
आज पढ़िए युवा कवि नरेंद्र कुमार की कविताएं। ये कविताएं उनके संग्रह ‘नीलामघर’ से ली गई हैं।
1) नीलामघर
रुकनपुरा से शुरू होते
फ़्लाईओवर के ऊपर
फ़र्राटे मारती गाड़ियों में नहीं
ठीक उसके नीचे
जहाँ अंबेडकर पथ आ मिलता है
बिल्कुल वहीं
भोर होते ही एक भीड़
उमड़ती है
ये मॉर्निंगवॉकर लोग नहीं हैं
न ही नक़ली ठहाके लगाते लोग
ख़ाली पेट !
पेट के लिए जमा
खुसुर-फुसुर किए जाते
ढूँढ़ती हुई निगाह
रुकने वालों पर डालते
दौड़ पड़ते हैं
बोली लगने लगती है
चेहरों की
नहीं… नहीं
ख़ाली पेट की
कुछ चेहरे वापस लौट रहे हैं
बिना नीलाम हुए
जिसका मलाल
उन पर साफ़ दिखता है
ऐसा नहीं है कि
इन चेहरों की जरूरत
शहर को नहीं है
पर, वह अपने सपनों की ईंट
थोड़ी और सस्ती जोड़ना चाहता है
और ये चेहरे
अपनी भूख की कीमत पूरी चाहते हैं
आप अंदाज़ा लगाइए
इस मुक़ाबले में कौन जीतेगा?
बिल्कुल सही,
शहर और उसके सपने
जब तक कि भूख अपनी सीमा-रेखा
न पार कर जाए।
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रुकनपुरा, पटना में बेली रोड के किनारे एक मुहल्ला है
2) मेरा भी हाथ
यह अराजक समय है
यह उदास समय है
यह बेचैन समय है
यह क्रूर समय है
यह बेशर्म समय है
… … … … … …
और
समय के ऐसा होने में
मेरा भी उतना ही हाथ है
जितना
अराजक, उदास, बेचैन, क्रूर
और बेशर्मों का।
3) डीजे की धुन
डीजे की धुन पर
गँवई लड़के नाच रहे हैं
अबीर उड़ा रहे हैं
रंग मल रहे हैं
अपने हिस्से के दुख से बेखबर
उधार की शराब-सिगरेट की
ख़ुमारी में डूब रहे हैं
इस घड़ी में
बर्बाद होती फसल नहीं है
पिता के फटे जूते नहीं हैं
माँ की पैबन्द लगी साड़ी नहीं है
अभी वे बेरोज़गार नहीं हैं
अभी वे लाचार नहीं हैं
कुछ घड़ी बाद
डीजे की धुन धीमी पड़ती है
अंत में आख़िरी साँस की तरह
टूट जाती है
रंग-बिरंगी लाइटों के बुझते ही
लड़के पसीना पोंछ रहे हैं
वे फिर से बेरोज़गार हैं
वे फिर से लाचार हैं।
4) ग्लेडिएटर
एक झटके में
होता सीना चाक ग्लेडिएटरों का
टप–टप गिरता खून
रेत में जा सूखता
लगते थे ठहाके
पवित्र रोम के अभिजातों के
साक्षी है कोलोसियम
एक आश्चर्य
सभ्यता का
एक शरीर के चूकते ही
आ जाता दूसरा शरीर
ग़ुलामों का
मज़दूरों का
सीधे–सीधे कहें तो
मजबूरों का
उनकी नज़र में
वे ग्लेडिएटर थे
एम्फ़ीथिएटर के खिलौने थे
जिनकी ख़ातिर न ताबूत था
न कफ़न
पर दरअसल वे
हमारी दुनिया के शहीद थे
भूल चुके हम उन्हें
भूल चुके उनके विद्रोह को
उनके नेता स्पार्टकस को
रोम से कापूआ के बीच खड़े
हजारों सलीबों को
उन पर टंगे ग़ुलामों को
बस याद रह गया है
भव्य कोलोसियम !
आज रोम का सीनेट
इसी स्मृतिलोप का फायदा उठा रहा है
पूरे ग्लोब पर छा रहा है
उनके एम्फ़ीथिएटर बड़े होते जा रहे हैं
उसी अनुपात में ग्लेडिएटर बढ़ते जा रहे हैं
जोड़ियाँ तय की जा रही हैं
अभिजात आज भी इन अखाड़ों में
पैसे लगा रहे हैं
पैसा बना रहे हैं
सीरिया, इराक़, अफगानिस्तान जैसे
विशाल एम्फ़ीथिएटरों में
किसान–मज़दूर एवं ग़ुलामों के बेटे
लहूलुहान हो रहे हैं
यथार्थ जानने से पहले ही
चूक जा रहे हैं
हालात वही हैं
बस
औज़ार बदल गए हैं
हम राष्ट्रवाद के नारों के बीच
ग्लेडिएटरों को गिरता देख रहे हैं
रेत पर, मिट्टी पर
कहाँ देख पा रहे हैं
कि हर मुकाबले के बाद
हमारे बीच के लोग
कम होते जा रहे हैं।
5) कुछ हिस्सा
तुम लोकतंत्र को पूरा लाना चाहते हो न
तो सुनो
इस लोकतंत्र का कुछ हिस्सा
एक-दूसरे से पीठ सटाए
उन चार शेरों के बीच पड़ा है,
जो हर समय, हर जगह मुँह फाड़े नज़र आते हैं
वहाँ जाओगे?
वह जो चक्र है न तुम्हारा
चौबीस तीलियों वाला
कभी अनवरत कर्म का प्रतीक रहा होगा
चौबीस घंटे
देश प्रगति के पथ पर
अब उसे अपनी गाड़ियों के पहियों में फिट कर
मनचाही गति देते हैं वे
उनकी मनमर्ज़ियाँ चलेंगी
चक्र केवल आगे नहीं, पीछे भी चलेगा
वे जब चाहें रोकें, जब चलाएँ
तुम्हारे लोकतन्त्र का कुछ हिस्सा
उन पहियों में फँसा पड़ा है
उसे निकालोगे?
6) याद
इन दिनों
देहरी पर बेसाख़्ता
जा जाकर
निहार बैठता हूँ गली
याद आते हैं पिता
प्रतीक्षारत !
7) लुका-छिपी
बिटिया
घर से निकलती है
घूम-घाम
वापस आ
पिता की आँखों में
ढूँढ़ती है कुछ
पिता भी लौटे हैं अभी
बिटिया को अपनी ओर
ग़ौर से ताकते देख
चौंकते नहीं
बस, हौले–से मुस्कुरा देते हैं
हाँ,
शुरू में चौंके थे ज़रूर
उन्होंने भी
महसूस किया है इधर
बिटिया की आँखों ने
बोलना अधिक,
देखना कुछ कम कर दिया है।
8) टायर
वह
लुधियाना की टायर कम्पनी में
रबड़ के साथ
खुद को गलाता
रह–रह खाँसता
गृहस्थी की गाड़ी खींचता
घिसता हुआ टायर है
चिमनी का धुआँ कम होते ही
कम्पनी उसके सामने परोसती है
भूख !
फिर वह
और तेजी से
घिसटता है, घिसता है।
9) वह मारा गया
वह मारा गया
प्रशासन ने दर्ज़ किया
गाड़ी के सामने आ गया
सो मारा गया
यारों में चर्चा हुई
बड़ा क्रांतिकारी बनता था
सो मारा गया
दबे स्वर में बात फैली
कुछ का जाना तय था
सो मारा गया
वे नाम थे जो खुलेआम
कानून को नज़र नहीं आए
सो मारा गया
अपनों ने बहुत समझाया, मगर
उसके पल्ले कुछ न आया
सो मारा गया।
10) किसान
राजधानी से सटे
उस गांव का बाशिंदा
कह रहा था प्रफुल्लित मन से
सर, यह जो पईन देख रहे हैं न
दोनो किनारों को मिलाकर नब्बे फीट चौड़ी है
टेंडर हो चुका है पाटकर सड़क बनाने का
और ये जो धान की फसल देख रहे हैं
कितने दिन जिएगी?
बालू, गिट्टी, ईंटें जब गिरनी–बिछनी
शुरू होंगी
तो खेतों का पानी सूखते क्या लगेगा?
ट्रैक्टर से बनी लीक के सहारे
आप जब चाहें प्लॉट तक पहुँच सकते हैं
साल दो साल में मकान बना सकते हैं
फिर कहिएगा
क्या जमीन दिए थे!
यह सब बताने वाला किसान था।
परिचय :
नरेन्द्र कुमार
जिला – नवादा, बिहार
प्रथम काव्य–संग्रह ‘नीलामघर’ प्रकाशित
मोबाइल – 9334834308
ईमेल – narendrapatna@gmail.com

