• कथा-कहानी
  • संतोष दीक्षित की कहानी ‘कद्र’

    आज पढ़िए वरिष्ठ लेखक संतोष दीक्षित की कहानी- कद्र। संतोष जी ने यह कहानी हिंदी दिवस के लिये लिखी थी लेकिन इस कहानी में भाषा के जिस बिंदु को उठाया गया है वह हिन्दी के संदर्भ में शाश्वत है। पढ़िए एक रोचक कहानी- मॉडरेटर

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                  किस्सा एक पति-पत्नी का है। राधेश्याम जी मेरे पड़ोसी हैं। सच पूछिए तो यह उनके परिवार का ही किस्सा है। उनके होनहार, वीरवान पुत्र का।

                     अब राधेश्याम जी के बारे में क्या कहूं! आम शहरियों की तरह चंट, मक्कार, खुदगर्ज जैसे कई विशेषणों से लैस हैं वह मेरी नजर में। हो सकता है इससे कुछ ज्यादा ही विशेषण उन्होंने मेरे बारे में चुन रखा हो। आज के समय में कुछ भी हो सकता है। तरह-तरह के वैमनस्य, टकराव, दुर्भावना, गाली-गलौज के साथ भी आदमी अंततः पड़ोस धर्म का निर्वाह तो कर ही रहा है। केवल यही सोच कि जितनी हो चुकी है अलगाव और दूरी, बस अब और नहीं। यह पूरी दुनिया इसी तरह लड़ते और चूमते चल रही है। एक दूसरे को झेलने और मौके-बेमौके गले लगाते ही हमारा समाज आगे बढ़ रहा है। सबको एक दूसरे की कद्र करनी चाहिए। तब और भी ज्यादा, जब दोनों आस-पास या आमने-सामने हमेशा मौजूद रहते हों। जैसे कि पति और पत्नी। भले अब रिश्ते में पहले जैसी वह मिठास या लज्जत ना रही हो, फिर भी।

            “लज्जत तो अब सब्जियों में भी नहीं मिलती पहले जैसी… इसका क्या मतलब है!”- राधेश्याम अक्सर पुराने दिनों का गुणगान करते रहते हैं। उनके लिए हर पुरानी चीज पवित्र है– जैसे कि वेद और रहने सहने के तमाम पुराने नेम-धरम। इसे वह परंपरा कहते और इसी से संस्कृति कायम रखती है के मंत्र पर विश्वास बनाए रखते। वह जिला समाहरणालय में बड़ा बाबू थे। खम ठोंक कर कमाते लेकिन जाहिर कभी नहीं करते। मलाई भी खाते रहते तो मुंह इस कदर बनाते मानो चूना चाट रहे हों। कंबल ओढ़ कर घी पीते लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर घी की निंदा करते। स्वयं को हमेशा ईमानदार और नियम-कानून का महान ज्ञाता बतलाते। सुनने वालों के सामने रोज डींग हांकते कि ‘नवका’ लड़का सब आ जाता है जिलाधिकारी बन के, लेकिन काम-धाम कुछ आता नहीं। बिना हमारी मदद के चार कदम भी चल नहीं सकता।

           राधेश्याम जी के बारे में इतना सब इसलिए बखानना पड़ रहा है क्योंकि जिसकी यह कहानी है, उनका वह लड़का उनके ठीक विपरीत प्रकृति का है। सिक्के के ठीक दूसरे सिरे की तरह… जहां कोई राज-चिन्ह नहीं, केवल उसका मूल्य छपा रहता है।

           राधेश्याम जी के प्रबल आग्रह के बावजूद आई.आई.टी. करने के बाद उसने कभी सिविल सेवा का विकल्प नहीं चुना, क्योंकि राज-चिन्ह से उसे भयानक एलर्जी थी। उसने आगे के विकल्प के रूप में प्रबंधन को चुना और इसमें डिग्री हासिल करने के बाद एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी से अपने मनपसंद ऑफर के साथ जुड़ गया। एक शाम पिता को अपना ऑफर लेटर दिखलाते पूछा उसने– “क्या इतने रुपया के वेतन पैकेज आपके जिलाधिकारी का होता है?” राधेश्याम जी से कोई जवाब देते नहीं बना।तब बेटा प्रेम से कहने लगा–”काहे को इतना नाराज रहते हैं आप! यही चाहते थे न कि हम घूस कमाने को प्रशासनिक सेवा में जाएं?लेकिन हर किसी को यह काम पसंद नहीं आ सकता। देखिए कि बिना घूस के केवल अपना काम करने के बल पर कितने रुपए मिल रहे हैं मुझे! यह क्या काम है?”

            राधेश्याम जी ने इस सत्य को भले मुंह बनाकर सुन लिया, लेकिन बेटे की अनुपस्थिति में पीठ पीछे यही हांकते कि कितना लायक बेटा है मेरा सिन्टू! तभी तो वह पूरी ईमानदारी से जितना कमा लेता है, उतना लोग ब्लैक-मनी नहीं कमा पाते। बेटे के नौकरी में आते ही किसी ऊंचे खानदान में उसके ब्याह को लेकर सोचने लगे थे। कल्पना में लाखों-करोड़ों के दहेज और जाने क्या-क्या सोचते रहते।

            लड़के ने इस मोर्चे पर भी उन्हें गहरा झटका दिया। उसकी पहली नौकरी हैदराबाद में लगी थी। वहीं की एक स्थानीय लड़की भी उसी बिल्डिंग के एक बैंक में अफसर थी। बेटे का इस बैंक में आना जाना था। उसका खाता वहीं था। एक दिन उन दोनों की आंखें लड़ गईं। एकदम फटाफट किस्म का प्रेम हो गया जैसे उनके बीच। जब पहली बार आंखें मिली, तभी लगा मानो आंख के कैमरे ने उसकी सौम्य छवि क्लिक कर तस्वीर सीधे दिल तक भेज दी हो। दूसरी-तीसरी मुलाकात में दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराने लगे थे।चौथी मुलाकात इसी बिल्डिंग के एक रेस्टोरेंट में हुई। उन दोनों के करीब आने की वजह उन दोनों का रंग था। राधेश्याम जी का बेटा सिन्टू(पुकार का नाम) काफी सांवला था। उस लड़की का नाम लक्ष्मी था। वह भी सांवली, सलोनी और तेजस्विनी दिखती थी। सिन्टू के चेहरे पर हल्की घनी,काली दाढ़ी  खूब शोभती थी। वह दक्षिण के किसी फिल्म स्टार की तरह लगता था।

           “ आप कहां से हो… आई मीन फ्रॉम विच स्टेट?”

            “मैं इडर लोकल फ्रॉम रंगारेड्डी डिस्ट्रिक्ट। माई फुल नेम इस लक्ष्मी चेवल्ला नायडू! आर यू फ्रॉम बेंगाल?”

              “ नो आई एम फ्रॉम बिहार, पटना जिला! फुल नेम इस नीलेश सिन्हा।”

            औपचारिक परिचय के बाद दोनों अंग्रेजी-हिंदी मिलाकर बतकही करते रहे। फिर भी बहुत सी बातें ऐसी थीं जो भीतर उमड़-घुमड़ कर रह जाती थीं। अबतक सिन्टू उर्फ नीलेश ने जान लिया था कि वह एक समृद्ध किसान घर की लड़की है और कुंआरी है। अपने बारे में भी नीलेश ने बतला दिया था कि वह किसी अच्छी ब्राइड की तलाश में है, क्योंकि अब अकेले जीने में कुछ मजा नहीं आ रहा! बहुत हो चुकी है लंबी यात्रा।

           “तेलंगाना में रहना तो तेलुगु सीखना!”–जाते हुए लक्ष्मी ने यह बात यूं ही सहज भाव से कह दी थी। भाषा ही समस्या थी उन दोनों के बीच और यह एक गंभीर समस्या थी। लक्ष्मी की अंग्रेजी कामचलाऊ थी और हिंदी तो बस माशाअल्लाह! फिर भी नीलेश की संगत में कुछ-कुछ तो बोल ही लेती। नीलेश के पल्ले अभी तक तेलुगू के दो-चार शब्द ही पड़े थे। “ यू सी न्यूज इन तेलुगू! तेलुगु जल्दी सीखेगा। फिर एक प्राइमर भी गिफ्ट किया उसने नीलेश को ठीक अगली मुलाकात में। नीलेश को लगा कि उसे अपने रंग में रंगने को वह कहीं ज्यादा ही उत्सुक है। यह बात उसे थोड़ी चुभी भी, लेकिन नजरअंदाज कर गया। लक्ष्मी के व्यक्तित्व में ही एक ऐसी सहजता और सरलता थी कि वह उसके बारे में कुछ भी उल्टा-सीधा सोच नहीं सकता था।

          इसी तरह मिलते जुलते उन दोनों के बीच की प्रगाढ़ता बढ़ने लगी थी। लक्ष्मी बहुत भली थी यह नीलेश ने अच्छी तरह से जान लिया था। यह भी कि उसकी जिंदगी में आने वाला वह पहला लड़का है। आजकल की पढ़ी-लिखी और खासकर जाॅब वाली लड़कियों में यही गुण उसे जल्दी नहीं मिल पाया था। उसके  परिचय के दायरे में जो भी लड़कियाँ थीं, सभी इतनी पेशेवर,तेज-तर्रार और चालू थीं (उसकी अपनी नजर में) कि इन सबों का संग-साथ उसे कभी पसंद ही नहीं आया। जबकि लक्ष्मी के साथ का उसका मामला  ‘लव एट फर्स्ट साइट’ वाला था। लक्ष्मी यहां एक गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी। उसका एक भाई भी हैदराबाद में ही जॉब कर रहा था। उसकी शादी इसी वर्ष होने वाली थी। इसके बाद लक्ष्मी को भाई के साथ ही रहना था। अभी भाई भी एक लॉज में रह रहा था।

             नीलेश या महसूस कर रहा था कि लक्ष्मी की हिंदी बातचीत की क्षमता में तेजी से सुधार हो रहा है। अब वह कुछ बात तो बिल्कुल साफ बोलने लगी थी। ऐसा कोई सुधार वह तेलगु के प्रति अपने अंदर नहीं ला पा रहा था। इस मामले में वह काफी लापरवाह था।

          एक शाम उसने लक्ष्मी को एक महंगे रेस्टोरेंट में डिनर के लिए आमंत्रित किया। उस शाम वाकई उसने चौंका दिया। उसने इवेंट मैनेजर के माध्यम से सारी तैयारी कर रखी थी। बैंड के स्वर के बीच जब उसने झुककर गुलाब के फूल को लक्ष्मी की ओर बढ़ाते हुए तेलुगु में ‘नेनू निन्नू प्रेमिस्टुन्नानु’ कहा तो लक्ष्मी की आंखें जैसे किसी स्वप्न में डूब जाने से मुंद सी गई। एकदम से जैसे थिर और अवाक सी रह गई वह! फिर तो उससे ‘ना’ कहते नहीं बना। उसे नीलेश के चेहरे और जुबान में अपनी कल्पना के प्रेमी की हूबहू छवि पा ली थी। नीलेश को भी ऐसी ही लड़की चाहिए थी– साफ दिल  की, पवित्र और प्यार करने वाली। फ्लर्ट करने वाली नहीं, सचमुच प्यार करने वाली। इस नाते दोनों की खोज पूरी हो चुकी थी। दोनों अब देर रात तक बतियाने लगे। जितनी अधिक बातचीत बढ़ने लगी, करीब आने की और साथ रहने की तड़प भी उतनी तेजी से बढ़ने लगी। दोनों के लिए एक दूसरे के बिना रह पाना अब मुश्किल लगने लगा था।

           लक्ष्मी ने एक दिन नीलेश को अपने बड़े भाई से मिलाया। वह भाई को पहले ही सब बतला चुकी थी। भाई ने भी उसे पसंद किया। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उसने नीलेश के कार्यालय से उसका पूरा प्रोफ़ाइल निकलवा लिया। वहां उसके कई दोस्त थे। उसने सबके साथ यह शेयर किया। अपने घर वालों को भी उसने पहले से ही राजी कर रखा था। धीरे-धीरे पूरे कार्यालय में यह बात फैल गई की लक्ष्मी और नीलेश ब्याह करने वाले हैं। देखते-देखते यह बात हवा से आंधी में बदल गई थी, जबकि राधेश्याम जी तक इस बयार का एक झोंका भी अभी तक नहीं पहुंचा था। नीलेश ने केवल अपनी मां को सारी बातें बता रखी थी, लेकिन अपने पति के स्वभाव को देखते हुए उनकी पत्नी ने इसे अभी अपने तक ही सीमित रखा था।

           लक्ष्मी का भाई एक शनिवार की फ्लाइट से पटना पहुंचा और राधेश्याम जी से मिला। उसे घर-द्वार सब काफी पसंद आया! बस राधेश्याम जी का स्वभाव ही थोड़ा खल रहा था उसे। अपने पुत्र के भावी विवाह के प्रति उनके अंदर तरह किसी तरह की कोई खुशी नहीं थी। सारी बात जान उल्टे काफी रंज हुये थे वह। एकदम से जिसे कहते हैं हत्थे से उखड़ जाना, उसी तरह का प्रलाप करने लगे और तत्काल बेटे को फोन लगाने लगे थे।

            बेटे ने निर्भीकतापूर्वक सच को स्वीकार किया और मां को फोन देने को कहा। मां से उसने स्पष्ट कहा कि यदि पिता तैयार नहीं होंगे तो यहीं हैदराबाद में लक्ष्मी के साथ कोर्ट मैरिज कर लेगा। बेटे की दृढता को देखना मां के लिए काफी सुखद था। मां बेटे का लगाद अटूट था। राधेश्याम जी के मर्दवादी रवैया से आहत होकर जब भी वह टूटने को होती, बेटा ही उसके जख्म को समझता और हिम्मत देता। अपने पति की तुलना में अपने बेटे का स्वभाव उसे हमेशा ज्यादा अपना लगता और महसूस होता कि वह उसी की देह का जाया है और उसमें उसके पिता का कुछ भी नहीं। इस नाते वह उसे और भी प्यारा लगता।

           आधे घंटे के संवाद के बाद अपनी पत्नी को भी बेटे को पक्ष में खड़े होते देख राधेश्याम का पारा थोड़ा नीचे गिरा। फिर भी उन्होंने लड़की के भाई को इंगित कर कहा–” डू यू बिलीव समबॉडी आफरिंग मी फिफ्टी लैक्स एंड अ मर्सिडीज़ एज डाउरी!

          लड़की के भाई ने विनम्रतापूर्वक नीलेश की बड़ाई करते हुए टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी में बताया कि वह दोनों अच्छा कमा रहे हैं और बहुत अच्छी तथा ऊंची सोच वाले हैं। डाउरी की तो कोई बात ही नहीं। फिर भी वह लोग काफी सोना देंगे और जमीन भी, यदि वह लोग लेना चाहें। ब्याह का भी सारा खर्च उठायेंगे।

         इस घटना के महीने भर बाद सिन्टू घर आया और मां को लेकर हैदराबाद लौट गया। राधेश्याम जी तने और मुँह फुलाए पड़े रहे। साथ जाकर लड़की देखने से भी मना कर दिया। बोले कि ‘‘जब मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी! जब तुमने खुद ही सब तय कर लिया है तो मेरा क्या काम ?”

          “तो क्या आशीर्वाद भी नहीं देंगे?”

           “जब समय आएगा, जरूर देंगे।”

           राधेश्याम जी अंततः मान गए। अपने जीवन की इस दुर्घटना को भी अपने मूल स्वभाव के अनुरूप उन्होंने एक खुशगवार घटना में तब्दील करते हुए आसपास के लोगों, दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच यही भांजा कि जमाना अब काफी बदल गया है और यदि बदलते वक्त के साथ नहीं चलेंगे, तो कहीं के भी नहीं रहेंगे। सो वक्त के साथ चलते हुए उन्होंने इस अंतर्जातीय विवाह की स्वीकृति दे दी है।

         पंद्रह दिन बेटे के साथ बिताकर जब खुशी-खुशी राधेश्याम जी की पत्नी लौटीं, उन्होंने घोषणा कर दी की लड़की को वह अंगूठी पहना आई हैं।  अतः अब किसी मीन-मेख का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अब उन दोनों की सगाई इसी शहर में होगी और सारा खर्च लड़की वाले ही उठाएंगे। उन्होंने अपनी ओर से यह भी जोड़ दिया कि लड़की वाले अपने इलाके के भारी जमींदार हैं और काफी शानो-शौकत वाले हैं।

               सगाई, विवाह सब अच्छे से संपन्न हो गया। सगाई में लड़की के परिवार के दर्जन भर लोग पटना आकर एक बड़े होटल में ठहरे और वहीं सारा कार्यक्रम भव्य तरीके से संपन्न हुआ। विवाह में अपने नजदीकी परिजनों और दो-चार घनिष्ठ मित्रों संग राधे श्याम जी हवाई जहाज से बारात लेकर हैदराबाद गए। सारे बाराती स्वागत-सत्कार से इतने गदगद थे की राधेश्याम जी की चहुं ओर जय-जयकार हो रही थी। लड़की के पिता और भाई ने राधेश्याम जी को इतना मान आदर और उपहार दिया कि अंततः वह भी पिघल उठे। सारे बारातियों की आंखों में उनके लिए विशेष प्यार और सम्मान झलक रहा था। इस दुनिया में सदाचार और प्रेम को ठुकराकर कोई भी चैन से नहीं रह सकता। दुनिया अकेले रहने के लिए नहीं बनी है। राधेश्याम जी भी इस सत्य से अवगत थे। अनुभवी आदमी थे। अतः सब कुछ बेहद खुशी और उत्साह से भरे वातावरण में संपन्न हुआ।

             यहां तक तो सब ठीक-ठाक चला। सभी एक दूसरे की कद्र कर रहे थे और इस नाते इस कहानी की गाड़ी भी आगे बढ़ती जा रही थी। लेकिन विवाहोपरान्त उन दोनों के प्रेम की गाड़ी बहुत सही तरीके से नहीं चल पा रही थी। दांपत्य जीवन बहुत खुशहाल नहीं हो पा रहा था। दोनों एक दूसरे से घुल-मिलकर खूब सारा गप्प नहीं कर पा रहे थे। एक दूसरे से उन्हें अपने गत जीवन, घर-द्वार, देस-समाज की जाने कितनी बातें करनी थीं, क्योंकि दोनों की पृष्ठभूमि एकदम अलग थी। किंतु बातचीत में वह रस, प्रवाह और एक दूसरे के विशिष्ट शब्दों को ‘लोक लेने’ और ‘चुभलाने जैसा भाव व मजा नहीं आ पा रहा था। दोनों हिंदी, अंग्रेजी मिला अटकते केवल काम भर की जरूरी बात ही कर पाते। इस नाते एक दूसरे के मनोभावों को ठीक से नहीं समझ पाने के कारण परस्पर आकर्षण का वह उत्साह भी धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा था। प्रेम था, पर वह ठीक से अभिव्यक्त ना हो पाने के कारण, सामने आ नहीं पा रहा था। संवाद सबसे अधिक जरूरी है और प्रेम में तो खास कर। भाषा वह पहला जरूरी सेतु है जो हमें एक दूसरे के काफी करीब ही नहीं लाता है, बल्कि एक दूसरे के प्रति प्रेमिल और स्नेहमय भी बनाता है। रिश्ते को एक ‘प्रीमियम’ स्वरूप प्रदान करता है। जबकि इन दोनों के बीच न विश्वास जम रहा था, न सुरक्षा बोध! किसी अनकहे के संप्रेषण या सांस्कृतिक सामंजस्य का तो सवाल ही नहीं। सिन्टू, लक्ष्मी को खूब सारी हिंदी फिल्म देखने को बाध्य करता ताकि वह जरूरी बोल- चाल की हिंदी अच्छी तरह बोलना सीख ले। जबकि लक्ष्मी को तेलुगू फिल्म देखने में ज्यादा मजा आता और वह सिंटू पर भी इसके लिए जोर डालती।

            इस प्रकार धीरे-धीरे इन दोनों के दिल और दिमाग के बीच के सेतु में दरार पढ़ने लगी थी। शारीरिक रूप से नजदीक आ जाने के बाद भी दोनों भावनात्मक रूप से काफी अलग होते जा रहे थे। समय यूं ही सरकता जा रहा था। दोनों के घर वाले जब अपने-अपने बच्चों से बात करते तो उन्हें यही आभास होता कि दोनों ही अपनी जिंदगी से बहुत खुश नहीं हैं और कम से कम शब्दों में अपनी बात, अपना हाल कहते हैं। कोई अतिरिक्त खुशी या उत्साह इनमें न पाने के कारण दोनों के घर वाले चिंतित थे। दोनों के घर वाले जानते थे कि यह एक बेमेल विवाह है। फिर भी केवल आपसी प्रेम के भरोसे उन्होंने इसकी स्वीकृति दी थी। अब इस प्रेम को बहुत गहराई में न पाकर उन सबों में निराशा आ जाना स्वाभाविक था।

           देखते देखते दोनों के ब्याह को लगभग साल होने जा रहा था। नवरात्र का समय आ गया था। सिन्टू को अपने घर की याद आ रही थी। घर में साफ-सफाई होती । देवी मां का श्रृंगार होता। मां दोनों शाम दुर्गा सप्तशती का पाठ करती। चौराहे पर देवी की भव्य मूर्ति बैठती। मेला लगता। तरह-तरह के खाने-पीने और लेन-देन के तरह तरह के सामान बिकते, जिन्हें खरीदने का खूब उत्साह रहता। दशमी तिथि को रावण वध का शानदार कार्यक्रम होता। यहां भी खूब मेला-ठेला लगता।

          इधर लक्ष्मी अपने फ्लैट में ‘बथुकम्मा’ पर्व की तैयारी कर रही थी। सिन्टू जानता था कि यह पर्व इस इलाके में नवरात्रि के समय ही मनाया जाता है। लक्ष्मी ने तरह तरह के फूलों को मिलाकर बथुकम्मा बनाया था। आस-पास की कई तेलुगू महिलाएं आज आ जुटी थीं और अपनी भाषा में गाते हुए नृत्य कर रही थीं।

           शाम को सिन्टू घर आया तो ढेर सारे फल और मिठाई लेकर आया था।  चावल और गुड़ से बनने वाली ‘सक्किमालु’ मिठाई भी। घर में लक्ष्मी ने एक खास  ‘डिश’ बनाया था । इसे चखते ही सिंटू ने तेलुगु में कहा– “यह तो सद्दुलु है।”

          “अरे तुम कैसे जानते हो?” उसने आश्चर्यमिश्रित भाव से हिंदी में पूछा।

           “ पहले नहीं जानता था, इधर सब सीख और जान गया हूँ।” उसने तेलुगु में बात करते हुये कहा। फिर इस अवसर पर गाए जाने वाले एक गीत को गाने लगा —

                  बथुकम्मा  बतुकम्मा  उय्याला

                  बथुकम्मा  बतुकम्मा  उयलम्मा

                  गौरम्मा     बतुकम्मा  उय्याला

                  बंगारू      सतुकम्मा  ऊयलम्मा

            लक्ष्मी की आंखें अचानक से भर आईं। सिंटू इस कदर भाव-विभोर होकर जिस सुरीली धुन में गा रहा था…लक्ष्मी ने कभी जीवन में ऐसे ही पति के संग-साथ यह पर्व मनाने की कल्पना की थी।

          “क्या तुम इसका अर्थ भी जानते हो या…?”

           “तुम्हारी भाषा में इसका अर्थ यह है कि बथुकम्मा आओ तुम्हें झूला झुलाएँ। मां को गीत सुनाएँ। गौरी मां संग जीवन का उत्सव मनाएं। सोने सी चमकती बथुकम्मा को सजाएँ!

           अब सिन्टू के लिए भी आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी में लगभग चीख पड़ने की बारी थी। वह भी उतनी ही अच्छी हिंदी बोल रही थी

        “नीकु चाला बागा चेसावु!” चिंटू ने तेलुगु में कहा

            “तुमने भी तो बहुत अच्छा किया तेलुगु सीख कर! तुमने मेरा दिल जीत लिया।” कहते हुए वह भावुक होकर उसके सीने से लग गई थी।

            “आज तुम मेरी मा॔ से हिंदी में बात करना!”- चिंटू ने तेलुगु में कहा।

            “और तुम मेरे घर वालों से तेलुगु में;”–लक्ष्मी हंसते हुए जैसे पागल सी हुई जा रही थी!

    संतोष दीक्षित

    दुली घाट, दिवान मोहल्ला

     पटना सिटी, पटना 800008

    Mob.9334011214

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