‘बोरसी भर आँच’ की उष्मा

आज पढ़िए यतीश कुमार की मार्मिक संस्मरण पुस्तक ‘बोरसी भर आँच’ की यह समीक्षा जिसे लिखा है कवि-तकनीकविद सुनील कुमार शर्मा ने। यह पुस्तक राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित है-

============================

 कवि-कथाकार यतीश कुमार की सद्य प्रकाशित संस्मरण की किताब ‘बोरसी भर आँच’ पढ़ते हुए बशीर बद्र साहब का यह मानीखेज शेर याद आ गया- “जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है, आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा / ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं, तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा।’ चीकू से यतीश कुमार बनने की यात्रा में कई वर्षों का परिश्रम, अथक संघर्ष, सामाजिक-पारिवारिक चुनौतियों और बाधाओं को पार करते रहने का जुनून शामिल है। एक बच्चे का ऐसे परिवेश में पलना-बढ़ना जहाँ ज्यादातर राहें गलत दिशा को जाती हों, वहाँ से एक सही पगडंडी पकड़ कर आगे बढ़ने की यात्रा ही ‘बोरसी भर आँच’ का सार है।

संस्मरण लेखन के वैश्विक उदाहरणों को भी देखें तो यह स्पष्ट होता है कि संस्मरण लेखन आत्म-जागरूकता, व्यक्तिगत विकास और दुनिया में किसी की भूमिका की बेहतर समझ को बढ़ावा देता है (यागेल्स्की, 2009)। आमतौर पर संस्मरण लिखने का विकल्प आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के कारकों  से प्रभावित होता है जो महत्वपूर्ण या परिवर्तनकारी अनुभवों द्वारा उजागर होते हैं (फ्रैंक, 1998)। यह संस्मरण संग्रह कई बार अमेरिकी लेखिका जेनेट वॉल्स के संस्मरण ‘द ग्लास कैसल’ की याद भी दिलाता है जहाँ लेखिका की उतार-चढ़ाव भरी परवरिश और आत्म-खोज की दिशा में उसकी यात्रा का वर्णन है। ‘बोरसी भर आँच’ भी उसी तरह का मार्मिक और प्रेरक संस्मरण है जो पाठकों के दिलो-दिमाग में वर्षों तक बना और बचा रहेगा।

इस संग्रह में संकलित 11 संस्मरण जितने महत्त्वपूर्ण हैं उतना ही ‘स्मृतियों की तपन’ और ‘परिदृश्य की अकुलाहट’ भी। पढ़ते हुए मुझे कई जगहों पर ठहरना पड़ा। व्यक्तित्व की विविधता को लेकर निदा फ़ाज़ली ने जो लिखा है ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिस को भी देखना हो कई बार देखना’ वह मौजू बैठता है । लेखक से मेरा परिचय भी वर्षों का है लेकिन इस संग्रह में तमाम ऐसे संस्मरण हैं जिसने मुझे अपने पुराने संबंधों पर झुठला दिया। किताब से गुजरते हुए ऐसा बार-बार लगा कि एक शख़्सियत के तौर पर कितना कुछ जानना बाकी रह गया था। इस किताब से बावस्ता होने के बाद समझ आया कि किसी को जानने के तमाम दावों के बावजूद हम किसी को कितना कम जान पाते हैं। लेखक ने बहुतेरी यादों को ऐसी स्पष्टता के साथ लिखा है कि सुखद आश्चर्य महसूस होता है।

लेखनी में इतनी स्पष्टता और यादों को ज्यों का त्यों रख देने का साहस ही अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस संस्मरण यात्रा में मुझे अधिकतर मोड़ों पर लेखक में सच को सच कहने का साहस मुझे मिला। वह बिना लाग लपेट के सच को स्वीकारते और पाठकों के सम्मुख रख देते हैं। ‘अस्पताल तक जाती नदी’ में पृष्ठ संख्या 31 पर वह साफ-साफ लिखते हैं कि ‘स्टाफ क्वार्टर के नाम पर अस्पताल के ही कुछ हिस्सों को कर्मचारियों ने घेर रखा था। सिर्फ प्रभारी जिला चिकित्सा को अलग से बँगला मिला हुआ था, वह भी झूले के साथ और वह झूला मेरी नजरों में हमेशा से चुभता रहा। झूले पर बैठकर अंगूर खाता हुआ उनका लड़का अपनी संपन्नता के दर्पण में हमारे अस्तित्व को बौना बनाते हुए चिढ़ाता नजर आता। अंगूर उन दिनों हमारे लिए ज्यादा खट्टे होते थे, स्मृति में जिसकी खटास आज भी मेरी मीठी जिंदगी का रस बिगाड़ देती है।’

इसी तरह लेखक ने ‘अस्पताल- स्नेह, ममता और प्रेम’ में न सिर्फ अपने जीवन से जुड़ी बल्कि अपने आसपास की घटनाओं के बारे में ऐसी जानकारियाँ भी दी हैं जो बिहार के समकालीन राजनैतिक-सामाजिक इतिहास को समझने में भी सहायक है। इस संस्मरण के अधिकतर पन्नों में एक पाठक मन कहीं-कहीं बरबस खुद को खोजने लगता है।

संस्मरण ‘अस्पताल तक जाती नदी’ में तत्कालीन बिहार के आतंकी परिवेश में मानवता को बचाए रखने की जद्दोजहद हो या ‘भागता बचपन’ में एक बच्चे की संघर्ष यात्रा, दीदिया की कहानी तो हर उन बहनों के समर्पण की कहानी है जो भाई के लिए बहन और माँ दोनों की भूमिका निभाती हैं। ‘बैरन डाकिया’, ‘अस्पताल, स्नेह, ममता और प्रेम’, ‘स्मृति के रंग में होली’, ‘और कितने करीब’ जैसे संस्मरणों से गुजरना बतौर पाठक जब मेरे लिए इतना कठिन रहा तो मैं इस बात का अंदाजा बखूबी लगा पा रहा हूँ कि यह लेखक के लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा। दुख को बार-बार दोहराने से दुख की ताप बढ़ती ही जाती है। ‘नॉस्टेल्जिया’ एक ऐसा शब्द है जो पिछले कुछ वर्षों में खूब इस्तेमाल होता है। अतीत की स्मृतियों को दोहराते हैं। लेकिन बचपन के दिनों में लौटना हर किसी के लिए सुखद नहीं होता। लेखक ने जैसा बचपन जिया है, वहाँ से यहाँ तक पहुँचने की यात्रा अपने आप में ही एक अद्भुत उदाहरण है।

बचपन का चीकू जिसे आज हम यतीश कुमार के रूप में जानते हैं, वह खुद इस बात को स्वीकारते हैं कि बचपन में उनकी प्रतिस्पर्धा उम्र से ही चल रही थी। रिश्तों में गहराती शून्यता, कहीं किसी और घर में प्रेम स्नेह और सुकून के दो पल की तलाश, मुकेश और रफ़ी के गाने उनके अकेलेपन के साथी और शायद उसे भी मालूम नहीं चला कब जीवन का एक अलग ही दर्शन इसकी बाहरी और अंदरूनी खोज में शामिल हो गया। और इस सबमें चीकू समय से पहले ही बड़ा होता गया। परिपक्वता का आवरण उसके कोमल मन पर चढ़ता गया। शायद यही वजह है इस कोमल मन से कभी कविताएँ निकलती हैं तो कभी कहानी, कभी दूसरों की सहायता के लिए हाथ बढ़ जाते हैं। वह परेशान भी होता है और सोचता है कि खून और गुलाब का रंग एक जैसा क्यों है? यह प्रश्न इस संस्मरण को पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

एक महत्वपूर्ण और प्रभावी संस्मरण किसी व्यक्ति द्वारा अनुभव की गई घटनाओं का केवल दस्तावेजीकरण मात्र नहीं है। इसका वास्तविक लक्ष्य  ( संस्मरणकार पेट्रीसिया हैम्पल के शब्दों में ) “कथन और प्रतिबिंब के प्रतिच्छेदन” के रूप में वर्णित किया जाना है। इसका मतलब यह है कि यह व्यापक सांस्कृतिक विश्लेषण, स्मृति और इतिहास पर प्रकाश डालता है। अपने आत्मकथात्मक कार्य “एंटी-मेमॉयर्स” में लेखक और कला सिद्धांतकार आंद्रे मालरॉक्स ने स्पष्ट रूप से कहा है कि संस्मरण लिखने का उनका लक्ष्य केवल व्यक्तित्व या व्यक्तिगत रहस्यों पर केंद्रित नहीं था। इसके बजाय,  संस्मरण का लक्ष्य बाह्य जगत के साथ एक विशिष्ट संबंध अभिव्यक्त करना कहा जा सकता है। इसलिए संस्मरण लिखते समय रचनाकार के अंतस में प्रश्न उठना लाजिमी है कि ‘मुझे उन चीज़ों के बारे में चिंतित क्यों होना चाहिए जो केवल मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं?’ कहने का तात्पर्य यह है  कि पाठकों को केवल व्यक्तिपरक दृष्टिकोण में रुचि नहीं होगी । यह दृष्टिकोण, जिसमें व्यापक और अधिक महत्त्वपूर्ण सामाजिक या सांस्कृतिक आलोचना व्यक्त करने के लिए व्यक्तिगत अनुभवों को व्यक्त करना शामिल है, संस्मरण में किसी के रचनात्मक स्व को प्रतिबिंबित करने की कठिनाइयों पर विचार करते समय विशेष रूप से प्रासंगिक है। इस प्रयास में किसी की व्यक्तिगत सीमाओं से परे जाकर व्यापक दर्शकों से जुड़ना या एक संदेश देना शामिल है जो सभी पर लागू होता है (ली गुटकाइंड)।

इस किताब से गुजरते हुए इस के कई हिस्सों से लोग अपने को जोड़ कर देख सकते हैं या किताब ही आप से एक सम्बन्ध बना लेगी। कोई अभाव, संकट, या कोई दुर्घटना या अपने से ही चलता हुआ स्वयं का संघर्ष पाठकों को अपने जीवन का बीता हुआ हिस्सा जैसा प्रतीत होगा और लेखक का उन बाधाओं से पार हो जाना, एक प्रेरणा और उत्साह भरता प्रतीत होता है। इस सन्दर्भ में किर्नी कहते हैं कि रचनात्मक सफ़र में भूले-बिसरे दुखों या दर्दनाक यादों के बारे में दोबारा गौर करना और लिखना दूसरों को जीवन की राह में आई बाधाओं को दूर करने के लिए प्रकाश दिखला सकता है।

संस्मरण के कई हिस्सों के केंद्र में अस्पताल नज़र आया है और वहाँ से कई कहानियाँ निकलती हैं। उन कहानियों के साथ चलते हुए पता ही नहीं चलता कि कब एक कहानी से दूसरी कहानी शुरू हो जाती है…जो फिर से आपको अचानक अस्पताल में ही वापस लेकर आती है। हर कहानी अपने ढंग से इस कहानी के नायक के व्यक्तित्व के कुछ हिस्सों के बारे में कुछ बता जाती है। यदि हम इन सारी कहानियों को एक साथ रखकर अतीत के एक सैरबीन की तरह देखने की कोशिश करें तो हमें मनोवैज्ञानिक गेस्टाल्ट का सिद्धांत याद आ जाता है जो हमें यह बताता है कि ‘होल इज ऑलवेज ग्रेटर देन इट्स पार्ट’। इस संस्मरण संग्रह के संदर्भ में तो यह पूरा-पूरा ही सही नजर आता है।

लेखक को जानने को लेकर हमेशा हमारे मन में एक भ्रम होता है। अगर लेखक अति प्रिय हो तो फिर कहना ही क्या। वो हमारे लिए नायक सरीखी भूमिका में हो जाता है । पर एक उम्र में जाते-जाते हमें यह महसूस होता है कि हमारा नायक एक इंसान होकर ही नायक बना है। ये किताब एक इंसान के नायक बनने का दस्तावेज भी है। यतीश कुमार एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैं। सरकारी सफलताओं को अगर किनारे भी रख दिया जा, हालाँकि यहाँ एक संकट है कि वे सफलताएँ इतनी ज़्यादा हैं कि जिस तरफ़ भी मैं रखना चाहूँगा वो पलड़ा भारी रहेगा। फ़िलहाल ये किताब हमें इनके सृजन से सर्जनात्मक सफ़र का जो हाल बयान करती है, उससे गुजरते हुए मुझे अपनी एक ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ याद आती है-

एक दिलासा थपकी लोरी कितनी ताकत बो जाते हैं

मुश्किल दर्द मुसीबत जिसके आगे बौने हो जाते हैं

शिकवे लाज़िम हैं मनमाफ़िक चीज नहीं मिल पाए तो पर

बापू के हाथों के छाले सारे शिकवे धो जाते हैं

सबकी किस्मत में कब होते हैं गुड्डे गुड़ियों के दिन

जीने की जद्दोज़हद में कितने बचपन खो जाते हैं

सुनने में वैसे ही लगते खुशियाँ सपने मंज़िल लेकिन

ग़ुरबत में लफ़्ज़ों के मतलब बदले-बदले हो जाते हैं

मजबूरी का पत्थर सीने पर रखकर माँ ने बोला था

भूख लगे तो अच्छे बच्चे आँसू पीकर सो जाते हैं ।।

उर्मिला मौसी, शांति मौसी, डाकिया चाचा, डॉक्टर साहब, बड़की अम्मा, भांग की गोली और कितनी कुछ बातें हैं, कितने किरदार है औऱ इस संस्मरण में हर एक का अपना योगदान है। हाफ पैंट वाले चीकू को आज का यतीश बनाने में हर कहानी, हर किस्सा अपनी अहमियत बतलाने की कोशिश करता है। अपने हिस्से की पीड़ा बताता है। अपने हिस्से का सच बयां करता है। पूरा सच जानने के लिए चीकू की बातों को, कहे दर्द को और शब्दों के बीच छुपे अनकहे दर्द को समझना पड़ेगा। जब वह जोश मलीहाबादी के शब्दों को लेकर अपनी बात कहता है कि..

मेरे रोने का जिसमें किस्सा है

उम्र का बेहतरीन हिस्सा है ।।

More From Author

सुरेश पंत की किताबों ‘शब्दों के साथ-साथ’ व ‘शब्दों के साथ-साथ-2’ की समीक्षा

संदीप तिवारी की कविताएँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी