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  • रवित यादव की गद्य कविताएँ

    आज पढ़िए रवित यादव की कविताएँ। रवित पेशे से वकील है और अपने छात्र दिनों से ही कविताएँ लिखते रहे हैं। जानकी पुल पर पहले भी उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आज उनकी कुछ गद्य कविताएँ पढ़िए। जीवन की उलझनों को सुलझाने के क्रम में जैसे अपने आपसे संवाद की शैली में- मॉडरेटर

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    1- जब पहली बार महसूस हुआ कि मेरी आवाज़ मुझ तक लौटकर नहीं आती।

    शाम ठहरी हुई है। जैसे किसी पुराने आईने पर जमी धूल, जिसे उँगलियों से छूने पर भी मिटाया नहीं जा सकता। मैं पहाड़ पर खड़ा हूँ। नीचे शहर की रोशनी अभी पूरी तरह नहीं जली है, बस दूर-दूर कुछ घरों की खिड़कियाँ टिमटिमा रही हैं। ऐसा लगता है जैसे वहाँ किसी ने दिन को अलविदा नहीं कहा, बस उसे अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया है। हवा में ठंडक है, एक हल्की नमी, और मैं पहली बार महसूस कर रहा हूँ कि मेरी आवाज़ मुझ तक लौटकर नहीं आती।

    मैंने धीरे से अपना नाम पुकारा था। बस एक बार, यह जाँचने के लिए कि क्या इस सन्नाटे में भी कोई मेरी मौजूदगी दर्ज कर सकता है। लेकिन कुछ नहीं। कोई प्रतिध्वनि नहीं, कोई हलचल नहीं। जैसे मैंने कुछ कहा ही नहीं। क्या यही वह क्षण है जब आदमी अपने अस्तित्व की अंतिम सीमा को छूता है? जब उसे एहसास होता है कि वह दुनिया में किसी लुप्तप्राय प्रजाति की तरह रह गया है—जिसके होने का कोई अर्थ नहीं, बस एक आदतभर रह गई है?

    शहरों में ऐसा नहीं होता। वहाँ तुम्हारी आवाज़ हमेशा किसी न किसी चीज़ से टकरा जाती है—दीवारों से, लोगों से, शोर से। वहाँ खो जाना आसान नहीं है। लेकिन यहाँ… यहाँ मैं सच में अकेला हूँ। चारों ओर सिर्फ़ पहाड़, हवा, और एक अनजाना सूनापन।

    क्या यह डरावना है? शायद। लेकिन यह डर वैसा नहीं जैसा अंधेरे कमरे में होता है, जहाँ हर परछाईं में कोई अनहोनी छिपी लगती है। यह उस डर की तरह है जो धीरे-धीरे आत्मा पर जम जाता है, जैसे नमी दीवारों पर फफूँद बनकर उगती है। यह उस अहसास की तरह है जब तुम किसी पुराने घर में लौटते हो और पाते हो कि वहाँ सब कुछ वैसा ही है, लेकिन कुछ भी अपना नहीं बचा।

    शायद यही वजह है कि मैं अब तक यहाँ रुका हुआ हूँ। यह जगह मुझे बदल नहीं रही, यह मुझे सिर्फ़ मेरी ही परछाईं से मिलवा रही है। जब मैं शहर में था, तो भीड़ ने मुझे अपने भीतर समा लिया था। वहाँ मैं अपने सवालों को सुन नहीं सकता था, क्योंकि हर जगह जवाब पहले से मौजूद थे—अधूरे, लेकिन इतने बड़े और ऊँचे कि उनके पीछे मेरी आवाज़ दब जाती थी। लेकिन यहाँ… यहाँ कोई जवाब नहीं, सिर्फ़ सवाल हैं।

    मैंने फिर से पुकारा। इस बार थोड़ा ज़ोर से। आवाज़ पहाड़ों से टकराई, लेकिन वापस नहीं आई। कहीं कुछ टूटने की आवाज़ आई—शायद भीतर कुछ दरक रहा था।

    मैं सोचता हूँ, क्या यह हमेशा से ऐसा ही था? क्या मेरी आवाज़ कभी लौटती थी? या मैं हमेशा अपने ही भीतर खोई हुई ध्वनियों के बीच खड़ा था, यह सोचते हुए कि कोई मेरी पुकार सुनेगा? शायद यही असली सवाल है। शायद इसलिए हम शहरों में लौट जाते हैं, रिश्तों में लौट जाते हैं, उन गलियों में लौट जाते हैं जहाँ हमारी पहचान के कुछ पुराने टुकड़े बिखरे होते हैं—क्योंकि वहाँ हमें यह भ्रम बना रहता है कि हमारी आवाज़ सुनी जा रही है।

    लेकिन पहाड़ों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वे सिर्फ़ देखते हैं, चुपचाप। वे किसी की कहानी का हिस्सा नहीं बनते, वे किसी के उत्तर नहीं होते।

    शाम और भी गहरी हो गई है। नीचे शहर की बत्तियाँ अब साफ़ दिखने लगी हैं। मैं चुप हो जाता हूँ। मैं जानता हूँ, मेरी आवाज़ अब भी कहीं गूँज रही होगी—लेकिन शायद वहाँ नहीं, जहाँ मैं उसे सुनना चाहता हूँ।

    …..

    2- दरवाज़े के इस पार

    मैंने कई बार सोचा था कि इस घर को छोड़ दूँगा। एक दिन चुपचाप उठूँगा, दरवाज़े के कुंडे पर हाथ रखूँगा और बिना पीछे देखे बाहर निकल जाऊँगा। लेकिन हर बार, किसी न किसी चीज़ ने मुझे रोक लिया—कभी यह जालीदार दरवाज़ा, जिसके पार दुनिया एक धुंधली परछाईं की तरह दिखती है, कभी वह पुराना आईना, जिसमें अब चेहरा नहीं, बस एक खालीपन झलकता है। और कभी वह छिपकली, जो दीवार पर जमी रहती है, जैसे कोई भूला हुआ ख़याल, जिसे मैं मिटाना चाहता हूँ लेकिन जो हर बार लौट आता है।

    समय यहाँ ठहरा हुआ है। दरवाज़े के उस पार ज़िंदगी दौड़ रही है, गाड़ियाँ, लोग, बातें—सबकुछ बह रहा है, जैसे एक लगातार बदलती हुई नदी। और मैं? मैं इसी दरवाज़े के इस पार खड़ा हूँ, ठहरा हुआ, अटका हुआ। क्या मुझे कोई रोक रहा है? नहीं। क्या कोई पुकार रहा है? नहीं। तो फिर मैं यहाँ क्यों हूँ?

    क्या आदमी कभी सच में किसी जगह से चला जाता है? क्या शहर उसे छोड़ देते हैं, या वह खुद को बार-बार उन्हीं गलियों में लौटता पाता है, जहाँ उसने एक बार चलना सीखा था? मुझे याद आता है—इस घर के हर कोने में मैं किसी न किसी उम्र में रहा हूँ। दीवारों पर कुछ पुराने धब्बे हैं, जिन्हें मैं बचपन में उंगलियों से कुरेदता था। फ़र्श पर वह जगह, जहाँ कभी मेज़ हुआ करती थी, जिसके नीचे बैठकर मैं कहानियाँ लिखा करता था। और वह आईना—जिसमें पहले माँ का चेहरा दिखता था, फिर मेरा, और अब… अब बस धूल है।

    मैं जानता हूँ, अगर मैं बाहर निकलूँ, तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बाहर की दुनिया में कुछ नया नहीं होगा—वही भागते हुए लोग, वही आवाज़ें, वही अधूरे सपनों के इश्तेहार, जो हर किसी को कहीं न कहीं ले जाने का वादा करते हैं। लेकिन आदमी हर जगह पहुँचकर भी अधूरा ही रहता है। शहर बदलते जाते हैं, चेहरे बदलते जाते हैं, लेकिन भीतर वही शून्यता बनी रहती है।

    शायद यही वजह है कि मैं अब तक यहाँ हूँ। यह दरवाज़ा सिर्फ़ लकड़ी का बना एक चौखट नहीं, यह एक सीमा है—मेरे और उस दुनिया के बीच, जहाँ मैं जाना चाहता हूँ, लेकिन जाने से डरता हूँ। दरवाज़े के इस पार स्मृतियाँ हैं, सुरक्षा है, एक जानी-पहचानी उदासी है। और उस पार? शायद कुछ नहीं, शायद सिर्फ़ भ्रम।

    छिपकली अभी भी वहीं है, दीवार पर स्थिर, लेकिन मैं जानता हूँ, वह मुझसे ज़्यादा मुक्त है। मैं दरवाज़े की ओर बढ़ता हूँ, कुंडा छूता हूँ, और एक पल के लिए सोचता हूँ—क्या यह वह क्षण है जब मैं बाहर निकल जाऊँगा?

    लेकिन नहीं। शायद अभी नहीं। शायद मैं थोड़ी देर और ठहरूँगा। कई बार यह सोचना पड़ता है कि हम दरवाज़े के भीतर हैं या बाहर। या यह भी कि—कहीं ऐसा तो नहीं कि असल में कोई दरवाज़ा होता ही नहीं?

     

    3- गुमशुदा शामों का ठिकाना

    दूर पहाड़ियों के पार शाम उतर रही थी—मद्धम, धूसर, उदास। आकाश में बादल वैसे ही ठहरे थे, जैसे किसी पुराने चित्र में कोई अनजान आकृति धुंधली पड़ गई हो। हवा घास के ऊपर धीमे-धीमे सरक रही थी, और उन पत्तियों की सरसराहट में एक अजीब-सी पहचानी हुई उदासी थी—जैसे कोई पुरानी चिट्ठी, जिसे बरसों बाद खोलने का साहस किया हो।

    गायें चुपचाप चर रही थीं, उनके शरीर की भूरे और सफ़ेद धब्बों से भरी आकृतियाँ इस बियाबान में घुलती जा रही थीं। वे समय की उस सतह पर टिकी थीं, जहाँ न कोई हड़बड़ी थी, न कोई आकुलता—सिर्फ़ एक धीमी स्वीकृति कि यह दिन भी वैसे ही ढल जाएगा, जैसे बाकी ढलते आए हैं। वे एक के बाद एक सिर झुकातीं, घास को अपने मोटे होठों से खींच लेतीं, फिर धीरे-धीरे चबाने लगतीं, जैसे किसी भूले-बिसरे गीत को दोहरा रही हों।

    मैं उन्हें देखता रहा, बिना किसी उद्देश्य के। कई दिनों से मन में यह सवाल उमड़ रहा था कि क्या इन पहाड़ियों के पार कोई रास्ता जाता है? या यह पूरा परिदृश्य सिर्फ़ एक अंतहीन फैलाव है, जहाँ रास्ते शुरू होने से पहले ही खो जाते हैं?

    बहुत पहले मैंने सोचा था कि उन जंगलों में जाकर ही कुछ समझ पाऊँगा—शायद अपने भीतर उठते उन प्रश्नों के उत्तर भी वहीं मिलेंगे, जिन्हें शहर की भीड़ और घर की दीवारों ने धुँधला कर दिया था। लेकिन यहाँ आकर अहसास हुआ कि जंगल केवल उत्तर नहीं देता, बल्कि तुम्हें तुम्हारे ही प्रश्नों से भर देता है—धीरे-धीरे, संदेह की तरह, जो किसी अस्फुट स्वर में भीतर लगातार बजता रहता है।

    कभी-कभी लगता है, इस खुले मैदान में वे सभी लोग आकर ठहर गए हैं, जो शहर की भीड़ से छूट गए थे। वे किसी नाम के साथ याद नहीं आते, बस एक एहसास की तरह—किसी अधूरी बातचीत के छूटे हुए वाक्य, किसी आँगन में हवा के झोंके की तरह, जिसे महसूस तो किया जा सकता है, पर पकड़ा नहीं जा सकता।

    दूर कहीं एक चिड़िया का स्वर उभरा—एकदम हल्का, जैसे किसी बीती हुई स्मृति की अंतिम झंकार। पहाड़ियों पर अब अँधेरा घिरने लगा था, और मैं सोचने लगा—क्या कोई कभी इस अरण्य से लौट पाता है? या यह वही अंतिम ठिकाना है, जहाँ हम सब अंततः भटकते हुए पहुँचते हैं, बिना यह जाने कि हमने इस जगह को चुना, या इस जगह ने हमें।

     

    4- दिल की दरारों के भीतर के भीतर से

    यह एक अजीब और भयावह बात है—यह संकोच, यह भीतर ही भीतर सिकुड़ जाना, जैसे हर परछाईं के पीछे कोई अज्ञात भय पसरा हो। आदमी ज़ख़्मों के साथ नहीं, बल्कि एक असहनीय संवेदनशीलता के साथ छोड़ दिया जाता है—जीवन के आगे एक हिचक, एक ठिठकन, मानो हर चीज़ के स्पर्श मात्र से दरारें पड़ जाएँगी।

    चिंता, जो पहले एक हल्की सी बेचैनी थी, अब एक धीमी मगर लगातार रिसने वाली यातना है—किसी बंद लिफ़ाफ़े की अनुपस्थित गूँज, किसी अनजानी नज़र की छुअन, सड़क पर क़दम रखने की अनिश्चितता।

    मन, जो कभी अनंत तक फैलने का साहस रखता था, अब एक ही भय को चबाता रहता है—बार-बार, जब तक वह बेजान धूल में न बदल जाए।

    और तब? तब कुछ भी शेष नहीं रहता, सिवाय एक असहायता के—बिलकुल वैसी जैसी किसी बच्चे में होती है, परंतु बिना उसकी मासूम उम्मीदों के। सबसे निर्मम बात दर्द नहीं है, बल्कि यह जानना कि अब कुछ भी तुम्हारे वश में नहीं—न लड़ाई, न भागने की राह। बस एक अज्ञात सज़ा, जिसका अपराध भी तुम्हें याद नहीं।

     

    5- अनुपस्थिति का स्वर

    कई दिनों से यह अजीब-सा अहसास मेरे भीतर जमा हो रहा है—जैसे किसी पुराने, बंद कमरे में धूल की परतें धीरे-धीरे जमती जाती हैं। मैं सोचता हूँ, अनुपस्थिति क्या वास्तव में शून्यता होती है, या यह सिर्फ़ एक और रूप है उपस्थिति का? किसी चीज़ का न होना क्या उसकी सबसे प्रबल मौजूदगी नहीं बन जाता?

    कभी-कभी मैं देर रात बालकनी में बैठकर सड़क की ओर देखता हूँ। रोशनी बुझ चुकी होती है, कुछ देर पहले तक जो आवाज़ें थीं, वे भी अब कहीं लोप हो गई हैं। लेकिन एक विचित्र नमी हवा में ठहरी रहती है, जैसे कोई अदृश्य साक्ष्य कि यहाँ अभी कोई था, और अब नहीं है। यह ‘न होना’ ज़्यादा ठोस क्यों लगता है? यह उन चीज़ों को अपने में समेट क्यों लेता है, जो हो सकती थीं लेकिन कभी हुई नहीं?

    शायद यही जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है—जो चीज़ें पूरी हो जाती हैं, वे कभी लौटकर नहीं आतीं, लेकिन जो अपूर्ण रह जाती हैं, वे हमेशा हमारे भीतर मंडराती रहती हैं।

    तुम्हारी अनुपस्थिति इसी तरह मेरे साथ है। एक अधूरे संवाद की तरह, जिसे पूरा करने की कोई संभावना नहीं। एक ऐसे शहर की तरह, जहाँ मैं कभी गया नहीं, लेकिन जिसकी गलियाँ मुझे हमेशा परिचित लगती हैं। और एक अधूरी किताब की तरह, जिसका आख़िरी पन्ना हवा में उड़ गया हो—अब जो कुछ भी समझा जा सकता है, वह बस कल्पना के भीतर ही संभव है।

    मैं अक्सर यह भी सोचता हूँ कि इस अनुपस्थिति को नाम दिया जा सकता है या नहीं। क्या यह दुःख है? शायद नहीं। दुःख ठोस होता है, उसके भीतर एक निश्चितता होती है। यह तो एक अजीब तरह की रिक्तता है—जैसे समुद्र किनारे खड़ा कोई आदमी, जिसकी जेब में जहाज़ का टिकट है, लेकिन जिसे अब कहीं जाना नहीं।

    और यही सबसे गहरी त्रासदी है—कहीं न जा पाना, जबकि सामने रास्ते खुले हों।

    हमने हमेशा सोचा था कि हम आगे बढ़ेंगे, कि समय हमें धीरे-धीरे उन सब चीज़ों से मुक्त कर देगा जो पीछे छूट गई हैं। लेकिन समय हमें कहीं नहीं ले जाता। वह हमें बस वहीं छोड़ देता है, हमारे अतीत के बिल्कुल पास, लेकिन इतनी दूरी पर कि हम उसे छू नहीं सकते। और यह दूरी ही असहनीय है।

    शायद इसी दूरी को समझने के लिए मैं यहाँ हूँ—एक शोर से भरे शहर में, जो दिन-रात बदलता रहता है, लेकिन भीतर से स्थिर है। मैं सोचता हूँ, क्या कोई वास्तव में किसी को भूल सकता है? या हम सिर्फ़ उनकी अनुपस्थिति के साथ जीना सीख लेते हैं?

    शायद जीवन का यही अंतिम सत्य है। कोई भी उपलब्धि कुछ लोगों की अनुपस्थिति से बड़ी नहीं हो सकती। क्योंकि अंत में, हम उन्हीं चीज़ों के हो जाते हैं, जो हमें अधूरा छोड़ जाती हैं।

     

    6- शब्दों की परछाई में छूटता जीवन

    कहने को बहुत कुछ है, लेकिन हर बार लगता है, जैसे शब्द मेरा साथ छोड़कर कहीं और चले गए हैं। यह कैसा समय है, जहाँ विचार मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, पर भाषा उनकी चाल समझ नहीं पाती। हर अक्षर जैसे किसी अनकही बात का गवाह बनकर चुप खड़ा है। क्या भाषा हमारी साथी है, या वह केवल एक सीमा है, जो हमें भीतर-ही-भीतर कचोटती रहती है?

    मैंने हमेशा माना था कि भाषा हमारे भीतर छिपी हर भावना की खिड़की है। पर जब वह खिड़की बंद हो जाती है, तो क्या हम अंधेरों में ठोकरें खाते रहने को अभिशप्त हैं? आज लगता है, जैसे यह सबकुछ लिख पाना भी एक छलावा है। मैं लिखता हूँ, लेकिन शब्द उस बोझ को उठा नहीं पाते, जो मैंने उन पर डाल दिया है। वे गिरते हैं, टूटते हैं, और मेरी असमर्थता की गूँज बनकर मुझे घेर लेते हैं।

    जो कहना था, वह क्यों नहीं कहा गया? क्यों हर बार उस अभिधा से मुँह मोड़ लिया, जिसने सीधा-साधा रास्ता दिखाया था? क्या यह भाषा का डर था, या खुद को पूरी तरह नग्न कर देने का भय? जब भी कुछ कहना चाहा, भीतर एक आवाज आई, “क्या यह सचमुच कहा जा सकता है?” और हर बार, मैंने खुद को वापस खींच लिया।

    पर यह जो “न कह पाना” है, इसे भी शायद बचा लेना चाहिए। इसे दर्ज कर लेना चाहिए, ताकि समय के बाद कभी हम इस पल को देख सकें और जान सकें कि हमारे भीतर कुछ टूटा था, कुछ ऐसा जिसे जोड़ना शायद कभी संभव नहीं था। लिखना सिर्फ वो नहीं है, जो समझ में आए; लिखना वो भी है, जो हमारे भीतर छुपा है, जो हमारी हर साँस में जिंदा है, लेकिन जिसे शब्दों में ढालना एक असंभव पहेली बन गया है।

    कभी-कभी लगता है, शायद यह असमर्थता भी एक यात्रा है। हर बार जब मैं शब्दों को पकड़ने की कोशिश करता हूँ, वे मेरी उँगलियों से फिसलकर किसी अज्ञात में खो जाते हैं। क्या यह मेरे मन की चालाकी है? क्या मैं उस सच्चाई से भाग रहा हूँ, जो मुझे खुद से सामना करने पर मजबूर करती है?

    भाषा की यह सीमा क्या हमेशा थी, या मैंने इसे अपने भीतर पैदा किया? यह सवाल मुझे बार-बार सताता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं अपने ही डर में कैद हूँ, अपनी कल्पनाओं की ओट में छिपा हुआ? पर कल्पना भी कब तक चल सकती है? हर कल्पना, चाहे जितनी भी सुन्दर हो, अंततः वास्तविकता से टकराती है। और तब हम उस खालीपन के सामने खड़े रह जाते हैं, जिसे कोई शब्द नहीं भर सकता।

    संभावनाएँ, हाँ, वे हमेशा बची रहती हैं। कहीं किसी कोने में, किसी अनदेखे अंधेरे में। लेकिन वे इतनी छुपी होती हैं कि उन्हें खोजने का साहस हर बार नहीं जुटा पाते। शायद यह समय उन पुरानी संकल्पनाओं पर लौटने का है, जिन्हें हमने कभी अपने भीतर गढ़ा था। वे संकल्पनाएँ जो कभी पूरी नहीं हो पाईं, जो कभी शब्दों का रूप नहीं ले सकीं, उन्हें फिर से देखना होगा।

    और जो लिखा नहीं गया, उसे भी अपनी जगह देनी होगी। क्योंकि यह “अवकाश” ही है, जो हमें समय के पार ले जाएगा। जो अनसुलझा रह गया, वह हमेशा अनसुलझा नहीं रहेगा। लेकिन उसे सहेजने की जिम्मेदारी हमारी है। यह असमर्थता, यह मौन, यह टूटन — इन्हें भी शब्दों की परछाई में रख लेना चाहिए। ताकि जब समय बीते, हम जान सकें कि हमने न कह पाने को भी बचा लिया।

    शायद यही भाषा की सबसे बड़ी ताकत है — कि वह हमारी कमजोरी, हमारी सीमाओं, और हमारी चुप्पियों को भी अपने भीतर समेट लेती है। और शायद यही हमारी यात्रा है — भाषा के उस मोड़ तक, जहाँ न कह पाने का दर्द भी एक नई कहानी बन जाए।

     

    7— लौटने का कोई रास्ता किसी भाषा में कहीं नहीं होता।

    कमरे की खिड़की से जो धुँधलका भीतर आता है, वह बाहर की बारिश से नहीं, भीतर किसी बहुत पुरानी स्मृति से उपजा लगता है। जैसे दीवारों में बसी नमी, किसी पुराने संवाद की सुगंध लिए हुए धीरे-धीरे साँस ले रही हो। बारिश के शोर में एक सन्नाटा छुपा होता है, वही जो किसी पुराने प्रेम के टूटने के बाद कमरे में देर तक ठहरा रहता है, जब सब कह दिया गया हो—और फिर भी बहुत कुछ बचा रह गया हो।

    ऐसे ही किसी दिन, किसी शाम, मैंने जाना कि अकेले रह जाना एक सज़ा नहीं, एक सौगंध है। यह जीवन का वह मोड़ है जहाँ तुम्हें कोई धक्का नहीं देता—तुम स्वयं पीछे हटते हो। शायद इसीलिए वह स्त्री, जो चित्र में अधलेटी है, धुएँ में अपने अकेलेपन को बुनती है—उसमें कोई बेताबी नहीं है, कोई शिकवा नहीं। जैसे उसने स्वयं को किसी स्मृति की भट्टी में सौंप दिया हो। उसका निर्वस्त्र होना एक दृश्य नहीं, एक अनुभव है—जो शरीर से नहीं, आत्मा से महसूस किया जाता है।

    मुझे भी जब-जब प्रेम मिला, मैंने पाया कि उसकी गूँज उससे अधिक मोहक थी। वह गूँज जो प्रिय के चले जाने के बाद कमरे में रह जाती है—जहाँ कोई नहीं है, पर सब कुछ है। एकाकीपन का यह अनुभव कभी-कभी किसी पुराने संगीत की तरह होता है—धीमा, टूटता हुआ, पर बेहद सच्चा।

    और उसी गहराई में कहीं वह भाव भी उभरता है जिसे कोई कवि किसी दोपहर में कह गया था—“Into each life some rain must fall, Some days must be dark and dreary.”

    कभी-कभी, वह जो सबसे अपना होता है, वही सबसे पहले चला जाता है। और फिर, बचे रह जाते हैं वही कोने, वही चीज़ें, वही ध्वनियाँ, जो उसके होने की याद दिलाती हैं। जैसे दीवार पर टंगी एक तस्वीर, या धूप में सूखती एक पुरानी चिट्ठी।

    तुम्हें मालूम है, किसी दिन यूँ ही बैठते हुए मैं सोचता हूँ—क्या सच में जीवन वही है जो घटता है, या वह जो घटकर भी भीतर बचा रह जाता है?

    शायद हम सब अपने-अपने अकेलेपन में उस स्मृति को दोहराते रहते हैं जो कभी पूरी नहीं हुई। और यह अधूरापन ही जीवन का सबसे पूर्ण अनुभव बन जाता है।

    बारिश की बूंदें जब काँच पर गिरती हैं, तो कोई नया संगीत नहीं रचतीं—वे बस उन ध्वनियों को पुनः जीवित कर देती हैं जो हमने भुला दी थीं। प्रेम का अंत नहीं होता, वह किसी नई शुरुआत का रास्ता बनाता है—जहाँ कोई तुम्हारा हाथ नहीं थामता, पर तुम स्वयं से फिर मिलने लगते हो।

    Be still, sad heart! — क्योंकि यह सारा जीवन ही तो एक प्रतीक्षा है। प्रतीक्षा उस एक क्षण की, जब तुम्हें कोई नहीं बुलाता, और फिर भी तुम लौटते हो—अपने कमरे में, अपने एकांत में, अपने भीतर।

    और तब लगता है, कि सबसे सुंदर प्रेम वही था जो पूरी तरह कभी पाया नहीं गया।

    कई बार मुझे लगता है कि हम जिस शांति की कामना करते हैं, वह किसी और से मिलकर नहीं, खुद से छूटकर आती है। जैसे किसी पुराने कुर्सी पर बैठना, जिसकी पीठ पर तुम्हारे कंधों की छाप अभी भी है। या किसी खिड़की की धूल साफ़ करते हुए अचानक किसी भूली किताब का पन्ना हाथ लग जाना—जिस पर तुम्हारी ही लिखावट है, लेकिन तुम उसे पहचान नहीं पाते।

    अकेलापन एक दरवाज़ा नहीं होता जो बंद कर दिया जाए, वह एक रास्ता होता है—जो धीरे-धीरे तुम्हें अपने भीतर उतार लेता है। और वहाँ, उस भीतरी कमरे में कोई और नहीं होता, सिर्फ़ तुम होते हो—बिना अभिनय के, बिना प्रतीक्षा के।

    शायद एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं अपने अकेलेपन से कोई संवाद नहीं करूँगा, मैं उसमें रहूँगा जैसे कोई नदी अपने किनारों के बिना बहती है। और तब, यह सब जो अभी शब्दों में बंधा है, वह केवल एक मौन में परिवर्तित हो जाएगा। न कोई सिगरेट होगी, न कोई चेहरा, सिर्फ़ वह धुंध—जो कभी किसी एकान्त स्त्री के कमरे में उठी थी, और अब मेरे कमरे में उतर रही है।

    यह वही धुंध है, जिसमें मैं तुम्हें फिर से देखता हूँ—जैसे तुम कभी थी नहीं, सिर्फ़ मेरी स्मृति में उगी एक आकृति थी, जो हर बारिश में मेरे पास लौट आती है।

    शायद इसीलिए, लौटने का कोई रास्ता किसी भाषा में कहीं नहीं होता—सिर्फ़ एक कमरे की खिड़की होती है, जिससे देखता हुआ कोई चुपचाप बैठा रहता है।

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