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  • अविमुक्त क्षेत्र (काशी) के  मुक्त मेघों की प्रतीक्षा – भाग -1

     

    प्रियंका नारायण बीएचयू की शोध छात्रा रही हैं। मिथकों पर अच्छा लिखती हैं। इस बार उन्होंने गल्प में मिथकीय काशी से वर्तमान काल के काशी की यात्रा की है। काशी की एक स्त्री छवि देखिए।यह उनकी पुस्तक ‘घन बरसे’ का एक अंश है-

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    अविमुक्त क्षेत्र (काशी) के  मुक्त मेघों की प्रतीक्षा – भाग -१.

     

    “है अमानिशा, उगलता गगन घन अंधकार

    खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन- चार,

    अप्रतिहत गरज रही ‘सुरसरि’,

    भूधर ज्यों ध्यानमग्न,

    केवल जलती ‘मशान’…

     शृगालों की हनहनाहट, श्वानों के रुदन, बिखरे हुए गहरे कोटर वाले और उभरे जबड़ों वाले नर- मुण्डों की मेखला, तितर- बितर पसलियां, कहीं पस निकलता हुआ, कहीं गर्म ताजी लहू- कहीं सूख कर कत्थई पड़ गयी अब इस धूसर सान्द्र मिट्टी में सिमटी जा रही है। अधजली लाशों की चिरायंध के मध्य खोखले पड़ते जा रहे इन अगूंठों  से चूते हुए लिसलिसे हरे द्रव्यों से घिरा हुआ…अरे इधर- इधर दृष्टि करिए …ये दाहिना हाथ अब गिरने को ही  है…बचिए…हाथ लिसलिसाता- पिघलता- सा टपक पड़ता है.. जुगुप्सा में दो- एक कदम पीछे खींच जाते हैं। आँखें मुंद जाती है लेकिन जब खुलती है तो स्तब्ध होकर निर्निमेष भाव से सामने की प्रतिमा पर अटकी- सी रह जाती है।

     आत्मप्रलाप- कौन हैं ये ? कौन हैं ये जिसके अन्दर न जुगुप्सा है न भय। मध्य रात्रि का यह भयावना महाशम्शान भी जिसके अन्दर कोई विचलन, कोई भय उत्पन्न नहीं करता? कौन है ये जिसे अग्नि की ताप से झुलसती- पिघलती ये इस लोक से चन्द्र, सूर्य, ब्रह्म आदि विविध सप्तलोकों की यात्रा करने वाली ये प्रेतात्माएं भी भयाक्रांत करने का साहस नहीं करती? कौन है ये जो उल्लूक, टिटहरी और चामरों की पीन ध्वनि, चूर- चूर हो चुके नरमुंडों, पसों, मस्तष्क में मूर्च्छा का त्रास भर देने वाली इन गन्धों और धधकती-लपलपाती हुहुआती हुई ज्वालाओं, छिटकती हुई चिंगारियों के बीच भी निष्पंद है? कौन हैं ये जिनका यह महासौंदर्य इस महाश्मशान  में भी काम नहीं भक्ति को विह्वल कर रहा है? ये महातप, ये महातेज…क्या साक्षात् सरस्वती या या नहीं ..नहीं ये सरस्वती नहीं हो सकती? यह गेरुआ…कहाँ… मैं कहाँ आ गया… कौन है ये? क्या ये अविमुक्त क्षेत्र है? क्या..क्या ये वहीं पुण्य काशी क्षेत्र है जहाँ स्वयं महा…तो क्या…क्या ये पार्वती हैं? हाँ..हाँ ये देवी

    प्रतिमा पार्वती ही तो हो सकती है? उनके अतिरिक्त और कौन हो सकता है जो इस महाश्मशान के महातप को धारण कर सके? शिव की अर्धांगिनी के अतिरिक्त और किसका यह महासौन्दर्य हो सकता है? और कौन हो सकता है जो इन घनघोर घटाओं को विद्द्युलातिका से संयोजित कर सके। किसका ह्रदय वज्र का- सा हो सकता है जो ‘अपर्णा’ होकर भी केवल और केवल अघोर शिव से प्रेम कर सके ? उनके अतिरिक्त और कौन हो सकता है जिसमें पर्वतों की दृढ़ता हो! सत्य है, ये पार्वती के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकती…असंभव है इस महामूर्ति, महासौंदर्य के अन्दर किसी अन्य के प्राणों का विराजना। फिर …फिर ये आज यहाँ क्यों? किस हेतु ?

    सागर की भांति गंभीर ध्वनि – तुम्हारी प्रतीक्षा…तुम्हारे मेघों की प्रतीक्षा…

    अकस्मात् ही वायु वेगवान हो उठा। धधकती हुई ज्वालाएं तीव्रता से अपनी जिह्वा लपलपाती हुई नृत्य मुद्रा में आ गयी। हुहुवाहती हुई चक्राकार स्थिति का निर्माण करने लगी तो कभी चक्र को तोड़ती हुई भूमि का आलिंगन करती- सी लेट जाती, तो कभी अचानक- से खड़ी होकर पुन: ताल देने लगती। पट- पट की ध्वनि के साथ कुछ चिंगारियां  इधर- उधर बिखरने लगीं जैसे कोई बीच- बीच में कोई ताल टूट जाती हो या नृत्य करते- करते जोड़ों में इतनी पीड़ा हुई हो कि ध्वनि उत्पन्न करती हुई स्वयं को शून्य के साथ एकाकार कर लिया गया  हो…धुएं का रंग गहराने लगा था। सफ़ेद बादलों के बाद- गहरा काला…इनके मध्य महामूर्ति अभी भी निश्चल- निष्पंद थी लेकिन धूम को रमाये हुए उनके नेत्रों में कम्पन आरम्भ हो चुका था। कोई महाभयंकर विभ्राड आकृति उभरती चली जा रही थी। क्या है ये? ये क्या देख रहा हूँ मैं? ये नीलिमा कैसा? इस गहन अंधकारमय मेघों को छूता हुआ ये क्या उभर रहा है? विशालकाय, अनादि, अनंत…   ये नीलिमा कैसी है? ये शून्यता क्या है? कहाँ हूँ मैं? क्या यह सब सत्य है या मात्र स्वपन या भ्रान्ति…नहीं..नहीं या ये प्रत्यक्ष कोई माया या सम्मोहनकारी प्रभाव …नहीं त्राहिमाम रक्षा महाकाल…रक्षा महाकाल…

    देवि के नेत्रों का कम्पन बढ़ रहा था। वायु अपने वेग को भयंकर करती जा रही थी। उसकी खिसियाहट अपनी गर्जना में ललकार भर रही थी। श्मशान को घेरे हुए … अपनी लचक की माप करने लगे। ज्वालाओं का नर्तन बढ़ रहा था और अनुरूप लय का बिखराव और ताल की गति भी। शृगालों की हनहनाहट, चमगादड़ों की चीख, श्वानों का रुदन चरम पर पहुंच रहा था। गंभीर मेघ  अपनी ही गडगडाहट से फटने लगे। परस्परता के निर्वाह के हेतु सैंकड़ों बिजलियाँ एक ही साथ चमकती जीवन का अंतिम आलोक फैलाती हुई वसुंधरा पर उतरने लगीं। अविमुक्त क्षेत्र की सुरसरि अपनी लहरों के जाल को उछाल पछाड़ खाने लगी। संभवतः यदि महासमुद्र भी सामने होता तो गंगा की उद्विग्नता समाप्त कर देती। पंचक्रोशी के पर्यंक पर आज उसे भी स्थान चाहिए था । विशालकाय आकृति अपना स्वरुप गढती जा रही थी…  अमूर्त धीमे-धीमे मूर्त हो रहा था। आगंतुक की आँखें फटी रह गयी  तो क्या आज जो कैलास के स्फटिक निर्मित श्वेत राजमहलों की अधूरी इच्छा आज पूर्ण होने वाली है? हजारों वर्ष बाद… जिसकी आराधना में सर्वस्व गया, वह आज स्वयं ही … अघटित आज घटित हो रहा है।

    आगंतुक की स्थिति जड़ होती जा रही थी… जिह्वा तालु का साहचर्य खोज रहे थे…  न जाने रूद्र के ८४ वें गर्जन का आरम्भ है या अंत ?

    “धरा धरेन्द्र नंदिनीविलास बन्धु बन्धुर
    स्फुर द्दिगन्त सन्ततिप्रमोद मान मानसे
    कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि
    क्वचि द्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि

    जटा भुजंग पिंगल स्फुरत्फणा मणिप्रभा
    कदम्ब कुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्व धूमुखे
    मदान्ध सिन्धुर स्फुरत्त्व गुत्तरी यमे दुरे
    मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि..

    ********************************

    देवी के नेत्र पूर्णतया खुल चुके और आकृति भी पूर्ण हो चुकी थी। चार नेत्र एक दूसरे को पढ़ते हुए प्रफुल्लित थे। अंगों के पुलक, सात्विक स्वेद से आवृत मुस्कान की मधुरता में अपनी पूर्णता तलाश रहे थे। दोनों महामूर्तियों परस्पर प्रणम्य मुद्रा में झुकी ही थी कि देवी के स्मयीमान ओष्ठों और कृपा- कटाक्ष की वक्रता ने अपने कोणों को ज़रा- सा फैला दिया। सुरसरि की लहरों ने तट को जोर का धक्का दिया। भूमि प्रकम्पित हो उठी।

    देवी का हास्य सम्पूर्ण परिदृश्य में अनुनादित होता चला गया।

    आगंतुक की तन्द्रा टूट गयी। कोई संदेह कोई प्रश्न शेष न रहा। स्वयं को चिकोटी काटता हुआ साष्टांग की मुद्रा में भूमि पर गिर पड़ा– प्रणाम स्वीकार करे हे शुचिस्मिते ! स्वीकार करें माँ देवि… समर्पण स्वीकार करें धूर्जटि, धुरंधर, महाकाल, महाशिव…। हे हर! कर्णभूषणयुक्त मौलि के कंपन से विच्छेदित शिव के मणि से पवित्र, इन्द्र्नीलद्युति से श्रीयुत विष्णु के चक्र से निर्मित चक्रपुष्करिणी से शोभित मणिकर्णिका भूमि को प्रणाम। इस “सृष्टि के जरायुजादि चारों प्रकार के भूतग्रामों में आब्रह्म्स्तम्बपर्यन्त जो कुछ जन्तुसंज्ञक” है उनके मुक्तेश्वर और उनके मुक्तिधाम को शत-शत प्रणाम।  जिस भूमि पर “सांख्य, योग आत्मदर्शन, व्रत, तप दान आदि के बिना ही प्राणियों का कल्याण होवे”, “शशक, मशक, कीट, पतंग, तुरग, उरग इत्यादि भी जहाँ निर्वाण को प्राप्त करते हैं” उसके शिव- शिवा मेरे प्रणिपात को स्वीकार करे…

    वत्स! कैलासपुरी कैसी है? वहाँ का हिमाच्छादित स्फटिक महल कैसा है? हमारी क्रीड़ाभूमि कैसी है? मानसरोवर कैसा है? वहाँ के श्वेत राजहंस कैसे हैं? अग्नि का अंशि वह वह श्वेतवर्णी कपोत कैसा है? उस आलिन्द का हाल कहो – पार्वती के संग- रमण में जहां वह बैठा था? कृतिकाओं का हाल कहो? कुछ पता दो मेरे नीलकंठ धाम का? कहो, कहो विज्ञ! तुम्हें तो सब ज्ञात होगा?

    गहरा मौन…धूर्जटि का नि:श्वास….

    अभी-अभी खड़ा हुआ आगंतुक नि:श्वास के वेग से संभल नहीं पाया…धम्म से भूमि पर गिर पड़ा। उस नम नि:श्वास को समेट कर मुक्त कर देने के भाव से सुरसरि एक बार फिर खौल उठी। अपनी लहरों को उछाल कर  हर के जटाओं का पर मोतियों- से शुभ्र बूंद बिखेर दिए। इठलाती हुई पार्वती पर दृष्टि डाली। शिव ने संकेत कर गंगा को शांत को शांत होने का निर्देश दिया।

    श्यामवर्णी  मौन कृष्णवर्णी  होता चला गया…एक घटि समयांतराल के पश्चात् लदे हुए क्षणों ने पाँव आगे बढ़ाये …

    वत्स! “स्मृति” और “कल्पना” प्रकृति के दो महाशक्तियों के कृपापात्र रहे हो तुम! प्रकृति ने तुम्हें  ही अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। उसके वाहक हो तुम। जानते भी हो? आज तुम्हारे आगमन की सूचना पाकर ही शुभनेत्रे, शुचिस्मिते पार्वती का आगमन हुआ है और उसके पश्चात् की क्रियाओं को तुमने देखा ही है और तुम्हें यह भी ज्ञान होना चाहिए कि इन सभी पंचभूतात्विक सूक्ष्म, स्थूल, स्थावर या जंगम तत्वों को जानने, परखने, महसूसने, उससे संवेदित होने और उसको मूर्त करने का सर्वप्रथम अधिकार प्रकृति ने तुम्हें दिया है। तुम्हें याद होना चाहिए कि इस नाद-ब्रह्म सृष्टि के जनक तुम ही हो। इस सृष्टि के मार्गदर्शक तुम्हीं हो। तुम एक साथ ब्रह्मांड, प्रकृति, मेघ, बिजली, महासागरों, नद- महानदों, पर्वतों, पठारों, ज्वालामुखियों, जंगलों, महादेशों, देशों, समाज, पतितों, दलितों, स्त्रियों, किसानों, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष सबके उद्धारक हो। सूश्मतिसूक्ष्म कीट से लेकर वृह्द्काय ८४ ब्रह्मांड, रूद्र से लेकर ब्रह्मा तक, सीमान्त से शिखर, अनादि से अनंत तक सब तुम्हारी सीमा के अन्दर है। ‘पूर्णत्व’ तुम्हारी धरोहर है फिर यह क्षुद्रता क्यों?

    सभी कलाओं में अग्रणी हो तुम! वैयाकरण भी अपना स्फोट तुम्हीं में पाता है। सृष्टि अपना नाद- ब्रह्म तुमसे ही प्राप्त करती है।

    वत्स! स्वयं मेरा नटराज स्वरूप तुमसे ही तो लास्य लेता है। यहाँ तक कि पार्वती के लास्य- लालित्य हेतु भी मैं  तुम्हारा ही ऋणी हूँ। जानते हो क्यों?…बोलो…नहीं जानते तुम! क्योंकि उसके नूपुरों की झंकृति तुममें विराजती है। जाह्नवी अपनी कल-कल, छल- छल, तुमसे ही लेती है। कार्तिकेय के धनुष की टंकार तुमसे ही उत्पन्न है तो गणेश की बुद्धि के जनक भी तुम ही हो। सागर का गाम्भीर्य तुम हो, मेघों की गर्जना तुम हो, युद्धों का कोलाहल तुमसे ही स्वरूप पाता है तो किसी अरण्य प्रदेश में निर्झरिणी से जन्मी शिशु नदी के समीप संध्याकालीन रक्तिम सूर्यगोले को देख प्रोषित- पतिका के कंठों का आश्रय पाने वाले अश्रुमिलित गीत भी तुम ही हो। किसानों के धनखेतों के कोकिल स्वर( बुवाई के गीत) हो तो ‘धनबट्टी’ के मधुरिम ताल भी तो तुम ही हो न? आल्हा की ललकार भी तुम हो और सती का आत्मदाह भी तुम ही हो। हे वत्स! ‘सामान्य’ मनुष्य के जीवन में तीन ही तो अवसर है और उन तीनों के रंग भी तो तुम ही हो। सोहर, विवाह और मातमी… तुमसे पार कहाँ। अब बताओ, इस सृष्टि का कौन-सा कण या अवसर है जो तुमसे पृथक है?

    हर के कंठ अब तक वाष्पारुद्ध होने लगे थे। मौन ने अपनी साधना पुनः शुरू की, कुछ इस तरह कि क्षणों के श्वास उखड़ने लगें…।

    हर के नेत्रों की झिलमिलाहट देख चिताओं की मद्धम पड़ रही सिंदूरी ज्वालाओं के मध्य तप्त ताम्र रंग को ओढ़ती हुई पार्वती प्रत्यक्ष हुईं-

    तुम्हारी विरक्ति, तुम्हारे विमुखता को देख विचलित हूँ मैं। तुम्हारे मौन, तुम्हारे प्रयाण ने जब मुझे विचलित कर दिया है तो तो हे विज्ञ! इस विचलन से सहज ही भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं। विज्ञ! अंततः शिवा ही शिव की शक्ति, स्थिरत्व और केंद्र है। यह आप भलीभांति जानते हैं। मेरा विचलन उनके अन्दर विक्षोभ उत्पन्न करेगा और उनका विक्षोभ अंततः प्रलयंकारी तांडव को जन्म देगी। …वत्स! समयाभाव है। अब तुम्हीं निश्चित करो कि इस प्राचीन ब्रह्माण्डीय शक्ति के लौकिक रूपांतरण के इस काशी यंत्र का स्थिरीकरण करोगे या इसके विनाश के साथ ही विश्व प्रलय का आमंत्रण स्वीकार करोगे? मानव अपने  मस्तिष्क का सर्वोत्तम परिष्कार प्राप्त करे। उसकी क्षमता उसे जीवन से जीवनेत्तर तक के स्पंदन की अनुभूति- यात्रा में सहयोग दे सके। जीवन हेतु सर्वोच्च कलाओं  और जीवनेत्तर के लिए दर्शन व आध्यात्म – सर्वश्रेष्ठ को प्राप्त कर जीवन के सूक्षातिसूक्ष्म स्पंदनों का अनुसन्धान और ब्रह्मांड की सर्वोत्तम शक्तियों का संकेंद्रण ही इस काशी यंत्र का लक्ष्य था। बुद्ध, पार्श्वनाथ, आर्यभट्ट, शंकर, वल्लभ, चैतन्य, रमानंद, कबीर, रैदास, तुलसी, थियोसोफ़ी किसने नहीं छुआ। किसकी लालसा यहाँ अधूरी रह गयी। विज्ञ! तुम्हारे आधुनिक ऋषि आइंस्टीन क्या कहते हैं – पूर्व के गणित के बिना पश्चिम एक पग भी नहीं धर सकता। जिसने काशी को छुआ और जिसे काशी ने छुआ…

    देवि की वाणी भी रुद्ध होने लगी थी…

    आगंतुक – अवाक्! मौन…स्तब्ध….नेत्र धूमायित होने लगे…अश्रुओं के प्रचंड प्रवाह ने नेत्रों को धूम से तो मुक्त कर दिया लेकिन सब कुछ उस प्रव्हा में धुंधला होता हुआ डूब- सा गया। उधर कंठ के तार भी ज्यादा कसे जाने के तनाव को सहन न कर पाने से यकायक टूट कर फटी हुई ध्वनि बिखेरने लगे।

    मशान रुदन से दहलने लगा था लेकिन अबकि वह भी समझने में असमर्थ था कि यह घटाओं को भी प्रकम्पित कर देने वाला रुदन किसका है? मृत शरीर तो है ही नहीं। फिर स्वयं महाकाल और देवि की उपस्थिति में यह मूर्ख इस तरह विन्ध्याट्वी को दहला देने वाला रुदन क्यों कर रहा है? इस मूर्ख का किससे बिछोह हो गया कि देवि के समक्ष भी अपनी निर्लज्ज रुदन का प्रदर्शन कर रहा है? …मूर्ख कहीं का..

    देवि ने वाष्पित दृष्टि महादेव पर डाली। मुंदे हुए शुभ नेत्रों से अश्रुओं की धार चल पड़ी थी। देह प्रकम्पित हो उठी लेकिन मुद्रा अभी भी समाधिस्थ बनी हुई थी।

    धैर्य धारण करो विज्ञ! धैर्य धारण करो… देवी ने पुन: बोलना आरम्भ किया।

    तुम्हें स्मृत भी है कुछ पूर्व का या सब विस्मृत हो चुका या पुत चुकी उन पर काल की राख? तुम्हें कनखल का वह क्षेत्र याद है…

    प्रत्युत्तर – मौन; …अच्छा इन्हें जाने दो? यह बताओ तुम्हें ‘कुटज’ के उन पुष्पों की याद है, जिन्हें अंजलि में संजोये हुए हुए बहुत जतन से किसी की अर्चना की थी तुमने और कुछ पठाया था तुमने?

    पुन: अचंभित और मौन दृष्टि… दृष्टि की शून्यता को लक्षित करती हुई देवि- इन्हें भी जाने दो। तुम्हें मालिनों के उन कर्णफूलों की याद है जो फूल चुनने के श्रम से उत्पन्न स्वेदों के गालों से बहने के कारण गंदले पड़ चुके थे?

    मौन …

    अच्छा, शिप्रा के वे तट तो तुम्हें याद होंगे न ? स्मरण है तुम्हें उज्जैनी के टेढ़े रास्ते? वहां के राजमहलों की चमक, स्त्रियों के चंचल कटाक्ष, निर्विन्ध्या नदी का विरह? राजा उदयन और महाराज प्रद्योत की प्यारी कन्या वासवदत्ता के हरण की कथा? और इनकी याद यदि न भी हो तो तुम्हें चण्डी के पति महाकाल की संध्या आरती की तो याद होगी न? वे तो तुम्हें प्राणों से प्रिय हैं, हैं न ? इन पदों को तुम्हीं ने रचा था न –

    “ भर्तु: कण्ठच्छविरिति गणै: सादरं वीक्ष्यमाण: पुण्यं ययास्त्रिभुवनगुरोर्धाम चण्डीश्वरस्य।

     धूतोद्यानं कुवलयरजोगन्धिभिर्गन्धवत्यास्तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतित्तैर्क्मरुद्भि।।३७।।

    “ अप्यन्यस्मिय्जलधर! महाकालमासाद्य काले स्थातव्यं ते नयनविषयं यावदत्येति भानु:।

      कुर्वन्सन्ध्याबलिपटहतां  शूलिन: श्लाघनीयामामन्द्राणां फ़लविकलं लप्स्यसे गर्जितानाम्”।। ३८

     तुमने ही अपने मित्र को यह संदेश दिया था न कि उज्जैयनी के भवनों की सजावट देखने के बाद तुम चण्डी के पति महाकाल के मंदिर की ओर चले जाना और यदि संध्या से पूर्व ही पहुंच गए तब तक रुकना जब तक कि महाकाल की संध्याकालीन आरती के बाद उनका तांडव नृत्य न आरम्भ हो जाए। सांयकालीन  लालिमा लेकर उन वृक्षों पर छा जाना जिससे महाकाल के हाथी की गीली खल ओढ़ने की मुराद पूरी हो सके। और तुम्हारी गर्जना से जब पार्वती डर जाए तो तुम क्षमा मांग लेना। तुमने ही षडऋतुओं का शृंगार किया था न! तुमने ही मेरे विवाह के गीत रचे थे और तुमने ही ‘कुमार’ के जन्म को हर, कपोत, कृतिका और गंगा के संयोग से संभव बनाया था। शकुन्तला का प्रेम भी तो तुमने ही जाना था न!

     स्मरण है तुम्हें कालिदास!… अपनी अल्कापुरी, वियोगिनी प्रियंगुलता  और मित्र मेघ की?

     वर्षों की साधना के बाद इस वर्ष पंचक्रोशी के मेघ घने हुए हैं – तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं कालिदास! तुम रचो! तुम गाओ! तुम उड़ो, तुम बरसो, तुम सधो… तुम सधोगे तो जग सधेगा…यह काशी सधेगी। सधेगी विद्या, सधेगी विद्वता और सधेगा साहित्य….प्रकृति का आवाहन करो कालिदास! मेघों का आवाहन करो! खेतों का आवाहन करो! विन्ध्याट्वी के अरण्य प्रदेश, धूल- कणों का आवहन करो।  कालिदास छायावाद के बाद ‘प्रकृति’ निगली जा चुकी है। कर सकोगे उसे जागृत …

    अश्रुमिलित मौन…

    धूर्जटि –

    “विचलित होने का मैं नहीं देखता कारण

    हे पुरुष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण

    आराधन का दृढ़ आराधन से उत्तर दो,

    तुम वरो विजय,  संयत प्राणों से प्राणों पर”

    कालिदास – समाधि की मुद्रा में ….

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    १. काशीखण्ड पुराण,

     २.पूर्वमेघ- मेघदूतम्,

     ३.कुमारसंभवम्,

     ४.ऋतुसंहारम्,

     ५.अभिज्ञानशाकुन्तलम्,

     ६.काशी की पांडित्य परम्परा,

     ७.काशी का इतिहास- मोतीचन्द्र,

    ८. राम की शक्ति पूजा- कुछ शब्द परिवर्तन के साथ

     ९.सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

     १०.राणा पी.बी. सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, भूगोल विभाग के शोध- पत्रों के अध्ययन के आधार पर।

    शेष घुमक्कड़ी और कल्पना का मिश्रण )

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    लेखिका संपर्क- kumaripriyankabhu@gmail.com

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