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  • इरशाद ख़ान सिकंदर की ग़ज़लें

    असली नाम, छद्म नाम की बहसों से अलग कुछ अच्छी ग़ज़लें पढ़िए. इरशाद खान सिकंदर की गजलों की किताब आई है- आंसुओं का तर्जुमा. उसी anybook प्रकाशन से जिसने कुछ समय पहले जौन एलिया की किताब ‘गुमान’ छापी थी. 
    1.
    बन्द दरवाज़े खुले रूह में दाख़िल हुआ मैं
    चन्द सज्दों से तिरी ज़ात में शामिल हुआ मैं
    खींच लायी है मुहब्बत तिरे दर पर मुझको
    इतनी आसानी से वर्ना किसे हासिल हुआ मैं
    मुद्दतों आँखें वज़ू करती रहीं अश्कों से
    तब कहीं जाके तिरी दीद के क़ाबिल हुआ मैं
    जब तिरे पाँव की आहट मिरी जानिब आई
    सर से पा तक मुझे उस वक़्त लगा दिल हुआ मैं
    जब मैं आया था जहाँ में तो बहुत आलिम था
    जितनी तालीम मिली उतना ही जाहिल हुआ मैं
    फूल से ज़ख़्म की ख़ुशबू से मुअत्तर ग़ज़लें
    लुत्फ़ देने लगीं और दर्द से ग़ाफ़िल हुआ मैं
    मोजिज़े इश्क़ दिखाता है सिकंदरसाहब
    चोट तो उसको लगी देखिये चोटिल हुआ मैं
    2.
    सर पे बादल की तरह घिर मेरे
    धूप हालात हुए फिर मेरे
    मेरे महबूब गले से लग जा
    आके क़दमों पे न यूँ गिर मेरे
    रात गुज़रे तो सफ़र पर निकलें
    मुझमें सोये हैं मुसाफ़िर मेरे
    दिल में झाँके ये किसे फ़ुर्सत है
    ज़ख्म ग़ायब हैं बज़ाहिर मेरे
    एक दिन फूट के बस रोया था
    धुल गये सारे अनासिर मेरे
    उसकी आँखों में नहीं देखता मैं
    ख़्वाब हो जाते हैं ज़ाहिर मेरे
    मुझको ईमां की तरफ़ लाए हैं
    कुफ़्र बकते हुए काफ़िर मेरे
    3.
    बहुत चुप हूँ कि हूँ चौंका हुआ मैं
    ज़मीं पर आ गिरा उड़ता हुआ मैं
    बदन से जान तो जा ही चुकी थी
    किसी ने छू लिया ज़िंदा हुआ मैं
    न जाने लफ़्ज़ किस दुनिया में खो गया
    तुम्हारे सामने गूंगा हुआ मैं
    भँवर में छोड़ आये थे मुझे तुम
    किनारे आ लगा बहता हुआ मैं
    बज़ाहिर दिख रहा हूँ तन्हा तन्हा
    किसी के साथ हूँ बिछड़ा हुआ मैं
    चला आया हूँ सहराओं की जानिब
    तुम्हारे ध्यान में डूबा हुआ मैं
    अब अपने आपको खुद ढूँढता हूँ
    तुम्हारी खोज में निकला हुआ मैं
    मिरी आँखों में आँसू तो नहीं हैं
    मगर हूँ रूह तक भीगा हुआ मैं
    बनाई किसने ये तस्वीर सच्ची
    वो उभरा चाँद ये ढलता हुआ मैं
    4.
    रिश्ता बहाल काश फिर उसकी गली से हो
    जी चाहता है इश्क़ दुबारा उसी से हो
    अंजाम जो भी हो मुझे उसकी नहीं है फ़िक्र
    आग़ाज़े-दास्ताने -सफ़र आप ही से हो
    ख्व़ाहिश है पहुंचूं इश्क़ के मैं उस मुक़ाम पर
    जब उनका सामना मिरी दीवानगी से हो
    कपड़ों की वज्ह से मुझे कमतर न आंकिये
    अच्छा हो ,मेरी जाँच-परख शायरी से हो
    अब मेरे सर पे सब को हंसाने का काम है
    मै चाहता हूँ काम ये संजीदगी से हो
    दुनिया के सारे काम तो करना दिमाग़ से
    लेकिन जब इश्क़ हो तो सिकंदरवो जी से हो
    5.
    ज़मीनें आसमां छूने लगी हैं
    हमारी क़ीमतें अब भी वही हैं
    शराफ़त इन्तेहा तक दब गई तब
    सिमट कर उँगलियाँ मुठ्ठी बनी हैं
    रहे हैं वार सब ओछे तुम्हारे
    मिरी साँसें अभी तक चल रही हैं
    बचे फिरते हैं बारिश की नज़र से
    बदन इनके भी शायद काग़ज़ी हैं
    तिरी यादेँ बहुत भाती हैं लेकिन
    हमारी जान लेने पर तुली हैं
    6.
    दिलो-नज़र में तिरे रूप को बसाता हुआ
    तिरी गली से गुज़रता हूँ जगमगाता हुआ
    ग़ज़ल के फूल मिरे ज़ेहन में महकते हुए
    तिरा ख़याल मुझे रातभर जगाता हुआ
    वो बारगाहे-अदब है अक़ीदतों की जगह
    मै उस गली से न गुज़रूँगा ख़ाक उड़ाता हुआ
    मिरे जुनूं से हरीफ़ों के पांव उखड़ते हुए
    मैं जान देने के चक्कर में जाँ बचाता हुआ
    किसे मिला तिरे क़दमों में जान दे देना
    मैं सुर्ख़रू हुआ चाहत के काम आता हुआ
    तुम्हारी याद मुझे इस तरह से लगती है
    कोई चराग़ अँधेरे में झिलमिलाता हुआ
    हथेलियों की लकीरें मुझे परखती हुई
    मैं हर क़दम पे मुक़द्दर को आज़माता हुआ
    जवाब क्यों हैं सभी ख़ामुशी में दुबके हुए
    सवाल ज़ेहन के आंगन में आता-जाता हुआ
    मिरे खिलाफ़ सभी साज़िशें रचीं जिसने
    वो रो रहा है मिरी दास्ताँ सुनाता हुआ
    हमारी सम्त लगातार वार होते हुए
    उसे बचाने में अक्सर मैं चोट खाता हुआ

    7.

    जिस्म दरिया का थरथराया है
    हमने पानी से सर उठाया है

    शाम की सांवली हथेली पर
    इक दिया भी तो मुस्कुराया है

    अब मैं ज़ख़्मों को फूल कहता हूँ
    फ़न ये मुश्किल से हाथ आया है

    जिन दिनों आपसे तवक़्क़ो थी
    आपने भी मज़ाक़ उड़ाया है

    हाले दिल उसको क्या सुनाएँ हम
    सब उसी का किया-कराया है

    8.

    ये कैसी आज़ादी है
    सांस गले में अटकी है

    पत्ते जलकर राख हुए
    सहमी-सहमी आँधी है

    ये कैसा सूरज निकला
    जिसने आग लगा दी है

    चूहों ने ये सोचा था
    दुनिया भीगी बिल्ली है

    उसके घर के रस्ते में
    हमसे दुनिया छूटी है

    अपनी करके मानेगी
    चाहत ज़िद्दी लड़की है

    मिन्नत छोड़ो चीख़ पड़ो
    दिल्ली ऊँचा सुनती है

    मिट्टी में मिल जायेगी
    मिट्टी आख़िर मिट्टी है

    9.

    मिरी ग़ज़लों में जिसने चांदनी की
    उसी ने जिंदगी तारीक भी की

    वहाँ भी जिंदगी ने धर दबोचा
    वो कोशिश कर चुका है ख़ुदकुशी की

    कोई उसकी हिमायत में नहीं है
    हिफ़ाज़त कर रहा था जो सभी की

    अगर ये ख्व़ाब सच्चा हो तो क्या हो
    मिले भी और उससे बात भी की

    छुपाया मैंने सबसे राज़ अपना
    मिरे अश्कों ने लेकिन मुख़बिरी की

    10.

    आँखों की दहलीज़ पे आकर बैठ गयी
    तेरी सूरत ख़्वाब सजाकर बैठ गयी

    कल तेरी तस्वीर मुकम्मल की मैंने
    फ़ौरन उसपर तितली आकर बैठ गयी

    ताना-बाना बुनते-बुनते हम उधड़े
    हसरत फिर थककर,ग़श खाकर बैठ गयी

    खोज रहा है आज भी वो गूलर का फूल
    दुनिया तो अफ़वाह उड़ाकर बैठ गयी

    रोने की तरकीब हमारे आई काम
    ग़म की मिट्टी पानी पाकर बैठ गयी

    वो भी लड़ते-लड़ते जग से हार गया
    चाहत भी घर-बार लुटाकर बैठ गयी

    बूढ़ी माँ का शायद लौट आया बचपन
    गुड़ियों का अम्बार लगाकर बैठ गयी

    अबके चरागों ने चौंकाया दुनिया को
    आंधी आखिर में झुंझलाकर बैठ गयी

    एक से बढ़कर एक थे दांव शराफ़त के
    जीत मगर हमसे कतराकर बैठ गयी

    तेरे शह्र से होकर आई तेज़ हवा
    फिर दिल की बुनियाद हिलाकर बैठ गयी

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