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  • वेद प्रकाश काम्बोज के उपन्यास ‘फिरंगिया’ पर यतीश कुमार

    हिन्दी के प्रसिद्ध लोकप्रिय लेखक वेद प्रकाश काम्बोज का एक उपन्यास है ‘फिरंगिया’, जिसमें 17 वीं-18वीं शताब्दी के ठगों की कहानी कही गई है। इस दिलचस्प उपन्यास पर यह टिप्पणी लिखी है कवि-लेखक यतीश कुमार ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    इस किताब का पहला पन्ना खोलते ही एक बैठकी का संस्मरण उभर आया। बैठकी में एक पुलिस अधिकारी, एक चित्रकार और कई लेखक थे। पुलिस वाले मित्र ने एक एनकाउंटर की घटना का ज़िक्र किया जो दिल दहलाने वाला था। दिल एनकाउंटर की घटना से नहीं, बल्कि उस ग्रुप की कहानियों से दहल रहा था जिनका एनकाउंटर किया गया था। उस गिरोह की आदतें भी ठग-गाथा से मिलती हुई थीं—लूटना और लूट के साथ क़त्ल करके सब साफ़ कर देना। संयोग से जिस घर की घटना का वहाँ ज़िक्र हुआ, उसका ताल्लुक हमारी बैठकी में बैठे चित्रकार के घर से था और उन्हें बहुत सुकून मिला यह जानकर कि उन डकैतों को अंततः ऐसी सज़ा मिली।

    ठगी का एक वृत्तांत ‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ में पढ़ा था और फिर उसी किताब को पढ़ने के बाद इस किताब को उठाया ताकि उस घटना का विस्तार पा सकूँ। अब आते हैं इस किताब पर, जो ठगी के इतिहास का दस्तावेज़ीकरण से कम नहीं। वेद प्रकाश काम्बोज ने किस तरह का गहन शोध करके उस मानसिकता का जीवित चित्रांकन किया है, वह इस किताब को और भी विशिष्ट बनाता है। बारीक से बारीक जानकारियों को घटनाओं की शृंखला में क्रमवार सजाया गया है।
    इस कहानी की शुरुआत 1707 ईस्वी में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद शुरू होती है। सिंधिया, होल्कर, भोंसले और गायकवाड़—सभी ने एकजुट होकर मराठी सेना को एक नए संघ का रूप दिया। इनकी शक्ति में शामिल था पिंडारियों का साथ, जिन्हें जीत के बाद लूट की स्वीकृति मिली हुई थी।

    किताब ठग-गाथा पर आने से पहले बताती है कि अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी व्यापारियों का कैसे देश में राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ और कैसे फ़्रांसीसी प्रतिद्वंद्वी को रॉबर्ट क्लाइव ने पराजित किया। कैसे सिराजुद्दौला को गद्दी से उतार कर मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का फ़ैसला लिया गया। इन सब में ओमीचंद का क्या योगदान था। उसी साहूकार अमीचंद को क्लाइव ने कैसे ठगा और उसे मानसिक विक्षिप्तता से जूझना पड़ा। क्लाइव एक क्लर्क से कैसे बंगाल का गवर्नर और प्रधान सेनापति बना, इसे बहुत कम शब्दों में समझाया गया है।

    इतिहास को मैंने जब भी साहित्य की खिड़की से देखा है, बातें और तारीखें, जिनसे ताउम्र भागता रहा, ज़ेहन में आसानी से पैठती हैं। मैं धीरे-धीरे इस बात का प्रवर्तक बन चुका हूँ कि अकादमिक पढ़ाई में ऐसी ही किताबों को लाया जाए, जो आपको ऐतिहासिक घटनाओं को यूँ क्रमवार समझाती हैं और वह भी क्लिष्टता से दूर क़िस्सों–कहानियों की रोचकता के दायरे में।

    प्लासी के युद्ध के बाद, 1764 में बक्सर का युद्ध जीतना, बंगाल के बाद बिहार को पाना बन गया। अब पूरा पूर्वी भारत इनके पास था और सही मायने में व्यापारी राजनीतिक महाशक्ति बन चुके थे। मराठों से बचने के लिए बादशाह शाह आलम द्वितीय का अंग्रेज़ों की मातहती स्वीकार करना एक महत्वपूर्ण घटना है, जहाँ से दिल्ली पर अंग्रेज़ों की पकड़ बननी शुरू हुई।

    1770 का महा अकाल, आधी आबादी का काल कवलित होना और 1772 में वॉरेन हेस्टिंग्स का गवर्नर जनरल बनकर आना, क्लाइव के किए धरे को और विस्तार दे गया। उत्तर और पूरब को हड़पने के बाद अभी तक दक्षिण के नवाब उनके क़ब्ज़े में नहीं आ पाए थे। सिंधिया पिंडारियों के साथ अब भी टिका हुआ था, जो जाकर सितंबर 1803 में शिकस्त खाया।

    लेखक ने बहुत सोच-समझ कर यह ज़रूरी परिदृश्य उस कालांतर का सार बनाकर प्रस्तुत किया है ताकि फिरंगिया, जो कि इस किताब का मुख्य किरदार है, उसके जन्म के बाद के परिदृश्य और परिस्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सके। यह वह समय है जब मराठे टूट की कगार पर थे। संघ, जो औरंगज़ेब के मृत्योपरांत बना था, अपनी अंतिम साँसें ले रहा था और इस बीच ठगों की दुनिया अपना विस्तार ढूँढ़ रही थी।

    ठगों की अपनी गुप्त भाषा होती है ‘रमसी’। ‘पिलहाऊ’ और ‘थिबाऊ’ जैसी सांकेतिक और इशारे वाली शकुन की भाषा को जानना ज़रूरी था। यह एक तरह से एक-दूसरे की पुष्टिकरण जैसी बात थी। गीदड़ों जैसी सांकेतिक आवाज़ को ‘भली’ का नाम दिया गया। इसके पुष्टिकरण में ज़्यादा गीदड़ों की आवाज़ें निकालने को ‘रुआरना’ की संज्ञा दी गई। चेतावनी की इसी भाषा में एक नाम ‘इकरिया’ रखा गया, जिसके बोलते ही उस जगह को सुरक्षा के लिहाज से ख़ाली कर देना था। छिपकली का किसी के ऊपर गिरना बहुत अपशकुन माना जाता था, वहीं ‘भाराहर’ यानी पानी का मटका लिए औरत दिख जाए तो बहुत शुभ माना जाता।

    चाँदनी की ढाप या फिर चिरैया जैसी पचासियों कुदरती इशारों का ठगों की दुनिया में अलग-अलग मतलब होता, जिनका अपना ही व्याकरण सिर्फ़ उनको ही पता था।

    यह जानना भी रोचक है कि ठग जब अपनी लंबी यात्रा पर निकलते हैं, तो उसे युद्ध की तरह निकलना समझते हैं और इसे ‘जिताई’ नाम दिया गया है। जिताई के समय पवित्र कुदाली की प्राण-प्रतिष्ठा की क्रिया को ‘कस्सी’ कहा जाता है। ठग अपने शिकार को सांकेतिक भाषा में ‘बानिज’ कहते। कंबल पर बैठकर तपौनी का गुड़ खाने से कभी कोई ठगी नहीं छोड़ सकता, ऐसा माना जाता है। ‘झिरनी’ हमला करने के पहले का इशारा है। वहाँ भी सूबेदार और जमादार जैसे पदों से विभूषित किया जाता है जैसे-जैसे आप अपने काम में माहिरी हासिल करते हैं। चाहे हिंदू हो या मुसलमान, ‘जिताई’ से पहले या किसी भी मुसीबत में माँ भवानी का ही नाम लेते थे। इन्हें जान जाने का कोई ख़ौफ़ नहीं था।

    लेखक ने विधि-विस्तार को समझाने में समय लिया है, जो कई बार कहानी के क्रम को समझने में मदद करती है तो कई बार कहानी से आपको अलग भी कर देती है। कुछ समय के लिए आपको लगेगा यह ठग समाज की मान्यताओं का ब्योरा ज़्यादा है, लेकिन अगले ही पल फिरंगिया की कहानी आपको अपनी गिरफ़्त में ले लेगी।
    एक मासूम, जो अपनी मासूमियत में ‘आख़िर क्यों’ जैसे निश्छल प्रश्न पूछने की तबीयत रखने वाला, कैसे मासूम से सयाना और फिर ख़ूँख़ार बनता है, इसकी कथा है यह किताब। एक बच्चे के भीतर का श्रेष्ठता-बोध कैसे उसकी पूरी मानसिकता को पलट सकता है, इस किताब में इसका बखूबी वर्णन है। एक हंगामाखेज़ ज़िंदगी को समय की आवाजाही के संग रचा गया है। माँ भवानी क्यों इन ठगों की रक्षा करती हैं? ठगों का माँ पर इतना अटूट विश्वास क्यों है? काली माई का पसीना यानी धर्म-जल से जन्में इस समूह को विशेष उद्देश्य से पृथ्वी पर लाया गया है, जिसका भी वर्णन यहाँ दर्ज है। संदेश बहुत साफ़ था कि “राजा-रजवाड़े का ख़ुफ़िया काम करते हुए धरती का अतिरिक्त बोझ न बढ़ने देना।” वे मारते नहीं, बल्कि उन्हें स्वर्ग भेजते हैं।

    उस मासूम ने दीक्षांत के बाद इसको दिव्यता समझा और इसी के जादू की गिरफ़्त में सदा के लिए हो गया।

    तालीम में रुमाल की विधि और तलवारबाज़ी ज़रूरी है। मारने के बाद मिट्टी में दफ़नाना और फिर उसी मिट्टी पर चूल्हा बनाना और फिर खाना ताकि मिट्टी के ढीले होने के निशान मिल जाएँ—जैसी बातें यहाँ एक बच्चे को शातिर ठग बनाने की एकांत की कार्यशाला में समझाई गई हैं। झोरा नायक मुसलमान और कड़क बनवारी हिंदू जैसे नायक मित्रों का क़िस्सा उनमें नायकत्व पैदा करने के लिए सुनाया जाता है, जिनका नाम ठगों की दुनिया में बहुत आदरपूर्वक लिया जाता है।

    रोचक बातें पढ़ने को मिलीं कि जिसके पास गाय हो उसे नहीं मारना है, या फिर पिछड़ी जाति के लोग या स्त्रियों को भी नहीं मारना है। इसी के साथ साधु–सन्यासियों या गुसाइयों या फिर अपाहिजों को भी नहीं छूना है।

    ठगों ने फिरंगियों को देखकर अपने क़ानून बदल दिए यह कहते हुए कि जब वे कोई क़ानून नहीं मानते तो हम क्यों मानें। ठगों ने शुरुआत से ही फिरंगियों को ठग समझा, सौदागर नहीं, जो उनसे भी दो क़दम आगे निकले।
    स्त्री-हत्या के बाद प्रायश्चित स्वरूप हज़ारों ब्राह्मण को खाना खिलाना मन को बहलाने जैसी बात लगी।

    सिंधिया और पिंडारियों की हार का असर मुरैना गाँव पर भी दिखा। जब अंग्रेज़ उस गाँव को सबक सिखाने के लिए आए, तो भारी संख्या में होते हुए भी ठगों के सरगना लाला के ऊपर भय समा गया और अंग्रेज़ों को एक बार हराने के बावजूद अपने ऊपर पाँच हज़ार की इनामी राशि के डर से भाग खड़ा हुआ। यहाँ यह देखना बहुत रोचक भी है कि जो काम बंदूक नहीं कर सकी वही काम एक इनामी राशि ने कर दिखाया।

    फूट डालने का यह तरीका हमेशा से कारगुज़ार है।

    सोचता हूँ काम्बोज जी ने कितना शोध किया होगा, हम तक इसे यूँ संग्रहित सार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए। किताबें जो आपको नई दुनिया में ले जाती हैं, नई बातों से अनूठी जानकारियों से परिचय करवाती हैं।

    कुछ विशेष बातें जो उन्हें और विशेष बनाती हैं, वो हैं उनकी एकता, उनके बीच संवाद और संकेत का महत्व, एक-दूसरे को कभी नहीं ठगते, स्त्रियों और बच्चों का सम्मान इत्यादि।

    ठग कभी भी नगर या बस्ती में डेरा नहीं लगाते थे। शहर से बाहर ही किसी सुनसान पेड़ के नीचे उनका डेरा लगता।

    किताब कई छोटी-छोटी कहानियों और अनूठी घटनाओं का संग्रह है। ये घटनाएँ ठगी के इर्द-गिर्द मौत का तांडव दर्शन करवाती हैं—मुगलानी जैसी नफ़ासत वाली स्त्री का क़त्ल हो या फिर वह बैरागी जिसके पास अकूत दौलत थी।

    फिरंगिया के समानांतर एक और किरदार है विलियम स्लीमन, जिसका ज़िक्र शुरू में है पर उसकी कहानी शुरू आधी किताब के बाद होती है।
    स्लीमन और फिरंगिया के सवाल–जवाब में एक जगह फिरंगिया जवाब देता है—“ठग मुँह से साँप और मन से शेर होता है।” यह परिभाषा कितनी सटीक कही गई है, वह इस किताब को पढ़ते हुए समझ में आती है। किताब में बाइबिल की बातों को फिरंगिया की बातों से जोड़ा गया है, ख़ासकर साँप वाली बात। किताब के दूसरे हिस्से में इन दोनों किरदारों के बीच के संवाद में कई तरह का जीवन-दर्शन दिखेगा। देखने का नज़रिया आपके सही और ग़लत की परिभाषा कैसे बदल देता है, यह समझने में मदद मिलती है।

    चाणक्य की सूक्तियाँ भी ठगों और राजाओं के गुणों में समानता की तरह दिखीं। शेर और बगुले से एक-एक, मुर्गे से चार, कौए से पाँच और कुत्ते से छह गुण सीखने चाहिए—सरीखी बातें चाणक्य के लिखे आठ श्लोकों से मेल खाती दिखीं। यह किसी आश्चर्य से कम नहीं कि अनपढ़ ठग की बातों में चाणक्य की शिक्षा कैसे मिश्रित हुई। स्लीमन की खोज ने मैक्यावेली और चाणक्य की बातों में समानता को भी ढूँढ़ निकाला। रमसियाना किताब प्रकाशित करके ठगों की गुप्त सांकेतिक भाषा को स्लीमन ने दुनिया के सामने लाने का दुरूह कार्य किया। स्लीमन को यह भी लगा कि शायद ठगों का स्रोत चाणक्य की गुप्तचरी से जुड़ा है। वही सारे गुण ठगों में भी पाए जाते हैं। उसी का अपभ्रंश पूजा-अर्चना और अंधविश्वास से मिश्रित होकर समयांतर में ठगी में बदल गया।

    जबलपुर में अंग्रेज़ों ने देश भर के सारे ठगों को रखा था। वे ठग, जो मुखबिर बन गए, उनके लिए अलग से विशेष पुनर्वास बनाया गया, जिसका नाम स्कूल ऑफ़ इंडस्ट्री रखा गया। यह मुखबिरों के सुधारगृह के तौर पर विकसित हुआ।

    यह किताब जानकारी के हिसाब से बहुत शानदार है, पर किस्सागोई और बेहतर हो सकती थी। भाषा सीधी–सपाट है और चमत्कृत नहीं करेगी, पर अपना काम ज़रूर कर देती है। मुझे लगता है चूँकि लेखक ने ढेर सारा शोध किया है इसे लिखने के लिए, तो उनके रेफ़रेंस के होने से बात और बन जाती, जैसा कई चाँद थे सरे आसमाँ में किया गया है।
    अनतः कहूँगा, इस शानदार किताब को एक बार तो पढ़ना ही चाहिए। शुरुआती पन्नों में अंग्रेज़ों और फ़्रांसीसी का आगमन और वर्चस्व सुंदर सारगर्भित तरीक़े से लिखा गया है। वह साधारण पाठक की आँखें खोल देगा। उस युग यानी 1600 से 1840 तक का समय एक बार आपके सामने से गुज़र जाएगा।

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