पूर्वोत्तर अब पराया नहीं रह गया

उमेश पंत युवा लेखक हैं और इसी साल इनकी यात्रा-पुस्तक आई ‘दूर दुर्गम दुरुस्त‘, जो पूर्वोत्तर यात्रा अनुभवों से उपजी पुस्तक है। हिंदी में पूर्वोत्तर को लेकर कम पुस्तकें लिखी गई हैं यह किताब उस कमी को दूर करने वाली है। राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित इस पुस्तक का एक अंश पढ़िए-

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छठा दिन

गुवाहाटी-शिलांग

14 फरवरी

सुबह-सुबह मैं अंकुर और शीला को अलविदा कहकर शिलांग लिए निकल गया। अंकुर ने कहा था कि शिलांग में अगर जरूरत पड़े तो शीला को फोन किया जा सकता है। आज उसे कोई काम था वरना वो भी साथ ही निकल पड़ती। शीला के पिताजी शिलांग में ही डिस्ट्रिक्ट पब्लिक इन्फ़र्मेशन और पब्लिक रिलेशन अफ़सर हैं। ये जानकारी थोड़ा सहज करने वाली थी। शिलांग में अब मेरे दो जानकार थे। दूसरे जानकार जिनके यहाँ मैं अभी जा रहा था वो थे मेरे दोस्त रोहित जोशी के जीजाजी और दीदी जो पिछले कुछ समय से शिलांग में रह रहे थे।

रोहित की दीदी हिमानी ने कई बार कहा था कि मुझे शिलांग घूमने आना चाहिए। आज ये मौका भी आखिर आ ही गया था। पलटन बाजार में सुबह के छह बजे भी चहल-पहल होने लगी थी। शिलांग के लिए गाड़ी कहाँ से मिलेगी ये पूछने पर उस दुकानदार ने सड़क के दूसरी तरफ़ खड़ी एक टाटा सूमो की तरफ़ इशारा किया। उसने ड्राइवर को आवाज लगाई और मुझे सड़क के दूसरी तरफ भेज दिया। मैं कुछ देखता-बूझता इससे पहले ही मेरा सामान सूमो की छत पर लद चुका था और मुझे सूमो की सबसे पीछे वाली सीट पर भेजा जा चुका था।

गाड़ी कुछ देर गुवाहाटी में सवारियाँ ढूंढती रही और फिर पैसेंजर्स के दबाव बनाने पर शिलांग के लिए निकल पड़ी। मौसम अच्छा था और कुछ आगे चलकर सड़क भी अच्छी हो गई। जोराबाट से सड़क शिलांग की तरफ मुड़ गई और बूँदाबाँदी वाले मौसम ने यात्रा की खुशनुमा बना दिया। बढ़िया फोर लेन सड़क पर गाड़ी रफ्तार से भाग रही थी कम ऊँचाई के पहाड़ों के बीच ये हाईवे खुबसूरत भी लग रहा था। बीच में कुछ एक जगह को चौड़ा करने का काम चल रहा था।

क़रीब ढाई घंटे बाद सड़क के दाईं तरफ एकदम नीले रंग की एक झील दिखाई दी। सहयात्रियों ने बताया कि ये उमियम लेक है, जिसे बड़ापानी भी कहते हैं। उमियम उमत्रु हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के तहत 1965 में बनाई गई यह झील 10 वर्ग किलोमीटर के इलाके में फैली है। उमख्रा और उम्स्वर्पी सम की नदियाँ मिलकर रो-रो नाम की धारा बनाती हैं, जो उमियम झील में आकर मिल जाती है। मूलतः बिजली उत्पादन के लिए बांध बनाने की गरज से बनाई गई यह मानव निर्मित झील अब पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन गई है। यहाँ वाटर स्पोर्ट्स से जुड़ी कई तरह की गतिविधियां होने लगी हैं। लेकिन झील का एक स्याह पक्ष भी है। शहरीकरण की जबरदस्त मार इस झील पर पड़ रही है। झील में मिलने वाली दोनों नदियाँ अपने साथ शहरों के सीवेज और अवशिष्ट लेकर आती है, जो इस झील में मिल जाता है। कुल मिलाकर 40 हजार क्यूबिक मीटर सिल्ट इस झील में जमा हो चुका है। सन 2000 में राज्य द्वारा किए गए एक शोध के मुताबिक अपने निर्माण समय 200 सालों की सम्भावित उम्र वाली यह झील अगले 30-35 साल भी शायद ही जिन्दा रह पाए। पर झील का सौन्दर्य इस तथ्य ने कम नहीं किया है। यह सुन्दर झील सड़क के किनारे काफ़ी देर तक हमारे साथ यात्रा करती रही।

गुवाहाटी से निकलने के क़रीब तीन घंटे बाद हम शिलांग में थे। रोहित की दीदी ने मुझे बताया था कि मुझे पुलिस बाजार में उतरना है और वहाँ से रिंझा आना है। रिंझा के लिए शेयर्ड टैक्सी लेनी है। पुलिस बाजार में उतरने पर कुछ ही देर में टैक्सी मिल गई। काली मारुति 800 कार में पीछे की सीट पर तीन सवारियों के बाद मुझे भी लाद दिया गया। आगे भी दो सवारियाँ ड्राइवर के अलावा बैठी हुई थीं। करीब बीस मिनट तक पहाड़ियों पर चढ़ती-उतरती सँकरी सड़कों से गुजरने के बाद ड्राइवर ने बताया कि रिंझा आ गया है।

कुछ देर में मैं दीदी के घर पर था। दीदी के पति सिद्धार्थ एक सरकारी विभाग में यहाँ पिछले कुछ सालों से नियुक्त थे। वो अभी दफ़्तर में ही थे। बाहर हलकी सी धूप खिली हुई थी। दीदी ने बताया कि यहाँ अंधेरा बड़ी जल्दी जाता है और सुबह सूरज भी जल्दी अपने दीदार दे देता है।

करीब आधे घंटे बाद मैं एक अजनबी जगह पर अपने बचपन के परिचित के साथ चाय और पकौड़े खा रहा था। लग रहा था कि पूर्वोत्तर अब पराया नहीं रह गया।

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