आज पढ़िए जनमेजय की कविताएँ जिन्हें उन्होंने ‘दिल्ली की सड़कों पर’ शीर्षक से सीरिज के रूप में लिखा है – अनुरंजनी
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दिल्ली की सड़कों पर
(1)
दिल्ली की सड़कों पर शाम होने लगी थी
मैंने उसे देखा वह ऑफिस से लौट रही थी
मैं बेकार घूम रहा था
मॉडर्न कहलाने का लगभग हर सामान
उसके पास मौजूद था
लेकिन मैं नहीं देख सकता था
उन पर्दों को
जिनमें वह चल रही थी
जिनसे वह निकल कर आई थी
और जिनमें वह लौट रही थी।
(2)
शाम का डूबता सिंदूरी सूर्य
पहाड़ और देहात की तरह
शहर में भी सुंदर होता है
लेकिन मेरे अंदर दो समयों का संघर्ष है
जैसे यह शहर संघर्षरत है
मैं उसे नहीं उसके
उतार-चढ़ाव को पहचानता हूँ।
सूर्य अकेला, उदास
रात के लिए सफ़ेद पड़ते
शहर के क्षितिज से
धीरे-धीरे नीचे जा रहा है।
(3)
मेरी क्षुब्द वासना जानती है
शाम के वक्त मेट्रो में
कितनी हड़बड़ी
कितनी भीड़ होती है
और शायद इसलिए
मैं सोचता हूँ कि
आज रात कविता में
मैं कैसे-कैसे और कौन-कौन से शब्द लिखूँगा…
मगर किसी भी तरह मैं नहीं सोच पाता हूँ कि
वह लड़की क्या सोचेगी आज रात घर लौट कर
और कल सुबह
घर से निकलने से पहले…
काश! मुझे भी शब्दों की तरह ही
किसी शब्दकोश में ढूँढा जा सकता
और अगर वहाँ मेरा नाम ‘स’ से शुरू होता
सभ्यता शब्द के एकदम निकट
तो और भी अच्छा होता ।
(4)
अँधेरा- जंगल हो या शहर
हर जगह स्याह, सुनसान होता है
लेकिन अलग-अलग तरह से
जंगल में भेड़िया
भेड़िया का शिकार नहीं करता
लेकिन शहर में ऐसा नहीं होता
रात और सड़क दोनों ही किसी न किसी
उजाले में चमकते रहते है
फिर भी उस रात
वह मानव देह मानव के ही
नख, दंत, लिंग से कटी-फटी
समूची की समूची
मांस का एक टुकड़ा भी
खाया नहीं गया था
वही सड़क पर पड़ी
धीरे-धीरे मरती रही… और
भले मानुस किसी सभ्य कानून के डर से
अपने-अपने रास्ते गुजरते रहे।
(5)
उस रात के अगले दिन और
उसके बाद के कुछ दिनों तक
दिन-दिन भर
किसी बुरे से सपने में
टीस से बक-झक करते रहने के बाद
मैं अंतत: फिर से उसी शहर की
उन्हीं सड़कों पर निकल आता हूँ…
जबकि दिल्ली की सड़कों पर
उसी सच में जीती कोई लड़की
दूसरों की नजरों में
अपनी देह में कैद होकर जीती
सभ्यता नहीं कुछ कैमरों के भरोसे
जीने की कोशिश करने लगती है।
(6)
और अंत में उस दिन जब
प्रजातंत्र की सड़क पर उसने
अपना विरोध दर्ज करा दिया था
असंभव था एक सच के लिए
झूठ और दायरों में छिपे रहना
बेकार था बहलाना-फुसलाना
सच जो उसके भीतर धीरे-धीरे
अड़ता रहा था
आज तमाम सुनी जाती चीख़ों
और आश्वासनों के बावजूद
जो उसकी आँखों में नग्न था, जबकि
कनॉट प्लेस जैसे सुरक्षित घेरे में,
फुटपाथ पर बिकती अनगिनत किताबों के बीच
वह अपने प्रेमी के साथ
हल्की ठंड में खिली
धूप में खड़ी थी
और उसी दिन मैंने महसूस किया कि
उस लड़की का डर और
मेरे अंदर का आदमी
सरसरा सकते हैं
धूप और किताबों में भी
वैसे ही जैसे सरसराते हैं
अँधेरे में और घर में।

