27 फ़रवरी की शाम पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘नैनन में आन-बान’ पर बातचीत हुई। दिल्ली के कुंजुम बुक स्टोर में आयोजित इस बातचीत की यह रपट लिखी है युवा शोधार्थी मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर
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27 फ़रवरी को दूसरी बार कुंजुम में जाना हुआ। ख़ूबसूरत शाम बीती। ख़ूबसूरती की वज़ह थी एक लेखक को सुनना।
दूसरी वज़ह थी चारों ओर लगी हुई किताबें। किताबों के बीच ख़ुद को पाकर रमज़ान के रोज़े की प्यास मिट सी गई। प्यास की जगह सिर्फ़ शब्द ही शब्द ज़ेहन में दौड़ते दिखाई दे रहें थें।
ख़ैर मुद्दे पर आते हैं। हम जैसे लड़कों को सुनना बड़ा प्यारा उद्यम लगता है। क्योंकि अपन पढ़ने-लिखने वाले हैं और जहां कहीं भी अपने जैसा पढ़ा-लिखा व्यक्ति मिल जाए तो उन्हें सुनने का मौक़ा कतई नहीं गंवाते।
यतींद्र मिश्र आए हुए थे अपनी नई किताब ‘नैनन में आन-बान’ पर बात-चीत करने। किताब कितनी अच्छी है वो तो पाठकबंधु तय करेंगे। हालांकि इस मक़ाम पर ये बताता चलूं कि इस पुस्तक के लेखक पर वाकई में सरस्वती की असीम कृपा है।
आज आधे घंटे पूर्व ही मैं कुंजुम में पहुंच गया। संजीव जी ने पहुंचते ही किताब की एक प्रति थमा दी। अब किताबी-कीड़े को नई किताब मिल जाए तो वो दीमक बन ही जाता है। ख़ैर, अपन ने भी किताबों को उलटना-पलटना शुरू कर दिया। किताब उठाते ही आपकी नज़र शंकर महादेवन के शब्दों पर न चाहकर भी चली ही जाएगी। हां, पीठ पर जिन लोगों की प्रतिक्रियाएं हैं उनपर भी आप की दृष्टि अवश्य जाएंगी। क्योंकि वे सभी बड़े लोग हैं जिनका नाम साहित्य में रुचि रखने वाले लोग जानते ही होंगे।
पेंगुइन के लोगो (LOGO) के सामने लगे सोफे के एक छोड़ पर यतींद्र मिश्र बैठ गए और दूसरे छोड़ पर वैशाली माथुर। फ़िर बात शुरू हुई। बाक़ी संचालकों की तरह वैशाली जी ने भी बधाई दिया। यतींद्र जी ने अपने पहले वाक्य से ही समा बांध दिया। जब उन्होंने कहा कि “नई पीढ़ी बहुत अच्छा काम कर रही है। ये कहना कि नए बच्चे जानते नहीं। मैं ये बिल्कुल नहीं मानता।”
आगे कुछ एक पंक्तियां किताब के बारे में कही। उनके कहे हुए से ये समझ आया कि ‘नैनन में आन-बान’ में उन्होंने संगीत की दुनिया के उन दिग्गजों को पाठकों तक लाया है जो कभी सामने नहीं आ सके। जबकि उन सभी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत को अपनी कला से समृद्ध किया। उन्होंने ठीक ही कहा कि इसमें थोड़ा इतिहास, थोड़ा संस्मरण और थोड़ी किस्सागोई है।
संजीव जी ने ज्ञान की यात्रा से संबंधित एक प्रश्न किया। जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि हम अपने ज्ञान के लिए जो किताबें पढ़ते हैं वो हमारा व्यक्तिगत चुनाव है। इसको समझाते हुए उन्होंने ‘मलाई जमने’ का उदाहरण दिया। समय जैसे-जैसे बीतता है वैसे-वैसे हमारे ज्ञान की भी यात्रा चलती रहती है। इतिहास पर बोलते हुए उन्होंने रोमिला थापर और रामचंद्र गुहा का उल्लेख किया।
ज़रा सोचिए, एक लेखक जो बात करने अपनी शास्त्रीय संगीत की किताब पर आया है और वो तमाम डाइमेंशन पर बातें रख रहा है। ये एक लेखक के अध्ययनशील होने का परिचायक है।
आपके मन में ये प्रश्न उठ सकता है कि ‘नैनन में आन बान’ ही शीर्षक क्यों रखा है लेखक ने?
किसी प्रश्नकर्ता ने भी ये सवाल किया था। उन्होंने बताया कि ये शाम का राग है। इसका संबंध ‘राग मुल्तानी’ से है। राग मुल्तानी की उत्पत्ति मध्यकाल में मुल्तान में हुई थी। जिसका उल्लेख ‘राग तरंगिनी’ में मिलता है। इसे मुल्तानी धनाश्री के नाम से भी जाना जाता है।
मैंने संजीव जी के सौजन्य से किताब के 2 अध्याय लेखक के आने से पूर्व पढ़ा। अब अपने गुरुओं ने सिखाया है कि जब किसी किताब को उठाओ तो पहले उसकी भूमिका अवश्य पढ़ो। अपन ने भी ऐसा ही किया। सबसे अच्छा तब लगा जब ‘समर्पण पृष्ठ’ देखा। आपको बताता चलूं कि ये किताब लेखक ने अपने पिताजी को समर्पित किया है। क्योंकि हम और आप पिताओं के बारे में कह नहीं पाते। मां के बारे में तो बहुत कुछ बोल, लिख या पढ़ देते हैं पर पिता के बारे में कहने में या तो हिचकते हैं या बयां नहीं कर पाते। ये पंक्तियाँ देखिए-
“साहित्य और संगीत संसार के लिए आज तक जो भी मैं लिख पाया हूँ, उसमें साहित्य और कलाओं की दुनिया के लिए सपने देखने में पंख देने वाले, उस योग्यता में भरोसा कायम रखने के लिए और यह विश्वास कि उनका बेटा सही राह पर है…
यह किताब और शेष जीवन में भविष्य में आने वाली सारी कृतियाँ उनके स्मरण का पाथेय हैं…”
जब आप किताब को पढेंगे तो एक चीज़ जो आपको बेहद पसंद आ सकती है वो है हर संगीतज्ञ के बारे में अध्याय से पूर्व पूरे पृष्ठ पर उनकी तस्वीर। पृष्ठ संख्या 2 पर केसरबाई केरकर और पृष्ठ 8 पर उस्ताद अमीर ख़ान की तस्वीर।
मैं इसका उल्लेख इसीलिए कर पा रहा हूँ क्योंकि मैंने इन दोनों को आज पढ़ा है।
ज्ञान प्राप्त करने पर बातों को रखते हुए एक बड़ी अच्छी बात कही लेखक ने। उन्होंने कहा कि “ज्ञान सड़क पर चलते हुए लिया जा सकता है।” ज़रूरी नहीं कि सिर्फ आपके गुरु ही आपको ज्ञान दे सकते हैं। ज्ञान के लिए धैर्य रखना बेहद जरूरी है। यदि धैर्य नहीं है तो ज्ञान नहीं होता। 20 साल की उम्र से पढ़ रहा हूँ और आज 50 वर्ष का हो चला हूँ। पिछले 30 वर्षों से पढ़ता आ रहा हूँ। इसी कड़ी में उन्होंने अपने गुरु विद्यानिवास मिश्र को स्मरण किया। कोई कितना बड़ा क्यों न बन जाए पर गुरु का नाम आ ही जाता है। विद्यानिवास मिश्र और कोई नहीं ‘मेरे राम का मुकुट भींग रहा है’ निबंध वाले हैं।
बतौर संचालक, वैशाली माथुर ने कहा कि पुस्तक एडिट करते समय मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे कानों में सुर गूंज रहे हैं। खैर ये तो एक एडिटर का अनुभव है बाक़ी सुधिजन पाठक जब इसको पढ़ेंगें तब बेहतर निष्कर्ष निकलकर आएगा। एक कड़वी सच्चाई तो ये भी है कि संचालक की मजबूरी होती है बातों को बढ़ा-चढ़ा कर कहना।
लोक कंठ से ही शास्त्रीय संगीत निकली है। चाहे वो चैती हो, ठुमरी हो, मेहंदी हो या मटकोर हो। उन्होंने इस संदर्भ में कहा कि सारी कलाएं लोक कला से ही निकली हैं। इस बात को पुष्ट करने हेतु उन्होंने नौशाद साहब के गीतों का सहारा लिया और कहा कि उनके तमाम गीतों में लोक संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देतीं हैं।
उनका ये अंदाज़ खूब लगा जब उन्होंने स्वीकारा कि “कोई व्यक्ति कला की पूरा व्याख्या नहीं करता थोड़ा ही कर पाता है।” एक लेखक जिसने इतनी किताबें लिखीं हों और फ़िर भी ये कहता है तो लगता है कि वो कितना बड़ा अध्येता है।
‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ भारतीय स्कूलों में प्रार्थना में छात्रों से गवाया जाता है। अमूमन स्कूलों में सुबह सवेरे छात्रों की शुरुआत इसी से होती है। यतींद्र जी के लिए ये गीत डिप्रेशन जैसा है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने कहा कि ये मेरी व्यक्तिगत राय है। हो सकता है सबके लिए ये ऊर्जा का स्रोत हो हालांकि मुझे इससे डिप्रेशन होने लगता है।
एक बात जो मुझे पूरे सेशन में बड़ी प्यारी लगी। जब उन्होंने कहा कि एक लेखक या कलाकार को संख्या देखकर प्रस्तुति नहीं देनी चाहिए। कायदे से 10 लोग हों फ़िर भी उसी प्रकार की प्रस्तुति देनी चाहिए जैसी 2 हज़ार लोगों के लिए देते हैं। एक कलाकार में इतनी ईमानदारी अवश्य होनी चाहिए।
कलाकार के ईमानदारी की बात छिड़ ही गई हैं तो मुक्तिबोध को याद कर ही लिया जाए। क्योंकि उन्होंने अपनी रचना ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में “कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी” नामक सूची में तबील से इस बात की चर्चा की है।
संगीत को उन्होंने “स्ट्रेस बस्टर” की संज्ञा दी। आगे कहा कि आप इसे जिस रूप में लेना चाहें ले सकते हैं। आप नात शरीफ़ समझें, क़व्वाली समझें, भजन समझें या तराना। ये आपके रसास्वाद पर निर्भर करता है।
उनके पूरे वक्तव्य में लता मंगेशकर आ रहीं थीं। इससे पता चलता है कि उनका कितना क़रीबी नाता रहा है लता जी से।
अंत में उन्होंने कहा कि नए बच्चे जो कर रहे हैं उसका मज़ाक नहीं बनाना चाहिए। ये संभव है कि आने वाले समय में वही एक परंपरा बन जाए। हमें सिर्फ किताबों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए बल्कि रील्स और पॉडकास्ट पर भी बातें करनी चाहिए। ये कहकर बिल्कुल दरकिनार नहीं करें कि रील्स में कुछ भी नहीं।
उन्होंने अपनी किताब का हवाला देते हुए कहा कि मुझे पता है ‘नैनन में आन बान’ को जितने लोग पुस्तकाकार रूप में नहीं पढ़ेंगे उससे ज़्यादा यदि मैं एक रील्स बनाकर डाल दूंगा तो ज्यादा पहुंच बनेगी।
अब मैं कितनी बातों का ज़िक्र करूं। बहुत बातें उन्होंने की। इतने में सभा के सम्पन्न होने की घोषणा हो गई। अब पाठकगण पुस्तक साइन कराने के लिए जुट गए
चलते-चलते एक शेर यतींद्र जी के लिए कह देना चाहता हूँ। दिवंगत आत्मा, मुनव्वर राणा से इजाज़त लेकर-
ख़ुद से चलकर नहीं ये तर्ज़-ए-सुखन आया है,
पाँव दाबे हैं बुज़र्गों के तो फ़न आया है।
मुशर्रफ़ परवेज़
शोधार्थी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

