चंडीगढ़ में एक खबर की तरफ ध्यान गया. खबर मोगा जिले के बहोना गाँव की थी. वहां के सरपंच को सिख संगत की तरफ से तनखैया यानी धर्म विरुद्ध आचरण का दोषी ठहराया गया. कारण था कि उसने अपनी दाढ़ी डी सी के ऑफिस में जाकर कटवा ली थी. क्योंकि उस अफसर ने यह वादा किया था कि वह बहोना गाँव में पीना के पानी की आपूर्ति करेगा. वह नहीं कर पाया बस सरपंच साहब ने अपनी दाढ़ी मुंडा ली. किया भले उन्होंने सामाजिक कार्य के हित में किया हो लेकिन दाढ़ी कटवाना सिखों में धर्म विरुद्ध आचरण माना जाता है. बस उनको तनखैया घोषित कर दिया गया.
आम तौर पर तनखैया घोषित किये जाने के बाद गुरुद्वारा में जूते साफ़ करने या लंगर में बर्तन साफ़ करने की सजा दी जाती है और इस सजा को बड़े बड़े लोग भुगत चुके हैं. लेकिन उनको गुरुद्वारे की तरफ से बड़ी अजीब सजा दी गई. पूरे गाँव में साहित्यिक किताबों को बांटने का. किताबें भी उनको गुरद्वारे की तरफ से ही उपलब्ध करवाई गई. सजा के सजा और पंजाबी भाषा के साहित्य का प्रसार भी हो गया.
यह खबर पढ़कर मन प्रसन्न हो रहा था वहीं दूसरी तरफ चंडीगढ़ के दो बड़े माल्स में जाने का मौका मिला. चंडीगढ़ के एलान्ते मॉल और मोहाली के नार्थ कंट्री मॉल जाने का. दोनों मॉल बहुत बड़े बड़े हैं. एक से एक ब्रांडेड शॉप. क्या नहीं है इन माल्स में. नहीं है तो किताब की कोई दुकान. यह बहुत आश्चर्य में डालता है. मॉल कल्चर से पहले चंडीगढ़ में 17 सेक्टर के मार्किट का दबदबा रहा है, जहाँ आज भी किताबों की कई दुकानें हैं. लेकिन नई संस्कृति की आमद ने किताब के उस कल्चर से छुटकारा पा लिया है. 17 सेक्टर के मार्किट में किताब की दुकानें आज भी हैं. वहां हिंदी की भी नई नई किताबें देखने में मिली. लेकिन वहां अब जाता कौन है?
अब समझ में आया कि क्यों वहां सजा के रूप में किताब बाँटने के लिए कहा जाता है? पंजाब, चंडीगढ़ में अब कोई किताब पढना ही नहीं चाहता.
-प्रभात रंजन

