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  • किताबों की दुनिया – काग़ज़ से स्वाइप तक: प्रवीण कुमार झा

    किताब और पढ़ने की संस्कृति पर जाने-माने लेखक प्रवीण कुमार झा का यह लेख बहुत विस्तार से और बहुत रोचक ढंग से इस संस्कृति की बात करता है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    एक साल की बच्ची जो अभी बोल भी नहीं सकती, वह एक रंग-बिरंगी पत्रिका को हाथ में लेकर उंगली से स्वाइप करती है। पत्रिका का चित्र नहीं बदलता। वह उस पर उंगली से बार-बार दबाती है, फिर भी कुछ नहीं होता। वह निराश हो जाती है और पत्रिका पटक देती है कि शायद यह ‘खराब’ हो गयी है।

    यह विडियो आज से चौदह वर्ष पूर्व वाइरल हुआ था, जब चीजें ‘वाइरल’ होनी भी ठीक से नहीं शुरू हुई थी। इसने एक विवाद को जन्म दिया कि क्या भविष्य के बच्चे पैदा होते ही स्क्रीन पर पढ़ने के लिए तैयार होंगे। उन्हें किताब या पत्रिका क्या एक खराब हो चुकी आइपैड जैसी नज़र आएगी? वे स्वाइप करना पहले सीखेंगे, पन्ने पलटने बाद में (या कभी नहीं)?

    जब हम ऐसी शंकाएँ जताते हैं, हमें स्मरण रखना चाहिए कि पन्ना पलटना भी होमो सैपिएंस ने कुछ ही सदी पूर्व सीखा। दुनिया की बड़ी जनसंख्या बिना पन्ना पलटे जीवन गुजार चुकी। जिस तरह एक पीढ़ी ने पन्ने पलटे, ठीक उसी तरह पिछली पीढ़ी ने पन्ने नहीं पलटे। इसलिए आने वाली पीढ़ी किस तरह पन्ने पलटेगी, यह तय करना उस पीढ़ी पर निर्भर है।

    पहला कागज़ (Papyrus)

    आज जिस कागज़ पर हम किताब पढ़ते हैं, वह देवदार से यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों की लकड़ियों से लुगदी बना कर तैयार होता है। औसतन एक टन कागज़ के लिए दर्जन भर पेड़ काटने पड़ सकते हैं। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व लिखने-पढ़ने के लिए नील नदी के किनारे जो पहले पेड़ कटे, वे पैपिरस कहलाए। उन्हीं से पेपर शब्द बना। उस वक्त लुगदी नहीं थी, तो पेड़ों के छाल पर ही लिखा जाता। लेकिन, यह न तो आकर्षक था, और न ही लंबे समय तक टिक पाता था। इससे बेहतर था जानवरों की खाल पर लिखना।

    ये पेपिरस या जानवर की खाल लगभग साढ़े तीन मीटर लंबे चादर की तरह गोल मोड़ कर रखे जाते थे। जैसे आज भी बड़े-बड़े मानचित्रों को रखते हैं। उसे खोल कर बिछाइए, लिखिए-पढ़िए, वापस मोड़ कर रख दीजिए।

    अगले साढ़े तीन हजार वर्षों से अधिक तक कई स्थानों पर पढ़ने की यही कला थी। यदि उस वक्त सौ पृष्ठ का उपन्यास पढ़ना हो, तो ऐसे कई खाल रखने होते, जिनकी कीमत तीन सौ किलो गेंहू देनी होती! साल भर के अनाज में एक उपन्यास!! भला कौन पढ़ पाएगा?

    इसलिए प्रथा यह थी कि बाइबल जैसे ग्रंथ चादरों की तरह मोड़ कर किसी गिरजाघर में रखे जाते, और एक व्यक्ति इसे जोर-जोर से पढ़ कर सभी को सुनाता।

    बंधी किताबें (Codex)

    जब नयी पीढ़ी ने खालों को नत्थी कर किताब बनानी शुरू की, तो पुरानी पीढ़ी को शंका हुई। उन्होंने नाक-भौं सिकोड़ कर कहा होगा- यह नत्थी किताब भी कोई किताब है महाराज! असली मज़ा तो बिछा कर पढ़ने में है।

    यूँ तो दूसरी सदी से ही लकड़ी या चमड़े को नत्थी करना शुरू हो चुका था, लेकिन चौथी सदी तक गोल रखी खालें धूल फाँकने लगी थी। नत्थी करने का फायदा था कि पन्ने के दोनों तरफ़ लिखे जा सकते थे, और यह ‘पलटे’ जा सकती थी। आराम से हाथ में लेकर घूमे जा सकते थे। लेकिन, इसकी पवित्रता पर लंबे समय तक प्रश्नचिह्न था। बाइबल जैसे ग्रंथ भला इस तरह नत्थी कर पलटे कैसे जाएँ? यह तो इस ग्रंथ का अपमान होता।

    दूसरी हानि यह थी कि एक पन्ने की स्याही दूसरे पन्ने को खराब भी कर सकती थी, और यात्रा में यह गुम भी जल्दी हो सकती थी। लेकिन यह शंकाएँ शनैः-शनैः जाती रहीं, क्योंकि कोडेक्स (जिल्द वाली किताबें) दूर-दूर पहुँच भी तो सकती थी।

    अहल अल-किताब (किताबों वाले लोग)

    ईसाई और इस्लाम, दोनों के प्रसार में किताब की केंद्रीय भूमिका रही। दोनों ही मजहबों में जो लोग बाइबल अथवा कुरान को नहीं मानते, उन्हें पेगन या काफ़िर कहा जाता। ऐसे कई दृष्टांत मिलते हैं, जब अन्य मान्यताओं की किताबें जलायी गयी। ऐसे यूनानी साहित्य भी जलाए गए, जिनकी एक ही प्रति मौजूद थी। यह सिलसिला अगले कई सदियों तक चलता रहा।

    वहीं दूसरी तरफ़ इन्होंने अपनी-अपनी किताबों के हज़ारों नकल पूरी दुनिया में पसार भी दिए, क्योंकि यह किताब ही तो आस्था का मूल थी। ज़ाहिर है इसके लिए कई लोगों को बैठ कर नकल बनानी पड़ी, और वह भी महंगे छालों पर। एक बाइबल लिखने में 500 भेड़ों की छाल लगती थी! आखिर कैसे लिखा जाए कि पन्ने भी बचें और भेड़ भी?

    विराम-मुक्त लेखन (Scriptio continua)

    चाहे किसी भी भाषा के आदि-ग्रंथ उठा लें, उसमें एक समानता मिल सकती है-

    शब्दोंकेमध्यकोईभीरिक्तस्थाननहींहोता।

    इसके बावजूद लोग यह ग्रंथ पढ़ लेते थे। वे लोग अगर आज की दुनिया में आ जाएँ, स्क्रीन तो छोड़िए हमारी किताबें देख कर पूछेंगे- अमाँ तुम लोग हर शब्द के बाद सुस्ताते क्यों हो? यह तोड़-तोड़ कर क्यों पढ़ते हो? जाहिल हो क्या?

    मैंने कुछ ही साल पहले उर्दू सीखी, तो यही समस्या आयी कि बिना शब्दों के बीच खाली जगह के यह पढ़ूँगा कैसे। जिस तरह बच्चा पन्ना पलटने का कौशल खो देगा, हम भी इतने अक्षम तो हो ही चुके हैं कि हमें खाली स्थान, अल्प-विराम, पूर्ण-विराम सब कुछ चाहिए।

    लेकिन, वाकई वे कैसे पढ़ पाते थे?

    बोल कर पढ़ना

    एक बच्चा जब लिखना-पढ़ना सीखता है, तो उस पर ग़ौर करें। पहली चीज कि वह भी शब्दों के मध्य खाली स्थान कम छोड़ते हैं। दूसरी चीज कि वे बोल कर पढ़ते हैं। उन्हें चुपचाप पढ़ना सीखने में समय लगता है।

    जब शब्दों के बीच खाली स्थान नहीं होते थे, तो उन्हें बोल कर पढ़ना ही सहज था। चौथी सदी में ऑगस्टीन ने लिखा है कि वह हैरान है कि उसके दोस्त एम्ब्रोसियस के होंठ पढ़ते हुए हिलते क्यों नहीं है। बिना फुसफुसाए या बोले किताब पढ़नी लगभग नामुमकिन थी।

    यहाँ तक कि बारहवीं सदी में पीटर वेनेराबिलिस को जब खाँसी हो गयी, वह एक हफ्ते तक पढ़ ही नहीं पाए! जब भी बोलने लगते खाँसी हो जाती और क्रम टूट जाता।

    बोल कर पढ़ने की ख़ासियत यह भी थी कि आस-पास के लोग सुन लेते। मज़हबी किताबों में इसका बड़ा महत्व था। इसलिए आज तक कई मदरसों में बोल-बोल कर पढ़ा जाता है, ताकि दूसरों के कान में भी जाती रहे।

    बोल कर पढ़ने से उनकी स्मृति भी बेहतर होती, क्योंकि उनकी तीन इंद्रियाँ- मुँह, आँख और कान, एक साथ सक्रिय होती। यह अभ्यास तो चिकित्सा शास्त्र की किताबों को रट्टा लगाते हुए मैंने भी किया है।

    शांति में पढ़ना

    बारहवीं सदी में जब बोलोग्ना में विश्वविद्यालय खुला, तो किताबों में शब्दों के बीच खाली स्थान भी लगने लगे। इसका उद्देश्य ही यही था कि मन ही मन किताब पढ़ी जा सके। जिस तरह हम बोलते हैं, उसी तरह लिखा जाए।

    बहरहाल उस समय तक चीन से एक नयी चीज़ भी आ गयी थी- काग़ज़!

    1109 ईसवी में पहली बार यूरोप में एक महिला ने अपने पुत्र को कागज़ पर चिट्ठी लिखी। कागज़ पर कलम से लिखना सहज था। इसके लिए कलात्मक गॉथिक अक्षर (Gothic cursive) भी विकसित हुए, ताकि धड़ा-धड़ लिखा जा सके। कागज-कलम का नतीजा यह हुआ कि तेरहवीं सदी तक यूरोप में सैकड़ों किताबें लिख दी गयी। बल्कि चीन, जिन्होंने कागज़ बनाया, वे इतनी किताबें नहीं लिख सके।

    भले ही शब्दों के मध्य खाली स्थान आ गए, लेकिन इतनी किताबें तेज़ी से पढ़ पाना कठिन था। उस वक्त पन्ना-दर-पन्ना एक-एक शब्द पढ़ना पड़ता, जो भले अच्छी आदत है, इसमें समय तो लगता ही है। क्या कोई ऐसा तरीका नहीं कि किताब से बस ‘काम की चीज’ देख ली जाए?

    देखिए! किस तरह स्क्रीन-युग से पहले ही मनुष्य ने शॉर्ट-कट तलाशने शुरू कर दिए थे।

    अध्याय सूची, शीर्षक और पैराग्राफ़

    यह लेख यदि मैं बिना किसी शीर्षक या पैराग्राफ़ के लिखता, तो इसे पढ़ना आसान होता या कठिन? ऐसे कुछ लोग ज़रूर होंगे जिन्होंने मात्र शीर्षक या उपशीर्षक पढ़ कर समझ लिया होगा कि लेख में क्या है।

    तेरहवीं सदी से किताबों में यह सुविधा आने लगी। आज बाइबल को कई खंडों और सूक्तों में बाँट दिया गया है, जिससे बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि जेनेसिस खंड के अमुक पंक्ति में क्या है। तेरहवीं सदी के पहले के बाइबल में यह नहीं मिलते।

    इस कारण लोग न सिर्फ़ बिना बोले पढ़ने लगे, बल्कि तेज़ गति से पढ़ने लगे। यह भी कहा जा सकता है कि जितनी गहराई से पहले पढ़ते थे, उस तरह पढ़ना घटने लगा। लेकिन जब गति बढ़ी, तो किताबों की तलब भी होने लगी। किताबों को लिखे जाने और नकल बनाने की गति पढ़ने की गति से कम थी।

    तभी एक और शॉर्ट-कट आया।

    छपाई मशीन

    यह हम जानते हैं कि गुटनबर्ग नामक एक धातुकार ने पंद्रहवीं सदी में पहली छपाई मशीन बना ली। लेकिन छपाई मशीन को चलाने के लिए खूब सारी छपाई भी तो चाहिए। इससे नकल बनाने वालों की नौकरी भी जा सकती थी। मसलन अरबी दुनिया ने लंबे समय तक छपाई मशीन से दूरी बना कर रखी, ताकि वहाँ नकल बनाने वाले अपना काम करते रहें।

    ईसाई दुनिया में इस मशीन ने अलग ही तहलका कर दिया। कैथोलिक गुटेनबर्ग को यह पहले मालूम होता तो वह शायद खुद ही मशीन तोड़ देते।

    हुआ यूँ कि उस समय गिरजाघरों ने एक स्कीम चालू की। यदि कोई व्यक्ति उन्हें एक ख़ास रकम दान दे, तो उन्हें एक पाप-मुक्ति पत्र दिया जाएगा। यानी इस पत्र से उनके पाप धुल जाएँगे। छपाई मशीन से ऐसे लाखों पत्र जारी किए गए।

    उसी दौरान मार्टिन लूथर गिरजाघरों के निरंकुशता के खिलाफ़ मुहिम चला रहे थे। उन्होंने इस पर अपने विरोध-पत्र छपवाए। यह भी लाखों की संख्या में छपे और बँटे। ईसाई धर्म भले दो खेमों में बँट गया, लेकिन इस तकरार में छापा-मशीन चल पड़ी।

    किताबें संग्रह करना

    आज लोग सोशल मीडिया पर अपने किताबों के संग्रह की तस्वीरें लगाते हैं। छापा-मशीन के बाद यह शौक़ अभिजात्य वर्ग में बढ़ने लगा था। पंद्रहवीं सदी में किसी के पास अगर साठ किताबें होती, तो यह बड़ी बात थी। सोलहवीं सदी में मोन्टेन के पास हजार किताबें थी, और सत्रहवीं सदी के मोन्टेस्कू के पास तीन हज़ार!

    उन्हीं दिनों एक किताबों की चक्की भी बनी थी, जो लोग अपने घरों में रखते। उसे कुर्सी के सामने रख कर चक्की घुमाते हुए एक के बाद एक दर्जनों किताबें पढ़ी जा सकती थी।

    जहाँ पहले लोग किताबें खोल कर पढ़ने के लिए एक स्टैंड रखते थे, अब वे चक्की घुमा रहे थे। ये उस जमाने की ‘स्क्रॉलिंग’ ही तो थी।

    बुकमार्क

    सर आइजक न्यूटन ने यूँ तो कई सिद्घांत दिए, लेकिन किताब पढ़ने के तरीके में एक इज़ाफ़ा उनके नाम भी दर्ज़ है।

    एक तरीका जो सदियों से कायम है, वह है किताब पढ़ते वक्त नोट लेना। किताब में चिप्पी लगा देना कि अमुक पन्ने पर अमुक बात महत्वपूर्ण है। अब यह कलम लगाना, हाइलाइट करने तक पहुँच चुका है। आइजक न्यूटन ने पन्नों को कोने से मोड़ना शुरू किया। यूँ तो अब यह कोई नयी बात नहीं रही, लेकिन यह ‘खोज’ भी न्यूटन के नाम दर्ज़ है।

    न्यूटन मोड़ते समय एक ख़ास बात यह भी करते कि कोना ऐसा मोड़ते कि उसका निशाना उस ख़ास वाक्य की ओर जाता!

    यह इसलिए भी क्रांतिकारी कदम था, क्योंकि उसके बाद किताब कोई ऐसी पवित्र वस्तु नहीं रही कि इसे मोड़ा (या फाड़ा) न जा सके।

    मैंने महामहोपाध्याय गंगानाथ झा के विषय में सुना कि जब वह अनुवाद करते थे, तो किताब के पन्ने-पन्ने अलग कर लेते, फिर हर पन्ने के साथ एक खाली कागज लगाते, और वापस बाइंड करा लेते। उसके बाद अनुवाद पूरा कर फिर से पन्ने निकाल कर अलग-अलग बाइंड कराते।

    पढ़ने का दिखावा

    बेकन ने कहा कि कुछ किताबें चखने के लिए होती है, कुछ चबाने के लिए और कुछ पचाने के लिए। यदि किसी के संग्रह में हजारों किताबें हों, वह हर किताब गहराई से तो पढ़ नहीं सकता। उसने ज़रूर कई किताबें सिर्फ़ चख कर रख दी होगी।

    अठारहवीं सदी में रूसो को कहना पड़ा कि फ्रांस के लोग बहुत किताबें पढ़ते हैं, लेकिन दरअसल वे पढ़ते नहीं, सिर्फ़ इतना देख लेते हैं कि दूसरों को कह सकें-  मैंने पढ़ी है।

    यानी आज से दो सौ वर्ष पहले ही लोगों का ध्यान टूटने लगा था। वे स्वाइप और स्क्रॉल कर आगे बढ़ने लगे थे। हालाँकि उन्होंने इस घटते ध्यान का हल ढूँढना शुरू किया।

    गहन अध्ययन की वापसी

    मैं जब ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय घूमने गयी, तो देखा वहाँ सड़कों पर दोनों तरफ़ मशाल की तरह रोशनियाँ लगी हैं। वहाँ पहले मशाल ही जला करती थी, जिसके नीचे छात्र पढ़ा करते थे। ‘फलाँ ‘स्ट्रीट लाइट’ में पढ़ते थे’ यह तो हमने कई माहात्म्य में पढ़ा होगा।

    दरअसल किताब पर रोशनी डाल कर पढ़ने से ध्यान बढ़ता है। जब चारों तरफ़ अँधेरा हो, और सिर्फ़ किताब पर रोशनी हो। अस्सी के दशक या उससे पहले बिहार में पढ़े छात्र इससे जुड़ाव समझ सकते हैं, क्योंकि बिजली तो थी ही नहीं। मोमबत्ती या लैंप में किताब पर गज़ब का ध्यान बनता था।

    अठारहवीं सदी से यह प्रथा चल पड़ी थी। हालाँकि उससे पहले भी एक चीज आयी थी- कॉफी!

    यूरोप में यह संस्कृति अरब की दुनिया से आयी, लेकिन कॉफी पीते हुए गहन अध्ययन उन्होंने जम कर शुरू किया। वोल्टायर पढ़ते-पढ़ते दिन में बहत्तर कॉफी पी जाते थे!

    अख़बार

    मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो किताबें नहीं पढ़ते, लेकिन अख़बार आद्योपांत रोज पढ़ जाते हैं। अख़बार किताबों से पतली होती है, समसामयिक और रोचक होती है। इसने पढ़ने का शऊर तो बदला ही, इसे व्यापक बना दिया। आम जनता महंगी किताबें नहीं खरीद सकती थी, लेकिन लुगदी अख़बार ख़रीद सकती थी।

    सत्रहवी सदी से जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक कायम है। अख़बार और पत्रिका किताबों से कहीं अधिक तेज़ी से और व्यापक समाज में फैली। इसने लेखन में भी बदलाव लाया कि किताबें पठनीय और आम भाषा में लिखी जाने लगी।

    लेकिन, किताबों से अखबार पर उतरना क्या ‘आसमान से गिरे खजूर पर अटके’ नहीं था? क्या लोगों की क्षमता सिकुड़ नहीं गयी? क्या किताबें भी सिर्फ़ बिकने के लिए लिखी जाने लगी?

    बेस्टसेलर

    आज हम ‘बेस्टसेलर युग’ में हैं, जब कुछ लेखक प्रकाशकों के आँखों के तारे होते हैं। जो लाखों में बिकते हैं। लेकिन सदियों पहले लेखक बहुत महत्वपूर्ण नहीं थे।

    कई बार लोग जब तक किताब तक पहुँचते, लेखक मर चुके होते थे। कई लेखक छद्म-नाम से लिखते। कई किताबों पर आज तक विवाद होते हैं कि इन्हें लिखा किसने। मसलन ‘अरबियन नाइट्स’ (अल्फ लैला व लैला) किसने लिखा, कोई नहीं जानता। पंचतंत्र के मूल लेखक पर सहमति नहीं है। उन लेखकों को शायद ऐसी चाहत नहीं थी, या इस बात का ख़ास महत्व नहीं था।

    इटली के एक प्रकाशक का जिक्र मिलता है, जिनके पास पांडुलिपियाँ आती, तो वह सभी संदर्भ और फुटनोट तो हटाते ही, लेखक का नाम भी नहीं रखते। उन्हें यह चीजें पन्नों की बर्बादी लगती थी।

    कॉपीराइट और रॉयल्टी तो उन्नीसवीं सदी के बाद ही खुल कर आयी, जब चार्ल्स डिकेंस और अलेक्जेंडर डूमा जैसे ‘बेस्टसेलर’ आने शुरू हुए।

    पहले किताबों में आवरण भी नहीं होते। सभी किताबों पर एक जैसी ही मोटी बाइंडिंग होती। मैं लिस्बन की एक दुकान में गया, जो दुनिया की सबसे पुरानी किताब की दुकान कही जाती है। वहाँ अठारहवीं सदी में किताब की बजाय पन्नों की गठरियाँ होती। जो खरीदने आते, वह अपनी पसंद से बाइंड कराते। इसलिए लेखक के चित्र और आकर्षक आवरण का प्रश्न नहीं था। ‘नेवर जज अ बुक बाय इट्स कवर’ तो बाद का मुहावरा लगता है।

    आज हम ख़ूबसूरती से बनी किताबें देखते हैं, जिसमें बोल्ड, इटैलिक्स आदि सुविधाएं होती हैं। यह भी उन्नीसवीं सदी से शुरू हुआ कि पुराने गॉथिक फॉन्ट को बदला गया। ऐसे अक्षर गढ़े गए, जिससे सहजता से और तेज़ी से पढ़ा जा सके।

    समीक्षा

    किताबों पर चर्चाएँ पहले भी कॉफी हाउस में या यूँ ही जमघटों में होती रही थी। लेकिन, उन्नीसवीं सदी से किताबों पर ‘लिखना’ भी जम कर शुरू हुआ। अच्छा भी और बुरा भी। चार्ल्स डिकेंस की कार्लाइल ने बखिया उधेड़ दी थी।

    लोग सुझावों पर और समीक्षाएँ पढ़ कर किताबें खरीदने लगे। राल्फ वाल्डो इमर्सन किसी भी किताब छपने के बाद एक साल तक प्रतीक्षा करते कि लोग क्या कह रहे हैं। जब संतुष्ट हो जाते कि अधिकतर लोग अच्छा ही कह रहे हैं, तब जाकर किताब खरीदते।

    हालाँकि यह भी एक शॉर्ट-कट ही था। कई बार समीक्षाएँ पढ़ते-पढ़ते किताब पढ़ने का रोमांच और भूख, दोनों मर जाते। झूठी प्रशंसाएँ किसी औसत किताब को भी असाधारण कह देती, और पाठक ठगा हुआ महसूस करते।

    पिक्सेल

    जब दुनिया में लाखों किताबें और पत्रिकाएँ छप गयी, तो मनुष्य सूचना के महासागर में ऊब-डूब करने लगा। उस वक्त पुस्तकों को वर्गीकृत कर पुस्तकालयों में सजाया जाने लगा, ताकि हम अपने काम की चीज आसानी से ढूंढ सकें। उन्नीसवीं सदी से यह जद्दोजहद चल रही थी, जो इक्कीसवीं सदी में जाकर फलीभूत हुई, कि किस तरह सूचनाओं को समेटा जाए।

    बिल गेट्स जो स्वयं किताबों के शौकीन थे, ने नब्बे के दशक में कहा कि एक दिन ऐसा आएगा जब ‘सब कुछ’ इंटरनेट पर होगा। (मुफ्त! मुफ्त! मुफ्त!)

    हम आज लगभग उस युग में पहुँच चुके हैं, जब हमें दुनिया की कोई भी किताब, किसी का लिखा लेख, सिद्धांततः एक क्लिक पर उपलब्ध हो सकता है। भले मुफ्त न हो, लेकिन सहज है।

    लेकिन इसके अपने कुप्रभाव भी हैं। वानेवर बुश ने कहा कि हम सूचना की समृद्धि देख रहे हैं, जहाँ ध्यान का अकाल है। (A wealth of information creates a poverty of attention)

    इस लेख को पढ़ना शुरू करने वाले लोगों में मात्र सोलह प्रतिशत इस पंक्ति तक पहुँचे होंगे। यह मेरे लेख के लिए नहीं लिखा, यह एक शोध का निष्कर्ष है। अगर आप यह पंक्ति पढ़ रहे हैं, तो आप वाकई ‘टॉप टेन’ प्रतिशत लोगों में होंगे।

    मारियाना वूल्फ ‘पढ़ने’ के तरीकों पर जानी-मानी विशेषज्ञ हैं। वह उन लोगों की मदद करती हैं, जिनको पढ़ने में दिक्कत आती है। उन्होंने महसूस किया कि वह स्वयं पूरी-पूरी किताब नहीं पढ़ पा रही। उनकी आँखें तेज़ भागती रहती है, जैसे वह कागज़ पर नहीं, स्क्रीन पर पढ़ रही हों। स्क्रॉल कर रही हों।

    उन्होंने एक प्रयोग किया कि अपनी सबसे मनपसंद किताब दुबारा उठायी, कि यह तो ज़रूर पूरा पढ़ लूँगी। लेकिन उनसे नहीं पढ़ा गया। वह पन्ना-दर-पन्ना भागती गयी। उनके दिमाग से गहन अध्ययन का कौशल खत्म हो रहा था। आखिर उन्होंने यह तय किया कि वह रोज बीस मिनट किसी पुस्तक का हर शब्द पढ़ेगी। आँखें तेज भागेगी, तो उसे रोकेगी। कुछ महीने यह प्रयोग करने के बाद आखिर उन्हें सफलता मिली! अब वह पुस्तकों को वापस ध्यान से पढ़ पा रही है।

    किंडल

    मैं स्वयं वर्षों से डिजिटल पाठक हूँ, और मेरे पास उस ज़माने से किंडल है जब किंडल बाज़ार में आए ही थे। लेकिन मैं सायास कागज़ की किताबें भी नियमित पढ़ता हूँ। दोनों में क्या अंतर है?

    मैं यहाँ कागज़ की खुशबू या पन्नों की छुअन जैसे तर्क नहीं दूँगा। वह तो है ही, लेकिन इनसे पढ़ने या समझने पर क्या फर्क पड़ता है?

    पहला अंतर है कि हमारा दिमाग किताब के पन्नों की छवि दर्ज़ करता है। कई लोगों को स्मरण होता है कि अमुक वाक्य पुस्तक में दायीं तरफ़ वाले पन्ने पर शायद डेढ़ सौ पृष्ठों के बाद आया था। किंडल में यह संदर्भ-बिंदु नहीं दर्ज़ हो पाता।

    दूसरा अंतर आँखों के ‘दायें से बायें’ और ‘ऊपर से नीचे’ चलने से है। डिजिटल पठन में हम तेज़ी से ऊपर से नीचे आ रहे होते हैं, जैसे सीढ़ियाँ उतर रहे हों। यह गति बढ़ा देती है, लेकिन वाक्य तो दायें से बायें ही लिखे जाते हैं। अगर हमें उसे पूरा पढ़ना है तो दायें से बायें जाकर नीचे उतरना होगा, और वापस दायें से बायें शुरू करना होगा। यह प्रक्रिया डिजिटल पठन में संभव है, लेकिन इसके लिए खुद को तैयार करना होता है। मसलन बिना ऐसा किए यह लेख भी पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सकता।

    स्वाइप करने वाला बच्चा

    हमने देखा कि लिखने-पढ़ने की प्रक्रिया का कभी कोई स्थापित नियम नहीं रहा। हर सदी में तरीके बदलते गए। फिर भी मनुष्य पहले से कम बौद्धिक नहीं हुआ, बल्कि सतत प्रगति ही होती गयी। संभव है कि आज का ‘स्वाइप करने वाला बच्चा’ हमारी पीढ़ी से कहीं अधिक सूचना-संपन्न हो। उससे आइपैड छीन कर, किताबें पकड़ा कर, उसे हम अपने बचपन में ले जाने का प्रयास कर सकते हैं। इस पर कई वाद-विवाद होते रहते हैं कि यह उचित होगा या अनुचित। लेकिन दुनिया जिस दिशा में जा रही हो, उस दिशा से उस बच्चे को दूर रखना शायद वैसी ही कोशिश हो जैसे लोग छपाई-मशीन से खुद को दूर रख रहे थे। इसलिए कठोर अनुशासन के बजाय कागज़ की खूबसूरत किताबों के पन्ने पलटना सिखाना और स्वाइप करना साथ-साथ चलती रहे तो दोनों कौशल विकसित हो सकते हैं। यूँ भी किताबों की दुनिया अपना रास्ता ख़ुद ही ढूंढ़ती आयी है।

    (यह लेख स्वीडन के लेखक Joel Halldorf की पुस्तक Bokens folk – En sivilisasjonshistorie fra Papyrus til Piksler (किताबों के लोग – पपीरस से पिक्सेल तक सभ्यता इतिहास) पर आधारित है। इस कारण इसमें मुख्यतः यूरोपीय संदर्भ से विवेचना की गई है।)

    सभी चित्र इंटरनेट से साभार

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