होमबाउंड: साथ… पर अलग

नीरज घेवान की फ़िल्म ‘होमबाउंड’ को इस बार भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए भेजा गया है। फ़िल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है। इस फ़िल्म पर लिखा है प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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नीरज घेवान आसान फिल्में नहीं बनाते। मसान से लेकर गीली पुच्ची तक, उनकी सिनेमाई दृष्टि हमेशा एक शांत उग्रता लिए होती है—वह जाति, वर्ग और लिंग के परतों को इस तरह उघाड़ते हैं कि कोई शोर नहीं होता, लेकिन हर फ्रेम गहराई से चुभता है। होमबाउंड (2025) में, जो लंबे अंतराल के बाद उनकी फीचर फिल्म में वापसी है, घेवान सीधे दिल पर वार करते हैं। कान फ़िल्म समारोह में नौ मिनट की स्टैंडिंग ओवेशन पाने वाली और अब भारत की ऑस्कर में आधिकारिक प्रविष्टि बनी यह फ़िल्म सिर्फ़ दो दोस्तों की कहानी नहीं है जो सपनों और निराशाओं के बीच झूलते हैं—यह भारत का ही चित्र है: बिखरा हुआ, असमान, जीवट, और अंततः निर्मम।

कहानी के केंद्र में हैं शोएब (ईशान खट्टर) और चंदन (विशाल जेठवा)—एक ही मिट्टी के दो बेटे, लेकिन अलग दरारों से निकले: एक मुसलमान, दूसरा दलित। दोनों का सपना एक है—पुलिस की वर्दी पहनना। यह वर्दी उनके लिए सिर्फ़ नौकरी नहीं, मुक्ति है—रोज़मर्रा की अपमानजनक वास्तविकताओं से बचने की ढाल, उस गरिमा का टिकट जो समाज ने उनसे छीन ली है। लेकिन घेवन इतने ईमानदार हैं कि वे हमें “संघर्ष से जीत” की कोई सरल कथा नहीं देते। वे दिखाते हैं एक धीमी टूटन। दोस्ती की दरारें किसी नाटकीय विस्फोट से नहीं, बल्कि चुप्पियों से उभरती हैं—टली हुई निगाहें, अनकहे गुस्से, छोटे-छोटे समझौते। जब तक कोविड-19 लॉकडाउन कहानी में प्रवेश करता है, सवाल यह नहीं रह जाता कि दोस्ती बचेगी या नहीं—बल्कि यह कि क्या इंसानियत ही बच पाएगी।

मुख्यधारा भारतीय सिनेमा हमेशा जाति और धर्म से असहज रहा है—सिवाय तब जब उन्हें ‘एकता’ की सतही कहानियों में बदल दिया जाए या खलनायकी का रूप दे दिया जाए। होमबाउंड इस सुविधा को ठुकरा देता है। यह हमें हाशिए की दुनिया वैसी ही दिखाता है जैसी वह है— कच्ची, ईमानदार और बिना किसी आड़ के। शोएब और चंदन की दोस्ती कोई आदर्श “भाईचारे” की मिसाल नहीं है जो पहचान से परे जाती हो; बल्कि यह उसी पहचान से गढ़ी और उसी से तनावग्रस्त है। उनकी वंचनाएँ मिलती हैं, लेकिन मिटती नहीं—बल्कि गहराती हैं।

यही होमबाउंड की असली प्रतिभा है। यह अच्छाई-बुराई के साधारण द्वंद्व से आगे बढ़ती है। असली विरोधी यहाँ कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वे संस्थाएँ हैं जिन्हें हम पूजते हैं—राज्य, तंत्र, नौकरशाही। खाकी वर्दी भी दोधारी तलवार बन जाती है। जो लोग हाशिए पर हैं, उनके लिए यह पहचान का प्रतीक है, लेकिन साथ ही एक ऐसा औज़ार भी, जो सत्ता की मिलीभगत माँगता है। सम्मान पाने की आकांक्षा यहाँ अपने ही आत्मसम्मान से जूझती है।

अपनी समूची गंभीरता के बावजूद होमबाउंड में कोमल पलों की झलकियाँ हैं—दोनों दोस्तों का बाइक पर सफ़र, हँसी-ठिठोली, एक बल्ब की रोशनी में साझा किया गया खाना। ये क्षण इसलिए दमकते हैं क्योंकि वे क्षणिक हैं। दर्शक जानता है कि ये ज़्यादा देर टिकेंगे नहीं। घेवन हमें उम्मीद का स्वाद चखाते हैं—सिर्फ़ यह दिखाने के लिए कि व्यवस्था कितनी बेरहमी से सबसे पवित्र रिश्तों को भी कुचल देती है। यही उतार-चढ़ाव—स्नेह और सड़न के बीच—फिल्म को न केवल भावनात्मक बल्कि राजनीतिक रूप से भी विस्फोटक बनाता है। यहाँ दोस्ती महज़ निजी रिश्ता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक है—जाति और धर्म की दीवारों के पार एकजुटता की संभावना, और साथ ही यह यथार्थ कि राज्य का भार उस पर भी टूट पड़ता है। फिल्म का अंतिम अध्याय भारत के 2020 के लॉकडाउन में घटता है—और यह फैसला कलात्मक होने के साथ नैतिक भी है। हमें सभी को वे दृश्य याद हैं—मज़दूरों की अंतहीन यात्राएँ, उनकी टूटी चप्पलें, और थकान से चूर चेहरे। घेवन इस त्रासदी को फिर से जीवित करते हैं, लेकिन शोएब और चंदन की दृष्टि से यह सिर्फ़ रिपोर्टिंग नहीं रह जाती, यह प्रतीक बन जाती है। मज़दूरों का घर वापसी का सफ़र उनकी दोस्ती के बिखराव का आईना बन जाता है—दोनों एक ऐसे राज्य की उपज हैं जिसने अपने सबसे कमज़ोर नागरिकों को त्याग दिया।

कुछ समीक्षक कहते हैं कि फिल्म का अंत मेलोड्रामैटिक हो जाता है। लेकिन शायद जब वास्तविकता ही कल्पना से अधिक क्रूर हो जाए, तो मेलोड्रामा अपरिहार्य हो जाता है। जब सच्चाई ही किसी कथा से अधिक असहनीय हो, तो और कौन-सा रूप उसका सामना कर सकता है?

मार्टिन स्कॉर्सेसी का इस फ़िल्म के एक्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में जुड़ना अपने आप में एक बयान है। मिट्टी और धूल से निकली यह कहानी वैश्विक दर्शकों को झकझोरती है। कान, टोरंटो और अब ऑस्कर की दौड़ में इसकी सफलता यह साबित करती है कि जो कहानियाँ सबसे स्थानीय हैं—सबसे असुविधाजनक—वही सबसे सार्वभौमिक भी हैं। भारतीय दर्शकों के लिए, दाँव और ऊँचे हैं। होमबाउंड हमें वे सवाल पूछने को मजबूर करती है जिनसे हम बचते रहे हैं: कौन ‘अपना’ कहलाने का अधिकार रखता है? किसे सपना देखने की अनुमति है? गरीबों को क्यों उसी राज्य से सम्मान माँगना पड़ता है जो उन्हें कुचलता है? और सबसे पीड़ादायक प्रश्न—जब दोस्ती जैसी पवित्र भावना भी जाति, धर्म और सत्ता की साजिशों से अछूती न बचे, तो इंसानियत कहाँ बचेगी?

होमबाउंड को “भारतीय सिनेमा की वैश्विक जीत” कह देना आसान है, लेकिन यही इस फ़िल्म के अर्थ को खो देना होगा। यह फ़िल्म जीत नहीं, बेचैनी चाहती है। यह दर्शक के भीतर उतरकर वहीं ठहरना चाहती है। यह हमें याद दिलाती है कि प्रवासी मज़दूरों का संकट कोई अपवाद नहीं था—वह हमारे समाज का आईना था।

आख़िरकार, होमबाउंड दो दोस्तों की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समय की चेतावनी है—जहाँ दोस्ती भी अब जाति, धर्म और राज्य की चौकियों से होकर गुज़रती है। और यही इसका सबसे गहरा शोक है: जब इंसानी रिश्तों को भी समाज की असफलताओं का बोझ उठाना पड़े।

होमबाउंड की असली त्रासदी परदे पर नहीं, हमारे भीतर घटती है—क्योंकि हम हर दृश्य को अपने आसपास पहचान लेते हैं।

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