और उन्हीं गहराइयों में उतर गए कैफ़ी

—संगीता  ने यह संस्मरण कैफ़ी आज़मी के मई 2002 में निधन के बाद लिटरेट वर्ल्ड के लिए उन पर केंद्रित विशेष अंक के लिए लिखा था। आपके लिए प्रस्तुत है- 

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कैफ़ी आज़मी (1919-2002) (चित्र साभार विकीपीडिया)

23 दिसंबर, 2000 का दिन। तक़रीबन बारह बज कर 10 मिनट के आस-पास का समय रहा होगा। 23, अशोक रोड, नई दिल्ली। शबाना आज़मी का सांसद आवास। मुख्य द्वार पर खड़े कुछ गार्ड। और सामने ही एक कॉट पर खाकी चादर ओढ़े हुए ‘अब्बा’। हाँ, वहाँ हर कोई अब्बा ही तो बुलाता था उन्हें। और किसी अखबार का रिपोर्टर जो एक छोटे रिकार्डर में उनके लफ़्ज़ों को लगातार समेटने की कोशिश कर रहा था। पर ‘अब्बा’ की काँपती ज़बान, टूटते लफ़्ज़ों को लगातार जोड़ने के क्रम में थक कर लड़खड़ाने लगी थी।बीमार तो वे पहले ही थे।

बरामदे में उनका कॉट कुछ इस तरह लगाया गया था कि उनके शरीर पर जाड़े की सुखद धूप छन कर पड़ रही थी। वहीं उनके खटिये के साथ लगा चौड़ा सा पाया उनके चेहरे की धूप रोके खड़ा था।

गार्ड से मैंने बताया कि मेरा आज कैफ़ी साहब से साक्षात्कार के लिए बारह बजे का समय तय हुआ था। उसने मुझे शबाना आज़मी की निजी सहायिका तृप्ति के कमरे में बैठने को कहा। वहाँ तृप्ति जो लगातार बोले जा रही थी, मेरा तक़रीबन संक्षिप्त बायोडाटा जान लेने के बाद बताती रहीं… ‘अब्बा’ (कैफ़ी आज़मी) ऐसे ग़ुस्सा करते हैं। कई बार बच्चों की तरह रूठ जाते हैं। और जब रूठ जाते हैं तब दीदी (शबाना) उन्हें कैसे मनाती हैं। मनाने की बात पर मेरे जेहन में शबाना की फ़िल्मी तस्वीर उभर आई… अपने अब्बू को मनाती हुई शबाना। तृप्ति ने बक़ायदा शबाना के ‘अब्बू’ को मनाने की शैली हू-ब-हू बताने की कोशिश की। बातों-बातों में तृप्ति ने बताया कि ‘अब्बा’ से बात करने वाला रिपोर्टर तक़रीबन दो घंटे से बातें कर रहा है।

लगभग घंटे भार बाद कैफ़ी साहब उस रिपोर्टर से निबट गए। और मेरी बारी आ गई। मैं तब ‘दैनिक भास्कर’ अखबार के लिए ‘शख़्सियत’ स्तम्भ की ख़ातिर उनका साक्षात्कार लेने गयी थी। मैं गयी उनके पास। वहीं पड़े लकड़ी के छोटे स्टूल पर बैठ गयी। ‘अब्बा’ लफ़्ज़ मैंने तृप्ति से इतनी बार सुन लिया कि मैं भी उन्हें ‘अब्बा’ ही बुलाने लगी। थकी आँखों से मुझे देखते हुए लगभग काँपती ज़ुबान से मुझसे पूछा — ‘क्या बात है’? मैंने कहा, ‘अब्बा, मुझे आपका इंटरव्यू चाहिए।’ सुनते ही वे उखड़ पड़े। उन्होंने कहा, ‘पर आपने मुझसे समय नहीं लिया। मैं आपको इंटरव्यू नहीं दूँगा।’ मैंने कहा, ‘मुझे आपकी निजी सहायक ने आज बारह बजे का समय दिया था।’ उन्होंने कहा, ‘मैं इंटरव्यू नहीं देता।’ और बिल्कुल बच्चों की तरह अपना चेहरा बिल्कुल उल्टी तरफ फेर लिया। अब मेरी समझ में आना बंद हो गया कि मैं करूँ तो क्या करूँ? इतने बुजुर्ग और अपने से कई गुना बड़े व्यक्ति जिसने आज बिल्कुल बच्चों की तरह रूठ कर मुझसे अपनी शक्ल तक फेर ली है उन्हें किस तरह से व्यवहार करूँ। उन्होंने तो क्षण भर में मुझे इतना क़रीब समझ लिया। मुझसे रूठने तक का अधिकार पा लिया। पर मैं तो वाक़ई उलझ गयी। अपनी जद्दोजहद से जूझ ही रही थी कि वो मेरी तरफ मुख़ातिब हो कर उर्दू ज़ुबान में कुछ कहने लगे। जब वे मुझसे कुछ कह रहे थे तब मैं उनके चेहरे की सिलवटों को गिन रही थी। उनकी आँखों की छोड़ पर जम गए कीचों को देख रही थी। उनके मुँह से ढलक आए लार, जो जाने कब से सूखे पड़े थे, उनमें जगह जगह पतली दरारें बन गई थीं। सफ़ेद बिखरे बालों और हिलते हुए ज़ुबान को अपनी ही भाषा में पढ़ने की कोशिश कर रही थी। उन्हें जवाब नहीं मिलने पर, उन्होंने मेरी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा और कहा —‘आपको मेरी ज़ुबान समझ में आ भी रही है या, या मैं आपके लिए कोई और ज़ुबान बोलूँ।’ मैं हड़बड़ा गयी, और… ‘जी, जी ‘अब्बा’! समझ रही हूँ’। ‘चलिए इंटरव्यू ना सही पर ख़ुदा का शुक्र है कि मुझे सुबह-सुबह एक बेहद हसीन चेहरा तो देखने को मिला।’ मुझे ज़ोर से हँसी आई। पर सिर्फ मुस्कुरा ही पाई। कहीं और जोर से उन्हें ग़ुस्सा न आ जाए, कुछ कहने के पहले इस बात की भारी हिचक थी। मेरे सामने ही मेरे साथ आए फ़ोटोग्राफ़र जिसने बग़ैर पूछे उनकी तरफ अपना कैमरा तान दिया था। बड़ी जोर से डाँटा था ‘अब्बा’ ने उसे। फिर भी अपनी पूरी हिम्मत बटोर कर हमने कहा कि अब्बा पाँच-दस मिनट ही मुझसे बात कर लीजिए न। झुँझलाते हुए वे थोड़े तैयार हुए। ‘पूछिए!’

‘बचपन की कोई ऐसी बात जो आपको आज भी याद करके अच्छा लगता हो?’

(चिढ़कर) ‘बिस्तर में पेशाब कर देता था।’

‘वर्ष 2000 की क्या चीज़े आपको बहुत याद आएँगी’

अनजाने ही कहीं दुखती रगों को छेड़ दिया था मैंने। उनका सारा ग़ुस्सा, सारी चिढ़ यकायक जाने कहाँ चली गयी। बिल्कुल शांत हो गए वे। कहीं डूबते हुए उन्होंने बोलना शुरू किया। ‘अली सरदार जाफ़री की मौत!’ कितनी गहराई से उनके ये पाँच लफ़्ज़ निकले थे, उस गहराई को माप पाना कम से कम मेरे बूते की बात नहीं थी। वे आगे कहते चले गए ‘उसकी मौत ने मुझे पूरी तरह अपाहिज कर दिया। मेरी ये बीमारी भी ठीक थी, पर उसकी मौत ठीक नहीं थी। बिल्कुल अकेला हो गया हूँ मैं। पता है? मेरी बच्ची को शबाना नाम जाफ़री ने ही दिया था। शबाना को जान से ज़्यादा चाहते थे।’ और आँखों की कोर से दो छोटी पर भारी बूँदे ढलक पड़ीं। आगे वे कुछ नहीं कह पाए।

…कहीं गहरे डूब जाना चाहते थे वे। और मुझे ऐसा लगा कि अब वे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने मित्र जाफ़री से अकेले में बातें करना चाहते हैं। उनकी गहरी ख़ामोशी बता रही थी कि वे वहाँ हो कर भी नहीं थे।

मेरा उनसे साक्षात्कार पूरा नहीं हो पाया। पर कैफ़ी और इंतजार नहीं कर पाए। और खुद ही उतर गए पूरी तरह से उन्हीं गहराइयों में जहाँ उनके अगाध मित्र अली सरदार जाफरी उनका तक़रीबन दो साल से इंतज़ार कर रहे थे।

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