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  • प्रेमचंद, किसानी जीवन और ‘गोदान’

    प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ में गाँव और किसान का जीवन कितनी प्रामाणिकता से चित्रित हुआ है, किस तरह आज किसानों के जीवन को सामने के लिये भी यह प्रासंगिक है- इन्हीं बातों को लेकर यह लेख लिखा है दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र मुशर्रफ परवेज़ ने। नई पीढ़ी क्लासिक को पढ़ रही है और अपनी तरह से समझ भी रही है, इन बातों को समझने के लिए इस लेख को पढ़ा जाना चाहिए- मॉडरेटर

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    गोदान की कथा तब भी प्रासंगिक थी और आज भी है। अब आपके मन में ये सवाल उठ रहा होगा आख़िर कैसे?
    जब तक ये दुनिया रहेगी तब तक किसान रहेंगे और वर्ण व्यवस्था भी रहेगी। प्रेमचंद जी ने कथा की बुनावट ही ऐसी की है कि पढ़ते समय बिल्कुल नहीं लगता कि ये सन्1936 की कथा है। ऐसा लगता है सब कुछ वर्तमान में घटित हो रहा है। उन्होंने होरी के परिवार की संरचना इस ढ़ंग से की है जैसा वास्तव में एक कृषक परिवार होता है। देखिए न होरी कितना दबकू किस्म का है, उसकी पत्नी सशक्त नारी की प्रतीक है और बेटा कितना विद्रोही है। एक ही खून के तीन अलग-अलग रूप। कहना न होगा कि होरी हर एक परिस्थितियों में फिट बैठता है। अपनी रचनाधर्मिता से ग्रामीण और शहरी जीवन को समानांतर चलाकर उन्होंने एक नई लीक को जन्म दिया। भोला की पुत्री झुनिया के पति का उसको कलकत्ता छोड़कर जाना पितृसत्ता को बख़ूबी दर्शाता है। कथा की शुरुआत गाय की लालसा से होती है और अंत भी गाय से ही। मिर्ज़ा खुर्शेद जो धर्म से मुस्लमान है उनका शराब पीना ये दर्शाता है कि धर्म की बातें बस छोटे लोगों के लिए है बड़े लोगों की बात जब आती है सब ताख पर रखा जाता है। मालती जो स्वतंत्र रहकर जीवन जीती है। उसके पीछे उसके संदर्भ में लोग न जाने कैसी-कैसी बातें करते हैं वो बताता है कि समाज में शादी-शुदा नहीं होने पर हज़ारों आक्षेप मढ़ दिए जाते हैं। शिकार का दृश्य दिखाकर उन्होंने अमीरों के खेल का पर्दाफाश किया है। किस प्रकार वे जंगली जानवरों का शिकार करते हैं जो ग़लत है। मेहता को जंगली लड़की से मिलाकर उन्होंने जंगली लोगों के जन-जीवन को उकेरा है। मालती के सिर दर्द के बहाने उन्होंने जड़ी-बूटी की महत्ता को दिखाने का अद्वितीय काम किया।
    हिंदी साहित्य में हमेशा से एक बहस रहा है आख़िर प्रेमचन्द ही उपन्यास सम्राट क्यों? क्योंकि वे ही एक ऐसे उपन्यासकार हैं जिनकी रचनाओं में पुआल, बेर, मतली, नवेद, माहुर जैसे शब्द मिलते हैं। एक बात और उनके अलावा कहीं और गांव के द्वारा बोले जाने वाले शब्द नहीं मिलते। जैसे- कुकर्म की जगह कुकरम, मजदूरी की जगह मजूरी, लेकिन की जगह मुदा, एहसान की जगह औसान, लाश की जगह लहास। शिकार के समय जब लकड़हारा खुर्शेद से कहता है- “बोझ उठाना तो हम जैसे मजूरों का ही काम है।” लकड़हारे का ये कहना मात्र समाज की व्यवस्था पर उंगली उठाता है साथ ही कई प्रश्न को जन्म देता है। जब होरी के घर गाय आ जाती है। उसके पश्चात् पूरे बेलारी के लोग उसके गाय को देखने आते हैं। परंतु उसके दोनों भाई हीरा और सोभा नहीं आते हैं। होरी से रहा नहीं जाता तो रात को अपने भाईयों के पास जाता है बुलाने पर उसके दोनों भाई बात कर रहे होते हैं कि जब हम शामलात थे तब गाय नहीं आई। जैसे हम अलग हुए गाय आ गई। पक्का भैया हमारे माल को मारकर गाय लाए हैं। जब होरी ये सुनता है तो वो आधी रात को गाय भोला को लौटाने जाता है। इसका उल्लेख यहां इसीलिए कर रहा हूँ क्योंकि इन दिनों “पंचायत सीजन-4” का एक डायलॉग बड़ा वायरल हुआ जिसमें विनोद कहता है- “हम ग़रीब हैं गद्दार नहीं।”
    गोबर जब झुनिया को भगाकर अपने घर ले आता है उस समय समाज उसके परिवार पर जुर्माना लगा देता है। यहां प्रेमचन्द जी ने दिखाया है कि बच्चे तो कर लेते हैं लेकिन उसका खमियाजा उसके माता-पिता को भुगतना पड़ता है। होरी और धनिया का समाज के लोग जीना हराम कर देते हैं। उसी समय धनिया कहती है कि “वही काम बड़े-बड़े करते हैं, मुदा उन्हें कोई नहीं बोलता” ये वाक्य समाज की दोहरी नीति का पोल खोलती है कि सारे नियम-कानून ग़रीबों पर ही लगते हैं।
    बेलारी की महिलाओं को पति के सामने मुँह खोलने की हिम्मत नहीं है वहीं सेमरी को महिलाएं अपने अधिकार के लिए पुरुषों के नाक में दम कर रखी है। मालती की बहन सरोज का कहना- “हमें वोट चाहिए पुरुषों के बराबर” यहां सोचनीय है यदि बेलारी की महिलाएं भी पढ़ी-लिखीं होतीं तो शायद वहां के पुरुष उनपर अत्याचार नहीं कर पाते। प्रेमचंद जी ने यहां महिला-शिक्षा पर ज़ोर दिया है। यही विद्रोह बेलारी की कोई महिला करती तो पूरा समाज उसका पोस्टमार्टम कर देता। क्योंकि महिलाएं पढ़ लेंगी तो पुरुषों की सत्ता ध्वस्त हो जाएगी।
    पंडित ओंकारनाथ जो “बिजली” के सम्पादक हैं रायसाहब के घनिष्ठ मित्र हैं परंतु ओंकारनाथ रायसाहब के खिलाफ़ मुखर होकर छापते हैं। उनकी मुखरता इस बात का प्रमाण देती है कि दोस्ती अपनी जगह और पत्रकारिता अपनी जगह। कहना न होगा कि वर्तमान पत्रकारिता एजेंसियों को सीख देती है बिजली की पत्रकारिता। रूपा एक जगह कहती है कि “दादा तमाखू खायेंगे” ये कथन बतलाता है कि किसानों की स्थिति कैसी थी। उन्हें दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती। “मैंने प्यार किया” फिल्म का एक डायलॉग है “एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते” ठीक उसी प्रकार खन्ना और मालती की दोस्ती थी। लेकिन महफिलों में उन दोनों के सम्बन्ध को लेकर चर्चा होना समाज की मानसिकता को दिखाता है। यहां तक कि खन्ना की पत्नी गोविन्दी भी असहज महसूस करती हैं। एक कहावत हमेशा सुनने को मिलता है कि “संगत का असर पड़ता है” ये बात ठीक है क्योंकि जब गोबर गाँव में रहता है और शहर से लौटता है तो गांव वाले और शहर वाले गोबर में ज़मीन-आसमान का फर्क इस कहावत को चरितार्थ करता है। “बैना” शब्द का प्रयोग प्रेमचंद जी की भाषाई कौशल का कमाल है। जब कोई प्रदेश से आता है मिठाई लेकर उसी को आस-पड़ोस में बांटना बैना कहलाता है। अंतर्जातीय विवाहों के माध्यम से आने वाली समस्याओं को उन्होंने सिलिया और मातादीन के द्वारा दिखाया ही है जबकि समाज की रुढ़ियों को भी रेखांकित किया है। मातादीन ही एक ऐसा पात्र है जो सीधे- सीधे समाज की मान्यताओं को कुचलकर सिलिया को अपनाता है। उसके लिए प्रेम पहले है जाति बाद में। किस प्रकार दोनों के प्रेम को अलग करके कुल-प्रतिष्ठा की दुहाई दी जाती है। गोबर जब अपने मां-बाप से लड़कर झुनिया को लेकर शहर चला जाता है। उसका पहला बच्चा मर जाता है। दूसरा बच्चा जिस दिन होने वाला होता है उस दिन भी गोबर “ताड़ी” पीकर मदहोश रहता है।
    उस समय झुनिया को समझ आता है कि जिस इंसान के लिए उसने अपने भाई व बाप की इज़्ज़त की परवाह नहीं की आज उसके कष्टों में वो शामिल नहीं। उसे समझ आ जाता है कि प्रेम कुछ दिन तक ही रहता उसके बाद “स्त्री हवश का एक सामान” बन जाती है। जबकि झुनिया ने उसके साथ भागकर शादी की थी। खन्ना का जब सब कुछ लूट जाता है फ़िर वो अपनी पत्नी से कहता है- “हां प्रिय हम तबाह हो गए” ये वही खन्ना है जो पहले अपनी पत्नी को लगाता तक नहीं था पर जब विपदा आन पड़ी तो बीवी के गोद में सर रख दिया। यहां पुरुषों की स्वार्थी भावना को देखा जा सकता है। भारतीय समाज में जब कोई स्त्री विधवा हो जाती है तो बच्चों के लिए दूसरी शादी नहीं करती ठीक वैसे ही रायसाहब भी दूसरी शादी नहीं करते हैं ताकि उनके बच्चों को सौतेली मां का व्यवहार न झेलना पड़े। प्रेमचंद की लेखनी का कमाल है कि उन्होंने सच्चे किसान की दशा तो दिखाई लेकिन उन्हीं किसानों का अपने पूर्वजों द्वारा दी गई ज़मीनों से प्रेम और कैसे उसका संरक्षण किया जाता उसको भी दिखाया। होरी तमाखू पीकर भूखे सो जाता है परंतु एक इंच जमीन नहीं बेचता है। इसे किसानों का अपनी खेती से प्रेम को भी देखा जा सकता। इस उपन्यास का हर एक अध्याय सोचने पर मजबूर करता है। इसीलिए गोदान उपन्यासों की श्रेणी में शीर्ष पर आता है। एक बार अवश्य इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए ताकि भारतीय कृषक-जीवन को नज़दीक से समझा जा सके।

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