Meritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor Bahisleri, Mavibet Casino Ve Slot OyunlarıMeritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Mobilden Giriş 2026Meritking Giriş: Meritking Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Giriş Adresi, Mavibet Güvenilir MiMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir MiMeritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot Oyunları, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve Kampanyalar, Mavibet Giriş AdresiMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor BahisleriMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Mobilden Giriş 2026Marsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Bonus Ve KampanyalarMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Spor Bahisleri, Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Giriş Adresi, Mavibet Mobilden Giriş 2026Meritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir MiMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Bonus Ve KampanyalarMavibet Giriş: Mavibet Spor Bahisleri, Mavibet Casino Ve Slot OyunlarıMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor BahislerikalitebetgrandpashabetholiganbetjojobetholiganbetholiganbetextrabetAntalya EscortAntalya Escort BayanAntalya Escort BayanMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarAntalya Escort BayanAntalya EscortAntalya EscortlarAntalya Escortbetgarbetgar girişbetgarbetgarbetgar girişbetgarbetyapbetyap girişbetyapbetyapbetyap girişbetyapbetnisbetnis girişbetnisbetnisbetnis girişbetniswinxbetwinxbet girişwinxbetwinxbetwinxbet girişwinxbetbetlikebetlike girişbetlikeAntalya Escortbetgarbetgar girişbetgarbetgarbetgar girişbetgarRomabetRomabet girişRomabetRoketbetRoketbet girişRoketbetKulisbetKulisbet girişKulisbetEnbetEnbet girişEnbetBetasusBetasus girişBetasusRobinbetRobinbet girişRobinbetGalabetGalabet girişGalabetUltrabetUltrabet girişUltrabet

आत्मा की आवाज़ का कवि अशोक वाजपेयी

आज वरिष्ठ कवि, चिंतक, संस्कृतकर्मी अशोक वाजपेयी का जन्मदिन है। जानकी पुल उनके शतायु होने की कामना करता है। इस अवसर पर पढ़िए युवा लेखिका रश्मि भारद्वाज की यह टिप्पणी-

==============

‘मुझे किसी ने बताया नहीं था कि कवि होने के लिए क्या-क्या होना न होना पड़ता है!’

अपना समय नहीं और अशोक वाजपेयी

यह कहना ऐन इस समय मुश्किल है कि जो रेंग रहा है अपना समय समझकर,/वह सपना है या शब्दों का एक पिछड़ गया समुच्चय!/सपने तो अक्सर समय से रौंदे जाते हैं/ क्या ऐसा कोई समय होगा जिसे कोई सपना रौंद  डाले?/ शायद सच्चाई यही है कि न समय बचा है न सपना”

हम यह सुनते आए हैं कि कविता मनुष्य की जिजीविषा से जन्म लेती है। यह आत्मा की वह आवाज़ है जो समय के तमाम अँधेरों में भी हमें रोशनी का एक सिरा थमा ही देती है जिसके सहारे कवि सिर्फ़ अपने स्वप्न ही नहीं, अपना समय भी रच सकने का साहस पा लेता है। फिर वह कौन सा समय है जो शेष नहीं रहा? जो स्वप्न भी शेष नहीं होंगे तो हम जीने के बहाने किस प्रकार गढ़ेंगे? वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी जिन्होंने जीवन के लगभग  छह दशक से अधिक कविता को ही समर्पित कर दिए, क्या अब उम्र के इस पड़ाव पर शब्दों की सत्ता से उनका मोहभंग हो गया है? क्या कविता से कुछ बदला जाना तो दूर, कुछ रचा भी नहीं जा सकता जो उन्हें कहना पड़ता है, ‘हम अपना समय लिख नहीं पाएंगे….’

कवि का नया संग्रह ‘अपना समय नहीं’ की कविताओं के बीच से झाँकते नैराश्य, अन्यमनस्कता, पराजय के स्वर ने मुझे चौंकाया नहीं, कहीं गहरे तक विचलित किया। हमारी पीढ़ी तो क्या हिन्दी साहित्य के लिए अशोक वाजपेयी एक ऐसा नाम हैं जो कला और कविता के लिए अपने समर्पण, उनके सरंक्षण के लिए किए गए अपने प्रयासों के लिए सदैव अग्रणी रूप से याद किए जाएंगे। मुझे स्मरण नहीं पड़ता कि कला और साहित्य के लिये इतनी तत्परता से इतने बृहत प्रयास किसी अन्य साहित्यकार द्वारा किए गए हों और इसी बात के लिए हिन्दी साहित्य के बीच से ही उतनी ही मात्रा में दुर्दम्य आलोचना, उतने ही   भयंकर आघात भी झेले हों! समीकरणों के लिए व्यक्तिपूजा के इस दौर में इसे भी अशोक वाजपेयी के महिमामंडन के रूप में पढ़ा जा सकता है। पढ़ा जाएगा भी। क्योंकि जीवन के लगभग दो दशक हिन्दी गढ़ में बिताकर यह बात तो बखूबी समझ आ गई है कि हम इतने ही कृतघ्न हैं। हममें अपने बूते, अपने स्वयं के लाभ-हानि के गणित के आगे-पीछे ना कुछ करने का सामर्थ्य है और यदि कोई करता दीखता है तो उसे एक समुचित धन्यवाद कहना तो दूर की बात है, हम पाँव पकड़कर उसे कीचड़ में खींच लेने के अवसर गढ़ते रहते हैं। हम इतने ही कृतघ्न समय में हमेशा से रहने को अभिशप्त हैं। मेरा यह सब लिखने का अभिप्राय बस इतना है कि साहित्य और कला के लिए समर्पित कोई ऐसा व्यक्तित्व जो स्वयं हज़ारों के लिए प्रेरणा हो, अपने मन के भीतर कितनी विकट उथलपुथल झेल रहा है। उसके अंतर्मन का कोलाहल जो इन कविताओं में हर कहीं प्रतिध्वनित है, हमें अपने अंदर भी उतरता महसूस होता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए हमारे अंदर बहुत बेचैन सवाल उपजते हैं, जलते-सुलगते सवाल जिन्हें छूने जाओ तो हाथ में फफोले उग आएंगे, जैसे अपने समय को छू लिया हो। और मरहम कहीं नहीं है। इन कविताओं में तो बिल्कुल नहीं।

अशोक वाजपेयी के कवि की यह निराशा उनकी निजी निराशा या पराजय नहीं हैं। उनके शब्दों के बीच से कौंधता यह शोक उनका निजी नहीं, यह हमारे इस ‘गढ़ दिए गए’ समय की अनुगूँजें हैं। यहाँ हम सब हैं, हम सबकी हार, हम सबकी यातना की ध्वनियाँ हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए यही बात मन में गूँजती रहती है- यही अपना समय है। हम ऐसे ही समय में रहने को अभिशप्त हैं जब वे सब कुछ जो हमें संभाल सकते थे, हमारे जीवित होने के साक्षी बन सकते थे, नष्ट हो चुके हैं और अब हमें नष्ट करने के कगार पर हैं- शब्द, स्वप्न, ईश्वर!

फिर हम किसकी बाट जोहें, किसके सामने अपना मन उड़ेलें, कौन हमें इस यातना से मुक्ति दिलाएगा! मुझे ऐसा लगता रहा था कि कवियों के लिए यह कार्य सिर्फ़ और सिर्फ़ कविता ही कर सकती है। क्या मैंने कविता से कुछ अधिक अपेक्षा कर ली थी! क्या मैंने कविता के कंधों पर कुछ अधिक ही बोझ डाल दिया है! हमारे इस समय का भार इतना अधिक है और शब्द इतने सामर्थ्यहीन कि वे हमारे स्वप्नों, हमारी उम्मीदों के लिए अपर्याप्त हो चुके हैं! अन्याय के इस दौर में शब्दों से न्याय की आशा पाले दरअसल हम बहुत अकिंचन नज़र आते हैं! शब्दों को भी खोकर हम वास्तव में बहुत दरिद्र हो चुके हैं। यहाँ अशोक वाजपेयी ही मेरे ‘रेस्क्यू’ के लिए आते हैं, और यह कहते हुए वह आने वाली की पीढ़ियों के लिए भी बहुत कुछ कह जाते हैं-

हम फिर भाषा के दरवाज़े पर खड़े हैं: इस नृशंस समय के लिए हमें शब्द चाहिए-ऐसे जिनमें मानवीय हाथों की छापें हों/संग साथ की गरमाहट, बच्चों की हँसी की कोमलता, विलाप का मर्म, दुख की आहटें और सुख की थपकी हो/ ऐसे शब्द जिसे दूसरे भर नहीं/ नदियाँ -पर्वत, वृक्ष और फूल, पशु पक्षी, सूर्यास्त और चंद्रोदय भी समझ सकें

हालाँकि, दरवाज़े सब बंद हैं बाहर से भीतर की ओर और कोई चाभी नहीं है, जबकि दरवाज़ें खुलते हैं बंद होते हैं, कोई पुकारता नहीं, हम फिर भी भाषा के दरवाज़े पर खड़े हैं। एकमात्र यही वह जगह है, हमें जहाँ-जहाँ बार आ खड़े होना होगा, दस्तक देनी होगी। बस यही काम है हमारे हिस्से जो हमें अपने इस समय के तमाम आघातों के बीच करते रहना होगा। भले ही हमें शिद्दत से यह आभास होता रहे, हम अपना समय लिख नहीं पाएंगे। वह समय जो अपने नृशंस औजारों के साथ इतनी तीव्रता से हम पर हमलावर है कि शब्द हमारा कवच बन सकने में असमर्थ हो चुके हैं। वे हमारा हथियार कभी नहीं बन सकते क्योंकि वे पहले ही अधिक ताकतवर हाथों द्वारा अपहृत किए जा चुके हैं। हम बस इतना कर सकते हैं कि शब्दों से, कविताओं से स्वयं को निरंतर निष्कवच करते रहें ताकि वे सबकुछ  लिख सकें जो लिखना चाहते हैं। वे सबकुछ जिन्हें देखने की यातना झेल रहे हैं, जिन्हें सुनने को अभिशप्त हैं। जिनके साथ जीने का दंश उठाना पड़  रहा है। कविताएं हमें इतनी निष्कवच कर दे कि हमारे संघात में निकला शत्रु हमारे साहस को देखकर चकित रह जाए। उसके पास सब कुछ है, धर्म, राजनीति, सत्ता, तकनीक, यह समय…. और हमारे पास कुछ नहीं। हम अपने चंद शब्दों के साथ निहत्थे, निष्कवच, उसके सामने। हमारे पास कुछ और नहीं हो, लेकिन सच लिखने का साहस हो जिसके लिए हम निरंतर भाषा के दरवाज़े पर दस्तक देते रह सकें। अशोक वाजपेयी यही कर रहे हैं। अगर यह पराजय है, निराशा है तो यह कवि के जीवित होने का साक्षी है। इस समय में उल्लास से भरे, जिजीविषा से लदे हुए हर व्यक्ति को संदिग्ध होकर देखो। हमारे इस समय में उत्साह और उन्माद ने स्वयं को पर्यायवाची बना लिया है। हमारे इस समय में जीत का रास्ता किसी न किसी ध्वंस से होकर ही गुज़रता है। हमारे समय का ईश्वर अपनी ही रक्षा कर सकने में असमर्थ रहा, ‘इतने सारे दैत्य, राक्षस, चुड़ैलें पुरकथाओं से सीधे/ हमारे समय और पड़ोस में कैसे आ गए- हमें पाता ही नहीं चला!

पता तो हमें बखूबी था बस हम इसलिए अनजान बने रहने का स्वांग रचते रहे कि वह हमारे दरवाज़े तक नहीं आया। जबकि वह कभी भी आ सकता है, कहीं से भी आ सकता है। हम स्वयं से यह प्रश्न अवश्य करें, ‘जब अंधेरा गाढ़ा हो और कहीं जाने में खतरा हो….  तब भी क्या हम दरवाज़ा खोल सकेंगे, क्योंकि किसी को लगता है कोई चीख कहीं से आयी, कोई जानता है कि सब तरफ़ खामोशी है: कोई दरवाज़ा खोलता है।

 इस संग्रह की कई कविताएं आपदा के विकट समय में लिखी गई हैं, एक ऐसा समय जिसकी विभीषिका, जिसके कहर, जिसके भय के समक्ष लिखे गए असंख्य शब्द भी उसकी त्रासदी को दर्शा सकने के लिए समुचित नहीं होंगे। ऐसा समय जो किसी भी सभ्यता के लिए सबसे बड़ा सबक होना चाहिए था लेकिन दो साल भी नहीं बीते और हम अपने स्वार्थ, महत्वाकांक्षा, सत्ता और शक्ति के मद में सब कुछ ऐसे भुला बैठे हैं कि हमें स्मरण ही नहीं कि जिस नदी तीरे हम लाखों दीप जला रहे हैं, कभी उसमें ही लाशों के बीच तैर सकते थे। हमें यह भी याद नहीं कि जिस ईश्वर के आगमन के लिए हम उत्सव मना रहे वह हमारे लिए कभी नहीं आएंगे। कभी नहीं आए थे। ‘देवता बहुत हो गए थे उन्होंने किसी और के लिए कोई खाली जगह नहीं छोड़ी थी/हम देवता गंवा चुके हैं उनके दिव्य भव्य समय के साथ/ अब कोई आश्चर्य-कथा कहने को नहीं बची है।

हर दिन कविता का नहीं होता, हर दिन कविता सा भी नहीं होता। रोज का कोई दिन उतना ही साधारण होता है जितना साधारण हमारा जीवन है। जितनी औसत उसकी दिनचर्या है। तो क्या कविता विशिष्ट होती है! कविता लिखता हुआ कोई विशेष हो जाता है! नहीं, कविता उसी अति साधारण के बीच अपने होने के मायने तलाशती है। एक औसत सी दिनचर्या के बीच अपने जीवित होने के साक्ष्य खोजती, स्वयं को रच लेती है। वह जितना साधारण से जुड़ेगी, उसकी भाषा में उतरेगी, उतनी ही विशिष्ट होती जाएगी। एक साधारण दीखते क्षण में जब कविता सौन्दर्य देखती और गढ़ती है तो वह साधारण नहीं रह जाता है। जीवन के तमाम झंझावातों, इसकी रोज की ऊब, इसकी बेहद औसत दिनचर्या के बीच भी कवि को अपनी कविता से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वह किसी क्षण के सौन्दर्य को देख सके। मृत्यु अंतिम सत्य है, जीवन जितना है, बेहद जटिल है, स्वप्न और स्वप्नभंग के बीच ही सारी आवाजाही है, इन सबके बीच कला ही वह एकमात्र माध्यम है जहाँ से हम अपनी आत्मा के लिए कुछ सौन्दर्य जुटा सकते हैं। उस जीवन की कल्पना भी बहुत भयावह है जहाँ कला का सौन्दर्य नहीं हो। अशोक वाजपेयी का कवि रूप जीवन भर क्षण के उस सौन्दर्य को अपनी कविता में सँजोता रहा है और यह संग्रह जिसकी भूमिका में ही वे लिखते हैं,
ये कविताएँ अपने और अपने समय के बीच ऊहापोह की इबारतें हैं, यहाँ भी कविता ने गहन निराशा के तमाम क्षणों के मध्य कविता से अपना पूरा सौन्दर्य तलाशने का आग्रह नहीं छोड़ा है। भाषा का सौन्दर्य यहाँ समय के दिए समस्त नैराश्य को अतिक्रमित करता अपने लिए उतनी रोशनी तो तलाश ही लेता है जिसकी आभा से कविता ही नहीं, उसके पाठक भी अपने लिए रास्ता तलाश ही लेंगे। ‘वैसे ही बने रहना जैसे कि बरसों से हो सुंदर है: सुंदर है शब्द से कहना कि सब साथ छोड़ जाएँ/ पर तुम हमेशा साथ रहना/ सुंदर है।     

शब्द साथ हैं तो यह आभास भी है कि अपने तमाम अकेलेपन के बीच भी हम अकेले नहीं है। उम्र के अस्सी शीत जीवन का सारा ताप, उसके दिए सारे उल्लास, अवसाद, आघात झेलते कवि तमाम रिश्तों, मित्रों, शत्रुओं, सहचरों के मध्य उठते-बैठते भी यदि सिर्फ़ शब्दों के संग ही यह आश्वासन पाते हैं तो ये इस बात का सबूत है कि कविता उनमें और वह कविता में कितनी गहराई और कितने सौन्दर्य के साथ विन्यस्त है कि बिना कविता के अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। साथ ही, पुनः अभिव्यक्ति के खतरे उठाकर कहना होगा कि हिन्दी कविता की कल्पना भी अशोक वाजपेयी के बिना संभव नहीं होगी। यहाँ कविता का वह अपरिमित वैभव देखें जो मेरे शब्दों का साक्षी है ‘हम अकेले नहीं हैं/ विश्वासघात में मारे गए योद्धा, विफलता में अस्त हुए कुछ किंवदंती-पुरुष/ अपनी कामाग्नि में जौहर न कर पायीं ललनाएं/ और बलि पशुओं की गणना से बाहर रहे कुछ चकित पशु हमारे साथ हैं। 

अमरीकी कवि मेरी ऑलिवर ने कहा था, ‘कविता कोई व्यवसाय नहीं है, यह जीवन जीने का तरीका है। यह एक ख़ाली टोकरी है, आप अपना जीवन इसमें डालते हैं और उससे कुछ तो बना ही लेते हैं’।

अशोक वाजपेयी भी कविता के लिए कुछ ऐसा ही कहते हैं, ‘फिर भी लगता है कि इस सबको समेट कर/ अब भी एक वाक्य बनाया जा सकता है/ जो जीवन को दर्ज करता हो’।  

मुझे आजकल यह शिद्दत से महसूस होता है कि हमारे इस समय में सब कुछ संभव है। कुछ भी बना और हुआ जा सकता है। सबसे कठिन है कवि होना और कवि बने रहना। ऐसे समय में जब कवित होना सबसे निरुपाय, आभाविहीन व्यक्ति होना है जो समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए आदर, प्रेम या प्रेरणा का नहीं बल्कि उपहास का ही पात्र है। जब समय के नाखून इतने तीक्ष्ण हो चुके हैं और कविता मरहम बन सकने में असमर्थ है, कवि होना, कविता के पक्ष में खड़े रहना बहुत साहस और चुनौती पूर्ण निर्णय है। आत्मघाती भी । अशोक वाजपेयी के कवि रूप ने ना सिर्फ़ कविता का पक्ष चुना है, उम्र के इस पड़ाव तक भी अपनी तमाम पराजय, निराशा और स्वप्न भंग के साथ कविता के पास ही लौटते रहे हैं।

कवि की इस ज़िद का साक्षी बनते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यह पंक्तियाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही, ‘मैंने अपने जीवन में चाहे और जो कुछ भी किया हो, एक लंबी ज़िंदगी जी लेने के बाद आज मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि मैं सिर्फ़ एक कवि ही हूँ, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं’।

अशोक वाजपेयी भी ताउम्र सिर्फ़ कवि ही होना चाहते हैं, कुछ और नहीं, ‘मैं कुछ नहीं था/ जिसे होने का लगातार भ्रम होता रहा/ मुझे किसी ने बताया नहीं था कि/ कवि होने के लिए/ क्या-क्या होना न होना पड़ता है!’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Mercado Pro – Turn your WooCommerce into Multi Vendor Marketplace WPForms Tooltips WooCommerce EMI Popup Sendy Widget Pro iRestora PLUS Multi Outlet – Next Gen Restaurant POS TNC FlipBook – PDF viewer for WordPress WebViewGold for Android | Convert website to Android app | No Code, Push, URL Handling & much more! GutenSearch – Amazon Affiliates Products Search and Embed WPBakery Page Builder Extensions Add-on – Testimonial Carousel WooCommerce B2B