समकालीन कथाकारों में पल्लवी विनोद ने अच्छी पहचान बनाई। उनकी कहानी ‘नोटबुक’ जब ‘वनमाली’ में पढ़ी तो लगा कि आपसे साझा करना चाहिए। आप भी पढ़िए और अपनी राय दीजियेगा- मॉडरेटर
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मिट्टी की देह मिट्टी में मिल जाएगी। इसी पानी में घुल जाएगी। इन्हीं हवाओं में ख़ुशबू बन कर उड़ जाएगी। इसी अग्नि में भस्म हो जाएगी। हमारे भीतर की लौ जिस दिन बुझ जाएगी कुछ भी नहीं बचेगा। मिट्टी का शरीर है माधो इससे कैसा मोह? जो है हमारा आत्म है। वो सदा सर्वदा इस संसार की परिसीमा में भ्रमण करता रहेगा। आज इसने तुम्हारे परिवार का वस्त्र पहना है कल किसी और रूप में जन्म लेगा। इसलिए जो चला गया उससे मोह का बंधन भी तोड़ दो। मुक्ति में ही शांति है शांति में ही मुक्ति है।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
मोह के बंधन तोड़ने से शांति मिल जाती है? तब तो मुझे भी मिल जानी चाहिए थी। किसी के प्रति किसी भी तरह की आसक्ति नहीं बची। कोई दुःख अब परेशान नहीं करता। उस दिन जब दोस्त फ़ोन पर बिलख रहा था,
“यार मम्मी नहीं रहीं”
उस खबर पर मुझे उदास हो जाना चाहिए था। वो मेरा दोस्त है उसकी माँ ने मुझे भी बहुत स्नेह दिया था। जब भी मालपुए बनातीं मुझे बुलातीं,
“देखो ना! एक ये लड़का है बिहारी होकर भी पुआ नहीं खाता है। तुम मन से खाते हो तो जी अच्छा हो जाता है।”
पिछले हफ़्ते ही तो उन्होंने एक शीशी आलू का अचार दिया था। फिर अचानक से चली गईं। पर मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ। शांति पाठ में उनकी आदमकद तस्वीर के सामने आँख बंद किए बैठा हुआ हूँ। दीक्षित जी शोकाकुल परिवार को ढाँढस बंधा रहे है। पाप पुण्य की वही लिखी-लिखाई बातें दोहरा रहे हैं और मेरा मन अपने ही विचारों के पैडल मार रहा है।
आसमान से देखता है कोई ये सोचकर इंसान डरता रहा अपराध करने से…क्या सच में डरता रहा? पूजा के नाम पर किए जाने वाले अनुष्ठानों में बार-बार क्षमा प्रार्थना पढ़वाई गई। माफ़ करो ईश्वर! जो भी भूल-चूक हुई उसके लिए क्षमा करना। वो कहते हैं जीव हत्या का पाप लगता है उनसे एक बार पूछो, मन की हत्या का पाप नहीं लगता? अगर लगता है तो उस पाप की क्या सजा होगी? ग्रंथों के अनुसार बच्चे की हत्या करना महापाप है तब तो बच्चे के मन की हत्या करना भी महापाप होगा।
इस पाप का ज़िक्र किया जाना चाहिए। इस अपराध का दंड सबको मिलना चाहिए नहीं तो बच्चों के मन की हत्या यूँ ही होती रहेगी। उसे परिवार का सबसे कमजोर प्राणी जानकर लोग अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहेंगे। उसकी मेधा और शारीरिक दक्षता को प्रदर्शन का विषय बनाकर लोग आनंदित होते रहेंगे। हे धर्म ग्रंथों! लिखो कि बच्चों को गधा कहना पाप है। लिखो कि उन्हें भरे समाज में खड़ा करवा कर लोगों का मनोरंजन करवाना पाप है। लिखो कि बिना उनके मन को परखे उन्हें विषय पढ़वाना पाप है। फिर उसमें जोड़ना कि बच्चों को भय के साये में पालना गंभीर पाप है। उनके मन पर अपनी मनमानियों के प्रहार करना हत्या के सदृश है।
तुमने पेड़ की छाल को उतरते देखा है। उस छाल के भीतर मौजूद तना बहुत नरम होता है। नाखून धँसते ही चले जाते हैं। उसे धूप थोड़ी तेज लगती है। चींटियाँ उसकी देह पर चढ़ती हैं तो उसे सिहरन ज़्यादा लगती है। बालमन भी ठीक वैसा ही नाज़ुक होता है। आस-पास घट रही हर घटना उसे थोड़ी ज़्यादा दिखाई देती है। बग़ल के कमरे से आ रही आवाज़ें उसे ज़्यादा साफ़ सुनाई देती हैं। तुम्हें लगता है, वो तो बच्चा है! भूल जाएगा। लेकिन वो कभी नहीं भूलता। उसके अवचेतन में बने गाँठ कब कैंसरस हो जाएँ कोई नहीं जान पाता ख़ुद बच्चा भी नहीं। यही गाँठ बढ़ते-बढ़ते उसके चरित्र को बीमार बना देती हैं। मुजरिम को सजा देने से पहले उसका बचपन देखना! देखना उसके मन की नृशंस हत्या करने वाले अपराधियों को। फिर तय करना उसका अपराध और उसकी सजा..
कभी-कभी मुझे लगता है मैं और लड़कों सा नहीं हूँ। अपने दोस्तों के बीच अलग-थलग सा महसूस करता हूँ। राजनीति और खेल की बातों में भी एक समय के बाद चुप पड़ जाता हूँ। मन के अंदर वाक्यों की लंबी क़तारें उमड़ती हैं पर उन्हें मन से बाहर निकालने का मन ही नहीं करता।
दोस्त मुझसे परेशान होकर कहते, “कौन सी गुफा में रहता है? तुझे हमारी बातें सुनाईं नहीं देतीं या समझना नहीं चाहता है?” मैं लाख कहूँ ऐसा कुछ नहीं है लेकिन वो मेरे अंदर कुछ ऐसा देख लेते हैं कि धीरे-धीरे कटने लगते हैं। ऐसे नहीं जैसे कोई चीज ब्लेड से कटती है, जैसे बिना धार के पुराने चाकू से मोटा कपड़ा कटता हो वैसे..
“यार तुझे ये मूवी पसंद नहीं आएगी इसलिए तेरी टिकट बुक नहीं करवाए”
“यार बीच पार्टी पर तू इंजॉय नहीं कर पाएगा। इसीलिए तुझे वो प्लान नहीं बताया।”
सच ही तो कहते हैं। उनकी बताई अच्छी से अच्छी मूवी मुझे उबा देती है। जिस शो को देख सब ठट्ठा मार कर हंसते हैं उसे देख मैं और उदास हो जाता हूँ। सब फूहड़ और अश्लील लगता है। उत्तेजना जगाती फ़िल्में मुझे शांत कर देती हैं। ये उनके लिए मेरा मज़ाक़ उड़ाने का विषय हो सकता है इसीलिए मैंने ये बात उन्हें नहीं बताई। सेक्स मेरे लिये उन पलों का सुख था जिनमें मैं सबसे ज़्यादा शांत और खुश रहता हूँ। वो भी ये बात जानती थी। हालांकि उसके लिये ये एहसास थोड़ा अलग क़िस्म का था।
“प्रेम में जंगली हो जाने का अलग सुख है यार” यही कहा था उसने। लेकिन मैं समझ गया था ये प्रेम नहीं कुछ और बात है। वैसे तो ये बात उसने बड़े भोलेपन से कही थी…किसी मूवी को देखने के दौरान… पर मैं उसकी इस चाह को पूरा नहीं कर सकता था। जिस जंगलीपन को देख मुझे जुगुप्सा हो रही थी उसका दोहराव ..वो भी उसके साथ! मेरे लिए नामुमकिन था। हाँ मैंने ये ज़रूर कह दिया, “तुम सिखाओ मुझे जंगली हो जाना” मैं उसे निराश नहीं करना चाहता था। उसको हर क़िस्म का सुख देना चाहता था लेकिन वो नहीं सिखा पाई। इसका ठीकरा भी मेरे ही सिर फूटा।
“नहीं बनाना तुम्हें जंगल, तुम एक पहाड़ हो और मैं उस पर फूटता झरना”
“फिर तो तो तुम मुझे छोड़ कर नदी में गिर जाओगी”
“नहीं मेरे लिये वो नदी भी तुम्हीं हो”
पर बातों का क्या है! बातें तो किसी कोमल एहसास के आवेश में कह दी जाती हैं। पहले हम वीकेंड साथ बिताते थे। उन दो दिनों का हर एक क्षण संग ही बीतता। फिर हम आठ-दस दिन में कुछ घंटे के लिए मिलने लगे। ये अंतराल और बढ़ा। महीने से बढ़कर दो महीने फिर पाँच महीने बाद हम मिले। उसकी फ़ेवरेट जगह, उसकी फ़ेवरेट लैवेंडर टी शर्ट में…उसने टी शर्ट के लिये कुछ नहीं कहा। शायद ध्यान ही नहीं दिया। वो कुछ और कहना चाह रही थी,
“मुझे लगता है अब हमारे बीच एक दूसरे को देने से जैसा कुछ बचा नहीं है।”
“मतलब?”
“यू नो…वी आर ईच अदर्स ओपोज़िट्स. आवर रिलेशनशिप इज़ लाइक ए बुक एंड नाउ वी डोंट हैव एनीथिंग टू रीड”
मैं उसे बोलते हुए देख रहा था। लग रहा था ये सब बोलने की प्रैक्टिस कर के आई है। शब्द अंदर से नहीं फूट रहे थे। रिश्ता, किताब ये सब उसके वोकैब्युलेरी का हिस्सा नहीं थे। मैं बोलना चाह रहा था कि मैं इस किताब को बार-बार पढ़ना चाहता हूँ। कहना चाहता था, तुम चाहोगी तो हम नई किताब लिखेंगे। पर कुछ नहीं कह पाया। उसकी आँखों में अपने लिए कुछ दिखा ही नहीं। ग़ुस्सा होता तो मना लेता। वहाँ उदासीनता थी। जब मैंने उसको आख़िरी बार गले से लगाया तभी समझ गया इस रिश्ते की धड़कनें बंद हो चुकी हैं।
उसके जाने का भी दुःख नहीं हुआ मुझे या कहिए कि हमारे बीच दूरियाँ इतनी धीमी चाल से आईं कि उसके आ जाने पर भी कुछ नहीं बदला मैं उसी चाल में ऑफिस आता। शायद चाल थोड़ी धीमी हो गई थी। वापसी में लोगों से भरी बस देख उसे छोड़ देता जब तक कोई कम भरी या आख़िरी बस नहीं आती। बस स्टैंड पर बैठे-बैठे सोचता रहता कि ये भीड़ हर जगह बढ़ती जा रही है। पुराने दिन याद आते, जब हम छोटे थे तो इतनी भीड़ नहीं दिखाई देती थी। अब सबको उसी बस में चढ़ना है जो पहले से ही भरी हुई है। उस भीड़ को देख ख़्याल आता, हम सब कितने अवांछित हैं! शरीर को कुछ लमहों का आनंद देने की प्रक्रिया ने धरती का बोझ बहुत बढ़ा दिया है। थके हुए कदमों का भार लिए लोग हर रोज़ इधर से उधर जाते हैं। बस की भीड़ में औरतों की भीड़ ज़्यादा है। उनके गीले बालों से भीगे कपड़े, आधे उलझे-सुलझे बाल, नाखूनों में आधी पौनी बची नेल पॉलिश देख सोचता ऐसा भी क्या ज़रूरी है इतनी भीड़ में घुस कर नौकरी करना? घर में रह कर थोड़ा आराम कर लेतीं। कम से कम अँगूठियों में फँसा आटा तो निकाल लेतीं। पर जब उनकी बातें सुनता तो मुस्कुरा उठता। ये नौकरी उन्हें उनकी नज़र में ख़ास बना रही थी। किसी को उनके ऊपर लिपटे बेल को काटने की आज़ादी दे रही थी तो किसी को खुली हवा में साँस लेने की आजादी।
घर आकर हर रूम की लाइट जलाता। नहीं! ये कोई बहुत बड़ा घर नहीं था। एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट था। दोनों कमरों से अटैच बाथरूम।एक बारह बाई चौदह का लिविंग रूम दो बॉलकनी और एक छोटा सा किचन था। सुबह ही माँ ने फ़ोन पर घोषणा की कि वो तीन दिन बाद आ रही हैं। मुझसे मेरी सहूलियत नहीं पूछी गई थी। वैसे उन्हें पूछना भी नहीं चाहिए था। मेरी ज़िंदगी में जो कुछ भी था सब उनका ही दिया था। माँ का आना मेरे लिए ख़ुश होने की बात थी पर मुझे कोई ख़ुशी नहीं हुई। मुझे अब तक उन पकवानों की ख़ुशबू आने लगनी चाहिए जिन्हें माँ से अच्छा कोई नहीं बना सकता, पर नहीं आ रही थी। असल में माँ के आने की ख़बर से मुझे घबराहट हो रही थी। माँ के साथ वो भी तो आएगा! आते ही मेरे घर की उदासी में ज़हर घोल देगा। मेरे घाव नोच देगा फिर अंदर जमा मवाद बाहर निकलने लगेगा। मवाद के साथ वो परजीवी भी बाहर निकल आएँगे जो नंगी आँखों से नहीं दिखाई देते लेकिन वो सालों से मेरे भीतर रेंग रहे हैं। यही हुआ भी, अभी तो माँ आई भी नहीं पर उसकी यादों की आहट मुझे सुनाईं देने लगीं थीं। वो यादें जो हर बार मेरी ज़िंदगी को बेरहमी से कुचलती थीं।
उस दिन मेरा सातवाँ जन्मदिन था, माँ ने मोहल्ले की कुछ आंटी और उनके बच्चों को न्यौता दिया था। जन्मदिन मनाने का प्रचलन तब नया-नया शुरू हुआ था। तब केक बनाना इतनी आसान सी बात नहीं थी। माँ ने मेरे लिए घर में ही केक बनाया और उसको रंग बिरंगे जेम्स से सजा कर एक मोमबत्ती लगा दी। तब नवम्बर के दूसरे हफ़्ते अच्छी ठंड पड़ने लगती थी। शाम चार बजे ही माँ की तीन-चार सहेलियाँ अपने बच्चों के साथ मेरे घर आ गईं। उन बच्चों में से दो मेरे साथ पढ़ते थे। आस्था और विनय मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। पता नहीं! वो विपरीत सेक्स का आकर्षण था या महज़ दोस्ती पर मुझे आस्था को देख कर बहुत अच्छा लगता था। मैं जल्दी से जल्दी उसे घर में लगे लाल-नीले ग़ुब्बारे दिखा देना चाहता था। उन्हें माँ के साथ बैठ मैंने भी फुलाया था। माँ ने मुझे रिमोट से चलने वाली एक कार दी थी वो भी उसे दिखाना था। मैं बहुत खुश था। मुझे पता था माँ ने समोसे और छोले के साथ मैगी भी बनाई है। लग रहा था सब मुझे ही देख रहे हैं और मैं कोई सुपर हीरो बन गया हूँ। सब कुछ परफ़ेक्ट था। माँ ने केक मेज़ पर रख दिया पर तभी वो आ गया। माँ के चेहरे का रंग उड़ गया। वो आते ही सीधे कमरे में चला गया। माँ उसके पीछे-पीछे चली गई। जाने दोनों में क्या बात हुई? माँ ने म्यूजिक सिस्टम ऑफ कर दिया। जन्मदिन वाले गाने बंद हो गए। वो सहमी सी आवाज में मुझसे बोलीं, “पापा की तबियत ख़राब है जल्दी से केक काट लो तो सब लोग खाना खा लें”
“पर गाना क्यों बंद कर दिया?”
“पापा सो रहे हैं”
आस्था बोली, “अरे आंटी, बिना गाने का बड्डे कैसे मनेगा इसका?”
माँ कुछ बोलती उससे पहले ही उसने म्यूज़िक फिर से ऑन कर दिया।
“सूरज रोज आता रहे, रोज गाता रहे
लेके किरणों के मेले….तुम जिओ हज़ारों साल साल के दिन हो पचास हज़ार”
माँ ने सिस्टम की आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि हल्की म्यूज़िक सुनाई देती रहे लेकिन गाने के बोल ना समझ आएँ।
विनय की मम्मी ने माँ से बोला कि पापा को केक काटने के लिए बुलवा लें। माँ बोलीं, “ उनकी तबियत ठीक नहीं है” और जल्दी से मेरा केक कटवा दिया। तभी वो बाहर निकल आया। किसी ने कहा, “देखो! भाईसाहब भी आ गए। वही तो मैं भी कहूँ बेटे के जन्मदिन में बाहर कैसे नहीं आएँगे। अब आप ही केक खिलाइये बेटे को।”
उसने केक का एक टुकड़ा मेरे मुँह में ठूँस दिया। हाँ! वो ठूँसना ही था। फिर बोला, “और खाओगे?” मैं अभी ठूँसने और खिलाने के फ़र्क़ को समझ ही रहा था कि उसने दूसरा टुकड़ा भी ज़बरदस्ती मेरे मुँह में डाल दिया। माँ ने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। सब लोग मेरी तरफ़ ही देख रहे थे। फिर उसने एक टुकड़ा माँ के मुँह के पास लाते हुए कहा,
“लो …तुम भी खाओ मदर इंडिया…बेऽटेऽ के जन्मदिन का केऽक। तुम्हें तो अकेले पार्टी करनी थी और बीच में मैं आ गया! ये कहते हुए माँ के मुँह में भी दूसरा टुकड़ा डाल दिया। उसे ये सब करते देख सब लोग डर गए थे। जाने किसने किससे क्या कहा? म्यूजिक बंद हो गया। कोई ताली नहीं बजा रहा था। सब मेरा मुँह देख रहे थे। विनय ने मुँह झुका लिया था आस्था विनय को देख रही थी। फिर वो अंदर अपने कमरे में चला गया। माँ ने झूठी हंसते हुए कहा, “ अरे! वो क्या है ना, इनका बी पी बहुत बढ़ गया है। तो गाने की तेज आवाज़ सुन कर थोड़ा परेशान गए हैं। अभी थोड़ी देर में एकदम ठीक हो जाएँगे।” मुझे माँ की आवाज़ में आंसुओं की भरभराहट सुनाई दे रही थी।
सबको नाश्ता देती माँ बार-बार दूसरे कमरे की तरफ़ देख रही थीं। वो इतना धीरे बोल रही थीं कि सबको लगने लगा अब शांत रहना है। मेरी कार माँ के कमरे में थी पर वो अभी उसी में था। मैं आस्था और विनय को कार नहीं दिखा पाया। वो सब ऐसे ही चले गए। एक सुपर हीरो की सबसे अच्छी फ़िल्म फ्लॉप हो गई थी। मैं उस आदमी पर चिल्लाना चाहता था। उससे कहना चाहता था, “क्यों आए तुम? दो घंटे बाद आ जाते।” पर इतनी हिम्मत नहीं थी मुझमें।
माँ ने मेरे गालों में ढेर सारी पप्पियाँ दीं फिर सबके लाए हुए गिफ्ट्स देखने को कहा और अपने कमरे में चली गईं।
पहला पैकेट खुला, उसमें पेंसिल बॉक्स था। दूसरे में खिलौने वाला बंदर जो चाभी भरने पर ढपली बजाने लगा। मैं सोचने लगा, इतना छोटा थोड़े हूँ जो बंदर से खेलूँ। पर उसका ढपली बजाना अच्छा लग रहा था। माँ के कमरे से आवाज़ें आ रही थीं। मैं बार-बार बंदर की चाभी भर दे रहा था। उन तेज आवाज़ों को उस समय तो नहीं समझ पाता था लेकिन उसके बाद उस तरह की बातें सालों सुनता रहा। वही गालियाँ, संबंधसूचक उपनाम यहाँ तक कि …अपनी माँ के लिए मैं जिस तरह की बातों को सुन रहा था वो सुन कर मुझे हमेशा के लिए बहरा हो जाना चाहिए था। कुछ नहीं तो किसी गाड़ी के आगे आकर मर जाना चाहिए था वो भी नहीं तो उस आदमी को ही मार देना चाहिए था। पर मैं इनमें से कुछ भी नहीं कर सका। जब रात अपनी पलक मूँदती है अंधेरा तभी होता है वरना रात की रोशनाई दिन से ज़्यादा सुंदर लगती है। ठीक उसी तरह मेरे हिस्से की सारी रोशनी माँ पर निर्भर थी। उसकी आँखों को पढ़ता, उसके होंठों की मुस्कुराहट की गुणवत्ता जाँचता मैं धीरे-धीरे उमर की इमारत पर चढ़ रहा था।
माँ के आने की पूरी तैयारी हो गई थी। सोसाइटी के गार्ड से कह कर एक काम वाली दीदी को बुला लिया। वरना माँ पर ही सारा काम पड़ जाता।
माँ को आए एक हफ़्ते हो गए थे। कमरों से लगीं बालकनी जिनमें ख़ाली डिब्बे या झाड़ू पड़े रहते थे, गमलों से भर गईं। उसने मेरे कमरे की बालकनी में फूल वाले पौधे लगाए थे। कह रही थी, सुबह शाम इन्हीं को देख मुस्कुरा दिया कर…ये क्या मनहूस सी शक्ल बनाए रखता है?”
कभी-कभी सोचता हूँ माँ को मेरी शक्ल पर प्यार कैसे आता होगा! हू ब हू वही शक्ल मिली है मुझे। जिस शक्ल को मैं ख़ुद आइने में नहीं देखना चाहता हूँ माँ उसे मुस्कुराकर चूम लेती है। कहती है, “तूने कोशिश नहीं की वरना अरजीत से भी बड़ा गायक बनता।”
कोशिश करना तो बहुत दूर की बात थी मुझे तो संगीत के “सा” से भी नफ़रत थी। ये नफ़रत उस आदमी के कारण हुई जो वाक़ई मुझे सिंगर बना सकता था। सुबह वो हरमुनियम लेकर रियाज़ करने बैठ जाता। मोहल्ले के कुछ लोग कहते, “आपकी वज़ह से सुबह कितनी सुंदर हो जाती है!”
तो कुछ कहते, “अरे भाईसाहब, सुबह चार बजे से ही तान लगा देते हैं। नींद भी पूरी नहीं होती हमारी।”
नींद तो हमारी भी पूरी नहीं होती थी। वैसे भी ख़ुद जागने के बाद वो किसी और को सोने कहाँ देता था। माँ ने बाद में एक हल निकाला। रात जल्दी सुला कर सुबह पढ़ने बैठा देती। कहती जब वो गाएँ तुम गणित लगाया करो।”
कभी उसे कहीं बड़ा सम्मान मिलता तो वो ख़ुश रहता। मेरे लिये चॉकलेट लेकर आता। मुझे अपनी गोद में बैठा कर ईनाम में मिली शील्ड और सर्टिफिकेट दिखाता और बोलता, “लोग कह रहे थे, उस्ताद जी जब आप आलाप लेते हैं तो समय भी ठहर कर आपको सुनने लगता है। हा हा हा..पता है! जब तू पैदा होने वाला था तभी तेरी माँ से कह दिया था कि आलाप आ रहा है। मुझे उस समय उस आदमी पर बहुत प्यार आता। मन करता कि उसके सीने से चिपक कर ही सो जाऊँ। पर पंद्रह-बीस मिनट बीतते-बीतते कुछ ऐसा हो जाता कि वो अपना अच्छा पिता वाला मुखौटा उतार देता।
“साले, आलाप नाम रखे कि ये एक दिन मेरा नाम रोशन करेगा लेकिन इसे तो अपनी माँ के पल्लू में बँध कर ही बैठना है। ये तो चाहती थी कि तू पैदा ही ना हों। इसे तो लड़की चाहिए थी। माँ ठुमरी गाती और बेटी मुजरा करती।”
उसके बाद सारी गालियाँ माँ पर शिफ्ट हो जातीं। शुरू में माँ को उन गालियों पर जितना तड़पता देखा बाद में वो उतनी ही शांत हो गई। माँ भी बहुत अच्छी सिंगर थी। उस आदमी ने माँ को किसी दोस्त की शादी में गाते हुए सुन लिया था। माँ उसके दोस्त की ममेरी बहन थीं। उसने तुरंत शादी के लिए रिश्ता भेज दिया। उस एक गलती का अफ़सोस मामा को पूरी ज़िंदगी रहा।
आजकल ख़ाली बस का इंतज़ार नहीं करता। माँ मेरा इंतिज़ार करती है। एक दिन उसे इंडिया गेट घुमाने ले गया था। वहाँ भी कितनी भीड़ होने लगी है।
लोगों का हुजूम देख कर अजीब सी अकुताहट होती हैं। सब कितने खुश दिखते हैं। जहाँ देखो लोग सेल्फ़ी ले रहे।खिलखिला रहे। एक ही आइसक्रीम को दो लोग खा रहे। एक ही नारियल में एक ही स्ट्रा से दो लोग पानी पी रहे। मैं उन्हें देख कर सोचने लगा, “प्यार में इस तरह का छिछोरापन ज़रूरी है क्या? सब जगह प्रदर्शन की होड़ सी लगी हुई है। सब कुछ दुनिया को दिखा कर इन्हें क्या साबित करना है?”
तभी एक बच्चा दौड़ते हुए मेरे पास आया और मेरी पीठ के पीछे छिप गया। मैं जब तक उससे कुछ पूछता एक आदमी उसके पास आ गया,
“ढूँढ लिया हमने अपने बेटू को”
“कैछे ढूँढा”
“हमारे बेटू की ख़ुशबू हमें खींच लाती है”
“ये तो चीटिंग है पापा”
उस आदमी ने बच्चे को गोदी में लेकर उछाला। तभी वहाँ एक औरत भी आ गई।
“मम्मा पापा ने मेली ख़ुस्बू से मुझे ढूँढ लिया ये तो चीटिंग है ना?”
“हाँ भाई ये तो चीटिंग हुई।”
“अरे, अरे चीटिंग कैसे हुई! हम तो मम्मा को भी उनकी ख़ुशबू से ढूँढ लेते हैं।”
बच्चा हैरानी से पूछता है, “सच्ची मम्मा”
आदमी ने उस औरत के कंधे पर हाथ रख लिया है। औरत उसके पीठ में धीमा मुक्का मार रही है। दोनों खिलखिला रहे हैं। बेटा उनसे भी तेज खिलखिला रहा है। मेरी नज़र से वो दूर हो गए हैं लेकिन मेरी आँखें उनकी पीठ पर अटक गई है। कितने खुश हैं ये लोग। देखने में बहुत साधारण से लोग थे लेकिन उनके चेहरे पर बिखरी ख़ुशी बहुत ख़ास थी। वो ख़ुशी मेरे और माँ के हिस्से में नहीं आई थी। एक उमर के बाद मेरे अंदर के भाव ख़त्म होने लगे। उदास करने वाली चीजें अब उदास नहीं करतीं थीं ना ही खुश होने वाली बातों से कोई ख़ुशी मिलती। लोगों को खुश देखना भी एक ढोंग सा लगता है। लगता ये सब नाटक है, ये हँसना-खिलखिलाना।
आपकी जीभ को जो स्वाद लगा ही नहीं उसका एहसास आपको हो ही नहीं सकता। अगर आप मन से शाकाहारी हों तो आपको मांस के प्रति लालच नहीं होगा। उसकी तस्वीर आपके मन में वितृष्णा ही उत्पन्न ही करेगी। उसी तरह जो ख़ुशी इंसान को मिलती नहीं है वो उसी ख़ुशी को मृगतृष्णा मान लेता है। उसके वजूद को एक सिरे से इनकार कर देता है। साथ में बैठी माँ भी शायद यही सोच रही है। नहीं वो बार-बार मोबाइल देख रही है लग रहा है उसके साथ चैट कर रही है।
“सब ठीक है?”
माँ ने मुझे देख मोबाइल बंद कर दिया।
“हाँ”
“उन्हें बुरा तो नहीं लगता आपका यहाँ आना”
“बुरा क्यों लगेगा? अगर लगता भी तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता?”
“फिर भी अगर बुरा लगे तो..”
“तू कैसी बात करता है बेटा? क्या चल रहा है तेरे भीतर?”
“कुछ नहीं, कुछ भी नहीं। चलिए नौ बज गए।”
मुझे ये तो नहीं पता कि माँ की ज़िंदगी में वो आदमी कब आया था लेकिन जब मुझे पता चला मैं सोलह साल का हो चुका था। माँ थोड़ी खुश रहने लगी थी। अक्सर फ़ोन पर बात करती रहती थी। मुझे लगता था कि उसने अपने आस-पास एक काँच की दीवार लगा दी है जिसके भीतर कोई ना जा सके ना उसकी आवाज़ मुझ तक आ सके। पर उसे खुश देख मुझे अच्छा लग रहा था। एक दिन काँच की दीवार का दरवाज़ा खुला रह गया। वहाँ बैठी माँ अब कोई दूसरी ही औरत थी।
“आलाप, अब मैं तुम्हारे पापा के संग नहीं रह सकती। इस साल से तुम भी कॉलेज चले जाओगे। मैं यहाँ अकेली नहीं रह पाऊँगी।”
“आप मामा-मामी के साथ रह लीजिएगा।”
“नहीं बेटा, मैं उनके पास भी नहीं जाऊँगी।
“तब किसके साथ रहेंगी?”
“मेरे दोस्त के साथ”
“दोस्त! कौन सी दोस्त माँ?”
“वो दोस्त जिसके चलते मैं आज ज़िंदा हूँ। तुम्हारे पापा ने तो मुझे ख़त्म ही कर दिया था। उस आदमी के साथ अब एक घंटा बिताना भी बहुत मुश्किल है।”
मैं सोच रहा था ये क्या कह रही है माँ? किसके चलते ज़िंदा है वो? वो तो कहती थीं, मुझसे ज़्यादा प्यार वो किसी से नहीं करती हैं। मेरे मुँह से निकला, नहीं! मन में सवाल उछला, मैं कहाँ रहूँगा?
वो मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में लेकर बोलीं, “आलाप क्या सोच रहे हो बेटा? तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे। जल्दी ही तुम्हें अपने दोस्त से मिलवाऊँगी। वो बहुत अच्छे हैं तुम्हें उनके साथ बहुत अच्छा लगेगा।”
मुझे नहीं रहना किसी के साथ। किसी के साथ नहीं रहना…मैं रेल की पटरी पर नंगे पाँव दौड़ रहा था। जब पटरियों के आस-पास गिरे कंकड़ चुभने लगते तो मैं पटरियों पर चलने लगता फिर उनकी जलती पटरियों से पैर जलने लगते। मेरे पैरों के पास घास से भरे मैदानों का विकल्प नहीं था।
माँ ने मेरे तथाकथित पिता को तलाक़ दे दिया। सुना था कि उसने बहुत बवाल किया था। मुझसे मेरी माँ के लिए सवाल किए गए। मुझे बस माँ का ही साथ देना था लेकिन मैंने उनके साथ को स्वीकार नहीं किया। माँ या पिता के चुनाव में मैंने माँ और अकेलापन चुन लिया था।
अकेला रह जाना और अकेला होना दो अलग बातें हैं। अकेला होना आपकी इच्छा हो सकती है, आपका स्वभाव हो सकता है।वो आपका चुनाव या कुछ भी हो सकता है लेकिन अकेले रह जाने का दर्द इतना भारी होता है कि आप उसके नीचे छटपटाते ही रह जाते हैं। मेरी छटपटाहट जायज़ थी या नहीं, नहीं पता! लेकिन मैं साँस नहीं ले पा रहा था।
लोग मुझसे कहते, “घोर कलियुग है। बेटे की शादी करने की उमर में माँ बाप इश्क़ लड़ा रहे हैं।” हाँ वो भी कहीं इंगेज़ हो रहा था। वैसे तो मुझे इन बातों का असर ख़ुद पर नहीं पड़ने देना चाहिए था लेकिन आप सत्रह-अठ्ठारह साल के लड़के के अंदर कितनी गंभीरता की उम्मीद कर सकते हैं? कॉलेज-हॉस्टल सब जगह ख़ुद को सबसे छिपा कर रखता था। कोई मुझे देखता तो लगता इसे भी मेरे परिवार के बारे में पता चल गया। परिवार और उसके समानार्थी शब्द मेरे अंदर खीझ पैदा कर देते थे।
जैसे-तैसे अपनी पढ़ाई पूरी की फिर ये नौकरी मिल गई। वो जो अब मुझे छोड़कर जा चुकी थी, मेरी कॉलेज की दोस्त थी। उसके जाने के बाद मेरे अंदर एक अलग क़िस्म का ख़ालीपन आ गया है। रात को अपने कमरे की खिड़की खोल कर सोता हूँ। उसके बाहर से आसमान दिखाई देता है तो लगता है कोई मेरे साथ है। माँ को आए दस दिन हो गए हैं। जब वो मेरे बायोलॉजिकल पिता के साथ थी तो वो सिर्फ़ मेरी माँ थी। मैं अपने मन की हर बात उससे बाँट लेता था लेकिन जबसे वो अपने दोस्त के साथ रहने लगी है तबसे मेरी बातें ख़त्म हो गई हैं। शुरू-शुरू में उन पर बहुत ग़ुस्सा आता था लेकिन अब उस तरह का कोई भी भाव नहीं बचा। वो मुझे ख़ुश रखने के हर जतन करती है। कभी मेरी पसंद का खाना बनाती है तो कभी मेरे सिर की मालिश। कभी मेरे कपड़ों को ठीक कर देती है तो कभी मेरे घर को। मन करता है उससे कह दूँ, ये सब करके तुम मुझको और दूर कर रही हो माँ! मुझे लगता है तुम अपनी ग़लतियों के अपराध बोध को कम करने के लिए ये सब कर रही हो। लेकिन कहता नहीं था।
“कल ऑफिस से छुट्टी ले लो बेटा”
“अच्छा! अब कहाँ घूमना है?”
“कहीं नहीं, परसों मुझे निकलना है ना! तो कल घर पर ही रहेंगे एक साथ..”
“सब तो बना कर खिला दिया, अब क्या बनाओगी?”
“कुछ तो बनाना है लेकिन कैसे बनाऊँ समझ नहीं आ रहा”
“ऐसा क्या बनाना है माँ? अब जो बनाना हो वहाँ बनाना।”
ये बोलते ही मुझे लगा, कुछ ग़लत बोल दिया। उनका उतरा हुआ चेहरा देख मैंने कहा, “मतलब एक दिन तो आराम कर लो। वहाँ जाकर भी यही काम करना है।”
“वहाँ मुझे कुछ नहीं करना होता। अकेले का क्या ही काम होता है!”
मैं “अकेले” पर दिए गए अतिरिक्त वजन को समझ पाता उससे पहले ही वो कहने लगीं, “मैं राजीव के साथ नहीं रहती। एक कमरे का फ्लैट लिया है वहीं रहती हूँ।”
ये क्या कह रही है माँ? अकेले रहती है? क्यों और कबसे जैसे सवालों को निकलने से पहले ही वो कहने लगी, “तुम्हारे पापा ने मुझे पसंद करके रिश्ता भेजा था। शुरू-शुरू में सब कुछ ठीक ही लगता था। जो ठीक नहीं था उसे मैं अपनी किसी गलती से जोड़ देती थी। उसके रूप की तहें खुलने में जितना समय लगा उतने साल किसी तरह कट गए। मुझे लगता मुझे थोड़ी और कोशिश करनी होगी फिर सब ठीक हो जाएगा। परिस्थितियों का हवाला देते हुए मैं अपनी शादी को क्लीन चिट देती रहे लेकिन धीरे-धीरे मेरी आँखों पर बंधी पट्टी खुल गई। सब कुछ साफ़ दिखाई देने लगा और मैं उस इंसान से दूर होने लगी। तभी मेरी ज़िंदगी में राजीव आए। दोस्ती से शुरू हुए हमारे रिश्ते में साहचर्य की इच्छा जगी। वो मेरे साथ तुझे भी अपनाना चाहते थे पर तू तो उनसे मिलना भी नहीं चाहता था।”
“माँ आप अपनी जगह सही थीं लेकिन मेरे लिये ये सब कितना मुश्किल था वो आप समझ भी नहीं सकतीं।”
“ कैसे समझती? तूने तो मुझसे बात करना भी बंद कर दिया।”
मुझे माँ की बातों से घबराहट हो रही थी मैं उन गलियों में वापस नहीं जाना चाहता था। अगर जाता तो उनकी गंदगी माँ के सामने आ जाती।
“वो सब छोड़िए ये बताइए आप अकेली क्यों रहती हैं? उन्होंने आपके साथ डिच किया?”
“ना रे!”
“फिर, फिर क्या हो गया?”
“कुछ पुराने ज़ख़्म इतने गहरे होते हैं कि फूलों का स्पर्श भी उन्हें हरा कर देता है।”
“मतलब”
“तुम्हारी चुप्पी ने मुझे बहुत अकेला कर दिया था। राजीव चाहते कि हम एक सामान्य ज़िंदगी जिएँ लेकिन मैं ख़ुद ही नॉर्मल नहीं थी। मेरी मानसिक हालत देख वो भी डर जाते थे। कभी प्यार से तो कभी कड़े शब्दों में मुझे बदलने की कोशिश करते। मुझे लगता फिर से एक आदमी मुझे अपने हिसाब से ढालने की कोशिश कर रहा है। मैं अपनी पिछली ज़िंदगी में इतनी बार गिर चुकी थी कि फ़र्श पर पानी होने का ख़्याल भी मुझे डराने लगा था। कभी-कभी लगता कि मैं फिर से एक दलदल में फँस गई हूँ जहाँ मेरा बेटा भी साथ नहीं है।”
“पर कुछ तो हुआ होगा जो आपको ऐसा लग रहा था!”
“नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। मेरी मानसिक हालत ऐसी थी कि हमेशा लगता …कुछ ग़लत हो रहा है। अवसाद में इंसान कुछ भी सोचने-समझने की स्थिति में नहीं रह जाता है। एक दिन मैंने उनसे कह दिया कि मेरे मन में आपके लिए कुछ भी नहीं बचा अब मैं आपके साथ नहीं रह पाऊँगी।”
माँ ये सब बताते-बताते रो रही थी। मेरे अंदर भी कुछ पिघल रहा था। क्या कर दिया था मैंने? मैं वहाँ हॉस्टल के अंधेरों में अपनी कल्पनाओं में माँ को किस तरह देखता था! फिर ख़ुद को थप्पड़ मारता। उसके और राजीव के लिए कैसी-कैसी बातें सोचता? और वहाँ मेरी माँ डिप्रेशन में बिलख रही थी वो भी मेरी वजह से!
“मुझे लगता था जिस बेटे के लिए मैंने अपनी जीवन के अठ्ठारह साल उस राक्षस के साथ काटे वही बेटा मुझसे दूर हो गया! कभी सोचती, राजीव भी बाद में तेरे पापा जैसे हो जाएँगे लेकिन वो उनकी तरह नहीं थे। पहले तो उन्होंने मुझे जाने से रोका लेकिन जब मैं नहीं मानी उन्होंने मुझे एक फ्लैट में शिफ्ट करवा दिया। मैं भी उन्हें तलाक़ नहीं देना चाहती थी। सोचा, लोग क्या कहेंगे? सब सोचेंगे, मेरे ही अंदर ही कोई कमी है जो किसी के साथ नहीं रह पा रही!”
“ये क्या कह रही हो माँ? आप…कबसे…मतलब उनसे कब अलग हुईं?”
“हमारी शादी के तक़रीबन डेढ़ साल बाद ही उनका घर छोड़ दिया था लेकिन राजीव ने मुझे नहीं छोड़ा। ज़बरदस्ती मुझे साईकैटरिस्ट के पास ले गए। पता चला कि सीवियर डिप्रेशन में हूँ। इलाज शुरू हुआ। दवाइयों के चलते मुझे नींद आने लगी। जाने कितने सालों बाद…तब मुझे पता चला नींद ऐसे भी आती है।”
“ये सब चलता रहा और आपने मुझे कुछ भी नहीं बताया? एक बार कहतीं तो…”
“क्या कहती रे! तू तो ख़ुद ही सबसे कट गया था। बोलती तो थी, बच्चा मुझे तेरी बहुत ज़रूरत है। तू फ़ोन ही काट देता था।”
ये सब कहती तो थी माँ, मैंने कितना ग़लत किया इनके साथ। तक़रीबन तीन साल मैंने उनसे ना के बराबर बात की थी। सोचा ही नहीं माँ इस तरह जी रही है। वो मुझे अपने पास बुलाती तो मैं नहीं जाता। मेरे पास आना चाहती तो मैं मना कर देता था। धीरे-धीरे उन्होंने मिलने की बात ही बंद कर दी तब भी मैंने ग़लत ही समझा। यहाँ तक कि नौकरी मिलने पर जब माँ ने बधाई देते हुए मेरे पास आकर रहने की बात की तब भी…
सालों बाद मैंने माँ की गोद में अपना सिर रखा। कहना चाहता था, “मुझे माफ़ कर दो माँ” लेकिन नहीं कह पाया।
उनकी उँगलियाँ मेरे बालों में घूमने लगीं। मेरे माथे पर पड़ता उनकी उँगलियों का दबाव मेरे अंदर के ग़ुबार को हल्का कर रहा था। मेरी भीगी पलकों को पोंछते हुए माँ ने मेरा माथा चूम लिया।
“अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ बेटा, वो समय निकल गया। तुझे पता है, मैं वहाँ बच्चों को म्यूजिक सिखाती हूँ!”
मेरी आँखों में आश्चर्य देख कर वो बताने लगी,
“राजीव का ही आइडिया था। उन्हें लगता था कि संगीत ही मुझे ठीक कर पाएगा। अब तो बीस बच्चे आने लगे हैं। एक-एक घंटे की तीन क्लास लेती हूँ। तेरे लिए जो घड़ी लाई हूँ वो मेरे कमाए पैसों की है। तूने उसे पहना भी नहीं! तुझे लगा होगा…”
उनकी बात काटते हुए मैंने कहा, पहन लूँगा माँ।” माँ के आँसू अब सूख रहे थे।
मुझे शांत देख वो कहने लगी,
“इतना उदास मत रहा कर बच्चा, तू तो मेरा वो बच्चा है जिसने मुझे उन हालातों में भी ज़िंदा रखा जिसमें कोई भी मर जाता। दुनिया उतनी ख़राब नहीं है जितनी हम उसे समझने लगते हैं। हमारे ख़राब अनुभव हमें इतना खुरदुरा कर देते हैं कि हमारे साथ जुड़े अच्छे लोगों की नाज़ुक उँगलियाँ छिल जाती हैं और वो हमसे दूर होने लगते हैं।”
“पर ये सब हमारे साथ ही क्यों हुआ माँ? एक नार्मल लाइफ तो हम भी डिज़र्व करते थे। उस आदमी की वजह से…”
“माफ़ कर दो उसे”
“उसे! कभी नहीं”
“तेरे सामने पूरी ज़िंदगी पड़ी है आलाप। याद है बचपन में जब भी तेरी राइटिंग अच्छी नहीं होती मैं उन्हें मिटा कर फिर से लिखवाती थी। तू ग़ुस्सा हो जाता था लेकिन मैं बार-बार ये करती थी। उसके बाद तेरी हैंडराइटिंग कितनी सुंदर हो गई।”
मुझे याद आ गया। मेरी हैंडराइटिंग दिखाने के लिए मेरी नोटबुक दूसरे क्लास रूम्स में भी जाती थी।
“एक बार फिर से इरेज़र उठा कर उन पन्नों को साफ़ कर दे। माफ़ कर दे उसको।”
वो रात आंसुओं की रात थी। कुछ बहने के बाद थम जाने की भी रात थी। उस रात बहुत सालों बाद अल्पू अपनी माँ से मिला था।
माँ को गए महीना भर हो गया है । उस रात को बीते जाने कितनी रातें बीत गईं। माँ के आने से मेरे भीतर की तन्हाई को कुछ अलग प्रकार के दृश्य देखने को मिले थे। उसे ये सोचकर अच्छा लगता था कि फ़्लैट का दरवाज़ा खुलने के बाद वहाँ सन्नाटा नहीं ध्वनियाँ मिलेंगी। अब फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया है। नहीं बिल्कुल पहले जैसा भी नहीं है उससे थोड़ा अलग…जैसे मैं अब ख़ाली बस का इंतज़ार नहीं करता। जिसमें खड़े होने भर जगह मिल जाए उसी में चढ़ जाता हूँ। दोस्तों की बातों को सिर्फ़ सुनने के लिए नहीं सुनता, समझने की भी कोशिश करता हूँ। माँ के आने से पहले लगता था कि इस मन की सतह में दबे घाव फिर से उभर जाएँगे और ऐसा हुआ भी… पर माँ ने कुछ तो लगा दिया है उन पर जो वो सूख रहे हैं। कल उसे भी कॉल किया था। बातों से खुश लग रही थी। कोई आ गया है उसकी ज़िंदगी में। पूछना चाहता था, कब? मेरे जाने के बाद या उसके आने के बाद मेरा जाना हुआ? ये भी पूछना चाहता था कैसा है वो? जंगल या पहाड़? पर कुछ पूछ नहीं पाया।
फ़ोन रखने के बाद लगा, अंदर का पहाड़ दरक रहा है। उसको गले से लगाने की हूक उठी। आँखों में तेज़ी से कुछ भर रहा था।
तभी मोबाइल पर एक मैसेज फ़्लैश हुआ..
“हे आलाप, थैंक यू फॉर कॉलिंग मी…हम और कुछ होने से पहले दोस्त थे और मैं इस दोस्ती को पूरी ज़िंदगी निभाना चाहती हूँ।”
उस टेक्स्ट को पढ़ते समय माँ की बातें याद आने लगीं। गंदी राइटिंग..इरेज़र…सुंदर राइटिंग..नोटबुक…फिर मैंने एक पुराना नंबर ढूँढा जिसे थीफ़ के नाम से सेव किया था। राजीव मेरे लिए तब चोर ही थे। मेरी माँ को चुराया था उन्होंने…उस तरफ़ से आए अनुत्तरित मैसेजेज़ को पढ़ते समय लगा, पहले क्यों नहीं समझ पाया इनको? अब सब समझते हुए लग रहा था, माँ को ही नहीं इन्हें भी माँ की ज़रूरत है। मैं उन्हें टेक्स्ट करते हुए सोच रहा था, इस नोटबुक को सुंदर हैंडराइटिंग में लिखने का समय आ गया है।

