सोशल मीडिया की ताकत और सिनेमा

युवा लेखक मिहिर पंड्या फिल्मों पर बहुत तैयारी के साथ लिखते हैं. हमेशा कोशिश करते हैं कि कुछ नया कहा जाए. इसलिए उनका लिखा अलग से दिखाई देता है, अलग सा दिखाई देता है. मिसाल के लिए सोशल मीडिया और सिनेमा के रिश्तों को लेकर लिखे गए उनके इस आलेख को ही लें. कितने कम शब्दों में उन्होंने कितना विचारोत्तेजक लिखा है- मॉडरेटर 
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दिल्ली में वह मानसून का सुहाना दिन था. मौसम के और दिनों की तरह ही सामान्य बरसाती सुबह, जब उत्तरी दिल्ली निवासी एक बेरोज़गार ब्लॉगर के फ़ोन की घंटी बजी. सामने किसी अपरिचित लड़की की अावाज़ थी, “मैं शिप ऑफ थीसियसटीम की तरफ से बोल रही हूँ. आनंद गांधी आपसे मिलना चाहते हैं. उन्होंने आपका फिल्म पर लिखा ब्लॉग पढ़ा है और वे बहुत खुश होंगे अगर आप उनसे मिल पायें.” और यहीं से इस चिठ्ठाकार के लिए सुबह की सामान्यता ख़त्म हो जाती है. सिनेमा पर और वो भी हिन्दी भाषा में, इस इंटरनेटी संजाल की किसी नितान्त अपरिचित सी गिरह में बैठकर लिखनेवाला चिठ्ठाकार ऐसे अनुभव के लिए रोज़ तैयार नहीं होता. लेकिन एक फिल्म पर लिखे नितान्त व्यक्तिगत निबंध के ऑनलाइन जाने के दो ही दिन के भीतर यह ब्लॉगर दक्षिण दिल्ली की एक कॉफ़ी शॉप की भीड़भरी चहलपहल के बीच आनंद गांधी के आमने-सामने बैठा है.

स्वागत है सिनेमा की इस नई जाँबाज़ दुनिया में, जहाँ नवेले फिल्मकार अपने दर्शक से सीधा संवाद बना रहे हैं और इसके ज़रिये बड़े पैसे और स्टारपावर का खेल बनते जा रहे हिन्दी सिनेमा की चौहद्दी को भेद उसमें घुसने का रास्ता बनाने के लिए प्रयासरत हैं. और इसका सबसे बेहतर माध्यम बन रहे हैं हालिया सालों में नमूदार हुए संचार के ये नित नए साधन, यानी सोशल मीडिया. यह उदाहरण भी सिनेमा की दुनिया के उस बदलते चेहरे की ओर इशारा करने के लिए है जिसके चलते सार्थक सिनेमा पैसे और प्रमोशन के सिनेमाई बियाबान में विस्तार की एक नई राह बना रहा है. शिप ऑफ थीसियसका उदाहरण यहाँ इसलिए खास है क्योंकि वीकेन्ड कलेक्शन की धूम वाले इस समय में इस फिल्म ने कामयाबी का उल्टा रास्ता चुना. बिना किसी स्टार और फिल्मी मसालेके अपने विचार पर खड़ा यह सिनेमा शायद बीते सालों के ऐसे चुनिंदा उदाहरणों में शामिल है जो पहले हफ्ते 6 शहरों में रिलीज़ होने के बाद दूसरे हफ्ते में चार अन्य तथा तीसरे हफ्ते में सत्रह अन्य शहरों के सिनेमाघरों तक पहुँची. 
फिल्म के निर्देशक आनंद गांधी ख़ास बातचीत में बताते हैं कि कैसे उनकी टीम के लिए यह फिल्म एक सामूहिक उत्सव था रचनाशीलता का और यही सामूहिकता का भाव उन्हें सोशल मीडिया को देखने का भिन्न नज़रिया देता है. ” प्रमोशनजैसा कोई शब्द ही हमारे सामने नहीं था. शिप ऑफ़ थीसियसहमारे लिए संवाद की प्रक्रिया थी, जिसमें हम न सिर्फ खुद से बल्कि अपने दर्शक से भी संवाद कर रहे थे. और सोशल मीडिया इस दौरान बहुत काम अाया. इसकी वजह से भौगोलिक दूरियाँ हमारी बाधा नहीं रहीं. हमारी फिल्म का दर्शक दुनिया में जहाँ कहीं भी हो, उससे हम तुरंत संवाद बना पाये. और यह मुझे अपने दर्शक से सीधा जुड़ने का भी मौका देता है. पहले फिल्मकार जैसे कोई चीज़ बनाकर देखनेवाले को दे देता था, ऐसे कि उसमें कोई रचनात्मक आवाजाही कभी नहीं रही. लेकिन हम शुरु से ही स्पष्ट थे कि इस फिल्म से संवाद की शुरुआत होनी है, उसका अन्त नहीं.” इस दौरान वे यह भी बताते हैं कि उनकी टीम द्वारा सोशल मीडिया पर किया गया मज़ेदार प्रयोग, जिसमें वे फ़ेसबुक पर दर्शकों से पूछ रहे थे कि वे किस शहर में फिल्म रिलीज़ होते देखना चाहेंगे, का आइडिया शायद आमिर का था. लेकिन यह उनकी टीम के फिल्म को लेकर मूल विचार, जिसमें वे फिल्म को उसके असल दर्शक तक पहुँचाना चाहते थे, से इतना संगत बैठा कि उन्होंने इसे तुरंत अपना लिया. फेसबुक पर जनता के वोटों द्वारा हुए इस चयन के बाद फिल्म दूसरे शुक्रवार सबसे ज़्यादा वोट पाने वाले चार और शहरों में प्रदर्शित हुई. 
ऐसा ही एक उदाहरण पिछले दिनों रितेश बत्रा की फिल्म दि लंचबॉक्सका रहा, जिसने सोशल मीडिया और ब्लॉगजगत पर कायम हुई बेहतर साख के चलते अपनी लागत से कहीं ज़्यादा पैसा कमाया. कम स्क्रीन में कुछ हल्के प्रचार के साथ रिलीज़ हुई फिल्म जिसने वक्त बीतने के साथ अपने बेहतर वर्ड ऑफ माउथके बल पर बेहतर प्रदर्शन कर दिखाया. लेकिन इस ज़बानी तारीफ़ के जल्दी फैलने के पीछे भी बेशक सोशल मीडिया की भूमिका है. हिन्दुस्तानी स्वतंत्र सिनेमा पर केन्द्रित मुम्बई की चर्चित वेबसाइट फाइट क्लबके संचालक सोमेन मिश्रा इसे बेहतर स्पष्ट करते हैं, “पहले से हमारे सिनेमा में एक टर्म रहा है वर्ड ऑफ माउथका. जैसे यही वर्ड ऑफ माउथआज सोशल मीडिया में दोबारा अवतरित हुआ है. क्योंकि यहाँ आप विज्ञापन, निर्माता या आलोचक की बात पर भरोसा नहीं कर रहे हैं. बल्कि आप अपने उन दोस्तों की बातों पर यकीन कर रहे हैं जिनके टेस्ट पर आपको भरोसा है. जिनके बारे में पता है कि वो झूठ नहीं बोलेंगे. आजकल शहरों, कस्बों में सबके हाथ में मोबाइल है और उसमें फेसबुक, ट्विटर है. आपका दोस्त कोई फिल्म देखता है और उसको फिल्म कैसी लगी यह उसके सिनेमाहाल से बाहर निकलते ही इन नये संवाद के माध्यमों के ज़रिये सबके मोबाइल पर, जेब में होता है.”

दो आपस में जुड़ते सवाल सीधे पूछे जा सकते हैं. पहला, क्या सोशल मीडिया ने मुम्बई फिल्मोद्योग में बनने वाले कम बजट, स्वतंत्र सिनेमा के लिए मैदान में उतरने के नए दरवाज़े खोले हैं? पीवीआर सिनेमास के वैक्लपिक प्रोग्रामिंग हैड और स्वतंत्र सिनेमा को लेकर डाइरेक्टर्स रेयरजैसा वेंचर शुरु करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले शिलादित्य बोरा इसका जवाब हाँ में देते हैं. अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन प्रोजेक्टसे लेकर शिप ऑफ थीसियसतक जिस तरह का सिनेमा बीते कुछ सालों में सिनेमाघरों में आया है वो सोशल मीडिया के इस उभार के पहले के कई सालों में संभव नहीं था. उनका भी मानना है कि सोशल मीडिया के फैलाव की वजह से वर्ड ऑफ़ माउथआज तेज़ी से फैलता है और स्वतंत्र सिनेमा जिसके पास फिल्म के प्रचार पर खर्च करने को बड़ा पैसा नहीं होता, यह नये माध्यम दर्शक की नज़र में आने का एकमात्र ज़रिया बने हैं. आनंद गांधी की कही बात यहाँ संदर्भ के लिए जोड़ी जा सकती है, “हमारा सिनेमा दर्शक को वो इज्ज़त अाज भी नहीं देता जिसका वो हक़दार है. इसीलिए सोशल मीडिया को भी सीमित अर्थों में समझा और इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन हमारे लिए इसने संभावनाओं के नए द्वार खोले हैं.”

लेकिन यहाँ भी कुछ पेंच हैं जिन्हें समझा जाना चाहिए. जैसा सोमेन मिश्रा का कहना है कि शिप ऑफ थीसियसऔर दि लंचबॉक्सदोनों के पीछे यूटीवी जैसा बड़ा स्टूडियो था. यूटीवी चेन्नई एक्सप्रेसजैसी बम्पर फिल्मों का निर्माता है इसलिए वो सिनेमाघर मालिकों से अपनी अन्य फिल्मों के लिए भी बेहतर स्क्रीन और अच्छे शो टाइमिंग्स जैसी मांग मनवाने में सक्षम है. इसके अलावा स्वतंत्र निर्माण के बावजूद प्रदर्शन के समय शिप ऑफ़ थीसियससे किरण राव का और दि लंचबॉक्ससे करण जौहर का निर्माता के तौर पर नाम जुड़ा होना इन फिल्मों के फायदे में गया. “बेशक इन फिल्मों को सोशल मीडिया पर बेहतरीन रिस्पांस मिला. लेकिन सिनेमाघरों में बेहतर शो टाइमिंग्स के साथ लम्बे समय तक टिके रहने के पीछे बड़ी वजह यूटीवी की ताक़त थी” वे बताते हैं.
दूसरा सवाल होगा कि क्या संचार के इन नये माध्यमों ने सिनेमाई प्रचार के विषम मैदान को थोड़ा समतल करने का काम किया है? हालांकि बड़े बजट और बड़े स्टूडियो वाली फिल्मों का अातंक अब भी बरकरार है, लेकिन संवाद के इन नये माध्यमों के चलते अब छोटी फिल्मों को भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का एक मौका ज़रूर मिलता है. शिलादित्य इसके उदाहरण में कन्नड़ फिल्म लूसियाका उदाहरण देते हैं जो सिनेमाघरों में प्रदर्शन के बाद से अबतक ढाई करोड़ रुपये कमा चुकी है. इस फिल्म की कहानी एक गुस्सैल ब्लॉग पोस्ट से शुरु हुई थी जिसे लिखने वाले थे फिल्म के निर्देशक पवन कुमार. अपनी फिल्म के लिए बजट जुटा पाने में असफल होकर उन्होंने मेकिंग एनीमीज़शीर्षक से जो ब्लॉग लिखा, उसके जवाब में लोगों ने अागे बढ़कर पैसा देना शुरु किया. और यहीं से थ्रिलर फिल्म लूसियाकी असल शुरुआत हुई जिसे इंटरनेट पर क्राउडफंडिंगसे जुटाए 52 लाख रुपये में बनाया गया. आज इसे कन्नड़ सिनेमा की सबसे बड़ी स्वतंत्र सफलताओं में गिना जा रहा है और जहाँ एक ओर उदया टीवी इसके सैटेलाइट अधिकार 90लाख में खरीद चुका है वहीं इसके रीमेक राइट्स भी 70 लाख रुपये में बिके हैं. शिलादित्य बताते हैं, “लूसिया जैसी फिल्म, जिसके प्रचार के लिए हमने सोशल मीडिया को ही अपना मुख्य ज़रिया बनाया, के सत्तावन हज़ार से ज़्यादा टिकट बेचे जा चुके हैं. कुल 52 लाख में बनी फिल्म के लिए इससे बड़ी सफलता क्या होगी.” लूसिया की इस सफलता में सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल की भी एक छिपी भूमिका है जिसे पढ़ा जाना चाहिए.

लेकिन नए प्रचार माध्यमों को भी अब लड़ाई के वैसे ही रूप में तब्दील किया जा रहा है जहाँ सम्भावना इस बात की बनती दिख रही है कि अन्तत: बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को निगल जायेंगी. मीडिया आलोचक विनीत कुमार बताते हैं कि कैसे सिनेमा निर्माता आजकल टीवी चैनलों के साथ पहले ही गठजोड़ कर लेते हैं और ऐसे में इन चैनलों की भूमिका फिल्म के प्रचार के दौरान मीडिया पार्टनरकी हो जाती है. “एक सिनेमा के साथ कम से कम आधे दर्जन मीडिया पार्टनर होने का फार्मूला बन जाने के बीच फिल्म रिलीज होने के बहुत पहले ही कमोबेश ये तय हो जाता है कि इस पर किस एंगिल से बात की जाएगी, और इन चैनलों, अखबारों, वेबसाइट और टीवी चैनलों से जुड़े फिल्म समीक्षक इस पर क्या लिखेंगे? लेकिन हाँ, ये जरुर है कि फिल्म प्रोमोशन के लिए एक-दूसरे से अलग किस तरह के जुमले उछाले जाएं कि सिनेमा के पक्ष में बात जाए, इसका ध्यान रखा जाता है. इसे आप मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए फिल्म समीक्षा के बजाय मेरावाला मूवीकहें तो ज्यादा बेहतर होगा.” लेकिन विनीत भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर स्वतंत्र रूप से लिखने वालों ने, जिन्हें वे सोशल मीडिया प्रैक्टिशनरनाम देते हैं, पाठकों के बीच तेज़ी से विश्वसनीयता बनाई है और इनका सिनेमा पर लिखा भी कई बार अच्छे सिनेमा को आगे बढ़ाने और खराब सिनेमा को सिंहासन से उतारने का काम करने लगा है.

हमने देखा है कि किस तरह प्रायोजित प्रचार ने सोशल मीडिया साइ्टस पर कब्ज़ा कर लिया है. फेसबुक / ट्विटर भी अपनी सुविधानुसार मैनेज करने वाली कम्पनियाँ बाज़ार में हैं और इन्हें कोई भी पैसा देकर खरीद सकता है. फिल्म आने से पहले ही उसके प्रोमो के यूट्यूब पर हिट्स कितने हैं, यहीं से यह संग्राम शुरु हो जाता है. इस नम्बर को बढ़ाने के लिए ऐसी मारामारी, कि हमने देखा फिल्मों के प्रोमो यूट्‌यूब पर अपलोड करते हुए निर्माता ऐसी व्यवस्था बैठाने लगे जिसमें दूसरी किसी वेबसाइट को प्रोमो का ऐम्बेडेड लिंकन मिले और सारे हिट्स एक टोकरी में ही इकट्ठे हों. और फिर इन्हीं हिट्स को प्रचारित कर फिल्म की हवा बनाई जाती है. आज बाज़ार में ऐसी डिजिटल कम्पनियाँ मौजूद हैं जिनका मुख्य पेशा ही भविष्य में आनेवाली फिल्मों के लिए सोशल मीडिया मैनेज करना है. लेकिन इसके बीच भी अगर उम्मीद की कोई किरण है, तो उसकी राह सोशल मीडिया से होकर ही निकलती है. क्योंकि यहाँ बात जल्दी फैलती है इसलिए अच्छी हो या बुरी, दर्शकों को तेज़ी से एक दूसरे की राय पता चलती है. अन्तत: प्रायोजित मीडिया पर असल जनता हावी हो जाती है और बहुमत मामलों में सच्ची बात चल निकलती है. जैसा सोमेन मिश्रा बताते है, “आप लोगों को उनकी राय दूसरे को बताने से नहीं रोक सकते. और हमारे यहाँ बुरी फिल्म की बुराई लोग पहले करते हैं. बेशरम‘, ‘हिम्मतवालाइसके उदाहरण हैं जहाँ तगड़े स्टार और फिल्म का बड़ा प्रचार होने के बावजूद एकबार जो सोशल मीडिया पर लोगों ने बात करना शुरु किया, उसके बाद फिल्म को संभालना मुश्किल था. मुझे लगता है कि सोशल मीडिया की असली ताक़त अच्छी फिल्म को हिट कराने में नहीं,

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