• स्मरण
  • शिवानी जयंती पर मृणाल पाण्डे का लेख

    आज प्रसिद्ध लेखिका शिवानी जी की जयंती है। शिवानी को याद करते हुए आज प्रस्तुत है यह लेख जो उनकी पुत्री और प्रसिद्ध लेखिका-संपादक मृणाल पाण्डे का लिखा हुआ है। यह राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित शिवानी की संपूर्ण कहानियाँ की भूमिका के रूप में प्रकाशित हुई है। शिवानी जी के लेखन-जीवन को समझने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण लेख है। मृणाल जी की अनुमति से यह लेख प्रकाशित किया जा रहा है- मॉडरेटर

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    कभी-कभी कोई कुशल फोटोग्राफर किसी चेहरे के द्वारा अपने पात्र के पूरे व्यक्तित्व को सिर्फ एक छायाचित्र की मार्फत सदा-सदा के लिए साकार कर जाता है। शिवानी जी की रचनाओं के (राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा 2007 में मुद्रित) पेपर बैक संस्करण के पीछे उनका एक पुराना क्लोज-अप छपा हुआ है। शान्तिनिकेतन के किसी सहपाठी का लिया यह छायाचित्र उनके मूल व्यक्तित्व का सहज दर्पण है। बिना लजाए, एक जोड़ा घनी भँवों के नीचे से दुनिया को एकदम सीधी देखती उनकी प्रखर गम्भीर दृष्टि हमारी साहित्यिक रूढ़ियों में बार-बार वर्णित बाँकी-चपल स्त्री चितवन का विलोम है। एक गम्भीर सतर्कता से परिवेश को परखती यह ईमानदार दृष्टि ध्यान को लुभाती या न्योतती नहीं, पर ठिठकाती जरूर है। उन बड़ी-बड़ी आँखों का भव्य सहज दर्प अहंकार नहीं। वह एक मेधावी स्त्री की मूर्खों को, आलोचक को या कुटुम्बी जन, किसी कीमत पर स्वीकार न करने की एक निडर घोषणा है। हमारे यहाँ स्त्रियों से प्रायः त्रिया हठ की ही अपेक्षा की जाती है। पुरुषों सरीखी दृढसंकल्पी हठधर्मिता की नहीं, जो तमाम कष्ट सहकर भी साहित्य के क्षेत्र में एक लम्बी और सार्थक पारी खेल जानेवाले हर रचनाकार के लिए एक बुनियादी अर्हता है। इस गुण ने शिवानी जी से जहाँ अनेक दुनियादार बंधु-बांधवों और सतही समालोचकों को दूर रखा, वहीं इसी के प्रताप से महादेवी जी, बेगम अख्तर, अमृतलाल नागर, भगवती बाबू, ठाकुर प्रसाद सिंह, और उनके गुरुवर हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे गुणग्राही कलाधर्मी बड़ी सहजता से उनके निकट आए और आमरण उनके सहृदय पाठक बने रहे।

    शिवानी जी की कथा यात्रा की शुरुआत हुई थी शाहजहाँपुर से। नौकरीपेशा पति और बहुत छोटे बच्चों के साथ पहाड़ से मैदान प्रवास के दौरान उनकी पहली कहानी, ‘लाल हवेली’ लिखी गई। मुझे बस इतना याद है कि यह कहानी लिखने के बाद जब हमारी सदा से धुरंधर किस्सा गो रही माँ ने उसका विधिवत पारायण बाबू (हमारे पिता और उनके पहले तथा प्रखर आलोचक) के आगे किया तो उसके हम पुराने श्रोताओं को कतई समझ नहीं आया कि किसी कहानी को पहले लिखने और फिर पढ़कर सुनाने की क्या जरूरत हो सकती है? सो लिखित परम्परा के प्रति मुखर अश्रद्धा व्यक्त कर हम जल्द ही चलते बने। पर शिवानी के कुमाऊँनी में आगे भी बार-बार बराये दस्तूर पूछे सवाल : के? कशि लागी? (क्यों? कैसी लगी?) पर हमारे अल्पभाषी पिता का जवाब शायद सकारात्मक ही रहा होगा। क्योंकि कहानी अग्रेषित हो गई। धर्मयुग उन दिनों हिन्दी साहित्यकारों के बीच एक आदरणीय पीठ तथा समालोचकीय मंच बनकर उभर रहा था, सत्यव्रत विद्यालंकार जी उसके सुधी सम्पादक थे। न कोई पूर्व परिचय, न कोई सिफारिश और न पैरवी। शिवानी ने बिना किसी भारी झमेले या नखरों के अपनी कहानी साधारण फुलस्केप पेपर पर ‘फेयर’ की, और रजिस्टर्ड पोस्ट से सीधे धर्मयुग में छपे सम्पादकीय पते की मार्फत मुम्बई भेज दी। हफ्तेभर में स्वीकृति का पोस्टकार्ड आ गया और छपने के चन्द सप्ताह बाद उसका पारिश्रमिक, जो उन दिनों कोई पचास रुपया होता था। बस उसके बाद लेखकीय और पाठकीय प्रतिक्रियाओं की मार्फत अप्रत्याशित तौर से प्रशंसा पा गईं शिवानी लगातार रचनारत रहीं। अपने अन्तिम रोगाकुल दिनों तक।

    अगले पाँच छः सालों में शिवानी की अनवरत चल निकली कलम ने संकलन छपवाने लायक मसौदा तैयार कर लिया था। पर उन दिनों उपन्यास छपवाना आसान था, कथा संकलन नहीं। लिहाजा शिवानी का लेखन के शुरुआती दिनों में अलग-अलग प्रकाशकों से संकलन छपवाने का अनुभव वितरण या रॉयल्टी, दोनों लिहाजों से कोई बहुत अच्छा नहीं रहा। पर धर्मयुग की कृपा से उनकी सुख्याति लगातार फैलने लगी थी। लेखकों से परिचय होने लगा तो प्रकाशन जगत का बेहतर फीड बैक भी नियमित रूप से मिलने लगा। अन्ततः शिवानी जी का भ्राता द्वय विश्वनाथ और दीनानाथ मल्होत्रा जी से परिचय हुआ। तब प्रकाशक भी जो छापते थे, उसको प्रबुद्ध पाठकों की तरह पढ़ते थे। प्रख्यात प्रकाशन संस्थान राजपाल एंड संस के यह दोनों सहृदय मालिक जो प्रकाशन व्यवसाय की लम्बी परम्परा से आए थे, तब तक खुद भी शिवानी जी के सुधी मर्मज्ञ पाठक बन चुके थे। कालान्तर में जब दोनों ने अपनी राह अलग की भी, तो कोई कटुता या कहासुनी बिना। दीनानाथ जी के सरस्वती विहार प्रकाशन से पहले शिवानी की किताबों के लायब्रेरी संस्करण छपे और फिर ताजा लॉन्च हुई हिंद पॉकेट बुक्स से उनके पेपर बैक संस्करण घरेलू लायब्रेरी योजना की तहत घर-घर जा पहुँचे। यह क्रम दीनानाथ जी के प्रकाशन से सेवानिवृत्ति तक शिवानी जी के पूरे जीवन काल में बना रहा। दीनानाथ जी के प्रति उनके मन में बहुत स्नेह था और दीनानाथ जी तथा उनकी परम स्नेही जीवनसंगिनी सत्या जी ने भी सदैव उनको भरपूर आदर सम्मान दिया। हर अच्छे-बुरे समय में दोनों जिस तरह आगे आ शिवानी जी के पास खड़े रहे, वह आज के समय में लगभग दुर्लभ है। उनके बाद भले ही प्रकाशकीय रिश्ता न रहा हो, लेकिन शिवानी जी के सच्चे  पारिवारिक मित्र होने का दाय हम, उनके उत्तराधिकारियों, के प्रति दोनों ने जिस गरिमामय ढंग से निभाया है उसके लिए शाब्दिक कृतज्ञता ज्ञापन असम्भव है। शिवानी जी का बाल साहित्य तब से अब तक विश्वनाथ जी ही लगातार छापते आए हैं। उनकी लोकप्रिय, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ सीरीज के अन्तर्गत शिवानी जी द्वारा चयनित उनकी प्रिय रचनाओं का एक संकलन भी उन्होंने प्रकाशित किया है।

    साठ के पार उम्र के जिस पड़ाव पर खडी हूँ, आज वहाँ से देखकर लगता है कि उस युग में गम्भीरतापूर्वक घर-गृहस्थी में ही रम रहना हर भले घर की महिला का निजी दाय और उसके जीवन का चरम उद्‌देश्य मान लिया गया था, लिहाजा उसमें परिजनों के बीच ‘शिवानी’ जैसी तबीयतन यायावरी वृत्ति और स्पष्टवादी और वीतरागी महिला की छवि बहुत उदारता से स्वीकार होना असम्भव था। उनकी किशोर वयस का जमाना वह था जब कालेज जाना लड़कियों के लिए स्वप्नवत था, और सहशिक्षा का आस्वाद तो अकल्पनीय। उनकी उम्र की अधिकतर लड़कियाँ स्कूली शिक्षा के तुरन्त बाद (या अधबीच में ही) ब्याह दी जाती थीं, और उसके बाद उनका भाग्य पति पुत्र की कृपाडोर से बँधा-बँधाया ही चलता था। महिला किसी तरह कॉलेज जा भी पहुँची और बहुत मेधावी साबित हुई हो तब भी नौकरियाँ खोजना उसके या परिवार के लिए निरापद नहीं माना जाता था, खासकर वह यदि सुंदर भी हो तो। किसी भले मध्यवर्गीय घर की पत्नी का नौकरी करना उसके पिता या पति के बाहुबल पर अप्रिय सवाल तुरन्त उठाता था, क्या उसका निर्वाह उसका पुरुष मालिक अपनी अर्जन क्षमता से नहीं कर सकता? यही नहीं एक माँ का किया कोई भी लीक तोड़ने वाला काम तुरन्त शत सहस्र प्रतिध्वनियों समेत उसकी ब्याहता बेटियों की रूढ़िवादी ससुरालों में पहुँचकर उनके जीवन में हड़कंप मचवा सकता था।

    शिवानी का परिवार कभी पारंपरिक कुमाँऊनी समाज के बीच नहीं रहा, लेकिन जहाँ भी रहा, उसकी निर्दिष्ट मर्यादाओं का पालक रहा। लेकिन प्रवास जहाँ मातृभूमि से विलगाता है, वहीं प्रवासी परिवारों को उड़ने के लिए नए पंख और नई आकांक्षाएँ भी देता है। लिहाजा शिवानी जन्मी सौराष्ट्र में, पर पली-बढीं शान्तिनिकेतन के हॉस्टल में जहाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंदलाल बसु और खुद टैगोर सरीखे शीर्ष रचनात्मक पुरुष उनके गुरु थे। उनके सहपाठी भी सत्यजित रे तथा शांखो चौधुरी सरीखे किशोर बने। तिस पर पिता थे तब बंगलोर में और हर गर्मी में सपरिवार पहाड़ जाना भी अनिवार्य था। लिहाजा उस समय की अधिकतर स्त्रियों के लिए दुर्लभ पहाड़ से समुद्र तट तक और बंगाल से वेरावल तक निरन्तर उन्मुक्त भ्रमण और सहपाठियों के साथ उदार खुला चिंतन शिवानी के जीवन का सहज अंग और बौद्धिक पाथेय बनता चला गया।

    शान्तिनिकेतन से प्रथम श्रेणी में स्नातक की डिग्री लेकर निकली शिवानी ने, जो तब गौरा पाण्डे कहलाती थीं, नए परिवेश की बाध्यताओं को लम्बी साँस खींचकर तब तक स्वीकार किया जब तक सम्भव था। उनके मेधावी व्यक्तित्व को पूरी ममता से सहेजते पिता गुजर चुके थे, और रूढ़िवादी ब्राह्मण समाज की कठोर नैतिकताओं से विवश उनकी माँ जल्द से जल्द अपनी इस बेहद सुन्दर, बेहद मेधावी किन्तु दुर्विनीत बेटी को किसी सही पात्र को सौंपकर गंगा नहाने की इच्छुक थीं। कॉलेज से निकलते ही तुरन्त विवाह हुआ और विवाह के बाद जीवन बहुत बदला, मातृत्व सहित कई बहुत बड़े उत्तरदायित्व झोली में आ पड़े। फिर सांसारिक उत्तरदायित्व पूरे हुए, शिवानी का पुराना जीवन धीमे-धीमे फिर उनके पास आने लगा। साथ ही लौटा स्वाधीनता का सहज मानवीय आनन्द।

    मन की आँखों से आज देखती हूँ तो लगता है कि मेरे बचपन के उन बंधनकारी दिनों में भी गौरा मूलतः एक उन्मुक्त यायावर आत्मा ही रही। बेहद सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद रवींद्र संगीत, हिंदी, गुजराती, अंग्रेजी का कालजयी साहित्य, पठन पाठन महल में कैद ‘चारुलता’ की नायिका की दूरबीन की तरह उनको गृहस्थी की बाध्यताओं से और उनकी बेटियों को छोटे शहरों की कस्बाती मानसिकता से लगातार उबारते रहे। बाद में जब आर्थिक बाध्यताएँ नहीं रहीं, तब भी अपने या अपने बच्चों के घर की चहारदीवारी या दुनियादार रिश्तों की बड़बोली चमक-दमक उनको कभी अधिक दिन बाँध नहीं पाती थी। माँ, नानी या सास के मर्यादित गृहस्थ कलेवर के भीतर एक भिक्षुणी का मन धारे शिवानी सचमुच स्वेच्छा से चुने एकान्त में बैठकर ही सबसे सुखी, निरापद और प्रसन्नमन महसूस करती थीं। मैं नहीं जानती कि निरन्तर भ्रमण के बीच बिना पति-पुत्र की निगरानी, सिर्फ सीमित सी सुविधाओं सहित जिया उनका यह गैर पारम्परिक वैरागी जीवन उनका निजी सलीब था या चरम उपलब्धि। पर अपनी लेखकीय क्षमता के आत्मविश्वास से दैदीप्यमान शिवानी को देख लगता था कि वे उसमें बहुत गहरे से रमी हुई और सहज स्थिर थीं। जब वे घर-गृहस्थी से घिरी थीं, तब भी बहुत तकलीफ झेलकर भी अपना लेखकीय विवेक और निजत्व वे बचा सकीं, क्योंकि अपनी कहानियों और जीवन में वे लगातार जाति, लिंग, उम्र या आय को लेकर रची गई कई निरर्थक लक्ष्मण-रेखाओं को सफलतापूर्वक तोड़ती रहीं। शायद वे यह न करतीं, तो पारम्परिक मातृत्व निभाने के रिरियाते तगादे और सामाजिक वर्जनाओं की बेड़ियाँ उनके रचनाकार को इतना कुंठित कर देते कि हम कुलीन खानदान की एक सौभाग्यवती पुत्रवती माँ, गौरा पंत वाली सीमित पहचान से परे एक विलक्षण रूप से लोकप्रिय रचनाकार ‘शिवानी’ से अपरिचित ही रह जाते। फिर भी स्वस्थ परम्परा में उनकी आस्था थी। अपनी कहानियों की बुद्धिमती नायिकाओं की ही तरह उनका विद्रोह परम्परा के थिराये हुए सड़ाँध भरे नकलीपने से था, उसके सनातन प्रवाह से नहीं।

    दरअसल दुनिया के हर साहित्यकार की ही तरह ‘शिवानी’ के साहित्य की जड़ें भी एक सहज भ्रमणशीलता और खुले आत्मविश्वासी मन से ही अपना जीवन-रस ग्रहण करती थीं। और इसीलिए एक चातक की तरह समाज प्रदत्त जीवन के तमाम विलासों को उन्होंने भूखी प्यासी होते हुए भी सदा खुद से दूर रखा, और जब पिया तो साहित्य के स्वाति नक्षत्र का जल ही पिया। उनकी पिपासा का यह दबाव और उसके फलादेश उनके प्रिय लेखक और सहृदय मित्र अमृतलाल नागर उनके समाज और परिवार के बंधु-बांधवों से कहीं बेहतर समझते थे। इसीलिए मेरे पिता की असमय मृत्यु से टूटी शिवानी को उन्होंने एक तरह से समस्त लेखकीय बिरादरी की तरफ से कहा था:

    ‘देखो गौरा बेन, मनुष्य दो तरह से जीता है, एक घुलकर, एक तपकर। हम नहीं चाहते कि तुम घुलकर जियो। तुम्हें तपकर जीना है, खूब लिखो और उसी स्याही में अपना दुःख मिला दो। …लेखनी को सदा जंगल से पकड़ी गई नई-नई नागिन समझो गौरा बेन! बिना खोले पिटारे में बन्द रखोगी तो ढकना खोलते ही डस लेगी। उसे “रोज बीन बजाकर झुमाना सीखो। …’

    (अब न आँखिन तर, मरण सागर पारे से)

    गुजरात में जन्मी, बंगाल में पढ़ी और उत्तराखंड में ब्याही गई बहुभाषाविद् शिवानी जी की कहानियाँ हिन्दी की एक लम्बी वाचिक कथोपकथनी परम्परा से जुड़ी हैं जहाँ आँखिन देखी भी है तो रसमय कानों सुनी भी। और उनका क्रम गुणाढ्‌य पंडित के बृहत्कथासरित्सागर से शुरू होकर सीधे शिवानी जी के गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की गप्प और गल्प का अन्तर पाटती रचनाओं तक जाता है। उत्तराखंड के परम्परानिष्ठ समाज से ग्रामीण समाज तक और दक्षिण भारत से बंगाल तक के गरीब-अमीर, राजे-महाराजे, उजडे-जमींदार, नवधनाढ्य, अफसर, नेता, विभाजन के दौरान दरबदर हुए लोग, भिक्षुणियाँ, वार वनिताएँ, पण्डे और संन्यासी, सब शिवानी के विराट कथा विश्व के साक्षी भी हैं और पात्र भी। इन सबके उतार-बढ़ाव भरे जीवन, उनकी गुप्त कामनाएँ, गूढ़-रहस्य और जाने-अनजाने किये अपराध, सभी शिवानी की कहानियों में सहजता से दर्ज होते चले हैं। उनकी एक बड़ी ताकत “यह थी कि समाज का सुहाना पहलू ही नहीं, उसका कुरूपतम पक्ष भी उनसे छिपा नहीं था। जो कुरूप है, भोंडा है, वीभत्स है, उसे भी उन्होंने साहस के साथ देखा और चित्रित किया है। उनकी कहानियों में समाज के यह दुरदुराए अभिशप्त पात्र उनसे सबसे अधिक करुणामय संस्पर्श पाते हैं। यह बहुत बड़ी बात है।

    1971 में शिवानी जी की लखनऊ कारागृह में बन्दी महिलाओं से साक्षात्कार पर आधारित उनकी जीवन गाथाओं की एक लम्बी मार्मिक शृंखला ‘अपराधी कौन’ नाम से छपी थी। उसकी भूमिका में शिवानी जी ने लिखा, ‘जीवन की समग्रता में कहानी की एकात्मता सदैव मेरे लिए एक आनन्द की अनुभूति रही।’ उनकी कहानियों का यह आनन्द तत्व शान्तिनिकेतन में पाई उनकी उच्च शिक्षा या उनके अभिजात बचपन से कहीं अधिक उनकी अपने अस्तित्व के प्रति चेतना से जुड़ा है। इस दुर्धर्ष चेतना को आर्थिक तंगियों और पति की पूर्व पत्नी की परछाईं से एक साथ जूझते वैवाहिक जीवन की शुरुआत भी उनसे न छीन पाई, जब शान्तिनिकेतन के बौद्धिक जीवन की छाँह रातोंरात उनके सर से पिता के साये के साथ ही विलग हो गई। संकट की उन कठिन घड़ियों ने उनको मानव परणति के अनेक नए रूपों से साक्षात्कार कराया। सिंहासन वंचित होकर भटक रहे किंग लियर की तरह तब वे उस नई अनिश्चितता, उस अकथनीय विवशता और मानव स्वभाव के वारांगना की तरह रंग बदलते रूपों को अपनी, दो स्मृति-चिन्ह, विप्रलब्धा और कैंजा जैसी कहानियों में सहज संवेदनशीलता के साथ पिरोती हुई अवसाद मुक्त होती रही हैं। इन कहानियों में उनकी मानिनी नायिकाएँ समझौतापरस्त दुनियादारी अपनाने और पति, प्रेमी या पुत्र की चिरौरी कर स्वाभिमान घटाने की बजाय बार-बार अपने लिए एक तटस्थ निभृत एकाकी जीवन को ही अन्ततः चुनती हैं। अपनी रचयिता की ही तरह उनकी नायिकाएँ भी हर कीमत पर अपना मनुष्यत्व अपनी स्वतंत्रता बचाए रखने की पक्षधर हैं। और पुरुष के प्रति उनका प्रेम समर्पणमय होते हुए भी एक स्वाधीनताकामी स्त्री का प्रेम है। शादी या रक्षिता के रूप में नई पराधीनता को ओढ़ लेना उनको अस्वीकार्य है। हिन्दी के पाठक और समालोचक प्रायः एक सामाजिक क्रिया के रूप में ही प्रेम को दिखाते देखते रहे हैं इसलिए कई बार उनकी विप्रलब्धा नायिकाएँ आलोचकीय कहा-सुनी की शिकार होती रही हैं। पर पंख लगाकर फेमिनिज्म की नकली हंस गति में मटकने वालों से बहुत पहले और उनसे बहुत आगे जाकर शिवानी की तटस्थ दृष्टि ने भारतीय समाज की यह सच्चाई पकड़ ली है कि एक पराधीन जीव को सपने में भी सुख नहीं मिल सकता।

    माता-पिता की रजामंदी से तयशुदा शादी में पति को एक पदार्थ की तरह सौंप दी गई वैवाहिक यात्रा के तहत एक बुद्धिमती औरत के जीवन में प्रेम (यदि वह आ सका तो) निरन्तर स्वीकार और अस्वीकार की एक गहरी भीतरी छटपटाहट से घिरा रहता है। लाल हवेली के विभाजन के दौरान दरबदर होकर पाकिस्तान में धर्मांतरण को अभिशप्त नायिका हो अथवा पति के ठंडेपन से हताश ‘बंद घड़ी’ की गृहिणी, इन का चित्रण एक विवाहिता महिला की कलम से एक कट्टरपंथी ब्राह्मण समाज के भीतर बैठकर कर पाना आज से आधी सदी पहले के भारतीय समाज में न तो सहज था न ही निरापद। सामान्य घर-गृहस्थी के बीच, हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई, हर वर्ग की स्त्री के जीवन की अनकही हजारों भीतरी सच्चाइयों का दर्द कभी मार्मिक ब्योरों, कभी अपनी परिहास रसिक टिप्पणियों और कभी लोकभाषा के मुहावरों से उघाड़नेवाली शिवानी की यह कहानियाँ इसीलिए आज भी इतनी लोकप्रिय हैं।

    ताउम्र अपनी विलक्षण, स्त्री की ज्ञात परिभाषाओं के परे माँ को लेकर मैंने अपने सहपाठियों, रिश्तेदारों, मित्रों के बड़ी समझदारी से आधे-अधूरे छोड़े जिन उपालम्भों को झेला है, उनका पूरा प्रहार शिवानी अपने स्वेच्छया एकाकी जीवन में झेलती, लिखती रहीं। गुटबंदियों से वे सदा दूर रहीं, लिहाजा न तो साहित्य अकादमी ने उनको शीर्ष सम्मान से नवाजा न ही उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के साहित्यिक संस्थानों ने। अतिरिक्त तौर से उनके निजी जीवन और लेखन की खुफिया निगरानी करनेवाले स्वजनों से कोई कम तकलीफ शिवानी जी को उन समालोचकों से नहीं मिली, जो उनकी निर्विवाद सफलता और लोकप्रियता को उनके कुछ कम बौद्धिक, कुछ अकर्मठ सामंती होने का प्रमाण साबित करने में निरन्तर गिरोह बाँधकर जुटे रहे। अपना दर्द या आक्रोश छुपाना उनके स्वभाव में नहीं था इसलिए इस अन्याय के विरुद्ध उनकी छटपटाहट की अवश साक्षी हम उनकी बेटियाँ रही आईं। तब भी शिवानी ने अपना लेखकीय धर्म नहीं छोड़ा जिसके तहत एक कहानी में जबरन राजनैतिक पक्षधरता कायम कराने की बजाय लेखक की स्वानुभूति का ईमानदार दर्द और मनुष्य जाति की कमजोरियों के प्रति क्षमाशील तटस्थता का निरन्तर मौजूद रहना अधिक जरूरी है। ‘करिये छिमा’ की अनपढ़ अनब्याही माँ हो या पति के साथ मिलकर लूटपाट करती रही ‘गहरी नींद’ की अपराधिनी अख्तरी, अथवा पिता द्वारा बेची गई ‘टोला’ की चोर लक्ष्मी, उनकी कहानियाँ पढ़कर पाठक कई पहले न देखे, सोचे किरदारों और उनके सवालों के सामने जा खड़ा होता है। मानव जीवन यहाँ दादी-नानी की परी कथाओं के पात्रों की तरह एक आँख हँसता और एक आँख रोता है। उनकी कहानियों जैसा करुणा और हास्य का अपूर्व समन्वय सहजता से कर पाना बेहद दुष्कर है, जहाँ हमको उनका हास्य समाज की ऊपरी परत उघाड़ कर हँसाता है, और साथ ही एक मार्मिक करुणा भीतर तक नश्तर की तरह प्रवेश कर दारुण सच्चाई भी दिखाती है, कि यह भी जीवन है, देखो इसे भी।

    इतनी गहराई से जीवन का चित्रण करने के बाद समझना आसान है कि, ‘आपकी अमुक कहानी में देश या पाठकों के लिए क्या जीवन सन्देश छिपा है? आपकी नायिकाएँ इतनी सुंदर क्यों? क्या अमुक कहानी का अमुक पात्र अमुक पर आधारित है?’ सरीखे थोथे सवाल पूछे जाने पर शिवानी जी को क्यों कुपित करते थे। अनाथ, मणिमाला की हँसी, करिये छिमा, तोप या धुआँ सरीखी उनकी कहानियों में परिहास और करुणा के बीच अचानक खुले जीवन के कई अकथनीय पहलू दिखाते हैं कि प्रेम या उसकी परिणतियों की अपनी कोई नैतिकता नहीं होती। पर फिर भी प्रेम से बड़ा शायद ही कोई दूसरा नैतिक अनुभव हो। इसलिए स्वानुभूति की छलनी से गुजरता हुआ जो सत्य लेखक साकार कर पाता, वही अपने आप में उसका पहला और अन्तिम संदेश है।

    शिवानी जी अक्सर रवीन्द्रनाथ की पंक्तियों से यही मंतव्य स्पष्ट करती थीं :

    नारद कहिलो हाँसी, सेई सत्य जा रचिबे तूमी।

    घटे जा सब सत्य नहे, कवि तव मनोभूमि।

    “रामेर जन्मस्थाने अयोध्यार चेये सत्य जेनो।

    (नारद ने हँसकर कहा कवि से, सच वही है जो तुम अपनी मनोभूमि पर रचते हो, वह सब नहीं, जो घटता रहता है। इसी से राम की जन्मस्थली अयोध्या का असली सच समझ लो।)

    केजरीवाल और उनके गणों की नारेबाजी से दिगदिगन्त में गुंजायित नारों के बीच आज भी शिवानी जी द्वारा राजनीति के परिवेश पर लिखी गई रचनाओं पर नजर डालने से घट रहे सच और लेखकीय मनोजगत में युगातीत दृष्टि से रचे गए गूढ़तर सच का फर्क स्पष्ट हो जाता है। आज भी पुष्पहार, रथ्या, मणिमाला की हँसी, विनिपात और तर्पण सरीखी कहानियों में पुरुष केंद्रित राजनीति, आदर्श और अवसरवाद, विचारधारा और चालू फतवों, प्रेम और उत्तरदायित्व के ताने-बाने में उलझे नेताओं के निजी जीवन के जटिल ब्योरों और आनेवाले युग की साफ आहटें सुनाई देती हैं। और परिहास और करुणा के इसी द्वैत-स्पर्श से पहाड़ों के दैनंदिन लोकजीवन के दुर्लभ जीवन्त ब्योरे भी एक “महाकाव्यात्मक गहराई पा लेते हैं। सांसारिकता के आग्रहों से बोझिल अभिभावक, व्यसनी पिता, उपेक्षिता पत्नियाँ, वंचित अनाथ बच्चे, ब्याह-शादी के मानवीय हँसी-ठट्‌ठे और रीति-रिवाज, इन सबको एक मधुबनी की कोहबर लेखिका के मनोयोग से शिवानी की कहानियाँ हमारे मनचक्षुओं के सामने साकार करती हैं, तो उन पर आधी सदी से लगाए जा रहे क्लिष्ट सकृंस्तनिष्ठ भाषा प्रयोगों के लांछन खुद ब खुद बिला जाते हैं। हिन्दी शिवानी जी की मातृभाषा उस मायने में नहीं थी जिस मायने में कुमाऊँनी। बांग्ला या भोजपुरी की ही तरह यह बोली भी जब-जब आगे बढ़ती है, बार-बार अपनी संस्कृत जड़ों को छूती चलती है जो सहज स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या यह पाठक के रसरंजन के आड़े आती है? हिन्दी पट्‌टी के छोटे-छोटे कस्बों में भी उपलब्ध और चाव से पढ़ी जा रही यह कहानियाँ साफ जवाब दे रही हैं, नहीं, कतई नहीं। शिवानी की हिन्दी में लोकभाषा की रवानगी है, तो रामचरित मानस से लेकर मेघदूत तक के भाषा विन्यास की प्रतिध्वनियाँ भी: ‘उनके उल्लास की गोधूलि को ‘दीन्हीं मुद्रिका डारि’ कर किस दुस्साहस से म्लान करती?’ (विप्रलब्धा)।

    शिवानी की कहानियाँ इच्छाओं की पूर्ति की कहानियाँ नहीं, इच्छाओं की पहचान की, साथ बैठकर युगानुभव या भावजगत साझी करने की सहज और विशुद्ध भारतीय परम्परा से उपजी कहानियाँ हैं। वे भावजगत ही नहीं, भाषा के स्तर पर भी बिना किसी ‘वाद’ या विचारधारा की बैसाखी के सुधी पाठकों को अपनी सहज जड़ों, जरूरतों का अहसास करा सकती हैं। इसीलिए उनके हर पाठक को, वह उत्तराखंड का सरल क्लर्क हो या बोटवाला, या बनारस, प्रयाग का कोई विद्वान् रसिक नागर पाठक, शिवानी की कहानियाँ पढ़ते हुए, उनके मुहावरों, भाषा प्रयोगों का आनन्द लेते हुए उनकी सह उपस्थिति का सबको सहज अहसास होता रहता है। और शायद इसी लिए कहा भी गया है कि उन ऐसे सुकवि लेखक की काया को बुढ़ापे या मृत्यु से कोई भय नहीं। नास्ति येषांयशस्काये जरामरणजं भय।

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