पटना पुस्तक मेला की पॉलिटिक्स क्या है?

पटना पुस्तक मेला को किताबों की दुनिया का कुम्भ कहा जा सकता है. बिहार में पुस्तक संकृति को बचाए बनाये रखने में इसका बहुत योगदान रहा है. इसी कारण इससे अपेक्षाएं भी बहुत होती हैं. कल 23 वें पुस्तक मेला का समापन हो गया. एक संतुलित रपट पढ़िए सुशील कुमार भारद्वाज की कलम से- मॉडरेटर

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पटना पुस्तक मेला में “साहिर समग्र” पर चर्चा के दौरान जब प्रेम भारद्वाज, मदन कश्यप और अवधेश प्रीत जैसे लोगों ने कहना शुरू किया कि “पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” तो उनलोगों ने शायद उस परिचर्चा को वहीं भूला दिया होगा लेकिन अब पटना पुस्तक मेला पटनावासियों, अपने आयोजकों, एवं आगंतुकों से पूछ रहा है कि “पटना पुस्तक मेला की पालिटिक्स क्या है?” मेले में जहां सूबे के मुख्यमंत्री आए, स्वास्थ्य मंत्री आए, वित्त मंत्री आए तो आख़िरकार राज्यपाल भी आए.  सूबे के प्रशासनिक पदाधिकारी, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद आदि आए तो देश के चर्चित साहित्यकार भी आए और गुमनाम रचनाकार एवं आम पाठक भी. मुख्यमंत्री ने जहां मेले को अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनाने की सलाह दी वहीं मेले में ही नोवेल्टी प्रकाशन की ओर से “ब्लू बर्ड” नाम से अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन की ही घोषणा नहीं की गई बल्कि ढाई लाख का चेक पटना पुस्तक मेला के अध्यक्ष एवं लेखक रत्नेश्वर सिंह को देते हुए ग्लोबल वार्मिंग पर केंद्रित उपन्यास “रेखना मेरी जान” के लिए लगभग पौने दो करोड का अनुबंध भी किया जो कि शायद हिन्दी लेखकों के लिए एक बहुत बड़ी रकम है.

4 फरवरी को अहले सुबह कुहरे और कनकनी का जो आलम था उसमें पुस्तक मेले जैसे किसी आयोजन में शरीक होने से पहले शायद लोग किसी जरूरी काम में व्यस्त होने के बहाने तलाशते लेकिन मौसम की मेहरबानी रही कि चढ़ते दिन के साथ वसंत अपने खिले धूप में मुस्कान बिखेरने चली आई. फिर भी शुरु शुरु में मेला धूप और धूल के बीच हो रहे नुक्कड़ नाटक, संवाद –परिसंवाद, कविता –पाठ, कहानी –पाठ एवं अन्य सांस्कृतिक आयोजनों के लिए ही नहीं बल्कि पुस्तक और लिट्टी –गोलगप्पे के लिए भी दर्शकों और खरीददारों को ढूंढते रहा.

पुस्तक मेला जब 23 वी बार पटनावासियों को पुस्तकों की दुनियां में सैर कराने की तैयारी में था उसी समय पहला झटका लगा जब प्रशासन ने 350 वें प्रकाश-पर्व की तैयारी और गाँधी मैदान में टेंट-सिटी बनाने के नाम पर जगह उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया. प्रकाश-पर्व की खुमारी पूरी तरह से उतरती उससे पहले ही गणतंत्र दिवस की तैयारी शुरू हो गई. प्रशासन गाँधी मैदान में जगह की उपलब्धता की जो बात रखी उसमें आयोजकों ने वसंत ऋतु की वसंती वयार के बीच 4 -14 फरवरी 2017 का समय तय किया. समय तय करते वक्त 8 नवम्बर  2016  को प्रधानमंत्री की घोषणा से हुई नोट्बंदी का विचार मन में था या नहीं यह तो कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इतना तय है कि वे इस समय से आगे बढ़ने को बिल्कुल ही तैयार नहीं थे क्योंकि कुछ वर्ष पहले भी मार्च में मेला को आयोजित किया गया था जिसमें गर्मी एवं बिक्री के मामले में मेले की भद्द पिट गई थी.

इसे भी संयोग ही कहा जाय कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर गाड़े गए बांस–बल्ले पूरी तरह से उखर पाते उससे पहले ही पुस्तक मेले की तैयारी शुरू करनी पड़ गई वह भी आयोजकों के इच्छा के प्रतिकूल अन्य वर्ष की तुलना में कम जगह पर. लेकिन आयोजकों की ही यह अथक लगन थी कि मेले की लगभग 25-30% की तैयारी के बाबजूद महज कुछ लोगों की मौजूदगी में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से न सिर्फ मेले का उद्घाटन करवा लिया बल्कि मुख्यमंत्री ने आने वाले वर्षों में मेले को अन्तराष्ट्रीय स्तर का बनाने और उसमें सरकारी सहयोग देने की बात कहकर सबका दिल जीत लेने की कोशिश की.

मसि के द्वारा आयोजित कविता –कहानी कार्यशाला में स्कूली बच्चों ने जरूर अपनी सक्रिय भागीदारी निभाकर मेले की उपयोगिता को साबित करने की कोशिश की. बच्चों ने मेले में जहां गणित के कुछ खास नुस्खे सीखें वहीं नृत्य एवं संगीत से धमाल भी मचाए. आयोजकों ने भोजपुरी मुक्ताकाश मंच पर एक प्रमुख कार्यक्रम एवं अन्य औसतन पांच –छः कार्यक्रम प्रतिदिन प्रस्तुत किए जिसमें लोगों की भीड़ इतनी रही कि कुर्सी कम पड़ने लगी. आयोजक की सबसे बड़ी खासियत रही कि पाठकों के बीच न सिर्फ गौरतलब एवं समकालीन विषयों एवं पुस्तकों पर बहस एवं बातचीत के लिए शमी जमां, भगवान दास मोरवाल, यतीन्द्र मिश्र, उदय प्रकाश, शशि शेखर, अनंत विजय एवं संजीव जैसे लोगों को आमंत्रित किया बल्कि बिहार के रचनाकार उषाकिरण खान, हृषिकेश सुलभ, अवधेश प्रीत, मदन कश्यप एवं प्रेम भारद्वाज आदि जैसों को भी यथोचित सम्मान देते हुए नई एवं युवा पीढ़ी को भी मंच पर सहृदयता के साथ स्थान देने की सफल कोशिश की. यूं तो कई रचनाकार अपनी निजी व्यस्तता के कारण इस आयोजन में सशरीर शरीक नहीं हो सके लेकिन सोशल मीडिया के बहाने न सिर्फ इससे जुड़े रहे बल्कि होने वाली हर गतिविधि पर नजर गड़ाए रहे एवं शुभकामनाएँ भेजते रहे. साथ ही शहर में मौजूद अनेक रचनाकार मेले में अपनी सहभागिता भी दिखाते रहे.

ग्यारह दिवसीय इस आयोजन में लगभग तीन –चार दिन ही ऐसे रहे जिसमें औसत से कुछ अधिक भीड़ रही जिसने मेले को न सिर्फ सफल बनाने की कोशिश की बल्कि प्रकाशकों के चेहरे पर भी खुशी लाने की कोशिश की. बाबजूद इसके लगभग सभी प्रकाशक एक मत दिखे कि पिछली बार की तुलना में भीड़ कम जुटी है और बिक्री पर इसका स्पष्ट असर दिख रहा है. एक खास बात जो देखने को मिली वह यह थी कि अधिकांश खरीददार भी नवरचनाकार ही थे जो कुछ किताबें अपने वरिष्ठ लेखकों की सलाह पर खरीद रहे थे वर्ना प्रेमचंद, शरतचंद्र, बच्चन, बाबा नागार्जुन, रेणु, निर्मल वर्मा, एवं धर्मवीर भारती की ही किताबें चर्चा में रहीं.

मेले में पुस्तक –लोकार्पण के वक्त दर्शकों के होंठतब मुस्कुराने को बाध्य हो जाते थे जब लोकार्पण करने आए शहर के नामचीन शिक्षाविद एवं राजनेता बगैर किताब की सामग्री को पढ़े ही शीर्षक एवं लेखक के नाम पर ही पुस्तक को श्रेष्ठ एवं उपयोगी होने की बात कहने लगते थे. दूसरी बात नज़र आई कि हर लेखक सामने वाले को अपने पुस्तक के ग्राहक के रूप में देखता और हर मिलने वाला इंसान मुफ्त में एक किताब पा जाने की आस में घूमता रहता.

1985 से पटना पुस्तक मेला अपने सांस्कृतिक पहल में निखार लाते हुए न सिर्फ साहित्यकारों एवं पाठकों को नजदीक लाकर एक दूसरे के संपर्क में लाने की कोशिश में लगा है बल्कि यह प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वालों, अपनी जिंदगी संवारने वालों को भी एक दूसरे से मिलाने की कोशिश करता है. साथ ही साथ विभिन्न राज्यों की हस्तशिल्प कला को भी प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा है. जबकि इस बार भवनों, प्रवेश द्वारों एवं सभागारों के नाम भाषा के आधार पर रखे गए थे.

पटना पुस्तक मेला में आमंत्रित गणमान्य अतिथियों का स्वागत कॉफी, स्मृति –चिह्न एवं पटना पुस्तक मेला मुद्रित झोले से किया गया. जबकि मुक्ताकाश मंच के बगल में सभी आगंतुक अपनी इच्छा एवं अपनी जेब के हिसाब से बिहारी लिट्टी, गोलगप्पे समेत अन्य फास्ट –फ़ूड का मजा लेते रहे.

यूं तो जब नोट्बंदी ने सबके हाथ बांध रखे हों, आयकर के खर्च –ब्योरे के समय भी समापन की ओर हो, परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला हो वैसी स्थिति में भी पुस्तक –मेला का आयोजन अपने आप में ही अहम है. शेष तो लोग कहते ही हैं कि पटना पुस्तक मेला की पॉलिटिक्स क्या है?

संपर्क :- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

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