चार्ली चैप्लिन की फ़िल्म द गोल्ड रश के सौ साल हो गये। इस फ़िल्म पर पढ़िए युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर का लेख- मॉडरेटर
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धुँधली सी याद है सन् १९८९ की जब चार्ली चैप्लिन की जन्मशती मनाई जा रही थी। उन दिनोँ दूरदर्शन पर ‘सर चार्ल्स स्पेंसर चैप्लिन’ (1889-1977) की कुछ छोटी अवधि की मूक फिल्मेँ दिखाई गयीँ थीँ। तब शायद पहली बार मैँने स्वचालित सीढ़ियोँ को टीवी पर देखा और मुझे बड़ा अचरज हुआ कि सीढ़ियाँ भी चलती हैँ। चार्ली चैप्लिन की महानता और उनकी फ़िल्मोँ से परिचय बहुत बाद मेँ हुआ जब मैँ अपनी लेखिका मित्र ‘भैरवी चैटर्जी’ की मेरे अल्पज्ञान पर धिक्कार भरी टिप्पणी – तुमने ‘द गोल्ड रश’ नहीँ देखा और फिर सिनेमा की बात करते हो – से आहत होकर चैप्लिन की अधिकांश फ़िल्मेँ अविलम्ब देख डालीँ। मेरे कहने पर मेरे स्वर्गीय मित्र प्रतीक जैन ने जब चैप्लिन की फ़िल्मेँ देखीँ तब उनकी टिप्पणी थी – “मैँ खुद पे लानत देता हूँ कि जीवन मेँ कुछ बड़ा कर पाना तो दूर, महान और महत्त्वपूर्ण चीजोँ से मेरा परिचय तक नहीँ।“
सम्भवत: अल्पज्ञता और लघुता का विनम्र आत्मस्वीकार ही जीवन मेँ क्रान्तदर्शी होने की प्रेरणा दे सकता है। कभी-कभी विचार आता है यदि भारत मेँ माध्यमिक शिक्षा मेँ बदलाव के लिए कुछ विचार देनेँ हो तो वे क्या होँ? यह कैसा रहेगा कि हम विद्यालय की आधी कक्षाएँ चुनिन्दा महान फ़िल्मेँ (अधिक नहीँ १०-१२), कुछ महान गीत, प्रसिद्ध पुस्तकेँ, नृत्य, खेल, पहेलियोँ मेँ बिताएँ। शिक्षा पद्धति का इतना ही सत्य है कि मास्टर्स की डिग्री लेने के बाद भी अच्छे से अच्छे विद्यार्थियोँ का ज्ञान सीमित और छिछला होता है। शिक्षा उत्तम व्यवहार और प्रायोगिकता नहीँ सिखा पाती। सांस्कृतिक विविधता, दर्शन, इतिहास, सङ्गीत के मानक से परिचय कम ही होता है। हालाँकि यह कटु सत्य है कि बहुत काम छात्र ही पढ़ना-लिखना चाहते हैँ। यह उतना ही कर्णकटु है जितना कि यह सुनना कि सच्ची पढ़ाई स्नातक (पारम्परिक शाब्दिक अर्थ – गुरुकुल मेँ सफलतापूर्वक शिक्षा पूरी कर लेने के बाद समारोह मेँ पवित्र जल से स्नान कर लेने वाला ) करने के बाद ही प्रारम्भ होती है। ज्ञान के प्रति अनुराग जब संस्थानात्मक प्रवृत्तियोँ को छोड़ कर आगे बढ़ता है, परीक्षा मेँ अङ्को की दौड़ और होड़ से मुक्त हो कर, कलुषित प्रतिस्पर्धा से निकल कर, आत्मन्यूनता को ढँकने का प्रयास न करते हुए, अपनी अल्पज्ञता को स्वीकार कर कम करने का शुचितापूर्ण प्रयास करता है तब ही अर्जित ज्ञान आस्वादात्मक होता है। कहा जा सकता है कि जब तक ज्ञान ‘आस्वादात्मक’ नहीँ होता है, तब तक वह श्रेय नहीँ है, स्मृत नहीँ है, स्तुत्य नहीँ है।
हम अगर ऐसी पीढ़ी बनाना चाहते हैँ जो भौण्डी रीलोँ से, इन्फ्लुन्सर के कचरोँ से, यूट्यूबर के पूर्वाग्रहोँ से इतर दूरदर्शी और विवेकवान होँ, उस स्थिति मेँ अपरिहार्य है कि हम श्रेष्ठ विचारोँ, दृश्योँ, श्रव्योँ का मानक तय कर के स्थापित करेँ। पाठ्यक्रम मेँ पचास साल से अधिक पुराना उच्च स्तर का साहित्य इसलिए ही पढ़ाया जाता है कि मानकीकरण के उपरान्त श्रेष्ठ साहित्य विद्यार्थियोँ को उत्तम सर्जना के लिए प्रेरित करे। यह अधिगम का अभीष्ट है। ऐसे मेँ सिनेमा का अध्ययन आवश्यक है। वह भी विद्यालय और महाविद्यालयोँ के स्तरोँ पर। इस सम्बन्ध मेँ मेरी पुस्तक ‘अभिनव सिनेमा’ एक प्रयास है जो कि सिनेमा के मानकोँ पर परिचयात्मक दृष्टि देती है। मैँ यह प्रस्तावित करना चाहता हूँ कि ‘द गोल्ड रश’, ‘सिटी लाइट्स’, ‘द किड’ और ‘बाइसिकल थीव्स’ जैसी पब्लिक डोमेन मेँ उपलब्ध फ़िल्मेँ देखना-दिखाना, दुनिया भर की माध्यमिक शिक्षा मेँ अनिवार्य कर देनी चाहिए। इस पर बहसेँ होनी चाहिए। वे सामान्य ज्ञान का अंग होना चाहिए। सामान्य ज्ञान का अंग स्वीकृत मानक जैसे ‘शोले’,’दीवार’ और ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ न हो कर श्रेयक मानक ‘मुग़ल+ए+आज़म’ या ‘नवरङ्ग’ होने चाहिए।
बहरहाल आज जून २६, २०२५ को ‘द गोल्ड रश’ के सौ साल पूरे हो रहे हैँ। आज से सौ साल पहले प्रदर्शित ‘द गोल्ड रश’ को सन् १९५८ मेँ ११७ प्रतिष्ठित फ़िल्मकारोँ और समीक्षकोँ के मत संग्रह के उपरान्त ‘बैटलशिप पोत्योमकिन’ के बाद ‘बाइसिकल थीव्स’ को पीछे छोड़ते हुए सबसे महत्त्वपूर्ण फ़िल्म मानी गयी थी। सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य मेँ यह फ़िल्म सपरिवार देखी जानी चाहिए जो यूट्यूब पर मुफ्त मेँ उपलब्ध है – https://www.youtube.com/watch?v=DltL_aTwfns
आमतौर पर ड्रामा, करुणात्मक कहानियाँ या रोमांस आदि बहुत पसन्द किए जाते हैँ। क्या कारण है कि ‘द गोल्ड रश’ का जादू आज भी सिर चढ़ कर बोलता है। ‘द गोल्ड रश’ की कहानी सन १८९८ मेँ अलास्का मेँ सोने की खोज मेँ पहुँचे लोग के जमावड़े को लेकर है। फ़िल्म के पहले ही शॉट मेँ बर्फीली ऊँचे पहाड़ पर खोजकर्ताओँ की लम्बी कतार का दृश्य बड़ा मोहक है। कम से कम हम बच्चोँ को ऐसा बता सकते हैँ कि केदारनाथ यात्रा या हेमकुण्ड साहिब की यात्रा मेँ भी हज़ारोँ लोग पहाड़ोँ पर कतार पर चढ़ते हैँ और ग्लेशियरोँ को पार कर के आगे बढ़ते रहते हैँ। इतना ही नहीँ, जब बहुत से लोग जुटते हैँ तब निर्जन स्थान पर भी रिहाइश और व्यापार के अवसर भी बनते जाते हैँ। ‘बिग जिम‘ नाम के पर्वतारोही को एक सोने के अयस्क का पूरा पहाड़ मिलता है। कितना अच्छा हो कि फ़िल्म देखने के बाद धातुकर्म के बारे मेँ बताया जाए कि सोना आमतौर पर शुद्ध ही मिला करता था। आधुनिक काल मेँ अयस्कोँ से कैसे सोना निकाला जाता है, कम से कम उत्सुकता बढ़ायी जा सकती है। ब्लैक लार्सन नाम का अपराधी उस सोने के पहाड़ के पास एक लकड़ी की कुटिया मेँ रह रहा होता है और ट्रैम्प (चार्ली चैप्लिन का चरित्र) जो कि सोने की तलाश मेँ है वहाँ आ पहुँचता है। किस तरह बिग जिम, ब्लैक लार्सन और ट्रैम्प बर्फीले पहाड़ पर भूखे दिन बिताते हैँ। जब ब्लैक लार्सन खाने की तलाश मेँ बाहर निकलता है, भूख से ट्रैम्प और बिग जिम दोनोँ का बुरा हाल हो जाता है। यहाँ ‘द गोल्ड रश’ का सबसे प्रसिद्ध दृश्य है जिसमेँ चैप्लिन जूते उबाल कर खा जाते हैँ। यह दृश्य कई माने मेँ अनूठा है क्योँकि बहुत से दर्शक इस कारुणिक दृश्य पर हँस पड़ते हैँ।
इस दृश्य की मीमांसा करने के बजाय, यह उचित होगा कि भारत की नई पीढ़ी जो भूख से कम परिचित है उन्हेँ बताना चाहिए कि सन १६३० का अकाल, सन १७७० का अकाल, सन १७८०-८४ का भीषण अकाल, सन १९४३ का बंगाल मेँ पड़ा अकाल आदि ने किस तरह भारत की कमर तोड़ दी। हमेँ बताना चाहिए कि ‘आनन्द मठ’ मेँ वर्णित संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि सन १७७० के भयङ्कर अकाल की थी। सत्यजित राय की चर्चित फ़िल्म ‘आशानी संकेत‘ (१९७३) सन् १९४३ के भयावह अकाल की पृष्ठभूमि मेँ है जिसमेँ तीस लाख लोग भूख से मर गए। किस तरह भारत मेँ अव्यवस्था, अनाज के असमान वितरण और अंग्रेजोँ के लालच ने लाखोँ लोग को भूख से मार दिया। मुझे नहीँ लगता कि यह दृश्य देखकर सन् १९२५ के भारत मेँ कोई हँसता होगा जिस तरह आज हम बेफिक्री से हँस सकते हैँ। हम किस अजीब समय मेँ रहते हैँ कि जब किसी साहित्य मेँ या फ़िल्म मेँ लम्बे-मोटे, दुबले-सूखे, काले-ठिगने होने पर हँसने पर हम जोरदार बहस करते हैँ और आपत्तियाँ करते हैँ, वहीँ भूख और उससे हो सकने वाली मौत को लेकर हम चैन से ठहाके लगा सकते हैँ। कला-साहित्य मेँ हास्य की विवेचना होनी चाहिए, किन्तु अंकुश नहीँ लगाना चाहिए। मैँ समझता हूँ अभद्रता की सबसे बड़ी काट सम्यक और गम्भीर विवेचना है।
फ़िल्मकथा मेँ आगे प्राकृतिक हादसोँ मेँ ‘ब्लैक लार्सन’ मारा जाता है और बिग जिम की याददाश्त चली जाती है। ट्रैम्प सोने की तलाश मेँ पहाड़ी इलाके के एक नगर मेँ शरण लेता है, जहाँ उसकी मुलाकात जॉर्जिया नाम की सुन्दरी से होती है। चार्ली चैप्लिन की सराहना इसलिए भी करनी चाहिए कि वे विदूषक को नायक की तरह स्थापित करने मेँ सफल रहते हैँ। कोई भी चैप्लिन जैसा फटेहाल, छोटे कद का, उल्टे-फटे जूते पहनने वाला नहीँ बनना चाहेगा, किन्तु सभी उसकी सराहना अवश्य करते हैँ। बहुत से दर्शक यह कल्पना भी नहीँ कर सकते कि बिना बेल्ट के ढीली पैँट पहन कर नाचने के अवसर पर जब आदमी की इज़्ज़त दाँव पर लगी हो, उस समय हालात का कैसे सामना किया जाए। कथा का नायक वीर हो, यह अपेक्षित है किन्तु आवश्यक नहीँ। और चैप्लिन कमजोर होने के बाद भी वीरता दिखाने से चूकते नहीँ। यह वीरता कई बार काम नहीँ आती, बल्कि नायक हँसी का पात्र बनता है और निन्दनीय नहीँ होता। हममेँ से कितनोँ मेँ इतना धैर्य है या यह स्थिति स्वीकार्य है कि हम हँसी का पात्र बने किन्तु किसी के लिए भी भय या घृणा का कारण न बनेँ? हम यदि फ़िल्मोँ की सम्यक विवेचना सीख जाएँ तब यह समझ और समझा सकते हैँ कि वीरता केवल युद्धवीरता नहीँ बल्कि धर्मवीरता और दानवीरता भी है। नाट्य परम्परा के लघु प्रमेय जीवन को बहुत समृद्ध कर सकते हैँ। हम नीति-धर्म-उत्साह से ले कर जीवन के समस्त चुनौतियोँ के प्रति चिन्तन कर सकते हैँ।
बिग जिम पहाड़ी पर बसे नगर मेँ ट्रैम्प को ढूँढ निकालता है और भूले हुए सोने की पहाड़ की तलाश मेँ पुन: उसे साथ ले चलता है। इस फ़िल्म के कई दृश्य, जैसे कि पहाड़ से आधी लटकती झोपड़ी, हिन्दी फ़िल्मोँ मेँ सीधे-सीधे नकल किए गए हैँ। अपनी चुस्त कथा और न भूलने वाले हास्य के कारण यह फ़िल्म कई-कई बार देखने लायक है।
यह सोचने लायक है कि इतनी तकनीक, थ्री-डी, एआइ, उन्नत कैमरोँ के बावजूद आज भी ‘द गोल्ड रश’ या ‘सिटी लाइट्स’ जैसी फ़िल्मेँ हम क्योँ नहीँ बना पाते? शायद इस सवाल का उत्तर हमेँ जेनेरेटिव एआइ से बेखौफ़ बना सकता है।
जन्म शताब्दी के बजाय हमेँ कर्म शताब्दियाँ मनानी चाहिए वह भी बड़े धूम-धाम से। ‘द गोल्ड रश’ और चार्ली चैप्लिन की अन्य कृतियोँ का मानवता पर दोस्तोयेवस्की और बीथोपेन जैसा प्रभाव है। मैँ आशा करता हूँ कि दिसम्बर २०२५ मेँ कोई अध्येता ‘बैटलशिप पोत्यमेकिन’ और जनवरी २०३१ मेँ ‘सिटी लाइट्स’ पर गम्भीरता से विचारेगा। तब तक मेरी नज़रेँ कुछ और कमजोर हो चुकी होँगी पर ऐसे लेखोँ को पढ़ कर वैसी खुशी होगी जैसे स्वर्ग मेँ आज चार्ली चैप्लिन को अपनी फ़िल्मोँ की पुन: प्रशंसा पर हो रही होगी।
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