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  • लेख
  • शोले: जेन ज़ी की निगाह में

    शोले फ़िल्म के पचास साल पूरे हुए। ‘शोले’ फ़िल्म की स्मृति सबकी अपनी-अपनी है। लेकिन जेन ज़ी इस फ़िल्म को किस तरह देखती है। इसी को बहुत रोचक ढंग से लिखा है दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    जब भी “शोले” का ज़िक्र होता है तो भाड़े की ब्लैक एंड व्हाइट टीवी और भाड़े वाली बैट्री का दृश्य मेरी आँखों में चलने लगता है। उस समय गांवों में फ़िल्में देखने का एकमात्र माध्यम भाड़े की बैट्री ही थी। क्योंकि बिजली गांवों में उन दिनों तक पहुंची नहीं थीं। ईद, होली, दिवाली, नए साल के मौक़े पर नौजवान पैसे इकट्ठे करके फ़िल्में देखने की पूरी व्यवस्था किया करते थे। ख़ैर इस साल फ़िल्म शोले की गोल्डन जुबिली है। मुझे पिछले दिनों सोशल मीडिया पर सलीम-जावेद की एक तस्वीर दिखी और ठीक उनके पीछे सलमान खान खड़े थे। तस्वीर के नीचे शोले लिखा था। शोले पर नज़र पड़ते ही मुझे वह बहस याद आ गई जो ईद पर हुआ करती थी। बहस यह होती थी कि फ़िल्म कौन-सी चलेगी? अंत में उसी के पसंद की फ़िल्म चलती थी जो सबसे ज़्यादा पैसे देता था। ईद पर सभी बच्चों को अपने बड़ों से “परवी” मिलती थी और आज भी मिलती है। परवी यानी ईदी। उसी पैसों में से कुछ पैसे फ़िल्म देखने पर खर्च करते थे।

    अमूमन हमारे घरों में त्योहारों के दिन न पढ़ने की छूट होती है। घर के बच्चों को खुली छूट मिल जाती है कि वे जो चाहे करें। ख़ैर, किसी को टीवी रखने के लिए टेबल लाने का काम दिया जाता था। जो सबसे समझदार होता उसको टीवी लाने का जिम्मा दिया जाता था। गोतिया (खानदान के अलग-अलग परिवार) में सबके यहां से कुछ न कुछ खाने का आ जाता था। कहीं से भुजा, कहीं से कचरी, कहीं से मालपुआ, कहीं से दालमोठ। सब लोग बैठकर देखते और बीच-बीच में चाय का दौर भी चलता रहता। उस समय चाय की व्यवस्था घर में नहीं होती बल्कि बाहर स्टोव पर बनाई जाती थी। हम लड़के ही बनाया करते थे। फ़िल्म देखना मानो पूरे परिवार को इकट्ठा करना था। जब कोई रोमांटिक सीन आता और हम बच्चें हँसने वाले ही होते कि फ़िर याद आता यहां पापा, चाचा, अम्मा के साथ और लोग भी हैं। आज भी साल दर साल ईद आती है पर वे दिन कहां? न वह आँगन रहा, न हमारे बुजुर्ग, न हम बच्चे रहें और न ही वह ख़ुलूस। आज त्योहारों पर क्या होता है? सब फ़ोन में लग जाते हैं। या फिर नौजवान टोली बनाकर सिनेमाघर चल लेते हैं।

    ख़ैर, काफ़ी बहसबाज़ी के बाद तीन फ़िल्में चुनीं गईं। फ़िल्में थीं- मुग़ल-ए- आज़म, दीवार और शोले। किसी ने कहा तीनों देखेंगे, किसी ने कहा यार रात हो जाएगी और बैटरी भी डाउन हो जाएगी। अंततः बात इस पर बनी कि “शोले” ही देखी जाए। शोले की स्क्रिप्ट पर मुझ जैसा अदना सा तालिबे-इल्म क्या ही लिख सकता है? तमाम स्थापित फ़िल्म समीक्षकों ने दशकों पूर्व हज़ारों बातें कह डालीं हैं। इस मक़ाम पर बस इतना अर्ज़ कद देना चाहता हूँ कि शोले के कई सीनों ने उस समय हमारे घर के लोगों को एक साथ संजीदा कर दिया था। 50 साल बीत जाने के बाद भी शोले का इतना क्रेज़ है कि आज भी जवान लड़के “बेल-बॉटम” पैंट पहनते हैं। बेल-बॉटम पैंट की संस्कृति मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय में आकर दिखी। जब पहले दिल्ली या बम्बई से लड़के गांव जाते थे और इस डिज़ाइन की पैंट पहनते तो उनको हँसी-मज़ाक में लोग कहते कि देखो “वह आ रहा अमिताभ बच्चन।”

    रामगढ़ में जब गब्बर के डाकू हमला कर रहे होते हैं और ठाकुर बंदूक उठाकर जय और वीरू की तरफ़ नहीं फेंकता है तो वे दोनों ठाकुर को बुरा-भला कहने लगते हैं। दरअसल उन्हें पता नहीं होता है कि ठाकुर के दोनों हाथ नहीं हैं। उसी समय कहानी “फ़्लैशबैक” में चली जाती है। तो अनायास ही मुझे चन्द्रधर शर्मा “गुलेरी” की कहानी “उसने कहा था” याद आ गई। कथा कहने की ये शैली सबसे पहले उन्होंने ही सन् 1915 में शुरू की थी। मैं गुलेरी जी का आभारी हूँ कि उन्होंने हम हिंदी के छात्रों को उन्होंने फ्लैशबैक जैसी शैली से नवाजा।

    ज़ाहिर है कि गब्बर ने ठाकुर के साथ जो किया वह सरासर अपराध था। ठाकुर की जगह कोई भी होता तो वो भी वही करता जो ठाकुर ने किया। कहते हैं हाथ किसी भी व्यक्ति की मर्दाना होने की निशानी होती है। हाथ के बिना एक व्यक्ति ज़िंदा लाश से कम नहीं। सलीम-जावेद की कथा के बुनावट की जितनी तारीफें की जाए कम हैं क्योंकि उन्होंने ठाकुर के अंदर प्रतिशोध की ज्वाला भरने के लिए ही ऐसा दृश्य बनाया होगा। फ़र्ज़ कीजिए, ठाकुर जिसके समूचे परिवार को मार दिया गया, उसके दोनों हाथ काट दिए गए तब उसके जीवन में बचा ही क्या? अब वह अपने प्रतिशोध को शांत तभी कर पाएगा जब अपने दुश्मन को मौत के घाट उतारेगा। इमाम साहब का अपने बेटे अहमद की लाश को लाठी से पहचानना इस बात की ओर इशारा करता है कि बाप अंधा ही क्यों न हो अपने औलाद को आहट से पहचान लेता है। इमाम साहब की ही बात क्यों करें? सभी बाप अपने बेटे को उससे ज़्यादा पहचानते हैं। हर एक बाप के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सदमा होता है अपने कंधे पर बेटे के जनाजे को उठाना।

    बसंती को सशक्त नारी के रूप में दर्शकों तक पहुंचना सलीम-जावेद की दूरदर्शी सोच का परिणाम है। जिस समय में स्त्रियों को घर तक महदूद कर दिया गया था। उसी समय बसंती का तांगा चलाकर अपना गुजारा करना समाज के लिए एक नज़ीर से कम नहीं था। आज भी समाज में कामकाजी स्त्रियों को उतने आदर के साथ नहीं देखा जाता है। मैंने तो कई लोगों को बोलते सुना कि “हमारे घर की बहू-बेटी काम करने जायेगी तो समाज में हमारी क्या इज़्ज़त बचेगी?” ख़ैर, समाज का ताना-बाना ही ऐसा है। वैसे तो शोले के सभी गीत शानदार हैं लेकिन “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” का आज तक जोड़ नहीं है। यही वज़ह है कि सन् 1975 में लिखा गया ये गीत आज तक दोस्ती का “एंथम” बना हुआ है। यूं तो अभी तक हज़ारों गाने लिखे गए हैं पर इस गीत का कोई सानी नहीं बन सका। अभी मुझे ऐसा लगता है कि दोस्ती वाला गाना तो है पर वैसी दोस्ती नहीं रही। आज हम देखते हैं कि हर संस्थाओं में बड़े अधिकारियों का कोई न कोई चमचा यानी खबरी होता है। इस फ़िल्म में भी जेलर का चमचा, श्रीराम नामक नाई है। जेल के परिवेश को देखते समय साल 1947 की सुभद्रकुमारी चौहान रचित कहानी “राही” दिमाग़ में उमड़ पड़ती है। कहना न होगा कि शोले हमें उन कहानियों से भी जोड़ने का काम रहा है जो शोले बनने से कई दशक पहले लिखे गए। राही की ही बात कर लीजिए फ़िल्म बनने से तक़रीबन 27 साल पहले लिखी गई। बचपन में जब फ़िल्म देखता था तो बस देखता चला जाता था लेकिन अब हर एक सीन में कोई न कोई कहानी, क़िस्सा, उपन्यास, नाटक, यात्रा संस्मरण, जीवनी दिमाग़ में आ जाती हैं।

    गब्बर का क़िरदार आज तक गुंडे और बदमाशों का पर्याय बना हुआ है। गांवों में आज भी लोग बदमाशों को गब्बर की संज्ञा देते हैं। यूं कहते हैं कि “ई तो साला एकदमै गब्बर बन गया है”। गब्बर की पहली झलक बेल्ट के बक्कल को पत्थर पर पटकना उसके आतंक और दहशत को दर्शाता है। हो सकता है गब्बर का ही स्टाइल नौजवानों ने अपनाया होगा क्योंकि आज भी लड़कों के गैंगवॉर में सबसे पहले बेल्ट ही खुलता है। रामगढ़ के पहाड़ों का दृश्य देखते समय सन् 1958 की कहानी “कोसी का घटवार” के गुसाईं और लक्ष्मा की प्रेम कहानी दिमाग़ में दौड़ने लगती है। ठीक वैसी ही प्रेम कहानी शोले में “वीरू यानी धमेंद्र” और “बसंती यानी हेमा मालिनी” की है। वहां भी दोनों का प्रेम-प्रसंग अधूरा रहता है और फ़िल्म में भी।

    “ये हाथ हमको दे दे ठाकुर” डायलॉग हर पीढ़ी के लोगों के ज़बान पर दर्ज़ है। शोले का कोई सीन किसी को याद रहे या न रहे पर ये डायलॉग तो याद ही रहता है। यही मकबूलियत है इस फ़िल्म की कि आज 50 साल बीत जाने के पश्चात् भी इसकी इतनी चर्चा है। आज भी जब गांवों में फ़िल्म की बातें होतीं हैं तो हमारे बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि “अरे… अभी के फ़िल्मों की न कहानी है, न गीतों में दम हैं, पुराने फ़िल्मों को देखो, उसके गानों के बोल देखो, कितने लाजवाब हैं। अभी क्या है? प्यार से शुरू और प्यार पर ख़त्म।“

    गांव से जब दिल्ली पढ़ने आया तो अपना एडमिशन ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (इवनिंग) में हुआ था। वहां हमारे प्रोफेसर पढ़ाया करते थे कि “साहित्य समाज का आईना होता” है। फ़िर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में पढ़ा तो ये पता चला कि “सिनेमा और साहित्य का कार्य-कारण” सम्बन्ध है। पढ़ते समय तो इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया लेकिन शोले देखते समय जो कहानियां दिमाग़ में दौड़ने लगीं तो लगा कि ठीक बात कही गई थी। दरअसल, साल 2025 में शोले देखना मेरे लिए अपने बचपन में झांकने जैसा हो गया। वह स्मृतियां याद आ गईं जिसका उस समय कोई मोल नहीं था पर आज वही यादें बन गईं हैं। हां, वही जिसे हम Gen-Z “मेमोरी” कहते हैं।

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