नायरा वहीद एक अफ्रीकी-अमेरिकी कवयित्री हैं। वहीद के ‘नमक’ और ‘नजमा’ नाम से दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। दोनों संग्रह नस्लवाद, महिला-विरोधी और ज़ेनोफ़ोबिया जैसी ताकतों के खिलाफ एक शांत धर्मयुद्ध करते हैं। वहीद अपनी नन्ही-नन्ही कविताओं में हमें पुकारतीं हैं, बहुत कम शब्दों में हमें बतातीं हैं कि वो क्या है जो हमें खुद से दूर ले जा रहा है, वे भोर की किरन की तरह हमारी जिन्दगी में उजियारा भरती हैं। जीवन का पुनर्मूल्यांकन करतीं ये कविताएँ खोल में लिपटे पूर्वाग्रहों, धारणाओं और भावनाओं को आहिस्ता से अलग करतीं हैं और हमें हमारे वजूद का अहसास करातीं हैं। भोजन में नमक की तरह ये कविताएँ लाखों-करोड़ों पाठकों के जीवन में अहम भूमिका निभा रहीं हैं जैसा कि अमेरिकी कवयित्री ऑड्रे लॉर्ड का भी कहना है: “कविता सिर्फ एक लक्जरी नहीं है यह हमारी जरूरत भी है।”
इन्स्टाग्राम पर बेहद लोकप्रिय इस कवयित्री के तीन सौ करोड़ से अधिक प्रशंसक हैं और ताज्जुब की बात यह है कि इतनी प्रसिद्धि के वावजूद किसी भी सोशल साईट पर उनका कोई एकाउंट नही और न ही उनकी कोई तस्वीर है| वर्जनाओं से निकलकर सतर्क और सचेत हो रास्ता ढूँढती वहीद की कविताएँ अफ्रीका के अलावा और कई देशों के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल की गयीं हैं| नायरा अंग्रेजी भाषा में लिखतीं हैं उनकी कुछ कविताओं के हिंदी अनुवाद नीता पोरवाल द्वारा-

