वीरू सोनकर की प्रेम कविताएं

मार-तमाम कविताएं लिखी जा रही हैं. सब में एक दूसरे की छाया होती है. लेकिन वीरू सोनकर की कविताओं में एक अलग सी माया है. प्रेम की माया. बहुत कम समय में इस कवि ने अपनी भावप्रवणता के कारण सबका ध्यान खींचा है. खासकर उसकी प्रेम कविताओं ने. आज इस युवा कवि की कुछ प्रेम कविताएं- मॉडरेटर 
==================================================================

मेरे प्रेम
1- 
भोर के प्रथम पहर में,
जब शिव आरती से गलियां गूंजने लगती है
काशी विश्वनाथ की कतार बद्ध पंक्तियों के बीच,
कहीं हम मिलते है
और
तब हमारी आँखे कह उठती है
बनारस की सुबह से भी सुन्दर
“हमारा प्रेम है”
अचानक से,
मंदिर की सभी घंटियां बज कर
हमे आशीर्वाद देने लगती है
और हम जान जाते है
हमारे प्रेम को किसी कसम की जरुरत नहीं !
2-
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के पार्क में
तुम्हारी पीएचडी की बुक पलटते हुए,
अक्सर, मैं हैरान हो जाता था
और तुम कह देती थी
बाबू
ये आपके लिए नहीं !
तब मैं जानता था,
तुम चाहती थी की मैं तुम्हारी आँखों को पढूं
सिर्फ तुम्हारी आँखों को…
मेरा प्रेम गवाह है !
मैंने तुम्हे पढ़ा
बखूबी पढ़ा
खूब खूब पढ़ा…
3-
 शिला !
तुम्हारे नाम का उपनाम,
जब मैंने जाना तुम्हारा उपनाम तुम्हे कितना प्रिय है
तब हमने ये तय किया था
यही नाम हमारे बच्चे भी धारण करेंगे
यही नाम !
मेरे प्रेम
तब नहीं पता था
ये उपनाम तो बना रहेगा तुम्हारे साथ
पर मैं अकेला ही रह जाऊंगा
तुम्हारे बिना..
4-
 दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर हम बैठते है
और याद करते है
हमसे पहले
हजारो हजार साल पहले से
लोग यहाँ आते है
और
हमको हमारा प्रेम
अनवरत जारी गंगा आरती से भी पुराना लगता है
हम खुद को किसी किवदंती सा समझते है
और चुप चाप गंगा को देखते है
हमारे पैर
एक लय में हिलते है
जैसे हम किसी स्कूल के अल्हड बच्चे हो,
हम एक साथ कोई फ़िल्मी गीत गाते है
हमारे पैर और तेज़ हिलते है !
हम वहां की सांसे खींच खींच कर अपने फेफड़ो में जमा करते है
और एक दूसरे को देखते है
तय करते है—
जब तक ये गंगा है
ये गंगा आरती है
और हम है…
तब तक ये प्रेम बना रहेगा
5-
गोदौलिया के बाजार की भारी भीड़ में तुम दुकानदार से लड़ती हो,
पंद्रह रुपये की झुमकी को पांच रुपये की बता कर,
और मैं हँसता हूँ !
तब मैंने
तुम्हे बिना बताये कुछ बेहद महंगे स्वप्न ख़रीदे थे
तब, जब तुम बाजार में टुच्चा सा मोलभाव कर रही थी
उन महंगे स्वप्नों में तुम थी
अपने उपनाम के साथ
शिला !
उन स्वप्नों की कीमत आज तक अदा की जा रही है
और शायद तभी
आज तक
मेरे हाथ में नकद नहीं रुकता…
6-
कहते है की,
शिव अपने भक्तो की खबर “नंदी” से लेते है
और हमने नंदी को भी खूब पटियाया था
सर से लेकर पुंछ तक जल अर्पण करके हम अपना काम उनके कानो में बताते थे
याद करो !
हम युगलप्रेमी नंदी के कानो में एक दूसरे का प्यार बता रहे थे
और तुमने आगे बढ़ कर
कहा था
बाबा हमे सात फेरे लेने है !
और,
मेरा गला रुंध गया था !
7-
 शिला सुनो
मेरे प्रेम सुनो !
वह महंगे स्वप्न
वह गंगा घाट
वह पुरातन काल का समझा हुआ प्रेम
तुम्हारी पीएचडी की बुक्स
तुम्हारे कैम्पस में संग संग की गयी वह चहल कदमी
शिला,
वह सब कभी याद नहीं आता
याद आता है
तुम्हारा आगे बढ़ कर
नंदी के कानो में कहा गया वह वाक्य,
बाबा हम सात फेरे लेंगे !
बाबा हम सात फेरे लेंगे !
बाबा हम सात फेरे लेंगे !
आगे बढ़ कर पीछे लौटना,
हमेशा-हमेशा के लिए पीछे लौटना याद आता है
मुझे पक्का यकीन है
नंदी बहरे नहीं थे
कभी उनके पास जाना और देखना
वह आज भी हमारे और तुम्हारे इन्तजार में चुपचाप बैठे है
वही !
शिव के चरणों में,
हमारी अर्जी लिए हुए
नंदी को अभी तक खबर नहीं,
तुमने इन सब बातो को,
एक मजाक कहा था
सिर्फ एक मजाक…
शिला मेरे प्रेम सुनो,
लोग कहते है अब नंदी अर्जियां नहीं लेते
तो तुम जब भी उनके पास जाना
तो कानो में कह देना…
“बाबा वह सब मजाक था !”
सिर्फ मजाक…
मुझे यकीन है
हठी नंदी समझ जायेंगे……


More From Author

बिहार चुनाव के तनाव से बचना चाहते हैं तो पढ़िए ‘इश्कियापा’

दूधनाथ सिंह की कहानी ‘सरहपाद का निर्गमन’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी