, विस्थापितों की मदद के लिए भी अग्रणी है, मानव कल्याण, हरिजन कल्याण, सर्वोदय आन्दोलन सभी में सक्रिय है. उसकी लोकप्रियता से इंद्र का सिंहासन डोल गया तो उसका ध्यान भंग करने के लिए इंद्र ने मेनका को भेजा. मेनका के पास बड़े तपस्वियों के तप भंग करने का अनुभव था और वह जानती थी कि यह कितना कठिन काम होता है.
अपने काम को अंजाम देने के लिए सूक्ष्म रूप में मेनका ने एक स्त्री के भीतर प्रवेश कर नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाती है . वहां वह देखती है कि बिना शिक्षा, अनुभव के भी उस समाज सेवी द्वारा मेनका का चयन तुरंत कर लिया जाता है. चयन के बाद लगातार समाज सेवी उसके घर के चक्कर लगाते हैं, उससे हृदयेश्वरी कहकर प्रणय निवेदन करने लगते हैं, तनख्वाह दुगुनी कर देते हैं और तब भी मेनका नहीं मानती है तो उसे नौकरी से निकालने की धमकी भी दे जाते हैं . मेनका समाज सेवी की स्त्रियों को लेकर लोलुपता देख कर वितृष्णा से भर जाती है और वापस बुला लेने की विनती इंद्र से करती है. समाज सेवी को जब पता चलता है कि वह मेनका है तो वह कहते हैं कि मैंने इतना प्रयास इंद्र के सिंहासन के लिए नहीं बल्कि तुम्हें पाने के लिए किया है, मेनका (परसाई ह. , मेनका का तपोभंग , 2019 ).
यह कहानी कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की और इशारा करती है. सौन्दर्य से प्रभावित होकर तमाम जरूरत मंद लड़कियों को नौकरी पर रखने वाले कैसे बाद में उनके साथ यौन उत्पीड़न करने का प्रयास करते हैं और मना करने पर उन्हें नौकरी से निकाल देने की धमकी देते हैं, न मानने पर निकाल भी देते हैं. बहुत सी जरूरतमंद लड़कियां समझौता कर लेती हैं और बहुतों को नौकरी से हाथ भी धोना पड़ता है. परसाई जी इस कहानी के माध्यम से समाज के चमकते और समाज सेवी चेहरों की असलियत उजागर करते हैं और कार्यस्थल पर व्याप्त वर्चस्वशाली सत्ता संबंधों के महिलाओं के ऊपर यौन हिंसा के रूप में पड़ने वाले प्रभाव को सामने लाते हैं.
स्त्री शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता के समर्थक
परसाई जी स्त्री शिक्षा और आत्मनिर्भरता के कितने बड़े हिमायती हैं, यह चौबे जी की कथा में बहुत स्पष्टता से परिलक्षित हुआ है. चौबे जी की कथा एक बेहद महत्वपूर्ण कहानी है, जिसमें लड़कियों का एक अलग ही रूप परसाई जी दिखाते हैं. मिश्र जी की एम् ए फर्स्ट क्लास पास लड़की शीला का विवाह चौबे जी के पुत्र अशोक से तय हुआ. वह भी एम् ए फर्स्ट क्लास पास है और नौकरी की खोज में है. एम् ए पास बेकार लडके का रेट 15 हजार रुपये लगा और शादी तय हो गयी. महीने भर बाद अशोक का चयन डिप्टी कलक्टर के पद पर हो गया और परिवार के मन में ज्यादा दहेज़ का लालच आ गया. चौबे जी और उनकी पत्नी को जल्दी शादी तय करने पर खुद पर गुस्सा भी आया. हारकर चौबे जी ने पत्र लिखकर नीति मर्यादा और लडके के डिप्टी कलक्टर पद के नाम पर मिश्र जी से 10 हजार रुपये की और मांग की. लेकिन चौबे जी का यह दांव उलटा पड़ गया. जबाव में मिश्र जी का पत्र आया कि शीला का चयन भी आई. ए. एस. के लिए हो गया है और उसका निर्णय है कि वह किसी जूनियर सरकारी नौकर से शादी नहीं करेगी. इस संबंध को तोड़कर मुझे हर्ष हो रहा है (परसाई ह. , चौबे जी की कथा , 2019 ). यह कहानी लड़कियों के भीतर एक आत्मविश्वास का संचार करती है कि यदि वह पढ़ लिखकर उच्च पद पर आसीन हो जाएँ तो वह दहेज़ लोभियों को करारा जबाव दे सकती हैं और अपनी शर्तों पर स्वाभिमान पूर्वक जिन्दगी जी सकती हैं. उच्च शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता से उनके पास भी यह शक्ति होगी कि वह उनका अपमान करने वाले को उसकी हैसियत दिखा दें.
परसाई 1950 में प्रहरी में प्रकाशित कहाने ‘एक बहिन की बात’ में ऐसी लड़की का जिक्र करते हैं, जो आत्मविश्वास से भरी है, अपने निर्णय लेती है और किसी भी अप्रत्याशित बात कि संभालने का भी माद्दा रखती है. इस कहानी में एक लड़की को अपने परीक्षा स्थल पर पहुँचने में देरी हो गयी है. उसे कोई भी साधन नहीं मिल रहा है. उसकी ऐसी हालत देखकर एक युवक ने उसे अपनी साइकिल पर छोड़ने का आमंत्रण दिया. लड़की उसकी साइकिल पर जाने को तैयार हो गयी. जब वह साइकिल से उतर कर जाने लगी तो युवक ने पूछा अब मैं आपसे कब मिलूँ तो लड़की जबाव देती है, रक्षा बंधन के दिन. परसाई जी की कहानी यह भी बताती है कि किसी स्त्री द्वारा किसी पुरुष द्वारा की मदद की पेशकश स्वीकारने का तात्पर्य उस स्त्री की उस पुरुष को सहज उपलब्धता बिलकुल नहीं है (परसाई ह. , एक बहिन की बात , 2019 ).
स्त्री जीवन के द्वंद्व
परसाई जी ने प्रेम विवाह की बात अपने लेखन में पुरजोर तरीके से उठायी है. पर स्त्री के इस फैसले को लेकर चलने वाले द्वन्द्व पर भी चर्चा की है . उस समय भारतीय समाज में युवतियों को इतनी छूट नहीं मिली थी कि वे लम्बे समय तक किसी पुरुष के साथ परिचय रखकर अपनी पसंद ना पसंद को स्पष्ट रूप से समझ पायें. उनके पास सीमित लोग सीमित अवसर होते थे. उन्हें प्रेम के लिए भी उनमें से ही चयन करना होता था. कई बार उन्हें यह भी लगता था कि वह उस व्यक्ति से सचः में प्रेम करती भी हैं या नहीं. इसी ऊहापोह को परसाई जी ने अपनी कहानी प्रेमियों की वापसी में प्रस्तुत किया.
प्रेमियों की वापसी कहानी में इस सन्दर्भ में कई मुद्दों पर एक साथ बात करने का प्रयास किया है. इस लोक में प्रेम पूरा न होने की सम्भावनाओं को देखते हुए दो युवा आत्महत्या करते हैं और स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु परलोक पहुँच जाते हैं. वहां वे अपने कई वरिष्ठ और संयमित जीवन जीने वाले लोगों को देखते हैं कि वे एक स्वच्छंद जीवन जी रहे हैं. जिन महिलाओं को या पुरुषों को इस लोक में नकारते और बदनाम कर रहे थे, उस लोक में उन्हीं के साथ प्रेम की पींगें बढ़ा रहे हैं. वहां वे अपने छिपे हुए प्रेम को स्वीकारते हैं और बताते हैं कि मृत्यु लोक में इन संबंधों को नहीं स्वीकार पाए पर यहाँ वे उन सभी संबंधों को स्वीकारने के लिए स्वतन्त्र हैं. पर इन संबंधों के बावजूद एक अविश्वास की स्थिति बनी हुई है. अविश्वास जो धरती लोक में एक दूसरे के प्रति बना था, वह यहाँ भी बना है. हर एक व्यक्ति अपने दूसरे साथी पर दूसरी सम्भावनाओं की तलाश के शक में है. युवा और युवती भी प्रेम के लिए जीवन को त्याग देने के समय से ही एक दूसरे के प्रति व्याप्त अविश्वास रखते हैं. दोनों के मन में संशय है कि कहीं कोई पहले की मृत्यु के बाद अपने इरादे से पीछे न हट जाए. मृत्यु के बाद इस शक को उनके वरिष्ठ जन और पुख्ता कर देते हैं. स्वर्ग लोक की आज़ादी देख कर धीरे धीरे लड़की भी यह स्वीकार कर लेती है कि वह किसी और से प्रेम करती है . पर उसके पिता और लड़की के पिता की दुश्मनी के कारण वह इस सम्बन्ध को स्वीकार नहीं कर पायी. पर वह अब उससे प्रेम करना चाहती है. जिसके साथ उसने आत्महत्या की वह उसकी मजबूरी के प्रेम था क्योंकि उसके अलावा वह किसी और लडके से मिली ही नहीं थी. जब यह शिकायत विधाता के पास जाती है तो वे उस लड़की को समझाते हैं कि जब उस लड़के को पता चलेगा कि तुमने किसी और के साथ प्रेम में आत्महत्या की है तो वह तुम्हें कभी नहीं स्वीकारेगा. जब दोनों वापस धरती लोक पर जाने की बात करते हैं तो विधाता व्यंग्य भी करते हैं कि इधर उधर ही करते रहोगे या कुछ काम भी करोगे? लड़की हर बात में पुरुष की अनुगामिनी भी बनाना चाहती है और दूसरी और स्वतंत्र भी. अंत में दोनों को किसी और योनि में जन्म लेने के लिए मौक़ा दिया जाता है क्योंकि मनुष्य का जीवन नष्ट करके उन्होंने उस लोक के द्वार बंद कर दिए हैं. इस कहानी में लोगों के मन की भीतरी परतों तक परसाई जी ने पहुँचने का प्रयास किया कि जो लोग स्वयं को संबंधों में बहुत ज्यादा प्रतिबद्ध और संयमित साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं उनके मन की भीतरी परतों में क्या कुछ चल रहा होता है, पर समाज के दबाव उन्हें अपनी भावनाओं को स्वीकारने नहीं देती. (परसाई ह. , प्रेमियों की वापसी, n.d.).
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि परसाई जी ने सिर्फ स्त्री जीवन की त्रासदी को अपने लेखन में प्रमुखता से शामिल किया गया है, बल्कि उसके जीवन संघर्ष को भी बखूबी सामने लाया है. छोटी छोटी कहानियों, आलेखों के माध्यम से परसाई जी स्त्री जीवन के प्रति अपने सरोकारों को सामने रखते हैं. हिंदी में कम लेखक हैं , जिन्होंने इतनी संवेदनशीलता के साथ स्त्री मुद्दों पर बात की है. परसाई जी को व्यंग्यकार के रूप में ही सीमित नहीं किया जा सकता बल्कि वह एक समाज विज्ञानी और स्त्री अधिकारों के समर्थक व्यक्तित्व है. परसाई जी के लेखन के इस पहलू को अभी और गंभीरता से देखा जाना आवश्यक है.
संदर्भ
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