‘भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई’ पुस्तक की समीक्षा

कवि-आलोचक श्रीप्रकाश शुक्ल की किताब आई है ‘भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई’। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब पर यह सुविचारित टिप्पणी लिखी है युवा लेखक आशुतोष कुमार पांडेय ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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वाराणसी की तंग गलियों में, गंगा की बहती धारा के साथ घुली सदियों पुरानी स्वर-लहरियाँ, कभी तुलसी का सगुण भाव, तो कभी कबीर का निर्गुण सत्य—आज भी हवा में तैरते हैं। मगर इन सबके बीच एक और आवाज़ है, गहरी, अडिग और सच्ची, जिसे शहर की स्मृति ने जैसे धीरे-धीरे दबा दिया हो—संत रविदास की आवाज़। विडंबना देखिए, जिस धरती ने इस संत को जन्म दिया, वही अपनी सांस्कृतिक गाथा में उनकी जगह को बार-बार किनारे कर देती है।

प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल की किताब भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई इसी विस्मरण की परतों में उतरती है। लेखक यहाँ एक आलोचक भर नहीं, बल्कि एक खोजी पत्रकार की तरह सामने आते हैं, जो भूले-बिसरे केस की फाइल खोलकर पूछते हैं: ‘हमने इन्हें क्यों भुला दिया?’

भक्ति का नक्शा और सत्ता की कलम

भक्ति आंदोलन का इतिहास आमतौर पर संतों की कविताओं और भजनों से भरा हुआ मिलता है। पर यह इतिहास महज़ आत्मिक यात्रा का वृत्तांत नहीं है—यह सत्ता, जाति और सामाजिक पदक्रम से भी आकार पाता है। प्रो. शुक्ल बार-बार यह रेखांकित करते हैं कि इतिहास सिर्फ तथ्य-संग्रह नहीं है; यह एक ‘चयन’ है। और यह चयन तय करता है कि किसकी आवाज़ को जगह मिलेगी और किसकी आवाज़ को दरकिनार कर दिया जाएगा।
रविदास इस चयन के शिकार हुए।

उनकी कविता में समानता और मुक्ति की ध्वनि थी, इतनी सीधी और तीखी कि उसने वर्णव्यवस्था के स्तंभों में दरार डाल दी। परिणाम यह हुआ कि आधिकारिक साहित्यिक इतिहास ने उन्हें आदर के पन्नों पर सीमित कर, चर्चा के केंद्र से बाहर रखा।

लोकवृत्त: जीवंत मैदान, न कि केवल परंपरा

इस किताब की रीढ़ है ‘लोकवृत्त’ का विचार। आम तौर पर इसे लोकगीत, लोककथा या मौखिक परंपरा के रूप में समझा जाता है। लेकिन प्रो. शुक्ल इसे एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक मैदान के रूप में परिभाषित करते हैं, जहाँ विचार, प्रतिरोध, और रचना साथ-साथ सांस लेते हैं।

इस दृष्टि से रविदास की कविताएँ केवल धार्मिक भक्ति का प्रदर्शन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप हैं। यह हस्तक्षेप वर्णव्यवस्था, सामाजिक अन्याय और असमानता की जड़ों को चुनौती देता है। रविदास के शब्द किसी मृदु आध्यात्मिक प्रवचन की तरह नहीं, बल्कि एक निडर घोषणा की तरह सुनाई देते हैं।

कविताई में संघर्ष, मुक्ति और ‘बेगमपुरा’

रविदास की कविताओं में एक अद्भुत संतुलन है, वे आत्मा की मुक्ति की बात करते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ समाज में समानता की आवश्यकता को भी उतनी ही ताक़त से रखते हैं। वे न तो दार्शनिक अमूर्तता में खो जाते हैं, न ही भक्ति को केवल व्यक्तिगत मोक्ष का साधन मानते हैं।

उनके स्वप्नलोक ‘बेगमपुरा’ में कोई राजा-प्रजा का भेद नहीं, कोई ऊँच-नीच का बंधन नहीं। यह सिर्फ आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का खाका है—एक ऐसा शहर जहाँ अन्याय का कोई प्रवेश नहीं। प्रो. शुक्ल की व्याख्या इसे और गहराई देती है, यह दिखाते हुए कि रविदास की कविताएँ आज भी राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में उतनी ही प्रासंगिक हैं।

पत्रकारीय नज़र और साहित्यिक पकड़ का संगम

पुस्तक के कई अंश ऐसे हैं, जहाँ आलोचना की मेज पर पत्रकारिता की कुर्सी रखी हुई महसूस होती है। दस्तावेज़ों, संदर्भों और ऐतिहासिक गवाहियों का सघन उपयोग करते हुए भी लेखक एक सतत सवाल छोड़ते हैं—क्या हम सचमुच उतने बदल गए हैं जितना हम मानते हैं?

यह रविदास की आलोचना के बहाने वर्तमान को कटघरे में खड़ा करना है। जैसे एक पत्रकार किसी पुराने केस की तहकीकात करते हुए आज की सत्ता से सवाल पूछता है, वैसे ही प्रो. शुक्ल अतीत की परतों से वर्तमान की असलियत सामने रखते हैं।

गंगा, बनारस और विस्मृति की राजनीति

पुस्तक का सबसे मार्मिक हिस्सा वह है, जहाँ लेखक वाराणसी के सांस्कृतिक नक्शे में रविदास की जगह पर चर्चा करते हैं। गंगा के घाटों और मंदिरों के इस शहर में, जो स्वयं को आध्यात्मिक राजधानी मानता है, एक ऐसे संत की स्मृति का हाशिये पर होना सिर्फ लापरवाही नहीं, यह शहर के गहरे सामाजिक पूर्वाग्रहों का आईना है।

यहाँ प्रो. शुक्ल का लेखन सिर्फ साहित्यिक आलोचना नहीं करता, बल्कि सांस्कृतिक राजनीति की जटिल परतों को खोलता है। वे दिखाते हैं कि विस्मृति भी एक राजनीतिक क्रिया है, जो चुनिंदा स्मृतियों को बचाकर बाकी को भुला देती है।

आज के समय में रविदास क्यों जरूरी हैं

वर्तमान में ‘भक्ति’ शब्द को अकसर संकीर्ण सांप्रदायिकता, दिखावटी आस्था या राजनीतिक लाभ के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे समय में रविदास का असली स्वर और भी प्रासंगिक हो जाता है।
प्रो. शुक्ल की किताब हमें उस शिखर तक ले जाती है, बिना पॉलिश, बिना फ़िल्टर, जैसे वह अपने समय में था। वे अकादमिक गहराई और भावनात्मक संवेदना, दोनों को साथ लेकर चलते हैं। यह दुर्लभ संतुलन है, जिसमें शोध की सटीकता भी है और कहानी कहने की सहजता भी।

पढ़ने का अनुभव: सवाल और बेचैनी

यह किताब पढ़ने के बाद आपके भीतर कई सवाल रह जाते हैं, मिशाल के रूप में, इतिहास की निष्पक्षता, साहित्य की जिम्मेदारी, और समाज की स्मृति के बारे में। यह आपको मजबूर करती है कि आप इतिहास को नए सिरे से पढ़ें—उन पन्नों से भी, जिन्हें जानबूझकर मोड़कर रखा गया था।

रविदास की कविताओं की तरह, यह किताब भी सीधी, ईमानदार और असुविधाजनक है। और यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है—क्योंकि असुविधा ही वह जगह है, जहाँ बदलाव की संभावना जन्म लेती है।

भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई केवल एक संत कवि के साहित्यिक विश्लेषण तक सीमित नहीं है। यह एक सांस्कृतिक पुनर्पाठ है—जहाँ अतीत की आवाज़ वर्तमान की गलियों में लौटकर हमें झकझोरती है।

रविदास की कविताओं की सरलता में छिपी गहराई, और प्रो. शुक्ल के आलोचनात्मक दृष्टिकोण का मेल, इस पुस्तक को न केवल पढ़ने योग्य, बल्कि समय की ज़रूरत बनाता है। गंगा की तरह, जो हर घाट को छूती है, यह किताब भी हर पाठक के भीतर कुछ न कुछ बदलकर जाती है।

पुस्तक: भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई
लेखक: प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन
मूल्य: ₹525

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