मीडिया को अपनी लक्ष्मण रेखा का अहसास नहीं है!

आज \’प्रभात खबर\’ के संपादक हरिवंश ने मीडिया को लेकर एक आत्मालोचन परक लेख लिखा है. पढ़ने के काबिल लगा तो सोचा आप सबको भी पढ़वाऊं- प्रभात रंजन.
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मीडिया की ताकत क्या है? अगर मीडिया के पास कोई शक्ति है, तो उसका स्रोत क्या है? क्यों लगभग एक सदी पहले कहा गया कि जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो? सरकार को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. न्यायपालिका अधिकारों के कारण ही विशिष्ट है. विधायिका की संवैधानिक भूमिका है, उसे संरक्षण भी है. पर संविधान में अखबारों, टीवी चैनलों या मीडिया को अलग से एक भी अधिकार है? फिर मीडिया का यह महत्व क्यों? जिसके पीछे सत्ता है, जिसे कानूनी अधिकार मिले हैं, सीमित-असीमित, वह तो समाज में सबसे विशिष्ट या महत्वपूर्ण है ही, पर मीडिया के पास तो न संवैधानिक अधिकार है, न संरक्षण. फिर भी उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. क्यों? 

मीडिया के पास महज एक और एक ही शक्ति स्रोत है. वह है उसकी साख. मीडिया का रामबाण भी और लक्ष्मण रेखा भी. छपे पर लोग यकीन करते हैं. लोकधारणा है कि शब्द, सरस्वती के प्रसाद हैं. सरस्वती देवी, विद्या, ज्ञान की देवी या अधिष्ठात्री हैं. वे सबसे पूज्य, पवित्र और ईश्‍वरीय हैं. ज्ञान का संबंध जीवन के प्रकाश (सच, तथ्यपूर्ण, हकीकत, यथार्थ वगैरह) से है, अंधेरे (झूठ, छल, प्रपंच, छद्म वगैरह) से नहीं. सरस्वती हमारे मानस में प्रकाश की, ज्ञान की, मनुष्य के अंदर जो भी सर्वश्रेष्ठ-सुंदर है, उसकी प्रतीक हैं. इसलिए छपे शब्द, ज्ञान या प्रकाशपुंज के प्रतिबिंब हैं. इसलिए हमारे यहां माना गया है कि छपे शब्द गलत हो ही नहीं सकते. सरस्वती के शब्दों पर तिजारत नहीं हो सकती. यही और यही एकमात्र मीडिया की ताकत है. शक्ति-स्रोत है. लोग मानते हैं कि जो छपा, वही सही है. टीवी चैनल, रेडियो, इंटरनेट, ब्लाग्स वगैरह सब इसी प्रिंट मीडिया’ (छपे शब्दों) के एक्सटेंशन’ (विस्तार) हैं. इसलिए इनके पास भी वही ताकत या शक्ति-स्रोत है, जो प्रिंट मीडिया के पास थी.

इस तरह, मीडिया के पास लोक साख की अपूर्व ताकत है. यह संविधान से भी ऊपर है. इसलिए संविधान के अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ (जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं) भी मीडिया की इस अघोषित साख के सामने झुकते हैं. न चाहते हुए भी उसकी ताकत-महत्व को मानने-पहचानने
के लिए बाध्य हैं.

पर, मीडिया जगत को महज अपनी असीमित ताकत, भूमिका और महत्व का ही एहसास है, लक्ष्मण रेखा का नहीं. 

और लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का बार-बार अवसर नहीं मिलता! यह लोक जीवन का यथार्थ है. मीडिया अपनी एकमात्र पूंजी साख को बार-बार दांव पर लगाने लगे, तो क्या होगा? दांव पर लगाने के लिए फिर कोई दूसरी पूंजी नहीं है. ‘91 के उदारीकरण के दोनों असर हुए, अच्छे व बुरे भी. जीवन-देश के हर क्षेत्र में. मीडिया में भी. 1991 से ही शुरू हुई, पेज-थ्री संस्कृति. यह नयी बहस कि मीडिया का काम मनोरंजन करना है और सूचना देना भर है. इसी दौर में मीडिया में बड़ी पूंजी आयी, नौकरी की शर्तें बेहतर हुईं, पर यह सिद्धांत भी आया कि अब यह शुद्ध व्यवसाय है. विज्ञापन का व्यवसाय. खबरों का धंधा. इसका मकसद भी अधिकतम मुनाफा’ (प्राफिट मैक्सिमाइजेशन) है. 1991 के उदारीकरण के बाद नया दर्शन था, हर क्षेत्र में निवेश पर कई गुणा रिटर्न या आमद यानी प्राफिट मैक्सिमाइजेशन. पर, जीवन के यथार्थ कुछ और भी हैं. जैसे रेत से तेल नहीं निकलता. उसी तरह मीडिया व्यवसाय में भी नैतिक ढंग से, वैधानिक ढंग से, स्वस्थ मूल्यों के साथ अधिकतम वैधानिक कमाईकी सीमा थी. चाहे प्रिंट मीडिया हो या न्यूज चैनल या रेडियो वगैरह.

तब शुरू क्या हुआ? 

साख से सौदेबाजी. अपनी एकमात्र नैतिक ताकत की नीलामी! हुआ तो बहुत कुछ है, पर इसके पहले बताते चलें कि हो क्या सकता था? ईमानदारी से मीडिया के धुरंधर और बड़े लोग कोशिश करते कि मीडिया का ईमानदार आर्थिक मॉडलढूंढा जाये. इसके रास्ते थे, बड़ी तनख्वाहों पर पाबंदी लगती या कटौती होती. अखबारों की कीमतें बढ़ाई जातीं. समाज को बताया जाता कि ईमानदार मीडिया चाहते हैं, तो अखबार की अधिक कीमत देनी पड़ेगी. मुफ्त अखबार (दो-तीन रुपये में) चाहिए और ईमानदार पत्रकारिता, यह संभव नहीं. पाकिस्तान के अखबार आज भारत के अखबारों से काफी महंगे है, पर वे बिकते हैं. यह उल्लेख करना सही होगा कि पाकिस्तान की मीडिया ने वहां के तानाशाहों के खिलाफ जो साहस दिखाया, वह साहस तो भारत में है ही नहीं. वह भी भारतीय लोकतंत्र के अंदर. फिर भी गरीब पाकिस्तानी अधिक कीमत देकर अपनी ईमानदार मीडिया को बचाये हुए है. 

गांधी ने जब अपनी पत्रिका इंडियन ओपिनियनशुरू की थी, तो उन्हें इस द्वंद्व से गुजरना पड़ा. वगैर विज्ञापन, पत्रिका घाटे का सौदा थी. विज्ञापन से समझौते की शर्तें शुरू होती थीं. साख या मीडिया की एकमात्र नैतिक ताकत से सौदेबाजी, उन्हें पसंद नहीं आयी. इस द्वंद्व पर उन्होंने बहुत सुंदर विवेचन किया है. उदारीकरण के बाद उनका यह विवेचन, भारतीय मीडिया के लिए आदर्श हो सकता था. रोल मॉडल या लाइट हाउस की तरह पथ प्रदर्शक. पर हमने क्या रास्ता चुना? आसान-सुविधाजनक!

इसकी शुरुआत भी बड़े लोगों ने की. पहले एडवरटोरियलछपने लगे. खबर या रिपोर्ट की शक्ल में विज्ञापन. फिर पार्टियों की तसवीरें छपने लगीं, पैसे लेकर. फिर शेयर बाजार का उफान (बूम’) आया. कंपनियों के शेयर लेकर उन्हें प्रमोट करने का काम मीडिया जगत करने लगा. इस प्रक्रिया में हर्षद मेहता, केतन पारिख, यूएस-64 जैसे न जाने कितने लूट या सार्वजनिक डाका प्रकरण हुए. कितने हजार या लाखों करोड़ डूब गये या लूटे गये? मीडिया का तो फर्ज था, इन लोभी ताकतों से देश को आगाह करना. यह सवाल मीडिया उठाता कि रजत गुप्ता जैसे इंसान (जिस आदमी ने उल्लेखनीय बड़े काम किये, इंडियन बिजनेस स्कूल, हैदराबाद की स्थापना के अतिरिक्त अनेक काम) ने भी गलती की, तो अमेरिकी कानून ने दोषी माना. सख्त सजा दी. उस इंसान को जिसका समाज के प्रति बड़ा योगदान रहा है. देश-विदेश के कारपोरेट वर्ल्ड में. पर भारत में कितने हर्षद मेहता, केतन पारिख या यूएस-64 के लुटेरे या राजा या कनिमोझी या कलमाड़ी जैसे लोगों को सजा मिली? सार्वजनिक लूट के लिए आज तक भारत में किसी को सजा मिली है? मीडिया का धर्म था यह देखना. मीडिया ने 1991-2010 के बीच यह नहीं देखा. परिणाम आज देश में घोटालों का भूचाल-विस्फोट का दौर आ गया है.

पर, मीडिया में भी खबरें बिकने लगीं. पेड न्यूजकी शुरुआत का दौर. खबर, जिस पर लोग यकीन करते हैं, वही बिकने लगी. एकमात्र साख से सौदेबाजी. फिर 2जी प्रकरण हुआ. मीडिया जगत के बड़े स्तंभ, नाम और घराने इसमें घिरे. अब ताजा प्रकरण जिंदल और जी न्यूज विवाद का है. इसके पहले भी इंडियन एक्सप्रेस में कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य चैनलों के बारे मे कह चुके हैं कि कैसे उनके टॉप लोग आकर धमकी देते हैं. विज्ञापन मांगते हैं! हम नहीं जानते कौन सही है या कौन गलत! हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि मीडिया में होने के कारण, हम सब इसके लिए जिम्मेवार हैं. कुछेक दोषी, कुछेक पाक-साफ, यह कहना या बताना भी हमारा मकसद नहीं.

पर, मीडिया अपनी आभा खो रही है. उसका सात्विक तेज खत्म हो रहा है. समाज में उसके प्रति अविश्‍वास ही नहीं, नफरत
भी बढ रही है. यह किसी बाहरी सत्ता के कारण या हस्तक्षेप के कारण नहीं
, खुद हम मीडिया के लोग कालिदास की भूमिका में हैं. साख की जिस एकमात्र डाल पर बैठे हैं, उसे ही काट रहे हैं. क्या मीडिया के अंदर से यह आवाज नहीं उठनी चाहिए कि हम अपनी एकमात्र पूंजी, साख बचायें? यह सवाल आज बहस का विषय नहीं. एक दूसरे पर दोषारोपण का भी नहीं. हम सही, आप गलत के आरोप-प्रत्यारोप का भी नहीं. हर मीडियाकर्मी अपनी अंतरात्मा से आज यह सवाल करे, तो शायद बात बने!

आज समाज में विश्‍वास का संकट है. हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं. इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्‍वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए. इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे. यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है. इसके लिए बड़े मीडिया घरानों को एक मंच पर बैठना होगा. निजी हितों और पूर्वग्रह से ऊपर उठना होगा. अपने लोभ और असीमित धन कमाने की इच्छा को रोकना होगा. इस प्रयास से मीडिया को अपनी साख पुन: बनाने का अवसर मिलेगा. मीडिया की साख बढ़ेगी, आर्थिक विकास तेज होगा, तो इसका लाभ मीडिया उद्योग जगत को भी मिलेगा. मुद्दा है, संयम से काम करने का, अनुशासन में काम करने का और अचारसंहिता बना कर मीडिया की सही भूमिका में उतरने का. इसके साथ ही मीडिया की पहल पर कोई कारगर संवैधानिक व्यवस्था बने, तो मीडिया में वैल्यूज-इथिक्स (मूल्य-अचारसंहिता) की मानिटरिंग (निगरानी) करे. अगर मीडिया की सहमति से यह सब हो, तो मीडिया सचमुच भारत बदलने की प्रभावी भूमिका में होगी. याद करिए, कुछेक वर्ष पहले चंडीगढ. प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिजनेस पेपर (पिंक पेपर्स) के बारे में क्या कहा था? बड़े संगीन और गंभीर आरोप लगाये थे. उदाहरण समेत. कहा, कैसे खराब कंपनियों के शेयर भाव अचानक बढ़ाए जाते हैं और अच्छी कंपनियों के भाव गिराये जाते हैं? यह खेल कौन और कैसे अखबार करते हैं, यह सबको पता है.

प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर एडीटर्स गिल्ड ने तब कमेटी भी बनायी. इससे अजीत भट्टाचार्जी जैसे पत्रकार भी जुड़े. कमेटी की रिपोर्ट आयी. उस रिपोर्ट को मीडिया में लागू करने की बात उठी, पर सब कुछ भुला दिया गया.

मीडिया घराने सार्वजनिक क्षेत्र या जीवन से जुड़े हैं. आज के माहौल में जरूरत है कि वे सभी अपने कामकाज को सार्वजनिक और पारदश्री बनाये. अंतत: इससे, इनके प्रति आस्था बढ़ेगी इसी तरह यह काम आज मीडिया के हित में तो है ही, समाज के हित में है और देश के हित में भी.

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आज ‘प्रभात खबर‘ के संपादक हरिवंश ने मीडिया को लेकर एक आत्मालोचन परक लेख लिखा है. पढ़ने के काबिल लगा तो सोचा आप सबको भी पढ़वाऊं- प्रभात रंजन.
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मीडिया की ताकत क्या है? अगर मीडिया के पास कोई शक्ति है, तो उसका स्रोत क्या है? क्यों लगभग एक सदी पहले कहा गया कि जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो? सरकार को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. न्यायपालिका अधिकारों के कारण ही विशिष्ट है. विधायिका की संवैधानिक भूमिका है, उसे संरक्षण भी है. पर संविधान में अखबारों, टीवी चैनलों या मीडिया को अलग से एक भी अधिकार है? फिर मीडिया का यह महत्व क्यों? जिसके पीछे सत्ता है, जिसे कानूनी अधिकार मिले हैं, सीमित-असीमित, वह तो समाज में सबसे विशिष्ट या महत्वपूर्ण है ही, पर मीडिया के पास तो न संवैधानिक अधिकार है, न संरक्षण. फिर भी उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. क्यों? 

मीडिया के पास महज एक और एक ही शक्ति स्रोत है. वह है उसकी साख. मीडिया का रामबाण भी और लक्ष्मण रेखा भी. छपे पर लोग यकीन करते हैं. लोकधारणा है कि शब्द, सरस्वती के प्रसाद हैं. सरस्वती देवी, विद्या, ज्ञान की देवी या अधिष्ठात्री हैं. वे सबसे पूज्य, पवित्र और ईश्‍वरीय हैं. ज्ञान का संबंध जीवन के प्रकाश (सच, तथ्यपूर्ण, हकीकत, यथार्थ वगैरह) से है, अंधेरे (झूठ, छल, प्रपंच, छद्म वगैरह) से नहीं. सरस्वती हमारे मानस में प्रकाश की, ज्ञान की, मनुष्य के अंदर जो भी सर्वश्रेष्ठ-सुंदर है, उसकी प्रतीक हैं. इसलिए छपे शब्द, ज्ञान या प्रकाशपुंज के प्रतिबिंब हैं. इसलिए हमारे यहां माना गया है कि छपे शब्द गलत हो ही नहीं सकते. सरस्वती के शब्दों पर तिजारत नहीं हो सकती. यही और यही एकमात्र मीडिया की ताकत है. शक्ति-स्रोत है. लोग मानते हैं कि जो छपा, वही सही है. टीवी चैनल, रेडियो, इंटरनेट, ब्लाग्स वगैरह सब इसी प्रिंट मीडिया’ (छपे शब्दों) के एक्सटेंशन’ (विस्तार) हैं. इसलिए इनके पास भी वही ताकत या शक्ति-स्रोत है, जो प्रिंट मीडिया के पास थी.

इस तरह, मीडिया के पास लोक साख की अपूर्व ताकत है. यह संविधान से भी ऊपर है. इसलिए संविधान के अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ (जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं) भी मीडिया की इस अघोषित साख के सामने झुकते हैं. न चाहते हुए भी उसकी ताकत-महत्व को मानने-पहचानने के लिए बाध्य हैं.

पर, मीडिया जगत को महज अपनी असीमित ताकत, भूमिका और महत्व का ही एहसास है, लक्ष्मण रेखा का नहीं. 

और लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का बार-बार अवसर नहीं मिलता! यह लोक जीवन का यथार्थ है. मीडिया अपनी एकमात्र पूंजी साख को बार-बार दांव पर लगाने लगे, तो क्या होगा? दांव पर लगाने के लिए फिर कोई दूसरी पूंजी नहीं है. ‘91 के उदारीकरण के दोनों असर हुए, अच्छे व बुरे भी. जीवन-देश के हर क्षेत्र में. मीडिया में भी. 1991 से ही शुरू हुई, पेज-थ्री संस्कृति. यह नयी बहस कि मीडिया का काम मनोरंजन करना है और सूचना देना भर है. इसी दौर में मीडिया में बड़ी पूंजी आयी, नौकरी की शर्तें बेहतर हुईं, पर यह सिद्धांत भी आया कि अब यह शुद्ध व्यवसाय है. विज्ञापन का व्यवसाय. खबरों का धंधा. इसका मकसद भी अधिकतम मुनाफा’ (प्राफिट मैक्सिमाइजेशन) है. 1991 के उदारीकरण के बाद नया दर्शन था, हर क्षेत्र में निवेश पर कई गुणा रिटर्न या आमद यानी प्राफिट मैक्सिमाइजेशन. पर, जीवन के यथार्थ कुछ और भी हैं. जैसे रेत से तेल नहीं निकलता. उसी तरह मीडिया व्यवसाय में भी नैतिक ढंग से, वैधानिक ढंग से, स्वस्थ मूल्यों के साथ अधिकतम वैधानिक कमाईकी सीमा थी. चाहे प्रिंट मीडिया हो या न्यूज चैनल या रेडियो वगैरह.

तब शुरू क्या हुआ? 

साख से सौदेबाजी. अपनी एकमात्र नैतिक ताकत की नीलामी! हुआ तो बहुत कुछ है, पर इसके पहले बताते चलें कि हो क्या सकता था? ईमानदारी से मीडिया के धुरंधर और बड़े लोग कोशिश करते कि मीडिया का ईमानदार आर्थिक मॉडलढूंढा जाये. इसके रास्ते थे, बड़ी तनख्वाहों पर पाबंदी लगती या कटौती होती. अखबारों की कीमतें बढ़ाई जातीं. समाज को बताया जाता कि ईमानदार मीडिया चाहते हैं, तो अखबार की अधिक कीमत देनी पड़ेगी. मुफ्त अखबार (दो-तीन रुपये में) चाहिए और ईमानदार पत्रकारिता, यह संभव नहीं. पाकिस्तान के अखबार आज भारत के अखबारों से काफी महंगे है, पर वे बिकते हैं. यह उल्लेख करना सही होगा कि पाकिस्तान की मीडिया ने वहां के तानाशाहों के खिलाफ जो साहस दिखाया, वह साहस तो भारत में है ही नहीं. वह भी भारतीय लोकतंत्र के अंदर. फिर भी गरीब पाकिस्तानी अधिक कीमत देकर अपनी ईमानदार मीडिया को बचाये हुए है. 

गांधी ने जब अपनी पत्रिका इंडियन ओपिनियनशुरू की थी, तो उन्हें इस द्वंद्व से गुजरना पड़ा. वगैर विज्ञापन, पत्रिका घाटे का सौदा थी. विज्ञापन से समझौते की शर्तें शुरू होती थीं. साख या मीडिया की एकमात्र नैतिक ताकत से सौदेबाजी, उन्हें पसंद नहीं आयी. इस द्वंद्व पर उन्होंने बहुत सुंदर विवेचन किया है. उदारीकरण के बाद उनका यह विवेचन, भारतीय मीडिया के लिए आदर्श हो सकता था. रोल मॉडल या लाइट हाउस की तरह पथ प्रदर्शक. पर हमने क्या रास्ता चुना? आसान-सुविधाजनक!

इसकी शुरुआत भी बड़े लोगों ने की. पहले एडवरटोरियलछपने लगे. खबर या रिपोर्ट की शक्ल में विज्ञापन. फिर पार्टियों की तसवीरें छपने लगीं, पैसे लेकर. फिर शेयर बाजार का उफान (बूम’) आया. कंपनियों के शेयर लेकर उन्हें प्रमोट करने का काम मीडिया जगत करने लगा. इस प्रक्रिया में हर्षद मेहता, केतन पारिख, यूएस-64 जैसे न जाने कितने लूट या सार्वजनिक डाका प्रकरण हुए. कितने हजार या लाखों करोड़ डूब गये या लूटे गये? मीडिया का तो फर्ज था, इन लोभी ताकतों से देश को आगाह करना. यह सवाल मीडिया उठाता कि रजत गुप्ता जैसे इंसान (जिस आदमी ने उल्लेखनीय बड़े काम किये, इंडियन बिजनेस स्कूल, हैदराबाद की स्थापना के अतिरिक्त अनेक काम) ने भी गलती की, तो अमेरिकी कानून ने दोषी माना. सख्त सजा दी. उस इंसान को जिसका समाज के प्रति बड़ा योगदान रहा है. देश-विदेश के कारपोरेट वर्ल्ड में. पर भारत में कितने हर्षद मेहता, केतन पारिख या यूएस-64 के लुटेरे या राजा या कनिमोझी या कलमाड़ी जैसे लोगों को सजा मिली? सार्वजनिक लूट के लिए आज तक भारत में किसी को सजा मिली है? मीडिया का धर्म था यह देखना. मीडिया ने 1991-2010 के बीच यह नहीं देखा. परिणाम आज देश में घोटालों का भूचाल-विस्फोट का दौर आ गया है.

पर, मीडिया में भी खबरें बिकने लगीं. पेड न्यूजकी शुरुआत का दौर. खबर, जिस पर लोग यकीन करते हैं, वही बिकने लगी. एकमात्र साख से सौदेबाजी. फिर 2जी प्रकरण हुआ. मीडिया जगत के बड़े स्तंभ, नाम और घराने इसमें घिरे. अब ताजा प्रकरण जिंदल और जी न्यूज विवाद का है. इसके पहले भी इंडियन एक्सप्रेस में कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य चैनलों के बारे मे कह चुके हैं कि कैसे उनके टॉप लोग आकर धमकी देते हैं. विज्ञापन मांगते हैं! हम नहीं जानते कौन सही है या कौन गलत! हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि मीडिया में होने के कारण, हम सब इसके लिए जिम्मेवार हैं. कुछेक दोषी, कुछेक पाक-साफ, यह कहना या बताना भी हमारा मकसद नहीं.

पर, मीडिया अपनी आभा खो रही है. उसका सात्विक तेज खत्म हो रहा है. समाज में उसके प्रति अविश्‍वास ही नहीं, नफरत भी बढ रही है. यह किसी बाहरी सत्ता के कारण या हस्तक्षेप के कारण नहीं, खुद हम मीडिया के लोग कालिदास की भूमिका में हैं. साख की जिस एकमात्र डाल पर बैठे हैं, उसे ही काट रहे हैं. क्या मीडिया के अंदर से यह आवाज नहीं उठनी चाहिए कि हम अपनी एकमात्र पूंजी, साख बचायें? यह सवाल आज बहस का विषय नहीं. एक दूसरे पर दोषारोपण का भी नहीं. हम सही, आप गलत के आरोप-प्रत्यारोप का भी नहीं. हर मीडियाकर्मी अपनी अंतरात्मा से आज यह सवाल करे, तो शायद बात बने!

आज समाज में विश्‍वास का संकट है. हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं. इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्‍वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए. इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे. यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है. इसके लिए बड़े मीडिया घरानों को एक मंच पर बैठना होगा. निजी हितों और पूर्वग्रह से ऊपर उठना होगा. अपने लोभ और असीमित धन कमाने की इच्छा को रोकना होगा. इस प्रयास से मीडिया को अपनी साख पुन: बनाने का अवसर मिलेगा. मीडिया की साख बढ़ेगी, आर्थिक विकास तेज होगा, तो इसका लाभ मीडिया उद्योग जगत को भी मिलेगा. मुद्दा है, संयम से काम करने का, अनुशासन में काम करने का और अचारसंहिता बना कर मीडिया की सही भूमिका में उतरने का. इसके साथ ही मीडिया की पहल पर कोई कारगर संवैधानिक व्यवस्था बने, तो मीडिया में वैल्यूज-इथिक्स (मूल्य-अचारसंहिता) की मानिटरिंग (निगरानी) करे. अगर मीडिया की सहमति से यह सब हो, तो मीडिया सचमुच भारत बदलने की प्रभावी भूमिका में होगी. याद करिए, कुछेक वर्ष पहले चंडीगढ. प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिजनेस पेपर (पिंक पेपर्स) के बारे में क्या कहा था? बड़े संगीन और गंभीर आरोप लगाये थे. उदाहरण समेत. कहा, कैसे खराब कंपनियों के शेयर भाव अचानक बढ़ाए जाते हैं और अच्छी कंपनियों के भाव गिराये जाते हैं? यह खेल कौन और कैसे अखबार करते हैं, यह सबको पता है.

प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर एडीटर्स गिल्ड ने तब कमेटी भी बनायी. इससे अजीत भट्टाचार्जी जैसे पत्रकार भी जुड़े. कमेटी की रिपोर्ट आयी. उस रिपोर्ट को मीडिया में लागू करने की बात उठी, पर सब कुछ भुला दिया गया.

मीडिया घराने सार्वजनिक क्षेत्र या जीवन से जुड़े हैं. आज के माहौल में जरूरत है कि वे सभी अपने कामकाज को सार्वजनिक और पारदश्री बनाये. अंतत: इससे, इनके प्रति आस्था बढ़ेगी इसी तरह यह काम आज मीडिया के हित में तो है ही, समाज के हित में है और देश के हित में भी.

9 thoughts on “मीडिया को अपनी लक्ष्मण रेखा का अहसास नहीं है!

  1. तकदीर ज़माने वालो की स्याही ही लिखा करती है,
    हमने देखा था अकबारों को बिकते हुए,
    लोग कहते हैं खबरे भी बीका करती है,,,,,,,,पंकज !!!

  2. मेरी समझ में यह भी नहीं आता कि कोई संपादक एक अखबार का मालिक क्यों और कैसे बन जाता है। सुना है हिरवंश जी अब प्रभात खबर के मालिक भी हैं।

  3. बड़ा सात्विक लेख है। न किसी का नाम, न कोई केस,न कॉरपोरेट पूंजी के दबावों का जि़क्र। पानी में रह के मगर से बैर नहीं मोलते हरिवंश जी। समझदार जो हैं।

  4. हरिवंश जी जिस साख की बात करते हैं. उनके भी अखबार पर इसका संकट देखा जा सकता है। पटना से लेकर रांची तक अखबारी दुनिया पर नजर रखने वाले जानते हैं कि हरिवंश जी भी नीतीश कुमार के खिलाफ खबरें छापने से परहेज करते हैं। उनके यहां नीतीश कुमार के खिलाफ लेख नहीं छपते। प्रभात खबर के जिम्मेदार लोगों का जवाब होता है कि अभी नीतीश कुमार को मौका देना चाहिए। हरिवंश जी की इसके बाद भी साख बनी हुई है। सवाल यह है कि आखिर किसी के खिलाफ छापने और न छापने की सीमारेखा क्या हो..क्या इसके लिए अंदरूनी समझौते जरूरी होते हैं। इस सवाल का जवाब भी हरिवंश जी को देना चाहिए। तभी उनकी चिंताओं की असलियत समझ में आ सकती है।

  5. Pingback: 호두코믹스

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