कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएँ

आज प्रस्तुत है कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएँ। युद्ध, जिससे बच्चों का कोई लेना-देना नहीं होता है वह कैसे उनके जीवन को तहस-नहस कर देता है, इसका अंकन हमें इन कविताओं में दिखता है। साथ ही उनकी कविताओं में जीवन की अन्य त्रासदियाँ भी मार्मिक तरीके से शामिल हैं – अनुरंजनी

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1. अयूर और अयन के नाम

मेरे बच्चों दुनिया के बाकी बच्चों की तरह
तुम दोनों ने भी अपने माँ-बाप के प्रेम को मुकम्मल किया है

ये कैसी विडंबना है कि हमारे दिलों में
तुम्हारे लिए जो प्यार है
उसे ठीक से समझने के लिए
तुम्हें भी होना पड़ेगा उतने ही गहरे प्यार में
जितना मैं और तुम्हारी माँ हैं एक-दूसरे के

ये नज़्म मैं तुम्हे जिंदगी के कुछ ज़रूरी सबक देने के लिए
लिख रहा हूँ

मुझे नहीं मालूम कि हमारे
कालखंड के इस दौर में होने के लिए मैं किसे दोष दूँ
शायद समय के सब कालखंडों में
कुछ अपनी त्रासदियां रही होंगी

अब जबकि ये तय है की
यही हमारा सच है तो
तुम्हें ज़ीना होगा
रोज़ थोड़ी और घटती करुणा वाली दुनिया में
इस यक़ीन के साथ
कि सिर्फ करुणा ही एकमात्र रास्ता है
जिससे होकर तुम पा सकोगे
थोड़ी और बेहतरीन दुनिया

अपनी आंखों में पालते हुए
ऊंचे और बड़े ख़्वाब
तुम ये याद रखना
किसी की आंखों की रोशनी इनकी कीमत कतई न हो
मशीनें जब इल्म को अपने कब्ज़े में ले लें
तुम किताबों की सोंधी ख़ुश्बू में खोया करना

क़ुदरत का हरापन और उसके बाकी सब रँग
तुम्हारे लिए ज़ीना का सलीक़ा बने रहें
हो सकता है कोई ऐसा भी दौर आये
जब तुम्हें ये बताये जाने की कोशिश हो कि
नफरतों का ज़वाब सिर्फ नफ़रतें होती हैं
तुम बिल्कुल यक़ीन न करना उनकी बातों पर
ये सोच कर कि तुम्हारे खुद की इस दुनिया में
होने की इकलौती वज़ह प्रेम है

ये तो ज़ायज़ है तुम ना बाटों किसी का ग़म
किसी के ग़म की वज़ह तुम कभी ना होना

पंथ, मज़हब, मुल्क़ सब ज़रूरी हैं यक़ीनन
इंसानियत का जज़्बा सबसे पहले और ऊपर रखना
ताकतों से पहले मुहब्बतों के सामने
सर झुकाना मेरे बच्चों
और ये यक़ीन कायम करना
तुम्हारे जैसों के होते हुए
ये दुनिया अभी कुछ दिन और क़ायम रहेगी।

2. बच्चे और युद्ध

क्या करोगे
अपने जीते हुए सब भूखंडों का
कि जब उन में उगे किसी फूल को देखकर
मुस्करा नहीं सकेंगे
बारूदों के धमाकों से डरे सहमे
तुम्हारे बच्चे

जब वे आसानी से नहीं बना पाएंगे
किसी अज़नबी हमउम्र को अपना दोस्त

मौत का अट्ठहास करती
तुम्हारी तोपों की गरज़
उनके दिलों में ताउम्र के लिए
गहरी बैठ गयी है

अपने बच्चों में ख़ुदा की सूरत देखती
माँओं को क्या ज़वाब दोगे तुम
जब वे तुमसे पूछेंगी उनकी
मुस्कानों का पता

ये जो समय से पहले
बुलाये हैं तुमने पतझड़
क्या बुला सकोगे ऐसे ही
बसंत को भी

कभी सोचा है तुमने
तुम्हारे दिए हादसों की वज़ह से
दरियाओं के अँधेरे गर्त में जा छिपी
मछलियों तक रोशनी की
कौन सी आवाज़ पहुंच पाएगी
और वो एक बार फिर आएंगी
तुम्हारा निवाला बनने
ताकि भरे पेट
और अहम के साथ एक बार फिर
तुम निकल सको
किसी नयी जंग पर।

3. अस्पताल में पिता

अस्पताल में पिता
मेरे भय की पराकाष्ठा हैं
जिनकी उपस्थिति
हमारे अभय का शिखर रही हो

जीर्ण-शीर्ण देह और क्लांत मुख उनका
निस्सीम कर देता है
हमारे मौन के संसार को
हार की एक ऐसी प्रतिध्वनि
जिससे कभी गुजरना नहीं चाहता मैं

अस्पताल में पिता
जीवन का अघोषित आपातकाल हैं
समय के पेट पर
उभर आये उस फोड़े जैसे हैं
जो लेने नहीं देता पेट के बल होकर
सोने वाली दोपहर की अलसाई नींद

तकनीकी के साथ
हमेशा छत्तीस के आंकड़े में रहने वाले पिता
उत्कट व्यग्र हो उठते हैं
देखकर बड़ी सी मशीन
सीटी स्कैन की
अनायास हो जाते हैं
एकदम चुप

मैं समझ नहीं पाता
वो कर रहें हैं
कोई मंत्रोचारण
या फिर कोस रहे समय को
या फिर याद आ रहें हैं
उनको
उनके पिता.

4. पहाड़ों से लौटते हुए

दे आया हूँ
तिलांजलि
अपनी गढ़ी सब ऊँचाइयों की

समर्पित कर आया हूँ
मन के सब खोखले-छिछले-हल्के पहाड़
जो रचे थे समय ने
झूठी प्रवंचनाओ के सहारे

स्वार्थ की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़कर
आत्म्श्लाघाओं ने किया था
जिन्हें पोषित
भीतर की विपन्नताओं ने
डाल रखा था जिन पर
भ्रमों का मकड़ीला जाल

जहाँ से देखते हुए
पाया है मैंने खुद को
बहुत ऊँचा
बहुत बड़ा
बहुत भारी
बहुत गाढ़ा और
बहुत घना
पहाड़ों से लौटते हुए
दृष्टि ने मुझे आइना दिखाया
जिसमे मैं था
बहुत बौना
बहुत छोटा
बहुत हल्का
बहुत विरल
बहुत तरल.

5. मेरे समय की औरतों के नाम

रोज थोड़ी और निर्मम होती दुनिया में
नेकी और उम्मीद की रौशनी को जिन्दा रखती
मेरे समय की औरतों के नाम

तुमसे शुरू होती दुनिया में
तुमसे पहले किसी और का ज़िक्र
भला जायज़ होगा क्या
और अगर ये हुआ भी तो पूरा हो पायेगा क्या

माँ, बहन, दोस्त-औ-महबूब न जाने कितने किरदार
और सब के सब किरदारों में ये पाकीज़गी
सब के आँखों के ख्व़ाब की तामील करते हुए
खुद के ख्वाब देखने की हिम्मत पालती
मेरे समय की औरतों के नाम

अपनी वफ़ा औ दुआओं के जादू से
दुनिया को मुकम्मल औ खूबसूरत बनाती
अपनी ज़हीनी से तस्वीर-ए-कायनात को
रोज थोडा और खुशरंग करती
मेरे समय की औरतों के नाम

इंसानियत की राह-ए-मंजिल को रौशन करती
गम के हर एक सांचे में चुपचाप ढलती और मुस्कराती
पिछली रातों की थकान और भीतर के गम की गठरी बांधे
रोज़ सुबह काम पर निकलती
बिना परों के रोज़ उड़ने के जद्दोज़हद में लगी
मेरे समय की औरतों के नाम

किसी भी शायर की शायरी से बड़ी
और हर किस्सागो की कहानी से कहीं ज्यादा मुंतशिर
किस्सा-ए-आदम के इब्तिदा से इस लम्हे तक
सबसे औसाफ़ किरदार
मेरे समय की औरतों के नाम

आसां नहीं होता घर की इज्ज़त और अपने ख्वाबों को
एक ही कोख़ में यूँ बखूबी पाल पाना
मगर हर बार की तरह हार कर भी जीतती
चाहने और निबाहने के अंतर को रोज़ घटाती
मेरे समय की औरतों के नाम.

परिचय-

कुँवर रवीन्द्र सिंह
सम्प्रति: सेवारत (भारत सरकार उपक्रम)
संपर्क: +91 7017936096
मेल: kunwar2618@gmail.com

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