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  • छमाही तीस लाख रॉयल्टी और ‘खिड़की’: सुरेन्द्र मोहन पाठक

    विनोद कुमार शुक्ल को हिन्द युग्म प्रकाशन द्वारा तीस लाख की रॉयल्टी देना ऐतिहासिक घटना है और इस पर चर्चा थमने का नाम नहीं ले रही। आज हिन्दी में लोकप्रिय साहित्य के सबसे वरिष्ठ और लिविंग लीजेंड सरीखे लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक की टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर

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    मैं बहुत शर्मसार हो कर कुबूल करता हूं कि ‘छमाही तीस लाख रॉयल्टी’ प्रकरण से पहले मैंने कभी वयोवृद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल का नाम नहीं सुना था, न ही मैं उनके (अब) प्रसिद्ध उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के नाम से वाकिफ था। रायपुर मेले में पुस्तक के मौजूदा प्रकाशक ने एकाएक एक ड्रामा स्टेज किया जिसकी बदौलत मेरे जैसे कई – मैं खास तौर से – नादान पाठकों ने जाना कि लेखक कितने मकबूल थे, उनका लेखन कितना मकबूल था। फ़ेस-बुक पर ‘हिन्द युग्म सुपर शो’ का ऐसा वसीह चर्चा दिखाई दिया जैसे कि ट्रम्प ने भारत पर टैरिफ ज़ीरो पर्सेन्ट कर दिया था।

    हिन्दी के लेखक को यूं महिमामंडित होने का सुख प्राप्त हुआ, ये तमाम हिन्दी प्रेमियों के लिए अत्यंत हर्ष का विषय है। हम दुआ करते हैं कि अगली छमाही का ऐसा चेक भी इतने ही बाजे-गाजे के साथ लेखक को प्राप्त हो, हिन्द युग्म से प्रकाशित अन्य किसी लेखक को भी प्राप्त हो, ताकि शुक्ल जी तीस-लखटकिया क्लब के इकलौते चार्टर्ड मेम्बर बन कर न रह जाएं।

    मैं नहीं जानता कि आम पाठक प्रकाशक द्वारा प्रदत्त ‘एडवांस’ और ‘रॉयल्टी’ में फर्क महसूस करता है या नहीं, अलबत्ता मेरी कमअक्ली जो बयान करती है वो ये है कि ‘रॉयल्टी’ लेखक का हक है, क्योंकि वो लेखक को उसका अधिकारी बन के दिखा चुकने के बाद मिलती थी। यानी लेखक की पुस्तक की हो चुकी बिक्री से प्रकाशक पहले कमाता है, फिर उसका एक अंश – अगर देता है तो – लेखक को देता है जोकि अमूमन ग्रॅास सेल का दस प्रतिशत होता है। ‘एडवांस’ लेखक का विशेषाधिकार है (privilege) जिसमें लेखक की औकात – सॉरी, हैसियत – के मुताबिक घट-बढ़ होती है, अक्सर ‘घट’ ही होती है, ‘बढ़’ होती ही नहीं। ‘घट’ के संदर्भ में अर्ज है कि लेखक को – खास कर आजकल – कोई एडवांस हासिल हो जाए तो वो  अपने आप को खुशकिस्मत समझे। ‘बढ़’ के खाते में शुमार है कि एडवांस की कोई इज्जतदार रकम मकबूल लेखक को ही हासिल होती है जो इस बाबत या तो प्रकाशक से सौदेबाजी करता है – बल्कि उसकी बांह मरोड़ कर उसे अपने मनमाफिक रॉयल्टी अदा करने के लिए तैयार करता है – या खुद प्रकाशक उसके बड़प्पन का रौब खा के उसे बड़ी रकम से नवाजता है ताकि लेखक कहीं और न चल दे।

    मोटे तौर पर ‘रॉयल्टी’ हक है जो हासिल नहीं होता, ‘एडवांस’ हासिल है जिस पर हक नहीं बनता।

    दोनों ही विकल्पों के तहत हिन्दी के किसी लेखक को एडवांस में कभी कोई बड़ी ‘आँखफाड़ू’ रकम हासिल हुई हो, ये मेरी जानकारी में नहीं है, अलबत्ता अंग्रेजी के लेखकों में ऐसा शीराज़ा बंटता कई बार पाया गया है। मेरी जानकारी में इंग्लिश में इस बड़ी प्रिविलेज से नवाजे गए पहले लेखक विक्रम सेठ थे जिन्हें उनके ‘ए सूटेबल ब्वाय’ की बेमिसाल कामयाबी के बाद अगली पुस्तक के लिए, जिसका लेखन अभी उनकी कल्पना में ही था – या शायद अभी वहाँ भी नहीं था – प्रकाशक से एक बड़ा एडवांस हासिल हुआ था। एडवांस से न्याय करता कुछ वो कभी नहीं लिख पाए थे; संभ्रांत, संस्कारी, ऐतबारी शख्सियत थे इसलिए लिखने में अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए पूरी विनम्रता से उन्होंने एडवांस हासिल हुई राशि प्रकाशक को लौटा दी थी। लेखक की तरफ से – रिपीट, लेखक की तरफ से – फेयर डील की ये ऐसी मिसाल थी जो पहले कभी देखी सुनी नहीं गई थी, कभी किसी की कल्पना में ही नहीं आई थी। कर्टसी पब्लिशर, हाथ आई मुद्रा कौन लौटाता है!

    मुझे मिस्टर सेठ के एडवांस के साइज़ की खबर नहीं लेकिन इतना कहने का हौसला  मैं फिर भी कर सकता हूँ कि वो कालांतर में अमीष त्रिपाठी को हासिल एडवांस के करीब भी  नहीं खड़ा था क्योंकि वो तब डेली पेपर्ज़ की न्यूज़ थी कि लेखक अमीष त्रिपाठी को ‘वेस्टलैंड’ से पाँच करोड़ रुपये की विपुल धनराशि एडवांस में मिली थी जोकि इस मद में अपने आप में मिसाल थी। इस धनराशि को विपुल इस गज से नाप कर जानें कि तब सोना ढाई हजार रुपये तोला था, आज लाख से ऊपर है। तब एक इंटरव्यू में इस बाबत लेखक से सवाल हुआ था कि इतनी बड़ी रकम हासिल होने के बाद सबसे पहला काम वो क्या करेगा। जवाब था, मर्सिडीज़ खरीदेगा।

    हिन्दी का लेखक अपनी एडवांस राशि में से ‘स्विफ्ट’ खरीद ले तो कमाल किया जाने।

    एडवांस के मामले में हिन्दी के लेखक के लिए ट्रिक ऑफ दि ट्रेड ये है कि वो प्रकाशक से ज्यादा से ज्यादा एडवांस हासिल करने की कोशिश करे क्योंकि बाद में कुछ नहीं मिलने वाला। लेखक जब भी कोई मांग खड़ी करेगा, प्रकाशक की यही दुहाई होगी कि अभी तो पिछला एडवांस भी एडजस्ट नहीं हुआ था – कभी होगा भी नहीं। ये ऐसे फैसले हैं जो दिनों, महीनों, सालों में नहीं होते, सदियों में होते हैं; लेखक प्रकाशक की पीढ़ियों में होते हैं।

    पाँच करोड़ रुपये एडवांस से नवाजे जाने वाले दूसरे लेखक चेतन भगत थे और उन पर भी ये नज़रेइनायत कर्टसी ‘वेस्टलैंड’ ही हुई थी। अमीष को वो बड़ा एडवांस तब मिला था जब ‘वेस्टलैंड’ का मालिक टाटा था और एडवांस फुल्ली एडजस्टिड बताया जाता था, भगत को वही एडवांस तब मिला था जबकि वेस्टलैंड ऐमज़ान द्वारा टेकओवर किया जा चुका था और भगत का एडवांस एडजस्ट नहीं हो पाया था क्योंकि खड़े पैर ऐमज़ान ने प्रकाशन व्यवसाय से हाथ खींच लिया था और अनएडजस्टिड एडवांस लेखक का अनअर्न्ड प्रॉफ़िट बन गया था।

    यहाँ मैं ये अर्ज करना चाहता हूँ कि ‘एडवांस’ प्रकाशन व्यवसाय की पॉपुलर टर्म है जो असल में बिक्री हेतु माल की, मर्केंडाइज़ की, ‘अप्राक्सीमेट प्राइस’ होती है। साहित्यिक रचना की खरीद-फरोख्त हो, ये इज्जतदार बात नहीं जानी जाती इसलिए स्क्रिप्ट की आँकी गई अप्राक्सीमेट प्राइस को एडवांस जैसा इज़्ज़तदार नाम दिया जाता है। यूँ लेखक ‘नावल ले लो, कहानी ले लो, कविता ले लो’ वाले मिजाज का स्ट्रीट पैडलर बनने से बच जाता है।

    वैसे तो हिन्दी के प्रकाशक का हर कदम, लेखक के खिलाफ होता है, आजकल उसे एक नया पैंतरा सूझा है – “एडवांस का नाम न लो, जो छमाही रॉयल्टी बनेगी, मैं दूंगा।”

    यानी प्रकाशक की बादशाहत में लेखक का जो मामूली टो-होल्ड एडवांस की सूरत में था, वो भी खारिज!

    इस संदर्भ में एक मिसाल पेशेखिदमत है:

    फर्ज कीजिए आप घर के लिए आटा खरीदते हैं। तब आप अपने नेबरहुड ग्रॉसर को क्या कहते हैं? घर ला कर आटा गूँध लें, रोटियाँ पका लें, खा लें, स्वाद के बारे में तबसरा कर लें तो आटे की पेमेंट के बारे में तब सोचेंगे? और पेमेंट भी कितनी? सारे आटे की नहीं, उतने की जितने की कि आपने रोटियाँ बना कर खा लीं। ढूंढ लेंगे कोई ऐसा ग्रॉसर जो इन शर्तों पर आपको आटा देगा? जिसको आप कहेंगे कि यूँ हस्तांतरित हुआ सारा आटा पका खा लिया जाने से पहले वो फुल पेमेंट की कल्पना न करे? जो उम्मीद करे कि जैसे जैसे आटा कनज़्यूम होगा, वैसे वैसे पेमेंट उसे पहुँचती रहेगी!

    इसी मिसाल की एक्सटेंशन के तौर पर अर्ज है कि मेरे (लेखक के) पास एक आइटम है जिस के आप (प्रकाशक) खरीदार हैं। आप खरीदेंगे तो वो आइटम आपकी होगी लेकिन आप बिना कोई कीमत अदा किये इस आश्वासन के तहत उसके मालिक बनना चाहते हैं कि कोई कमाई होने के हालात बने तो एक साल बाद – रिपीट, एक साल बाद – कमाई का एक छोटा-सा अंश (रॉयल्टी) आपको भी मिल जाएगा। गौरतलब है कि ये खाली आश्वासन है कुछ मिलने की कोई गारंटी नहीं है। यानी प्रकाशक फोकट में स्क्रिप्ट का मालिक बनेगा और साल बाद अभी बाई रिक्वेस्ट आपको खबर करेगा कि आप किसी हासिल के काबिल बन पाए हैं या नहीं!

    ऐसे डील, ऐसे ट्रांज़ेक्शन को कैसे जायज ठहराया जा सकता है! यूं तो किसी अनुबंध  के तहत लेखक से स्क्रिप्ट हासिल करना और उससे स्क्रिप्ट छीनना एक ही दर्जे के काम हुए! लेकिन आजकल प्रकाशक करता है, लेखक की मजबूरी का फायदा उठाता है और करता है। लेखक लिखे और बिना किसी हासिल के प्रकाशक की नजर करे। अर्जुन कर्म करे, फल की अपेक्षा न करे – चिंता करता रहे, अपेक्षा न करे।

    जमा, जब कोई मानिटेरी कमिटमेंट नहीं होगी तो प्रकाशक को ये भी अख्तियार होगा कि वो साल, छ: महीने स्क्रिप्ट पास रखे, फिर लेखक को ये कह के लौटा दे कि वो उसे छापने में असमर्थ है। कौन रोकेगा उसे ऐसा करने से? और कोढ़ में खाज, ऐसा खुल्ला मूर्ख बनाया गया लेखक एग्रीमेंट से भी बंधा होगा जिन में जमीन-ओ-आसमान प्रकाशक के नाम दर्ज होंगे।

    कैसी विडम्बना है कि स्क्रिप्ट का मालिक बनने के लिए ऐसे प्रकाशक ने अपने हिस्से का जो काम अभी करना है, उसे वो साल बाद . . . भी अभी कर चुकेगा नहीं, लेखक को लोलीपोप दिखा कर अभी करना शुरू करेगा, अगरचे कि करेगा। प्रकाशक को बाजार से 60 या 90 दिनों का क्रेडिट हासिल होता है, लेकिन लेखक से उसको सालों में पसरा क्रेडिट चाहिए जिसकी पहली किस्त की अदायगी का उसका शेड्यूल 365 दिन का हो।

    फिर पहली किस्त के किसी काबिल होने की भी कोई गारंटी नहीं। एक साल के इंतजार के बाद हो सकता है प्रकाशक लेखक को झुनझुना थमाये।

    जाहिर है कि ऐसी प्रोफेशनल इक्वेशन में आप प्रकाशक से नहीं जीत सकते। तुरुप के सारे पत्ते उसके हाथ में है। आप के पास चायस नहीं है लेकिन उसके पास और भी बड़ी चायस है – उसे आम ऐसे नए लेखक मिलते हैं जो उससे अपनी इनवेस्टमेंट से अपनी किताब छपवाने के लिए लालायित हैं। पब्लिश्ड ऑथर कहलाने का अपना शौक पूरा करने के लिए वो प्रकाशक की लाइन टो करने के लिए खुद व्यग्र होते हैं। प्रकाशक मामूली रकम ही तो मांग रहा है, बाखुशी देंगे। पहले मैं समझता था कि टूटे फूटे, बेहैसियत प्रकाशक ही ऐसे लेखकों की ताक में रहते थे जो अपनी स्क्रिप्ट के प्रकाशन के लिए पार्ट पेमेंट करने को सहर्ष तैयार हो जाते थे। लेकिन मालूम हुआ है कि अब ये खुल्ला दरबार है, तकरीबन बड़े पब्लिशर भी अब लेखक से पैसा लेकर उसकी किताब छापने को तैयार बैठे हैं।

    और फिर पार्ट पेमेंट कह कर जो पैसा नए लेखक से झाड़ते हैं, वो क्या सच में पार्ट पेमेंट होता है? नहीं! वो फुल से भी ज्यादा पेमेंट होता है। लेखक प्रकाशक के धंधे को नहीं समझता, वो नहीं जानता प्रकाशन में कहाँ कितना पैसा खर्च होता है। उसे खर्चे की जो फिगर बताई जाती है, वो उसे कुबूल करने को मजबूर होता है। यूं प्रकाशक उससे साठ से नब्बे हजार रुपये तक ये कह कर वसूल कर लेता है उसकी रचना की वो हजार प्रतियां प्रकाशित करेगा जिस में से तीन सौ वो उसे फ्री में देगा और सात सौ को खुद बेचने की कोशिश करेगा। हजार प्रतियां छापने में प्रकाशक की लागत मुश्किल से तीस हजार रुपये आती है लेकिन कथित पार्ट पेमेंट दोगुना, तीनगुना होती है। यूं प्रकाशक को ज़ीरो इनवेस्टमेंट से सात सौ किताबें फ्री में हासिल होती हैं जिन्हें वो जैसे तैसे बेच खाता है और अतिरिक्त आय कर लेता है।

    इस महकमे में अब प्रकाशक और भी तिकड़मी हो गया है। वो छापता ही तीन सौ प्रतियां हैं जो वो लेखक की नज़र कर देता है, लेकिन उसे प्रिन्ट ऑर्डर हजार ही बताता है। ये काम बाजरिया डिजिटल प्रिंटिंग अब और आसान हो गया है, अब किताब ऑफसेट पर छपवानी जरूरी नहीं जिसमें प्रिन्ट ऑर्डर का कोई मिनीमम होता है, अब डिजिटल प्रिंटिंग के जरिये सौ कॉपी छापी जा सकती हैं, पचास कॉपी छापी जा सकती हैं, और भी कम छापी जा सकती हैं।

    एक कथित बड़ा प्रकाशक पैसे लेकर इतनी किताबें छापता है कि खुद भूल जाता है कि कौन-सी किताब उसने अपनी चायस से छापी थी और कौन-सी लेखक से पैसे लेकर छापी थी। इस शिनाख्त के लिए अब वो टाइटल पर अपना लोगो कलर कोड के मुताबिक छापता है; अगर लोगो नीले रंग में है तो किताब पैसे लेकर छापी थी, लाल रंग में है तो अपनी चायस से छापी थी।

    पाठक से मित्र बने परविंदर सिंह ‘शोख’ पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड से रिटायर्ड चीफ इंजीनियर हैं। ये सारे पंजाब में एक ही पोस्ट होती है इसलिए जाहिर है कि बड़े सिविल सर्वेंट थे। जमा, मकबूल शायर हैं, मुशायरों में उनकी शिरकत आम है। उनकी शायरी की दस किताबें छप चुकी हैं और ग्यारहवीं प्रकाशन की राह पर है। वाकया तब का है जब वो अभी रिटायर नहीं हुए थे और शायरी का अपना पाँचवाँ संकलन प्रकाशित करवाने की तैयारी में थे। तब मैंने खुद मध्यस्थ बन के दिल्ली के एक ऐसे बड़े प्रकाशक के साथ उनका डील करवाया था जोकि मेरा भी प्रकाशक था इसलिए मेरा अच्छा वाकिफ था। वाकफियत का कोई लिहाज किये बगैर उनसे शोख साहब से मनमानी कीमत वसूल की थी जो उन्होंने सहर्ष स्वीकार की थी और नकद अदा की थी। मेरे सामने डील फाइनल हुआ था कि वो हजार हार्ड बाउन्ड किताब छापेंगे जिनमें से तीन सौ लेखक को देंगे। जब किताब छप कर आई तो वो पेपरबैक थी। लेखक खूब कलपा, मध्यस्थ उसके साथ कलपा, लेकिन प्रकाशक अपनी जिद से हिल कर न दिया कि बाउन्ड बुक की नहीं, पेपरबैक की बात हुई थी।

    यानी कोई गारंटी नहीं कि बड़े प्रकाशन में भी पैसा दे कर काम दुरुस्त होगा।

    मेरा जाती तजुर्बा है कि फॉरेन बेस वाले प्रकाशकों में ही रॉयल्टी के मामले में ट्रांसपेरेंसी है, उन्हीं से उम्मीद की जा सकती है कि लेखक को ईमानदारी से रॉयल्टी हासिल होगी और होती रहेगी, बाकी तकरीबन प्रकाशक इस महकमे में डंडीमार हैं। कितने ही बड़े लेखक रॉयल्टी पेमेंट को लेकर प्रकाशक से तंत्र जाल से असंतोष प्रकट करते थे, सख्त शिकायत करते थे तो प्रकाशक यूं अपनी निर्दोषिता साबित कर के दिखा देता था:

    • कोई सेल नहीं थी, रॉयल्टी बनी ही नहीं थी।
    • ढेर किताब वापिस आ गई थी इसलिए रॉयल्टी नेगेटिव में चली गई थी। वापिसी डेढ़-डेढ़ दो-दो साल बाद भी आ जाती थी।
    • लेखक को जो एडवांस मिल चुका था, अभी वो ही एडजस्ट नहीं हुआ था। अभी तो – प्रकाशन के छ:, आठ, दस साल बाद भी – लेखक ने ही हमारा पैसा देना था।

    गौरतलब है कि ऐसे फ़ैन्सी जवाब महाश्वेता देवी, निर्मल वर्मा जैसे बड़ी हैसियत वाले लेखकों को मिल चुके हैं।

    मैंने भीष्म साहनी की बायो में पढ़ा था कि रॉयल्टी निरंतर न मिलने पर उन्होंने जब अपने प्रकाशक से रॉयल्टी का तकाजा किया था तो उन्हें अट्ठारह रुपये का – रिपीट, अट्ठारह रुपये का –  मनी ऑर्डर इस नोट के साथ हासिल हुआ था कि आइंदा वो भी नहीं मिल पाएगा क्योंकि प्रकाशक वो धंधा ही छोड़ रहा था।

    इस संदर्भ में मैं अपनी मिसाल भी दाखिलदफ्तर करना कहता हूँ:

    मेरी बायो का पहला भाग ‘वेस्टलैंड’ में छपा था और प्रिन्ट ऑर्डर 30,000 प्रतियों का  था जिसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि मुझे तीन सौ रुपये कीमत की किताब की नौ लाख रुपये एडवांस रॉयल्टी बिना मांगे मिली थी। कोई दो साल बाद जब वेस्टलैंड ने प्रकाशन के धंधे से हाथ खींच लिया था तो उनके पास मेरी बायो ‘न बैरी न कोई बेगाना’ का स्टॉक निल था। यानी मेरी बायो के पहले भाग की तीस हजार प्रतियां दो साल में बिक गई थीं – यकीनी तौर पर बिक गई थीं, क्योंकि किताब आप के खादिम को उसकी निजी जरूरत के लिए भी प्रकाशक से या मार्केट से नहीं मिली थी – फिर बायो का दूसरा और तीसरा भाग अन्यत्र छपा तो दोनों बार मेरी एडवांस राशि घट कर आधी हो गई जिससे मुझे कोई ऐतराज न हुआ क्योंकि ‘बैगर्स आर नॉट चूज़र्स’। वहां से दो साल बाद – हर छमाही के आखिर में चार बार नहीं – मुझे दोनों भागों की जो रॉयल्टी स्टेटमेंट मिली, वो कहती थी कि कुल जमा ढाई हजार प्रतियां बिकी थीं और लेखक को जो एडवांस मिला था, उसका अस्सी प्रतिशत से ज्यादा अभी प्रकाशक का लेखक की तरफ निकलता था।

    पाठक खुद फैसला करें कि पहले भाग की परफॉर्मेंस की रु में क्या दूसरे प्रकाशक का दावा सच होना मुमकिन है! अगर जाती तजुर्बे से दूसरे भाग का ऐसा बुरा हाल सामने आया था तो तीसरा भाग किस उम्मीद में छापा था! और अभी चौथे को छापने का ख्वाहिशमंद क्यों था!

    ऐसा देखने में आया है कि अपनी किताब को कामयाब साबित करने के लिए बाज लेखक खुद भी कोई कोशिश उठा नहीं रखते। मिसाल के तौर पर अर्ज है कि हैसियत में आसमान में ताकी लगाने वाले एक लेखक की पहली स्क्रिप्ट जब डेढ़ दर्जन प्रकाशकों द्वारा रिजेक्ट की जा चुकी थी तो तब कहीं जा कर वो छप पाई थी। कहा जाता है कि लेखक ने हजारों प्रतियां बुक स्टालों पर जा, जा कर खुद खरीदी थीं ताकि स्थापित हो पाता कि किताब धुआंधार बिक रही थी और सेल के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही थी।

    ऐसे ही एक किताब बुक स्टालों पर फ्री दी जाती थी लेकिन उसकी बिलिंग बाकायदा की जाती थी। उस प्रक्रिया का मकसद भी यही स्थापित करना था कि किताब बहुत बिक रही थी।

    शुक्ल जी जैसे वयोवृद्ध और सम्मानित लेखक से मैं ऐसी गिमिक्री की उम्मीद हरगिज नहीं कर सकता, वो किसी पब्लिसिटी स्टन्ट में प्रकाशक के साथ शरीक नहीं हो सकते लेकिन ये स्टन्ट प्रकाशक का वन-मैन-शो भी तो नहीं हो सकता! लेखक के सहयोग के बिना इसका वजूद में आ पाना नामुमकिन है। ऊपर से ये हकीकत काबिलेगौर है कि किताब नई भी नहीं, रीप्रिन्ट है। उन्नीस साल पहले मूलरूप से वाणी में प्रकाशित हुई थी और तब उसने ऐसी कोई इन्कलाबी वाइब्ज़ खड़ी नहीं की थीं, वो रीप्रिन्ट की तरह ‘टॉक ऑफ दि टाउन’ नहीं बनी थी। एक रीप्रिन्ट किताब की ऐसी महिमा योर्स ट्रूली की कल्पना से परे है।

    हिन्द युग्म वाणी से बड़ा प्रकाशक नहीं। ‘खिड़की’ के हवाले से ये अफसोसनाक बात है कि मूलरूप से वाणी में प्रकाशित हुई किताब तो सेल में कोई करतब न दिखा पाई लेकिन 19 साल बाद जब रीप्रिन्ट हुई तो करिश्मा कर दिखाया। किसने?

    लेखक ने?

    प्रकाशक ने?

    या दोनों ने?

    या किसी अदृश्य शक्ति ने जो सिर्फ और सिर्फ हिन्द युग्म के काबू में थी?

    तफतीश का मुद्दा है। ये भी कि लेखक-प्रकाशक जुगलबंदी पहले क्यों कारगर न हुई?

    ये भी गौरतलब है कि इतनी बड़ी खबर के वजूद में आने से कोई दो महीने पहले ही प्रकाशक ने एक इंटरव्यू में घोषणा कर दी थी कि वो लेखक को एक छमाही की तीस लाख की रॉयल्टी देने वाले थे। यानी सेल के जिस आँकड़े पर किताब ने अभी पहुंचना था, वो पहले ही मुकर्रर था, प्रकाशक को मालूम था कि आइंदा फलां तारीख को ‘खिड़की’ के ग्रोस सेल का आंकड़ा 86,897 होना था। और रायपुर में एक विशेष आयोजन में लेखक को तीस लाख रुपये का चेक भेंट किया जाना था क्योंकि तब तक स्कोर लाख तक पहुँच चुका होना था।

    राजपाल एण्ड संज़ जैसे कद्दावर प्रकाशक की संचालिका ने ऑन कैमरा इस खबर पर हैरानी जाहिर करते हुए कहा था कि सब प्रकाशकों के लिए एक ही तो मार्केट है, किसी और किताब का कोई और प्रकाशक वो करतब क्यों न कर सका! हिन्द युग्म का प्रकाशक उन्हें भी बताए कि उसने इतनी किताब – वो भी एक छमाही में – कहां बेची थी ताकि वो भी वहाँ कोशिश करें!

    स्पष्ट संकेत था कि ऐसी सेल नामुमकिन थीं।

    फिर इसी संदर्भ में ये सवाल भी आम गर्दिश में है कि क्या हिन्द युग्म ने अपने किसी दूसरे लेखक को इससे आधी या एक चौथाई या एक बटा दस भी रॉयल्टी दी थी? अगर ‘खिड़की’ टॉप पर थी तो कोई झरोखा, कोई रोशनदान रनर-अप भी तो होगा, प्रकाशक उसका नाम ले और बतौर रनर-अप उसकी सेल का आंकड़ा उजागर करे, वरना कुबूल करे कि एक छमाही की तीस-लखटकिया रॉयल्टी पब्लिसिटी स्टन्ट है जिसमें लेखक शरीक है क्योंकि लेखक की शिरकत के बिना, उसकी रज़ामंदगी के बिना, ये स्टन्ट खड़ा नहीं रह सकता, औंधे मुंह गिरेगा।

    फिर लेखक को नजर किये गए चेक की राशि पूरे तीस लाख! क्या कोई एडवांस न मिला जो इस रॉयल्टी में से माइनस किया जाता? कोई टीडीएस न कटा जोकि मैनडेट्री है, न काटा जाए तो पर डे के हिसाब से जुर्माना लगता है! यूं क्या ये नहीं जाहिर होता कि चेक का जो फेसीमल प्रेज़ेंटेशन के दौरान दिखाया गया था, वो भ्रामक था, तमाशबीनी था!

    इस संदर्भ में एक फेसबुकिए ने स्पष्ट लिखा है:

    बीस साल पहले इस किताब का प्रकाशन हो चुका है, कभी इसका नाम न सुना। आखिर अभी क्यों ये किताब इतनी प्रसिद्ध हो रही है? कारण स्पष्ट है। सब प्रकाशक की करामात है। किताब की आड़ में वो अपना प्रकाशन चमकाने की जबरदस्त मुहिम पर लगे  हुए हैं। कल ये किसी दूसरे नौसिखिये लेखक को पचास लाख रॉयल्टी देंगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए क्योंकि न तो उन्होंने किसी को देनी है और न किसी ने लेनी है।

          ऐसा ही एक अत्यंत आशावादी, हिन्दी के हितैषी फेसबुकिये का आख्यान गौर फरमाइए जो मिजाज में उपरोक्त से ऐन उलट है:

    ये प्रेज़ेंटेशन हिन्दी पाठकों की  साहित्यिक चेतना का उत्सव है। अब ये प्रमाणित हो चुका है कि गंभीर साहित्य को पाठकों ने सर माथे लिया और ये भी सिद्ध कर दिया कि हिन्दी में अब ऐसे कीर्तिमान संभव हैं। ये हिन्दी साहित्य के लिए ऐतिहासिक घटना है जिस पर कोई नुक्ताचीनी करने की जगह जिसे गर्व से देखा जाना चाहिए।

    फर्ज कीजिए हिन्द युग्म का हर दावा दुरुस्त है। अगर ऐसा है तो क्या इससे ये स्थापित होता है कि नामोनिहाद बड़े प्रकाशकों का बड़प्पन फर्जी है? या उनकी व्यापारिक सामर्थ्य उतनी नहीं है जितनी का कि उनको यश दिया जाता है? ‘खिड़की’ की करिश्माई परफॉर्मेंस से तो लगता है कि बड़े प्रकाशनों के साथ कुछ ठीक नहीं। हिन्द युग्म ने साबित कर दिखाया है कि उसके सामने सब बौने हैं। उसने एक ऐसा मैयार खड़ा कर दिया है जिस तक पहुंचना किसी भी प्रकाशक के लिए मुमकिन नहीं? अब क्या बड़े प्रकाशकों को लेखकों का अकाल झेलना पड़ेगा क्योंकि सब तो हिन्द युग्म की ओर दौड़े चले जाएंगे?

    तीस-लाख-छमाही-रॉयल्टी का सपना साकार होता देखने के लिए।

    मैं हिन्दी का लेखक हूँ, हिन्दी से मेरी औकात है, इसलिए स्वाभाविक तौर पर हिन्दी का तरफदार हूँ। हिन्द युग्म हिन्दी की प्रोमोशन में अगर इतना बड़ा खिलाड़ी है तो सबसे पहले मैं उसको सलाम पेश करता हूँ।

    अगर!

    सुरेन्द्र मोहन पाठक

    दिल्ली-110051

    2.10.2025

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