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  • कुशाग्र अद्वैत की कुछ नई कविताएँ

    कुशाग्र अद्वैत बीएचयू में बीए के छात्र हैं और बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं। उनकी कुछ नई कविताएँ पढ़िए-
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    चाहना
     
    जो आवाज़ देगा
    वो चाहेगा
    आप पहुँचे
     
    जो पुष्प देगा
    वो चाहेगा
    आप खिल उठें
     
    जो घड़ी देगा
    वो चाहेगा
    आपका वक़्त
     
    जो जूते देगा
    वो चाहेगा
    आप चलें उसके साथ
    दो पग
     
    जो किताबें देगा
    वो चाहेगा
    आप किताबों में ही
    ना उलझे रहें
    उसकी आँखों को भी पढ़ें
     
    जो देह देगा
    वो सामान्यतः
    नहीं चाहेगा
    कि आप देह के ऊपर उठें कभी
     
    जो पानी देगा
    वो चाहेगा
    आपको प्यास
    विकल ना करे कभी
     
    जो खाना देगा
    वो चाहेगा
    जब कभी भूख लगे
    आप सबसे पहले
    उसे ही याद करें
     
    2 जनवरी, 2020
     
     
    मुश्किल
     
    तुम मुख्य गायिका नहीं हो
    न होना चाहती हो
     
    दाँत तले होंठ दबाती हो
    माइक के पीछे मुँह छिपाती हो
     
    चार और लड़कियों संग
    कोरस में गाती हो
     
    तमाम साज़ों की धुन में
    इंतिहाई घुल मिलकर
    तुम्हारी आवाज़ आती है
     
    कितना मुश्किल होता है
    इतनी आवाज़ों में
    एक अदद
    तुम्हारी आवाज़
    ― सुनना
     
    ************************
     
    दुनिया बीहड़ जंगल है
    और, तुम बहुत ज़िद्दी हो
     
    बार-बार कहता हूँ
    एक नहीं सुनती हो
    नँगे पाँव बढ़ती हो
    सहसा कुछ चुभता है
    “आ….ह”
    चीख ही पड़ती हो
     
    ओ! मेरी दिलरुबा
    तुमको कहाँ होगा पता?
     
    कितना मुश्किल होता है
    गुलाबी मदहोशी में
    ख़्वार होता,
    तुम्हारी शरण गहता
    एक दीवाना काँटा
    ―चुनना
     
    22 फरवरी, 2020
     
     
    कॉल करो जानां
     
    फिर वैसे ही
    शहर भर की बिजुली गुल है,
    मन बहुत टूटा-टूटा है,
    पीछे बहुत कुछ छूटा-वूटा है,
    इस अनजान शहर में
    सर टिका दो पल रो सकूँ
    ऐसा कोई शाना नहीं है,
    ऐसा कोई सहारा नहीं है
    आज आकाश में दूर तलक
    एक भी तारा नहीं है,
    मुझको कॉल करो जानां,
    मुझको कॉल करो
     
    अच्छा, कॉल करो
    और कर के कह देना
    “गलती से चली गई थी।”
    प्रीत अकेली को चाक पर रख
    सारी बुद्धि को ताक पर रख
    मैं मान लूँगा तुम्हारा हर कहा―
    जस का तस―
    मान लूँगा कि तुमसे हो सकती हैं―
    ऐसी दिलफ़रेब गलतियाँ
     
    वही वक़्त है
    रात के तीन बजे हैं,
    कच्ची नींद जागा हूँ
    एक अजीब सपना देखा अभी ―
    कोई जादूगर है
    जिसने नज़्मों की किसी किताब में
    लुका दी हैं तितलियाँ
    ऐसा ही और भी बहुत कुछ
    बिल्कुल बेमतलब का
    तुमको था बताना―
    जैसे अब भूख नहीं लगती उतनी,
    प्यास का कोई अंत नहीं,
    गला रुँध-रुँध आता है अक्सर,
    दो प्रकाशक लौटा चुके हैं किताब की पांडुलिपियाँ,
    कुछ नई प्रेम कविताएँ उतरी परसों ही,
    तुम्हारे होंठ का स्वाद नहीं भुला पा रहा,
    किसी से मिलने गया था अस्सी
    तुम बहुत याद आई थी, सच्ची!,
    एक प्यारी सी लड़की आई है दफ़्तर में
    उसका नाम भी ‘स’ से ही शुरू होता है,
    आजकल, माँ की देह में बड़ा दर्द रहता है,
    इधर बीच, बहुत खरीदारी करने लगा हूँ–
    फैब इंडिया से एक बादामी शर्ट ली है
    वुडलैंड से एक भूरा जूता,
    तुम्हीं मिलाओ न मेरा नम्बर
    अब मुझमें नहीं रहा बूता
     
    और तुमको क्यों चाहिए
    मई की तेरह तारीख* का बहाना,
    मुझको कॉल करो जानां,
    मुझको कॉल करो
    कि आज मन बहुत टूटा-टूटा है,
    पीछे बहुत कुछ छूटा-वूटा है
     
    दिसम्बर, 2019
     
    *मई की तेरह तारीख को मेरा जन्मदिन है
     

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