सत्यजित राय की जयंती पर उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ की याद

आज महान फ़िल्मकार सत्यजित राय की जयंती है। आज से उनकी जन्म शताब्दी वर्ष का आरम्भ हो रहा है। उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ के बहाने उनको याद किया है विजय शर्मा जी ने- मॉडरेटर

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आज महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजित राय का जन्मदिन है। आज से उनकी जन्म शताब्दी भी प्रारंभ हो रही है। सत्यजित राय ने छोटी-बड़ी करीब तीन दर्जन फ़िल्में बनाई। उनकी पहली फ़िल्म ‘पथेर पांचाली’ ने भारतीय सिनेमा को विश्व सिनेमा की श्रेणी में ला खड़ा किया। उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री भी बनाई और खुद उन पर कई डॉक्यूमेंट्री बनी हैं। राय ने साहित्याधारित कई फ़िल्में बनाई। वे रवींद्रनाथ के शांतिनेकेतन में शिक्षित हुए और इस काल को अपना एक सर्वोत्तम काल मानते हैं। उन्होंने गुरुदेव के साहित्य पर फ़िल्में बनाईं। निर्देशक सत्यजित राय ने रवींद्रनाथ की तीन कहानियों पर उनकी जन्म शताब्दी पर फ़िल्म बना कर कविगुरु को श्रद्धांजलि दी। फ़िल्म का नाम है ‘तीन कन्या’। कन्या का अर्थ लड़की, स्त्री और बेटी होता है। इंग्लिश में इसे ‘थ्री डॉटर’ कहा गया है।

ये तीन फ़िल्में हैं, ‘पोस्ट मास्टर’, ‘मणिहारा’ तथा ‘समाप्ति। ‘पोस्ट मास्टर’ और ‘समाप्ति’ आपको किसी अन्य लोक में ले जाती हैं। ‘मणिहारा’ अन्य मिजाज की कहानी और फ़िल्म है। मेरी समझ से बाहर है, राय ने इसे इस त्रयी में क्यों समाहित किया। देश के बाहर अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए दो फ़िल्में ‘पोस्टमास्टर’ और ‘समाप्ति’ ही रिलीज हुई और उन्हें ‘दुई कन्या’ या ‘टू डॉटर’ ही कहा गया है। पहली फ़िल्म में शहर कलकत्ता से युवा पोस्टमास्टर नंदलाल (अनिल चैटर्जी) छोटे-से गाँव उलापुर आता है। एक बालिका रतन (चंदना बैनर्जी) उसका काम करने – खाना बनाने, कपड़े धोने और घर-बरतन साफ़ करने के लिए है। आज चाइल्ड लेबर की बात होती है लेकिन कुछ समय पहले तक ऐसी बातें आम थीं, आज भी घरों में लड़कियों को सारा काम करते देखा जा सकता है। रतन अनाथ है, पिछला पोस्टमास्टर उसे डाँटता-मारता था। गाँव का एक पगला आदमी पोस्टमास्टर के लिए भयभीत करने वाला व्यक्ति है, मगर रतन उसे सहज भाव से लेती है और उसे हानि रहित मानती है। समय के साथ धीरे-धीरे पोस्टमास्टर और रतन में एक बड़ा प्यारा संबंध विकसित होता है, वह उसे अपनी छोटी बहन मान कर बड़े भाई की तरह अक्षर ज्ञान कराता है। इसी बीच नंद को मलेरिया हो जाता है इस कठिन समय में रतन उसकी जी-जान से दिन-रात सेवा करती है।

उसकी सेवा और लगन देख कर किसी भी उम्र की स्त्री को माँ की संज्ञा देना उचित लगता है। बंगाल में लड़की को माँ पुकारने का रिवाज भी है। इसे देखते हुए उसी काल के एक अन्य महान रचनाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के लेखन का स्मरण हो आता है। और लो! बाद में जब मैंने रवींद्रनाथ की 1891 में लिखी यह कहानी पढ़ी तो आप भी टैगोर की पंक्तियाँ देखिए, ‘बालिका रतन अब बालिका न रही। उसी क्षण उसने जननी का स्थान ले लिया। वैद्य बुला लाई, वक्त पर दवा की टिकिया खिला दी, रात भर सिरहाने जागती बैठी रही, खुद ही जा कर पथ्य बना लाई, और सौ-सौ बार पूछती रही, ‘क्यों दादा, कुछ आराम पड़ता है?’ (काबुलीवाला तथा अन्य कहानियाँ, अनु. : प्रबोध कुमार मजुमदार, हिन्द पाकेट बुक्स) टैगोर मात्र दो पात्र और सामान्य ग्रामीण परिवेश में विलक्षण सृष्टि करते हैं। साधारण को असाधारण बना देते हैं। सत्यजित राय फ़िल्म में एक कदम और आगे जाते हैं, जब पोस्टमास्टर कुनैन की गोली खाने से इंकार करता है क्योंकि यह उसे कडुवी लगती है तो रतन स्वयं एक गोली उठा कर बिना पानी के चबा-चबा कर खा कर दिखाती है। लगता है, माँ अपने छोटे से बच्चे को बहला-फ़ुसला कर दवा खिला रही है। ऐसी मार्मिक कहानी है यह और ऐसी ही मार्मिक फ़िल्म है। अनाथ को सहारा मिलता है, घर से दूर रहते पोस्टमास्टर को छोटी बहन।

लेकिन स्वस्थ होने पर पोस्टमास्टर गाँव छोड़ने का निश्चय करता है तबादले के खारिज हो जाने पर वह नौकरी छोड़ कर जाना तय करता है। नए पोस्टमास्टर को चार्ज दे कर चलने की तैयारी करता है। रतन पर क्या गुजर रही है जिस दृष्टि से वह पोस्टमास्टर को देखती है शायद पहली बार उसे रतन का अपने प्रति प्यार समझ में आता है। लेकिन वह चला जाता है। जाते-जाते वह रतन को कुछ रकम देना चाहता है जिसे वह नहीं लेती है। फ़िल्म यहीं समाप्त हो जाती है लेकिन टैगोर लिखते हैं, ‘पथिक के उदास हृदय में इस सत्य का उदय हो रहा था, ‘जीवन में ऐसी बिछडने कितनी ही और आएँगी, कितनी ही मौतें आती रहेगी, इसलिए लौटने से क्या फ़ायदा? दुनिया में कौन किसका है?’

‘किंतु रतन के मन में किसी सत्य का उदय नहीं हुआ।…उसके मन में क्षीण आशा जाग रही थी शायद दादा लौट आवें।…’ टैगोर कुछ शब्दों में बता देते हैं, पढ़ा-लिखा शहरी व्यक्ति अपनी हर बात, हर काम का औचित्य खोज लेता है। मगर ग्रामीण, सरल हृदय बालिका इन तर्कों, इन प्रपंचों को नहीं जानती है। फ़िल्म नंद के मन की कचोट को दिखाती है और यह कचोट दर्शक के मन की कचोट बन जाती है। फ़िल्म उस समय के बंगाल को साकार करती है। सेट्स, ड्रेस, भाषा, संवाद, अभिनय सब मिल कर फ़िल्म को सजीव बनाते हैं। टैगोर अपनी कहानी में अंत की ओर दार्शनिक हो जाते हैं, फ़िल्म मार्मिकता पर समाप्त होती है।

पोस्टमास्टर की भूमिका करने वाले अनिल चैटर्जी को निरंतर चिंता रहती थी कि कोई उनके काम को तो देखेगा ही नहीं क्योंकि रतन ने इतना अच्छा कार्य किया था। फ़िल्म का अंतिम दृश्य बहुत मार्मिक बन पड़ा है। करीब-करीब शब्दहीन यह दृश्य दोनों के संबंध की पराकाष्ठा है। यह दृश्य कथानक और मार्मिकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है साथ ही कैमरा कार्य तथा एडीटिंग का भी नायाब नमूना है। सोने पर सोहागा है पूर्वी बंगाल के दो शरणार्थियों द्वारा बजाया गया संगीत वाद्य। रतन पानी भर कर ला रही है, नया पोस्टमास्टर और पुराना पोस्टमास्टर आते-जाते एक-दूसरे को क्रॉस करते हैं। नंद नाव की ओर जा रहा है। एक ओर आते-जाते लोगों से बेखबर पगला उकडूँ बैठा हुआ है। रतन रो रही है, लेकिन उसका आत्मसम्मान नंद के दिए पैसे लेने से इंकार कर देता है, वह आहत है। वह तो उन्हें देखने के लिए रुकती भी नहीं है। कुछ दूर जा कर वह हाथ के बोझ को बदलने के लिए पानी जमीन पर रखती है तब जाते पोस्टमास्टर को देखती है। वह ओझल हो जाती है मगर नंद को उसकी आवाज सुनाई देती है, ‘मैं तुम्हारे लिए पानी ले आई हूँ।’ असल में वह नए पोस्टमास्टर को कह रही है। तब जा कर नंद की भावनाएँ उमड़ पड़ती हैं, वह अपनी हथेली पर रखे सिक्कों को देखता है और उसे उनकी व्यर्थता का भान होता है। वह उन्हें जेब में रख कर धीरे-धीरे आगे बढ़ जाता है, रतन, पगले और गाँव को पीछे छोड़ता हुआ। हृदय के एकाकीपन के विषय में इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है, और कैसे दिखाया जा सकता है?

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