• फिल्म समीक्षा
  • दशावतार, दिलीप प्रभावलकर और ऑस्कर

    मराठी भाषा की किसी फ़िल्म को पहली बार ऑस्कर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के प्रतिस्पर्धा वर्ग में स्थान मिला है, फ़िल्म है ‘दशावतार’, जिसके निर्देशक हैं सुबोध खानवलकर, जिसमें दिलीप प्रभावलकर के अभिनय ने यादगार बना दिया है। इस फ़िल्म पर, दिलीप प्रभावलकर के अभिनय पर यह टिप्पणी आई लिखी है संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी टिकू ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    इतिहास हमेशा शोर के साथ नहीं आता। कई बार वह धीमे क़दमों से, लगभग विनम्रता के साथ, हमारी स्मृति में प्रवेश करता है। मराठी फ़िल्म दशावतार का इस वर्ष ऑस्कर की दौड़ में पहुँचना भी ऐसा ही एक क्षण है- एक ऐसा क्षण जो भारतीय सिनेमा, लोक-संस्कृति और सांस्कृतिक आत्मबोध के इतिहास में चुपचाप लेकिन स्थायी रूप से दर्ज हो जाएगा।

    यह उपलब्धि किसी एक फ़िल्म की भर नहीं है। यह उस सांस्कृतिक परंपरा की स्वीकृति है, जिसे दशकों से “हाशिए की कला” समझा गया। और इस स्वीकृति के केंद्र में खड़ा है एक अभिनेता—दिलीप प्रभावलकर- जिसका अभिनय स्वयं में भारतीय रंगमंच और सिनेमा का जीवित इतिहास है। दिलीप प्रभावलकर कोई साधारण फ़िल्म अभिनेता नहीं हैं। वे उन विरले कलाकारों में से हैं जिनके लिए अभिनय केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना है। मराठी रंगमंच से लेकर हिंदी सिनेमा तक, उन्होंने हमेशा ऐसे पात्र चुने हैं जो समाज की आत्मा से जुड़े हों—चाहे वह गांधी विरुद्ध गांधी का गोपाल कृष्ण गोखले हो, लगे रहो मुन्ना भाई का गांधी, या फिर दशावतार का वह वृद्ध लोककलाकार, जो अपनी कला के साथ बूढ़ा हो रहा है। दशावतार में प्रभावळकर का अभिनय किसी भूमिका का निर्वाह नहीं करता- वह उस लोकपरंपरा को अपने शरीर, अपनी आवाज़ और अपनी चुप्पियों में जीवित कर देता है। यह अभिनय नहीं, स्मृति का पुनर्जीवन है। लोककलाकार की कथा, भारतीय समाज की कथा फ़िल्म का नायक एक दशावतार कलाकार है- ऐसा कलाकार जिसने अपना पूरा जीवन विष्णु के अवतारों को मंच पर जीते हुए बिताया है। लेकिन अब समय बदल गया है। दर्शक बदल गए हैं। बाज़ार बदल गया है। और इस बदलते समय में वह कलाकार खुद से यह पूछने को मजबूर है कि क्या उसकी कला की अब कोई ज़रूरत है?

    यह प्रश्न आज के भारत का प्रश्न है।

    हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ तेज़ी, दृश्यता और तात्कालिक लोकप्रियता को मूल्य माना जाता है। ऐसे में लोककलाएँ- जो धैर्य, परंपरा और सामूहिक स्मृति पर टिकी होती हैं- असहज लगने लगती हैं। दशावतार इस असहजता को स्वीकार करती है, उससे भागती नहीं। दिलीप प्रभावलकर का पात्र न तो विद्रोही है, न ही करुणा का पात्र। वह बस एक कलाकार है- जो अपने समय से ईमानदारी से जूझ रहा है। दशावतार केवल धार्मिक आख्यान नहीं है। यह भारतीय सभ्यता का रूपक है। मत्स्य से लेकर कल्कि तक की यात्रा मनुष्य की नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक यात्रा है। दशावतार फ़िल्म इन अवतारों को किसी भव्य दृश्यात्मक तमाशे में नहीं बदलती। वह उन्हें मनुष्य के जीवन में घटित होने वाले संघर्षों के रूप में देखती है।

    दिलीप प्रभावलकर के अभिनय की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह मिथक को मानवीय बना देते हैं। जब वे मंच पर अवतार धारण करते हैं, तो वह ईश्वर नहीं लगते—वे मनुष्य लगते हैं, जो ईश्वर को अपने भीतर खोज रहा है।

    इस फ़िल्म का ऑस्कर की दौड़ में पहुँचना मराठी भाषा और क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। दशकों तक यह धारणा बनी रही कि वैश्विक पहचान पाने के लिए या तो हिंदी में बोलना होगा या अंग्रेज़ी में। डशावतार इस धारणा को ख़ामोशी से खारिज करती है। मराठी भाषा की सांस्कृतिक बनावट, उसकी लोकध्वनियाँ और उसकी रंगमंचीय परंपरा इस फ़िल्म को एक विशिष्ट पहचान देती हैं। दिलीप प्रभावळकर जैसे अभिनेता इस भाषा को केवल बोलते नहीं, वे उसे जीते हैं। ऑस्कर मंच तक पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि अब विश्व सिनेमा “केंद्र” और “हाशिया” की पुरानी श्रेणियों से बाहर निकल रहा है।

    भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में पुरस्कार का महत्व कभी अंतिम नहीं रहा। यहाँ कला को उसके प्रभाव, उसकी स्मृति और उसकी सामाजिक भूमिका से आँका जाता है। इस दृष्टि से देखें तो दशावतार पहले ही सफल हो चुकी है।

    ऑस्कर की दौड़ में पहुँचना एक माध्यम है- एक अवसर कि भारत अपनी लोककथाएँ, अपने कलाकार और अपनी भाषाएँ बिना किसी समझौते के दुनिया के सामने रख सके। दिलीप प्रभावळकर जैसे कलाकार इस अवसर को “प्रतिनिधित्व” में बदलते हैं। वे यह दिखाते हैं कि भारतीय अभिनय की परंपरा केवल स्टारडम पर नहीं, साधना पर टिकी है।

    जब भारत आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से स्वयं को वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, तब दशावतार जैसी फ़िल्में एक ज़रूरी सवाल पूछती हैं- क्या हमारी सांस्कृतिक आत्मा भी उतनी ही मज़बूत है?

    दिलीप प्रभावलकर का पात्र हमें याद दिलाता है कि कोई भी सभ्यता केवल भविष्य से नहीं बनती, वह स्मृति से भी बनती है। और जो समाज अपनी स्मृति खो देता है, वह दिशा भी खो देता है।

    शायद दशावतार ऑस्कर जीते, शायद न जीते। लेकिन उसने पहले ही वह कर दिखाया है, जो बहुत कम फ़िल्में कर पाती हैं- उसने भारतीय लोक-संस्कृति को सम्मान के साथ वैश्विक संवाद में प्रवेश कराया है। और इस संवाद का चेहरा है दिलीप प्रभावलकर—एक अभिनेता, जो स्वयं में एक चलती-फिरती सांस्कृतिक विरासत हैं। जब ऐसे कलाकार और ऐसी कहानियाँ विश्व मंच पर पहुँचती हैं, तो यह केवल सिनेमा की जीत नहीं होती—यह भारतीय आत्मा की स्वीकृति होती है।

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