संजीव मिश्र की एक कविता रावण दहन पर

आज रावण दहन के साथ दशहरा का पर्व हो जाएगा। इसी अवसर को ध्यान में रखते हुए ‘बावली कनपुरिया’ के लेखक और संपादक संजीव मिश्र ने यह कविता लिखी है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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मौन रह गया मेला सारा
रावण वध को लोग जुटे थे,
एक-दूजे से खूब सटे थे,
खूब सजा यह मेला था,
मेले से ज़्यादा खेला था।
झूले-झालर की रौनक थी,
एक नचनिया छा सी गई थी,
जश्न राम की जीत का था,
जोर तो नकली प्रीत का था।
अबकी मेला बड़ा कठिन था,
भीड़ बहुत थी शोर बहुत था,
रावण सारे बहुत बड़े थे,
राम कहीं बस छिपे खड़े थे।
लीला करना बड़ा जटिल था,
तीर राम का गुमसुम सा था,
रावण वध की जब आई बारी,
वह बाजी भी नेता ने मारी।
तीर चलाना राम को जो था,
वह भी नेता ने छीना था,
रावण को रावण ने मारा,
मौन रह गया मेला सारा।

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