संदीप तिवारी की कविताएँ

आज पढ़िए युवा कवि संदीप तिवारी की कविताएँ। इन कविताओं को पढ़ते हुए उन बदली हुई परिस्थितियों पर सहज ही ध्यान चला जाता है जब कभी न कभी, धीरे-धीरे सबसे एक शहर छूट जाता है, जब जीवन में निश्चितताएँ अधिक थीं, तकनीकी विकास के आने से सुविधाएँ तो बहुत मिलीं लेकिन मनुष्य को अधीर बना दिया। इसके साथ ही एक कविता लड़कियों की शिक्षा के प्रति समर्पित है। कवि की नज़र में विभिन्न प्राकृतिक दृश्यों में सबसे सुंदर दृश्य लड़कियों के स्कूल जाने का है, यह देखना दुनिया को थोड़ा सुंदर होते देखना तो कहा ही जा सकता है। यहाँ प्रसिद्ध कवि अनुज लुगुन की कविता ‘तुम्हारा यह स्कूल ड्रेस’ भी बरबस ही याद आती है।
संदीप लोगों द्वारा पहचान बनाने की होड़ को भी बखूबी पहचानते हैं, यह भी उनकी कविताओं में लक्षित होता है।
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1. किराया
मैं जिस शहर में हूँ
जब उसके एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने के लिए
कोई ऑटो वाला मुझसे दो-ढाई सौ रुपये माँगता है
मैं चौंक जाता हूँ
फिर मैं मन ही मन ट्रेन की टिकटों का हिसाब लगाने लगता हूँ
और सोचता हूँ कि इतने रुपये में तो मैं सोते हुए,
बहुत आराम से इलाहाबाद पहुँच जाऊँगा
यह अलग बात है कि इन दिनों इलाहाबाद कम जा पाता हूँ
2. फोन
 (१) मेरे फोन के बंद होने से
कितने लोग मुझे फोन मिला कर परेशान हो जाएंगे
मैं इसलिए परेशान होता हूँ
मेरा फोन बंद हो जाएगा
इसके लिए मैं कभी परेशान नहीं होता
(२) सुबह को घर से गया आदमी
शाम को घर लौट आता था
किसी महीने परदेस गए लोग
कुछ कपड़े कुछ पैसे और कुछ मिठाइयों के साथ
एक दिन घर वापस आ जाते थे
रिश्तेदारियों में आते-जाते
कोई, एक दो दिन अधिक रुक ही जाता था
किसी को कोई चिंता नहीं होती थी
जाने वाले को लोग यह मानकर भेजते थे
कि वह लौट ही आएगा,
आज थोड़ी देर के लिए भी बंद हो जाए फोन
शुभ चिंतक कितना परेशान हो जाते हैं
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ करने लगते हैं पता
हमारे युग में धीरज कितना कम होता जा रहा
लोगों में निश्चिंतता कितनी घटती जा रही
भरोसा तो रहा ही नहीं किसी को किसी पर
हम तकनीकि में भले ही हर दिन तरक्की कर रहे हों
लेकिन हम सब जीवन में उतने ही घबराए हुए भी हैं
(३) जब कोई आदमी कहीं पर अचानक और हड़बड़ाकर अपना हाथ,
 अपनी जेब पर रखता है
मैं समझ जाता हूँ कि
वह अपना फोन घर भूल आया होगा.
3. सुबह-सुबह
 इधर पहाड़ों में सुबह-सुबह के कितने सुंदर दृश्य दिख रहे हैं
चिड़ियाँ पैदल चलकर सड़क पार कर रही हैं
सामने हिमालय स्वर्ण चट्टान सा खड़ा है
उस पर सुबह की धूप पड़ रही है
साफ़-सुथरे रास्ते हैं
जो कहीं न कहीं जा रहे हैं
जिनके किनारे बांज चीड़ और देवदार के पेड़ों-पत्तियों की अप्रतिम हरियाली है
पत्थरों को नहलाते हुए सड़क के बराबर में एक पतली सी नदी बह रही है
ऐसे तमाम सुंदर दृश्यों से अधिक सुंदर भी एक दृश्य है
जिसमें बच्चियाँ, काँधे पर झोला टाँगे बड़े उत्साह से स्कूल जा रही हैं।
4. कवि बनने की कितनी बड़ी लड़ाई!
जोड़ तोड़ गठजोड़ करो तुम
पर न पड़े दिखाई
ढीठों से भी ढीठ बनो
और बातें हवा हवाई
दीदी भैया दादा जी की
पकड़ो ठोस कलाई
समय-समय पर उनकी
छक कर करते रहो बड़ाई
भले किसी का भला न करो
लेकिन कहो भलाई
किसी बहस में दौड़ के कूदो
मारो हाई-फाई
शब्द लिखो स्पंजी जैसे रस में पड़ी मलाई
हर कविता पर करो टिप्पणी ‘क्या लिख डाला भाई!’
कूड़ा करकट जो भी लिख लो
नियमित करो छपाई
चौपाई को दोहा बोलो दोहे को चौपाई
कुर्ते पर गमछा लहराओ
फेंको अपनी टाई
यही मन्त्र हैं कवि बनने की
इनकी करो जपाई
कवि बनने की कितनी बड़ी लड़ाई!

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