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  • यतीश कुमार से आशुतोष कुमार पांडेय की बातचीत

    आज पढ़िए लेखक-कवि यतीश कुमार से बातचीत। बातचीत की है युवा लेखक आशुतोष कुमार पांडेय ने। आइये पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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    1. आपकी पुस्तक ‘बोरसी भर आँच’ में ‘अतीत का सैरबीन’ एक केंद्रीय उपकरण के रूप में प्रस्तुत है। क्या आप इसे विस्तार से समझा सकते हैं और यह आपके लेखन में किस प्रकार की भूमिका निभाता है?

    सैरबीन अतीत के जंगल में काँटों को चुनने और फूलों को सूँघने की युक्ति है। मुझे लगता है कि स्मृतियों के बादल का घनत्व इतना सघन होता है कि आपको अक्सर लगेगा वे बादल नहीं शीशे पर जमी गाढ़ी धूल है जिसे समय-समय पर साफ़ करने की जरूरत है, ताकि धूल को पत्थर बनने से रोका जाए। कई बार स्वचिंतन की मुद्रा में अंतर्मुखी प्रयास से वो तीसरी दृष्टि आपको मिल जाती है जो लगातार स्मृतियों की खिड़कियाँ को खोलती चली जाती हैं। इसे आप अपने सामान्य मनःस्थिति में याद करने के प्रयास से नहीं खोल सकते। मैंने इसी तीसरी दृष्टि को सैरबीन की संज्ञा देने की कोशिश की है। इस युक्ति, इस प्रोसेस तक पहुँचने के लिए जो उपकरण आपकी मदद करता है उसके लिए इससे उपयुक्त शब्द मेरे पास नहीं था।

    वैसे अगर सामान्य अर्थ में इसकी व्याख्या को देखा जाये तो घर के भीतर से दरवाजे की जिस सुराख से बाहर का नज़ारा या आगन्तुक को देखने की आप कोशिश करते हैं उसी सुराख को आप सैरबीन कह सकते हैं। हालाँकि किताब के संदर्भ में मसला बाहर नहीं बल्कि भीतर झांकने का है। अपने मन की तहें खोलने का है।

    अब आप इस पूरे प्रोसेस को इस तरह भी समझ सकते हैं कि हम कहानियाँ, कविता या संस्मरण कुछ भी लिखें अंततः अपने अनुभव के जमीन की तलाश ही करते हैं। कभी इन अनुभवों को सीधे आप शब्दों के बाने में व्यक्त करते हैं और कभी आपको अनुभव की जमीन पर कल्पना के बीज अंकुरित करने होते हैं, तब जाकर कथ्य और शिल्प अपनी फसल उगाता है। तो इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि जिस जमीन पर यह सब घटता है उसकी तलाश में लेखक भटकते हैं तब यह सैरबीन लेखन को उस ज़मीन तक पहुँचाने में मदद करती है।

    लिखना अतीत में झाँकना भी होता है। अतीत की झाँक के उस पार यह व्यवस्था के आईने में बदल जाती है जहाँ पूरा परिदृश्य अपनी सूक्ष्मता के साथ और ज्यादा साफ दिखाई देने लगता है। इस यंत्र के साथ समय के परे ताकते हुए अतीत अपने वर्तमान के सारे जंगल जालों के साथ दिख जाता है। यहीं इसी खोज में आपकी लेखनी को  विस्तार मिलता जाता है, कथ्य को अपना रास्ता मिल जाता है और कहानी को अपनी मंजिल।

    1. इस आत्मकथा में आपने ‘किऊल’ नदी के किनारे के जीवन को कैसे चित्रित किया है? क्या यह स्थान आपके लेखन के लिए एक रूपक के रूप में कार्य करता है?

    किऊल के तट पर आज भी मेरा नाव टिका है, नाव माने मन का नाव! मेरे लिए किऊल यथार्थ की ज़मीन भी है और स्मृतियों की नदी भी। बहुत मुश्किल होता है हम जैसे लेखकों के लिए अपने बचपन की यादों से निकलना। हम बार- बार घूम-घूम कर उसी जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ की यादें सबसे ज़्यादा सघन होती है और उसी जमीन पर आज को गढ़ने की कोशिश करते हैं।

    किऊल मेरे लिए समय की वह धौकनी है जो मुझे बार-बार अपनी जमीन की याद दिलाती रहती है। यहाँ इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि ताउम्र आप अगर चाहते हैं कि आपके भीतर का बच्चा बचा रहे तो आपको उसी यादों की नदी का पानी बार -बार घूँट-घूँट पीने के लिए उसके घाट पर लौटना होगा जिसने आपके बचपन को बचाये रखा है, संजोए रखा है। मेरे लिए किऊल वही नदी है जिसके घूँट ने आज भी मेरे बचपन को बचाये रखा है।

    इसके बरक्स यह नदी नींद, भूख, भय, स्पर्श, पनाह और विराट त्रासदी से उपजे अतिक्रमण के केंद्र में भी है और इस नदी के केंद्र में तत्कालीन समय-समाज और समस्याएँ निहित हैं। यह अबोली नदी दोहन, पर्यावरण संकट के साथ-साथ पार्श्व से वर्चस्व की जंग की शिनाख्त लिए ‘सूखा और बाढ़’ का प्रतीक भी है। इसी के साथ गवाह उस समय का जिसमें विनाश विन्यस्त है।

    अलग दृष्टि से देखें तो किऊल का चित्रण असल में समाज का चित्रण है। समाज में व्याप्त असमानता का चित्रण है, समय का चित्रण है यहाँ तक कि बदलते समय में जो नहीं बदला उसका भी। हर चित्रण को एक रूपक की जरूरत रहती है। मेरे लिए किऊल ऐसा ही बहुरूपी रूपक है जो समाज के कई रूपों के एक साथ चित्रण करने का सामर्थ्य रखती है। ऐसी विविधता को रचना मेरे लिए व्यक्तिगत कारणों के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी भी बन जाती है।

    अंतस की खुरचन के शब्दों में कहा जाए तो- “मेरी लेखनी जब भी थोड़ी सी धूमिल होती है, मैं चुपके-से चला जाता हूँ उसी अपनी बचपन की किऊल नदी के पास। कई बार मेरी कविता में अनजाने बिना दस्तक दिए चली आती है दबे पाँव, मेरी धौंकनी बनती है और फिर उसकी साँसे अंतस में बहती चली जाती है।”


    1. आपकी लेखनी में ‘भंवर में फंसे मनुष्य को उबारने’ की भावना प्रकट होती है। क्या यह व्यक्तिगत अनुभवों से प्रेरित है या सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति है?

    जब लेखक अनुभव की जमीन पर लेखनी की पृष्ठभूमि गढ़ता है तो इसी के नेपथ्य में मौलिकता अपने सार्थकता का अनुपात भी रचती है। सार्थकता का अभिप्राय शून्य के दोनों अर्थों में होने में है, मतलब शून्य और अनंत। शून्य यहाँ व्यक्तिगत है और अनंत का सिरा समाज से जुड़ा है। इसलिए कविता में भी सिक्के के दोनों पहलू अपना संतुलन लिए मिलेंगे। एक तरफ़ रिश्तों की डोर और उसकी खींचा-तानी तो दूसरी तरफ सामाजिक समस्याओं से उपजे अनुभव की बनती झिलमिल तस्वीर।

    लेखनी की सार्थकता तो इसमें भी है कि डूबते को कुछ सहारा तो मिलना ही चाहिए वरना कविता में विचार के संतुलन का मतलब नहीं बचेगा। हालांकि ऐसा सायास नहीं होता, चूँकि जिस रास्ते पर चलते हुए हम जैसे लोग यहाँ तक पहुँचे हैं, वहाँ उन रास्तों के किनारे काँटों के साथ-साथ सकारात्मकता के दस बज़िया फूल भी खिले मिले हैं। वही फूल मेरी लेखनी में भी खिल जाते हैं, इसलिए आप इसे स्व से संसार के बीच का फैलाव भी मान सकते हैं। इसमें दोनों भाव संसार निहित दिखेगा आपको।

    ऐसे भी कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत अनुभव के संसार का सरोकार भी समाज से ही होता है। यह भी समझने की जरूरत है कि भले अनजाने ही सही पर आपकी निर्मिति में आपका परिवेश हमेशा शामिल रहेगा। अनुभव का छाँव तो आपकी लेखनी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पड़ना ही है। एक बात और अगर आप भंवर से स्वयं निकले हैं तो आपकी रचना में भंवर से निकलने का आशय अनजाने स्वतः आ ही जाता है। यह भाव आपको मेरी आने वाली कहानियों में भी मिलेगा। तद्भव के 50वें अंक में प्रकाशित मेरी कहानी ‘आतिशबाज़ी’ में भी आपको भंवर में फंसे मनुष्य को उबारने की दास्तां दर्ज मिलेगी। यह एक अनुगूँज है जो अनजाने भी आपके साथ रहती है और चुपके से आपकी लेखनी के उपयुक्त जगह शामिल हो जाती है। यह भी नहीं है कि सारी रचना इसी ज़मीन पर बुनी गई होती है। कह सकता हूँ कि ज्यादातर में आपको इसका इको सुनाई देगा।

    1. आपके पहले और बहुचर्चित कविता संग्रह ‘अन्तस की खुरचन’ को ‘मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार’ प्राप्त हुआ; इस संग्रह की कौन-सी विशेषताएँ इसे विशिष्ट बनाती हैं? क्या आप इसे ‘बोरसी भर आँच’ से जोड़ते हैं?

    यह बात वैसे मुझे संस्मरण लिखने के बाद समझ में आयी कि दोनों किताबें कैसे आपस में जुड़ी हुई हैं। जब ‘बोरसी भर आँच’ लिख चुका था तब लगा पाँच साल पहले की लिखी ‘अंतस की खुरचन’ की कविताएँ तो इन बातों को पहले कह चुकी है। बोरसी भर आँच की सारी स्त्रियाँ आपको ‘स्त्री’ कविता के नेपथ्य की गूँज में मिल जायेंगी। जब मैं लिखता हूँ- “जीवन में समस्त ऊर्जा स्रोत / जिन-जिन स्त्रियों से मिलता रहा / उनकी जागती-सोती आँखों से / मैंने प्रार्थनाओं से भरा स्वर्ग देखा है / ईश्वर मिथक नहीं सच है / और आपके इर्द-गिर्द हाथ थामे / यकीन दिलाता है कि / ईश्वर कोई पुरुष नहीं होता” तो आपको माँ, दीदिया, पत्नी और सारी मौसियाँ एक साथ इस कविता में दिख जायेंगी।

    अगर कहूँ तो कविता की यह पंक्तियां बोरसी भर आँच की रूह है, आत्मा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पर लिखते हुए नहीं पता था कि इन कविताओं का सिरा संस्मरण की किताब तक यूँ पहुँचेगा। और भी कई कविताएँ हैं जो आपको संस्मरण की इस किताब तक ले जायेंगी मसलन- ‘जाति’, ‘इतना ही सीखता हूँ’, ‘ओसारा’, ‘मुझे फिर वहीं लौटना है’, ‘माँ की सहेलियाँ’, पिता सीरीज की पाँचों कविताएँ या फिर ‘टिमटिमाना’ इन सभी कविताओं में मेरी वही स्मृतियाँ हैं जो ‘बोरसी भर आँच’ लिखने में सहायक रही हैं या यूँ कहें कि दोनों की आँच एक ही है क्यूँकि बोरसी एक ही है।

    अंतस की खुरचन के बारे में इतना ही कहूँगा कि पहले शिशु से आपका लगाव अलग- सा होता है। पहले शिशु के साथ आपका अनगढ़पन ज़्यादा जुड़ा होता है। उस अनगढ़पन में एक विशेष मिठास होती है जो ख़ुद को भी सिक्त करती है, ख़ुद की प्यास भी बुझाती है। यह संग्रह दो हिस्सों में है। पहला देश राग और दूसरा साझा-धागा। इन दोनों हिस्सों में आपको वही शून्य के दो अर्थ मिलेंगे जिसे मैं पहले ही बता चुका हूँ। आपको मिलेगा स्व का सामाजिक विस्तार जिसका सरोकार देश राग से है।

    अष्टभुजा जी के शब्दों में कहूँ तो “ इस संग्रह के संसार में जितनी निजता है, वैसी की संकुलता भी। कौटुंबिक कारकों के साथ सामाजिक कारक भी उतनी हो शिद्दत से मौजूद हैं। प्रेम की सांकेतिक अठखेलियाँ जगह-जगह मौजूद मिलेंगी। इन कविताओं में बहुधा किसी चित्रकार का डार्करूम नज़र आता है, जहाँ चित्रकार अपने निगेटिव्स को आपने हाथों से धोकर दुनिया के उजाले में सामने लाता है। इसलिए यहाँ बिंबों या रंगों की भाषा में स्याह पक्ष सबसे ज़्यादा चमकता है।”

    मुझे लगा अपनी कविता के बारे में स्वयं कहने से बेहतर अग्रजों की बातों को रखना उचित होगा। उनकी लिखी प्रस्तावना आज भी मेरे लिए आईने से कम नहीं, जिसमें झांकते हुए अपनी लेखकीय जिम्मेदारी का एहसास और सुदृढ़ हो जाता है। उन्हें और प्रिय कवि विनोद कुमार शुक्ल जी को कोटि-कोटि प्रणाम जो इस संग्रह को उन दोनों का आशीर्वाद मिला।

    1. ‘आविर्भाव’ में आपने हिंदी साहित्य की 11 प्रसिद्ध कृतियों पर कविताएँ लिखीं; इस प्रयोगात्मक शैली की प्रेरणा क्या थी और क्या यह आपके आत्मकथात्मक लेखन से संबंधित है?

    सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि ‘आविर्भाव’ का मेरे आत्मकथात्मक लेखन से कोई भी संबंध  है। ‘आविर्भाव’ मेरे लिए सिर्फ़ सीखने की ललक है और मैं कितना सीख पा रहा हूँ इसका स्केल भी। यह मेरी पात्रता का उद्गार है। असल में समझा जाये तो देर से आए विद्यार्थी का तेज़ी से झपट कर चलने का उपक्रम है। साहित्य में मेरा पुनरागमन 2015 में एक लंबे अंतराल के बाद हुआ। मुझे एहसास हुआ समय से कितना पीछे छूट गया हूँ मैं। समय से पीछे छूटना कमजोरी भी है और वरदान भी। पीछे छूटने का एहसास या यूँ कहें देर से की गयी शुरुआत, ज़्यादा पाने की आग और तड़प को बनाए रखता है और इसलिए मैं लगभग तीन घंटे रोजाना साहित्य को एक अनुशासित छात्र के तौर पर देता हूँ। ख़ुद के साथ, साहित्य के साथ यूँ अकेले रहना आपके भीतर की पात्रता को बढ़ाता है और इस क्रम में कुछ नया घट जाने की संभावना बनी रहती है, बढ़ती रहती है। वरदान के संदर्भ में यह कहना चाहूँगा कि जब आप ‘कितने पाकिस्तान’ को बीस साल की उम्र में पढ़ते तो आप उस किताब से उतनी बात उस तरह नहीं कर पाते जिस तरह से जितना आप चालीस या पैंतालीस की उम्र में कर पाएंगे। मेरे लिए ऐसी उम्र में ऐसी किताबों से गुजरना “एक पठनीय पात्रता का अपने भीतर अंकुरण से पेड़ बनने की घटना में परिवर्तित होने जैसा लगता है।”

    सीखने के इसी क्रम में ‘आविर्भाव’ का जन्म हुआ। साहित्य में पुनर्वापसी के समय साहित्य के इस उज्ज्वल पथ पर किताब की पहली किरण बनी आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी का लिखा ‘अनामदास का पोथा’। इस अद्भुत किताब को पढ़ते हुए, किताब के मर्म को डिकोड करने के क्रम में कुछ पंक्तियाँ स्वतः लिखता चला गया और फिर ऐसी पंक्तियां हर वैसी किताब से निकलने लगी, जिसने उस किताब की तरह ही बातें की। उन पंक्तियों को बिना कुछ सोचे समझे फेसबुक पर साझा करता रहा। शुरुआत में लगा जैसे पाठकों को भी कुछ अलग महसूस हो रहा है जबकि यह लेखनी गद्य और पद्य के बीच की आवाजाही सी थी। फिर प्रिय गद्यकार राजेंद्र राव जी का लिखा ‘कोयला भई न राख’ और अन्य किताबों के तौर पर समीक्षा बनकर प्रकाशित होने लगी। गद्य और पद्य के बीच की आवाजाही के इस क्रम को विस्तार और थोड़ी पूर्णता मिली विरले कथाकार स्वदेश दीपक के संस्मरण की किताब ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ पर लिखी कविताई करके। मैं इस बात का शुरू से श्रेय प्रभात रंजन जी को देता आया हूँ। उन्होंने इसे एक अलग विधा के रूप में अपनी संपादकीय दृष्टि से देखा और मुझे भी इस बात से अवगत कराया कि यह कुछ अलग काम हो रहा है। यह भी कि मुझे इसे जारी रखना चाहिए।

    सीखने के प्रयास में कविताई या किताब के काव्य सार को लिखना या कभी किताब को पढ़ते हुए उद्वेलित भावनाओं से स्वतंत्र कविताएँ जन्म लेती रही। मूल किताब के ज़मीन से उपजी स्वतंत्र या उसकी छाया में लिखी कविताओं का ही संकलन है ‘आविर्भाव’, जिसमें 11 पसंदीदा किताबों के ज़मीन से उपजी कवितायें हैं। ये कविताएँ स्वतंत्र होकर भी आपको किताब से गुज़रने का सुख देंगी। इस रूप में अब तक पचहत्तर से अधिक किताबों पर काम किया है। इस समय जब आपसे बात हो रही है, इस रूप में किए गए काम की अंतिम किताब है पंकज बिष्ट की लिखी ‘लेकिन दरवाज़ा’।

    आविर्भाव का शाब्दिक अर्थ उदय या उत्पत्ति से है जो किसी चीज के अचानक प्रकट होने या अस्तित्व में आने की स्थिति को दर्शाता है पर मेरे शीर्षक का संदर्भ संगीत से जुड़ा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो रागों के प्रदर्शन में उपयोग होती है। उस संदर्भ में आविर्भाव का अर्थ है राग के विशिष्ट स्वरों को इस तरह से प्रस्तुत करना कि उसका मूल स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

    इस किताब को याद करते हुए मुझे बेहद स्नेह देने वालीं, मेरी प्रिय कथाकार ममता कालिया जी को याद करना चाहूँगा। इस किताब के प्रस्तावना पृष्ठ पर उनकी शाब्दिक मौजूदगी है। हालांकि सबसे पहले वर्ष 2019 में ही उन्होंने फेसबुक पर मेरा हौसला बढ़ाते हुए लिखा था- ‘यतीश इन काव्यात्मक समीक्षाओं को अब संकलन के तौर पर आना चाहिए।’ प्रकाशन में विलंब का कारण कुछ तो मेरा आलसपन रहा और कुछ संशोधित की प्रक्रिया में समय लगा। प्रिय कवि-कथाकार और फ़िल्मकार देवी प्रसाद मिश्र जी का भी स्नेह रहा कि उन्होंने आविर्भाव का ब्लर्ब लिखा। एक कार्यक्रम में जब वो कोलकाता आए थे तब मुझे उन्हें ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ पर लिखी कुछ कविताएँ सुनाने का सुख मिला था। उन्हें कविताएं पसंद आई और उन्होंने पढ़ने के लिए किताब की पांडुलिपि मँगवायी। बेहद महत्वपूर्ण सुझाव के साथ-साथ उन्होंने अपना आशीष ब्लर्ब के रूप में दिया।

    1. आपने अभियन्त्रण/ प्रबंधन और रेलवे सेवा से साहित्य की ओर रुख किया; इस परिवर्तन के पीछे कौन-से अनुभव प्रेरणास्रोत बने और क्या यह बदलाव आपके लेखन में परिलक्षित होता है?

    जब से नौकरी में आया लिखने-पढ़ने से पूर्णतः दूर चला गया। कुछ सालों तक संगीत सुनने की धुन लगी रही फिर उसने भी मेरा साथ छोड़ दिया। मैंने अपने चारों ओर एक ऐसी कृत्रिम अवधारणा बना ली कि मैं सिर्फ रेलवे के लिए बना हूँ और सारा समय समर्पित रहा। हर पोस्टिंग में एक जुनून साथ काम करता। काम के साथ वहाँ के काम करने के वातावरण की बेहतरी में ख़ुद को झोंक देता। मैंने रेलवे के जीवन को सम्पूर्ण जीवन मान लिया। विरले ही छुट्टी लेता था। जमालपुर वर्कशॉप की पोस्टिंग के उत्तरार्ध में संभवतः 2010 में लगा मैं कितने बड़े भ्रम में हूँ। इसे आप सेल्फ रियलाइज़ेशन कह सकते हैं। वहाँ से मुझे पाँच साल लगे स्वयं के लिए समय निकालने के समुचित अनुशासन में आने में।

    साहित्य में आने का मतलब है स्वयं से बातें करना, स्वयं को ज़्यादा समय देना। अध्ययन और स्वाध्ययन दोनों के संतुलन ने मुझे एक नई ज़मीन दी, जहाँ मेरा लेखक जन्म ले सके, फल-फूल सके। साहित्य के सानिध्य में एकांत और ध्यान का का अभ्यास निहित है। यहीं से आपके भीतर के लेखक को माँजने की प्रवृति विकसित होती है। इसी रास्ते में परिमार्जन और परिष्कृत करने की कला को अपने भीतर ग्रहण करना सीखना होता है। यहीं से बीनने और चुनने के टूल्स मिलते हैं।

    इन टूल्स से परिचय में मेरी पत्नी, मेरी साथी स्मिता जी का बहुत बड़ा हाथ है। घर में सच्चा आलोचक हो तो इससे बड़ा पुरस्कार एक लेखक के लिए कुछ नहीं। पढ़ने की आवश्यकता का बोध स्मिता ने ही कराया और फिर कटु परंतु सत्य आलोचना ने समझाया कि काँटने-छाँटने के उन सारे टूल्स के बिना आप यहाँ गंभीरता पूर्वक नहीं टिक सकते। इसी रास्ते आपको फिर इस प्रोसेस में आनंद आने लगता है आप अपनी पंक्तियों की छटाई में संतुष्टि के बोध को महसूस करते हैं।

    अभियंत्रण या कहा जाये प्रबंधन से अगर कुछ मुझे मिला है तो वह है संतुलन। समय का संतुलन, रिश्तों का संतुलन, कम्पार्टमेंट में समय को रखने का महत्व। जब काम पर रहता हूँ तो पूरी तरह समर्पित और जब स्वयं के साथ साहित्य गुनता हूँ तो वही समर्पण यहां भी साध लेता हूं। यही मेरी कुंजी है और यही मेरी पूंजी भी है।

    1. आपकी कविताओं में जो सहजता और गंभीरता दिखाई देती है, वह पाठकों को एक नई दृष्टि प्रदान करती है। क्या यह दृष्टिकोण आपके व्यक्तिगत अनुभवों से प्रेरित है, या यह साहित्यिक परंपराओं और समकालीन सामाजिक संदर्भों का परिणाम है?

    प्रिय यायावर लेखक कृष्णनाथ के शब्दों में कहूँ तो हमें पहले दृष्टा बनना है तभी स्रष्टा बनने की सीढ़ी का निर्माण संभव है। दृष्टा का यहाँ तात्पर्य बाह्यदृष्टि और अंतर्दृष्टि दोनों को साधने वाले से है। व्यक्तिगत अनुभव के ज़मीन पर जगत में घटित दुनिया का चित्रण करने की कोशिश रहती है। व्यक्तिगत अनुभव आपकी पात्रता की तरह है, जिसमें बाह्य अनुभूति का ओस अर्जित किया जा सकता है। टप-टप बूँद अर्जित होता रहता है और पात्र के भरते ही कविताएँ प्रस्फुटित होती हैं। अब यह अनुपात का मामला बन जाता है कि वह टप-टप बूंदे बाह्य जगत को देखने से अर्जित हुई है या अन्तर्मन में झांकने से। कभी सामाजिक संदर्भ की मात्रा ज़्यादा होगी तो कभी रिश्तों की बुनाई सघन दिखेगी।

    इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि अंततः हम अपने परिवेश के धागे से बुने गए हैं। वे रेशे आपके संवेदना रूपी त्वचा का हिस्सा हैं जिसे अपनी रूह-अपनी आत्मा से जोड़ने का काम कवि करता है। अतः दोनों में कब किस रूप में आपकी रचना में परिलक्षित हो जाये, कब आप्लावित हो जाये, यह कवि को भी कहाँ ही पता चलता है।

    1. साहित्यिक संस्था ‘नीलाम्बर’ के अध्यक्ष के रूप में आपकी भूमिका साहित्यिक परिदृश्य को कैसे प्रभावित करती है? क्या यह भूमिका आपके लेखन में भी परिलक्षित होती है?

    मैं लगभग सात साल तक नीलांबर से जुड़ा रहा। अच्छे लोगों का सानिध्य आपको बेहतर बनाता है। वैसे लोग जो कला और साहित्य को अबाध प्रेम करते हों, उनके साथ काम करना आपको बेहतर बनाता है। वे आपके सामने उदाहरण की तरह प्रस्तुत होते हैं और आप झुंड से बेहतर बनने की कोशिश में लग जाते हैं। नीलांबर का सानिध्य कई मायने में मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा, उसमें से ‘ख़ुद से बेहतर’ बनने की ललक एक है।

    नीलांबर के माध्यम से मुझे ऐसे रचनाकारों, नाटककारों और कलाकारों से मिलने का मौक़ा और सानिध्य मिला जिनसे मिलना कभी सपना हुआ करता था। उन सब के साथ मंच के बाहर वन-टू-वन साहित्य पर चर्चा, समाज की बदलती तस्वीर पर बातचीत, आपकी देखने समझने की शक्ति में अद्भुत इजाफा करती है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव तो ऐसा ही रहा। मैं जब उन दिग्गज रचनाकारों को लेकर कोलकाता की सैर पर निकलता था तो उनकी दृष्टि, उनकी समझ की आँच मुझ तक भी पहुँचती थी। ये ताप भी मेरी लेखनी में विटामिन का काम करती रही। मुझे अभी भी अच्छे रचनाकारों से अकेले में बतियाना बहुत पसंद है। वे लोग मुझे समुंदर के दरीचे में खड़े टावर लाइट की तरह लगते हैं और साथ ही अंधेरे में रास्ता दिखाने वाले स्ट्रीट लाइट भी। सानिध्य का यही प्रकाश शायद मेरी रचनाओं की उजास का हिस्सा भी हो। पक्का कुछ नहीं कहा जा सकता पर लगता तो ऐसा ही है मुझे।

     

    9 ‘बोरसी भर आँच’ में स्त्री विमर्श को एक भाई और बेटे के दृष्टिकोण से कैसे प्रस्तुत किया गया है? क्या यह दृष्टिकोण पारंपरिक लेखन से भिन्न है?

    मैंने लिखते समय ऐसा नहीं सोचा कि मैं परंपरा या पारंपरिक लेखन से कुछ अलग लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। ‘बोरसी भर आँच’ से पाँच साल पहले मैंने ‘अंतस की खुरचन’ में अपनी बात कहने की कोशिश की थी।  जिसे आप स्त्री विमर्श का नाम दे रहे हैं वो भी एक बेटे और भाई की दृष्टि से, ‘स्त्री’ या अन्य कविताओं के मार्फ़त से इसे समझा जा सकता है।

    पहले भी कहा है कि स्व अर्जित अमिट अनुभव आपकी पूंजी हैं और व्यक्तिगत अनुभव के ज़मीन पर ही सामाजिक प्रश्नों को उठाया गया है, वही बात यहाँ भी लाजिमी है। ’बोरसी भर आँच’ में दीदिया और माँ के साथ और भी किरदार हैं जो स्त्री विमर्श या यूँ कहें सामाजिक परिस्थिति और उसमें स्त्री की मनःस्थिति कहाँ खड़ी है। उदाहरण के तौर पर उर्मिला मौसी या शांति मौसी की परिस्थितियाँ, माँ की परिस्थिति से भिन्न रहीं और वे किरदार उस समय की स्त्रियों की ज़्यादा व्यापक प्रतिबिंब प्रस्तुत करती हैं।

    वैसे मैंने लिखते समय यह भी नहीं सोचा था कि स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर कुछ लिखा जा रहा है। असल सच तो यह है कि जब आप अपने परिवेश को रचते हैं तो उसमें वह सब स्वयं शामिल हो जाता है जो समाज का हिस्सा है। स्त्री भी, पुरुष भी, जाति भी, सत्ता भी या यूँ कहें समय के साथ राजनीति भी। ये सारे विमर्श दरअसल समय की शिनाख्त का जरिया है, जिसे इस किताब में सायास या अनायास रचा गया है।

    यह दृष्टिकोण पारंपरिक लेखन से कितना भिन्न है यह आलोचना के प्रकाश में ही सामने आए तो बेहतर, लेखक स्वयं नहीं कह सकता और न कहना चाहिए कि यह रचना पारंपरिक लेखन से कितना भिन्न है।

    1. आपकी कविताओं में जीवन की कठोर और अनदेखी सच्चाइयों को उजागर करने की प्रवृत्ति स्पष्ट है। क्या यह संवेदनशीलता आपके व्यक्तिगत अनुभवों से आई हुई है, या यह समाज की गूढ़ परतों को उद्घाटित करने की आपकी साहित्यिक दृष्टि का परिणाम है?

    ये बात पहले ही हो चुकी है तो उसे दोहराना ठीक नहीं होगा। मैंने अंतर्दृष्टि और बाह्यदृष्टि की बात पहले कही  है और मैं अब भी वही कह रहा हूँ। शेष मामला बस अनुपात और संतुलन का है, पर बतौर लेखक मेरा प्रयास ख़ुद को हर दिन ख़ुद से बेहतर करने का रहता है। बेहतर कहने का मतलब बस इतना ही है कि आप संवेदनाओं को कितनी बेहतरी से उपयुक्त शब्द दे पाते हैं। चुकी आपके पास अगर गहन अनुभव है तो आपकी संवेदनाएं भी उतनी ही गूढ़ और गहरी होगी बस उसे माँजते रहने की जरूरत है। बिना यह माने कि आप को बहुत कुछ आता है या आपने तो बहुत कुछ सीख लिया है। दृष्टि में उसी दृश्य को अलग रचने की कला लेखक को पढ़ने और चिंतन के अभ्यास से आ जाती है। अभी मैं उसी साहित्यिक दृष्टि को दूरबीन और सैरबीन में बदलने की कोशिश में लगा हूँ।

    1. आगामी परियोजनाओं में आप किस विषयवस्तु पर कार्य कर रहे हैं?

    ‘आविर्भाव’ से आगे की कड़ी तैयार है पर अभी समय लूँगा। कविता को स्वतः आने दे रहा हूँ तो भविष्य में प्रेम कविता पर केंद्रित कविताएँ भी आपको पढ़ने को मिल सकती है। पर अभी जो पांडुलिपि तैयार है वो है पाँच लंबी कहानियों की। लंबी कहानियाँ कहने का मतलब है लगभग अपन्यासिका या नॉवेला कहिये। कहानियों पर अभी इससे ज़्यादा बात नहीं रखना चाहता। किताब ख़ुद अपनी बात कहे यही बेहतर और यही आशा बनी रहेगी कि कहानियाँ खुलकर पाठकों से अपनी बात कर पाये। पाठकों का इतना प्यार अब तक मिला है तो ख़ुद को ज़्यादा ज़िम्मेदार महसूस करता हूँ। यह भी सोचता हूँ लिखने के बाद कि जो भी नया कुछ आए पाठकों को निराश न करे, इसलिए थोड़ा वक्त भी लेता हूँ। यह सबसे मुश्किल समय होता है जब आपका रोल लेखक से एडिटर का हो जाता है। संपादन सबसे जटिल और मुश्किल के साथ बोझिल काम है, लेकिन यही असली कसौटी भी है। अभी पांडुलिपि इसी प्रोसेस से गुज़र रही है और साथ-साथ मैं भी!

    1. साहित्य, भारतीय रेल सेवा और समाज सेवा के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं ? विस्तार से बतायें !

    जिस पल यह बात समझ में आ गई कि यहाँ इस दुनिया में यानी साहित्य की दुनिया में क्यों आया हूँ तो उस पल से ही स्वयं को समय देने की बात समझ में आ गई। लेखन एकांत में मनन का विषय है इसलिए आपको वे पल चुनने या निकालने ही होंगे जहाँ आप ख़ुद से या समाज से, स्वयं के एकांत में रूबरू हो सके।

    नौकरी का समय पहले से बँधा है उसका आप कुछ नहीं कर सकते। चूँकि मैं अपने काम से भी उतना ही प्रेम करता हूँ अतः वहाँ भी आपकी संपूर्ण उपस्थिति अनिवार्य है। इसे छोड़कर परिवार और समाज का भी अपना स्थान है, आप कभी नहीं चाहेंगे कि उनको कम तवज्जो मिले। इसलिए मैंने अपने जीवन को सप्ताह और सप्ताह के सात दिनों के घंटों को अलग -अलग कम्पार्टमेंट में बाँटने की कोशिश की है।

    यह कंपार्टमेंटलाइज़ेशन और कुछ नहीं समर्पित समयानुपालन है। सुबह का समय साहित्य का। जब से साहित्य में आया सुबह उठने की लत लग गई। पढ़ने और लिखने के लिए ब्रह्ममुहूर्त से बेहतर और क्या। सुबह उठाने में मेरा बेटा पम्पकिन (श्वान) का भी अहम रोल है। आठ बजे के पहले पढ़ने लिखने के क्रम के बीच में टहलने के लिए भी समय निकालता हूँ और टहलते हुए पॉडकास्ट/गाने सुनता हूँ। नौकरी का समय तय है तो वहाँ शत-प्रतिशत ख़ुद को वैसी मनःस्थिति के साथ उपलब्ध रखता हूँ। नौकरी में जाते और आते समय पॉडकास्ट सुनता हूँ या फिर संगीत। घर पर लौटने के बाद परिवार को यथासंभव समय देता हूँ। शनिवार का सेकंड हाफ के बाद और पूरा रविवार पहले परिवार को पूरा नहीं दे पाता था पर अब वह भी संभव हो रहा है। सप्ताह में एक दिन बुधवार को गोल्फ खेलने जाता हूँ।

     सामाजिक कार्य जिसमें मेरा कई संस्थाओं से जुड़ाव है वह ज्यादातर फ़ोन पर ही होता है। तीन महीने में एक बार उन संस्थाओं के साथ व्यक्तिगत मीटिंग करना भी इसी का हिस्सा है।

    कुल मिलकर कहूँ तो अगर आप अपने इन सारे कार्यों को अपनी प्राथमिकता की सूची में ऊपर रखते हैं तो सब अपने आप व्यवस्थित होते चले जाते हैं। काम और साहित्य दोनों मेरे लिए साँस लेने जैसा ही है और आप कभी भी साँस लेना कभी नहीं भूल सकते। परिवार आपका हृदय है। अतः जिन्हें आप प्रेम करते हैं उनका साथ या उनका ख्याल रखने के लिए आपको फिर सोचना नहीं पड़ता। समर्पण, संतुलन और अनुशासन बेहद जरूरी तत्व हैं। यही साहित्य साधना या किसी भी काम की सफलता की कुंजी का, तो उसी के परफेक्शन में लगा रहता हूँ।

    मैं स्वयं भी अचंभित रहता हूँ कि कौन है जो वरदान की तरह मेरे इस समय-संतुलन की डोर थामे है पर कोई तो है सच! मेरे ख़ुद के बस की बात नहीं यह समय संतुलन।

    1. आपकी कविताओं में ‘समय’ और ‘स्मृति’ की भूमिका कैसे परिलक्षित होती है?

    समय और स्मृति एक सिक्के के दो पहलू ही तो हैं। स्मृतियाँ जब आपसे लिपटती हैं तो अपने समय को साथ लिए आती हैं। टैगोर के शब्दों में कहूँ तो “स्मृतियाँ एक अदृष्ट कलाकार की मूल कृतियाँ हैं” और हम लेखक असल में कलाकार तो हैं ही। स्मृतियाँ अकेलेपन की संगिनी भी है जो आपको एकांत से उबारती रहती है और इसी क्रम में लिखना आपके कषाय को कम करता रहता है।

    ये स्मृतियाँ टाइम मशीन की तरह हैं जो समय को लांघने में आपकी मदद करती हैं पर समय को लांघते हुए भी आप समय के घेरे में ही गिरते हैं। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि स्मृतियाँ और समय आँख और दृश्य की तरह पूरक हैं। लेखक को दोनों की ज़रूरत होती है।

    समय अनुभव के रूप में आपके साथ रहता है और स्मृतियों का अंकुरण समय की जमीन का हिस्सा। रचना समय और समय के अनुभव दोनों को ही शब्दों में ढालती हैं। और हाँ! कई रचनायें होती हैं जो वर्तमान के हस्तक्षेप से बुनी होती हैं। अगर ‘अंतस की खुरचन’ की कविता ‘मैं सड़क हूँ’ या ‘अनिसुर रहमान’ को ही देखिए तो ये वर्तमान को लक्षित करती कविताएँ दिखेंगी। कई कविताएँ ऐसी भी होती हैं जिसका मतलब भूत, वर्तमान या भविष्य के समय से नहीं होता और न ही वे आपके व्यक्तिगत स्मृतियों से निकल कर पन्ने पर उकेरी गई होती हैं। वे उन शाश्वत समय या यूँ कहें न बदलने वाली वे परिस्थितियों को परिलक्षित कर रही होती हैं जिसे कविदृष्टि शब्द दे देते हैं। ‘किन्नर’, ‘शहर के पुल’, ‘भूतनाथ घाट’, ‘विक्टोरिया एंजल की नज़र से’ जैसी कविताएँ वैसी ही कविताएँ हैं जिनका स्मृतियों से नहीं, समस्या की शाश्वतता से सरोकार होता है। अगर ऐसा रचते हुए शाश्वतता कविता का बोध बन जाये तो फिर इससे सुंदर और क्या!

    अतः आप समझ सकते हैं कि कविता पर किसी एक का अधिकार नहीं वरन् यह कई तत्वों का मिश्रण है जिनमें समय, स्मृति और यथार्थ प्रमुख घटक हैं। ऐसा कहा जाए तो संभवतः ग़लत नहीं होगा।

    1. ‘बोरसी भर आँच’ में आपने अपने परिवार के सदस्यों, माँ, दीदी, बड़े भाई, पत्नी; के साथ संबंधों को किस प्रकार चित्रित किया है, और इन संबंधों ने आपके आत्मकथात्मक लेखन को कैसे प्रभावित किया है?

    मैं असल में इन्हीं से निर्मित यतीश हूँ तो इनके बिना लेखनी ख़ासकर आत्मकथात्मक लेखन की बात संभव ही नहीं थी। इन रिश्तों की डोर का चित्रण तो किताब में लिख दिया गया है इसलिए उसे दोहराना शायद उचित नहीं होगा पर इतना कह सकता हूँ यह पूरी किताब माँ, दीदी और भैया पर केंद्रित है जिसका अंत स्मिता पर लिखे मेरे स्वीकारोक्ति से होता है। इनकी उपस्थिति सिर्फ़ ‘बोरसी भर आँच’ में नहीं बल्कि तीनों किताबों में है।

    ‘अंतस की खुरचन’ में ही मैंने कह दिया था “स्मिता, शुक्रिया मुझे वापस इस दुनिया में आने के लिए!”

    मेरा तात्पर्य यह था कि साहित्य में उपस्थिति और गंभीरता पूर्ण समर्पण के साथ उपस्थित रहने में अंतर है। स्मिता ने मेरा परिचय साहित्य की गंभीरता और गहनता दोनों से करवाया जिसे हम रियलाइज़ेशन का नाम दे सकते हैं। माँ, दीदी और भैया की अपनी भूमिका रही है जिन्होंने मेरे आधार की निर्मति में अपना योगदान दिया। इसका जिसका जिक्र बहुत बारीकी से ‘बोरसी भर आँच’ में किया गया है। आप इसे यूँ समझ सकते हैं कि माँ, दीदी और भैया मुझ जैसे पौधे की मिट्टी हैं तो स्मिता हवा और पानी जिसने इस पेड़ के तना को विकसित और सघन बनाने में अपना योगदान दिया।

    शायद जब दूसरा खंड लिखूँ तो स्मिता और भैया का पक्ष और खुल कर आयेगा। ‘बोरसी भर आँच’ मूलतः आठवीं कक्षा तक और कुछ हिस्सा दसवी तक को समेटे हुए है। भाई और स्मिता का विशिष्ट योगदान इसके बाद शुरू होता है जिसे ठीक से लिखना अभी बाक़ी है।

    ‘बोरसी भर आँच’ के समर्पण वाले हिस्से में मैंने लिखा है “दीदिया- तुम्हारे लिए, अपने बचपन की ढाल के लिए”, दीदिया को मैंने अपने बचपन की ढाल कहा है जो सर्वथा सत्य है। वहीं, आविर्भाव के समर्पण में मैंने लिखा है “माँ के लिए- जिसने कटीले (कँटीले) तार से भी सितार बनाना सिखाया”!

    समर्पण की ये सारी पक्तियाँ मेरे दिल के बेहद  क़रीब है और उन तीनों की मेरे जीवन और लेखन में उपस्थिति को दर्शाती भी है। असली चित्रण मेरी लेखनी में इन सब का यही है शेष तो बस इसी का विस्तार!

    1. आप अपने लेखन में ‘यथार्थ’ और ‘कल्पना’ का संतुलन कैसे स्थापित करते हैं ? यह संतुलन ‘बोरसी भर आँच’ में भी स्पष्ट है, विस्तार से बतायें।

    मुझे लगता है यथार्थ और कल्पना का संतुलन ही लेखक का सही आकलन है। मैं इस कला को अब भी सीख रहा हूँ। ‘बोरसी भर आँच’ लिखते समय मैंने लिखा था “एक सच यह भी है कि कल्पना यथार्थ की भाप है और भाप का एहसास सजग लेखक के लिये बेहद ज़रूरी है। पर कई बार इनका आपसी घोलमाल कब हो जाता है पता नहीं चलता। इस स्मृति यात्रा में बचपन के स्वप्न के साथ-साथ कल्पना और यथार्थ का घालमेल भी है। बचपन को ढूँढते हुए अक्सर इसी घालमेल की घुली मिली मिश्री चख लेता हूँ। तब यह पता ही नहीं चलता कि कब सपनों की दुनिया में भटक रहा हूँ, कब यथार्थ में!”

    मैं पहले भी इसी संतुलन का जिक्र कर रहा था। यह बात जब लंबी कहानियाँ लिखने लगा तब ज़्यादा समझ में आई। क्यूँकि कहानियाँ लिखते हुए कल्पना का आयतन बहुत विस्तार पा लेता है। संस्मरण के बाद लंबी कहानियाँ लिखना अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही मेरे लिए। जहाँ संस्मरण में कल्पना नाम मात्र का रहा, वहीं कहानियों में संयोग से कल्पना का चंदौवा मुझे पूरी तरह फैला हुआ मिला। कितना संतुलन साध पाया यह पाठक और समय तय करेगा पर मैं फिर अपनी बात रखना चाहूँगा की यही संतुलन असली परीक्षा है, जिसका नंबर पाठक निर्धारित करते हैं, लेखक नहीं।

    1. समकालीन लेखकों में आपको कौन से लेखक का लेखकीय भाषा प्रभावशाली लगती है?

    यह सवाल बड़ा मुश्किल है क्यूंकि हर लेखक अपनी नई किताब में स्वयं अपनी नई भाषा गढ़ता है ऐसा मुझे लगता है। रणेन्द्र की भाषा ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ और ‘गूँगी रूपाली का कोरस’ में कितनी भिन्न है। विषय वस्तु के ज़मीन  पर भाषा अपना रास्ता तय करती है। वहीं ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में विनोद कुमार शुक्ल की भाषा अलग दिखती है। आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की ‘अनामदास का पोथा’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में भाषा अलग है। यह मैंने ख़ुद भी अपनी लेखनी में खासकर लंबी कहानियों को लिखते हुए महसूस किया। उदाहरण के तौर पर गीताश्री की किताब खासकर अगर ‘क़ैद बाहर’ और ‘अम्बपाली’ की बात करें तो भाषा में कितना अंतर है। प्रभात रंजन संस्मरण लिखते समय अलग भाषा में लिखते हैं और उपन्यास की भाषा उसके ज़मीन के अनुसार मिली मुझे।

    हाँ! एक बात और है। हर उत्कृष्ट लेखक इस प्रोसेस में अपना हस्ताक्षर पा लेता है जो उसके लेखनी की सुगंध बन जाती है। पढ़ते ही गुलजार के गीतों की तरह महसूस कर सकते हैं कि ये गीत किसने लिखा है। विनोद कुमार शुक्ल का लिखा आप पढ़ते ही समझ जायेंगे। यहाँ तक की प्रमोद सिंह या प्रत्यक्षा को आप पढ़ियेगा तो वही हस्ताक्षर वाली बात समझ आएगी। वन्दना राग और गरिमा श्रीवास्तव में अपने हस्ताक्षर की तलाश साफ़ दिखती है। और भी कई नाम हैं जिनपर बात करने लगूँगा तो समय बीतता चला जाएगा।

    समकालीन में कुछ नाम यहाँ बस उदाहरण के लिए बता रहा हूँ जैसे शिवेंद्र, अम्बर पाण्डेय, सुशोभित या बलराम कांवट में भी मुझे वैसी बात नज़र आती है, जिन्होंने अपना हस्ताक्षर पा लिया है। अपने समकालीन कवियों में उदाहरण के तौर पर  विहाग वैभव या विवेक चतुर्वेदी की बात करूँ तो उनकी कविताओं का स्वर आप पढ़ते हुए महसूस कर सकते हैं और ये अपने हस्ताक्षर पाने के रास्ते में चलते दिखेंगे। लिस्ट लंबी है अतः बजाय किसी  विशेष नाम के उनकी रचनाओं पर बात हो तो ज्यादती बेहतर।

    1. साहित्य की राजनीति आपको कैसे प्रभावित अथवा विचलित करती है?

    बिल्कुल प्रभावित या विचलित नहीं करते। रुद्र और बुद्ध दोनों को अपने भीतर महसूस करता हूँ। बाह्य बुद्ध और भीतर रुद्र तो सबसे पहले बुद्ध ही इन बातों को ख़ारिज कर देते हैं तो बात रुद्र तक पहुँच ही नहीं पाती अन्यथा क्रोध का वरन् कर लेता।

    मुझे लगता है जब मैं उस राजनीति का हिस्सा नहीं हूँ तो अपनी ऊर्जा क्यों जाया करूँ। साहित्य में व्यक्तिगत अनुभव वाली बात पर बिना किसी बायस के चलता हूँ तो पाता हूँ 95 प्रतिशत लोग बहुत स्नेही हैं। मैं ख़ुद को बहुत खुशनसीब मानता हूँ कि इतना प्रेम, स्नेह, आशीष और आदर मिला, इसी साहित्य की दुनिया में तो मैं 5 प्रतिशत उपद्रवी लोगों के लिए 95 प्रतिशत को नहीं खोना चाहता। मैंने वैसे भी पहले भी कहा है और जिन्होंने भी ‘बोरसी भर आँच’ पढ़ी होगी वे लोग इस बात से सहमत होंगे कि मेरा स्वभाव ही ऐसा है कि मैं दुख को दुख नहीं अनुभव मानता हूँ और उन अनुभवों से सीखते हुए थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करता हूँ। अनुभव आपको समृद्ध करता है वो आपको आहत नहीं करता। एक आध मोमेंट ज़रूर आते हैं जब आपका बेहद क़रीब दिखने वाला इंसान पीठ पर छुरा घोंप देता है, पर वैसे मोमेंट के आते ही प्रिय कथाकार अलका सरावगी जी के लिखे कुलभूषण के किरदार को याद करता हूँ और उसे भूलने वाला बटन को, फिर क्या है मामला सिर्फ़ डिलीट का नहीं बल्कि कंट्रोल, ऑल्ट और डिलीट का हो जाता है और फिर सब रिसेट हो जाता है। मैं मनाता हूँ कि भीतर का रुद्र जाग न जाये, इतना आहत ना हो पाऊँ कभी और सेवा, प्रेम और साहित्य में रत रहूँ।

    18. क्या आपको लगता है कि बोरसी भर आँच का आपने बहुत अधिक प्रचार किया है? ऐसा अनेक लोग दबे छुपे कहते हैं

    मुझे अपने किताब के प्रचार करने में कोई समस्या नहीं दिखती।आख़िर पाठक को पता कैसे चलेगा कि कौन सी किताब प्रकाशित होकर आई है । पाठक कोई अंतर्यामी तो है नहीं ।

    यह बिल्कुल उस तरह है जैसे शिशु की उँगली पकड़ कर बाहर का रास्ता दिखलाना। आगे की यात्रा तो उसे ख़ुद करनी होगी अब उँगली पकड़ने को आप जो भी कहें ।

    पहली किताब में मुझे कोई प्रचार नहीं करना पड़ा । मित्रों ने खूब पाठ किया वीडियो अपने आप तैरने लगे । मैं इस मामले में ख़ुद को खुशनसीब मानता हूँ दोस्तों ने हमेशा बढ़ चढ़ कर स्नेह दिया और प्रचार किया ।

    तीनों किताबों की यात्रा इस मामले में अलग- अलग रही। अंतस की खुरचन बिना प्रचार के चौथे संस्करण तक पहुँच गई वहीं आविर्भाव दूसरे संस्करण के बाद आगे नहीं बढ़ पायी क्यूँकि काव्य सार के पाठक अलग हैं पर वे गंभीर हैं उस किताब और उस विधा को लेकर । बोरसी भर आँच का सबसे पहला पोस्ट तो प्रभात रंजन जी का ही था जिन्होंने अपनी किताब के आगे इसे स्वयं रखा।साहित्य में ऐसी घटना बहुत कम घटती है,बहुत भावुक कर देने वाला पोस्ट था वह ।

    अलका सरावगी जी ने पहली समीक्षा लिखी थी अपने पोस्ट में । कई अग्रजों ने इस किताब को आशीर्वाद दिया। उषा प्रियंवदा जी ने अमेरिका में रहते हुए तीनों किताबों पर अपनी बात रखी जबकि बोरसी भर आँच पर उनकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी ।

    लगभग सौ से ज़्यादा समीक्षा बोरसी भर आँच की लिखी गई और अंतस की खुरचन की पचास से ज़्यादा तो मैं इसे क्या कहूँ किताब की यात्रा या प्रचार। मैं फिर कहूँगा कि प्रकाशक पर हर बात की निर्भरता आपको छोड़नी होगी शेष यात्रा तो किताब को ख़ुद करनी होगी पर इस भ्रम से भी निकलने की ज़रूरत है कि अच्छी किताब ख़ुद पाठक तक पहुँच जाएगी । मैंने कई किताबें बहुत बाद में पढ़ी जब किसी दोस्त ने बतायी कि यह किताब पढ़ लीजिए । मुझ तक जो कि हर सप्ताह एक नई किताब पढ़ लेता है मोरिला चंचला चोर या अँधेरे में हँसी, मेरे संधि- पत्र जैसी बेहतरीन किताब को पहुँचने में इतने साल क्यों लग गए यह एक आत्मचिंतन वाली बात है ।

    इसलिए मैंने अपना वेबसाइट बनवाया, यू ट्यूब चैनल है और सभी तरह के सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर मैं अपने पाठकों के लिए उपलब्ध हूँ ।

    मेरे पाठक मुझे समग्र पायेंगे वेबसाइट में जहाँ मेरी लिखी सारी समीक्षाएं तक उपलब्ध है । सौ से ज़्यादा लोगो ने मेरी कविताओं का पाठ किया जो एक जगह वहीं मौजूद है ताकि समग्र रूप में सारी सामग्री पाठकों तक मुहैया आसानी से हो पाए । अगर इसे प्रचार करना कहा जाए तो हाँ मैं प्रचार करने में विश्वास रखता हूँ ।

    आपका शुक्रिया आपने इतना समय लेकर प्रश्नों को क्रमबद्ध रखा जिसका यथासंभव मैं जवाब दे पाया।

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