• रपट
  • दलित स्त्रियों की आवाज़ ने देश को ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाया है- हेमलता महिश्वर

    9 मार्च को जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर स्त्री लेखन पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। उसकी रपट पढ़ते हैं। लिखी है शोधार्थी मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर 

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    कल यानी 9 मार्च को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के उपलक्ष्य पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। वैसे परिचर्चा से संबंधित पोस्टर पिछले दिनों किसी व्हाट्सएप समूह के मार्फ़त प्राप्त हो ही चुका था। मैं इस परिचर्चा का हिस्सा बनने को इसलिए भी उत्सुक था क्योंकि जब से वहां का शोधार्थी हुआ हूँ तब से किसी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन सका।

    ख़ैर, जामिया के हिंदी विभाग के जिस प्रोफेसर ने भी इस विषय का सुझाव दिया होगा उनको विशेष रूप से आभार देना लाज़िम बन पड़ता है क्योंकि विषय बड़ा लाज़वाब था। अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर विषय क्या था? तो जान लीजिए ‘स्त्री चिंतन और लेखन: टूटते दायरे और बढ़ती चुनौतियां’।

    अब इतना तो आप जानते ही होंगे कि प्रतिवर्ष 8 मार्च को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाया जाता है। बाक़ी क्यों मनाया जाता है? मैं ये बिल्कुल भी नहीं बताऊंगा। आप इंटरनेट भैया के माध्यम से पूरी कहानी जान सकते हैं।

    हिंदी विभाग के छात्र और प्राध्यापगण ‘मीर अनीस सभागार’ की तरफ़ जाने लगे थे। समय क्या रहा होगा? वही 11 बजने में कुछ मिनट बचे रहे होंगे। सभागार की एक-एक कुर्सियां भरी हुईं थीं। आगे वाले सफ़ में प्रोफ़ेसर बैठे थे। उसके पीछे शोधार्थी और छात्र। अमूमन परिचर्चाओं में विलंब होता है लेकिन इस परिचर्चा में थोड़ा भी विलंब नहीं हुआ। विभाग की प्राध्यापिका प्रो० कहकशां ए० साद को संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने सभागार में बैठे सभी श्रोताओं का शब्दों से स्वागत किया। फ़िर ईरान में मारी गई बच्चियों के लिए 2 मिनट का मौन धारण करवाकर परिचर्चा की विधिवत् शुरुआत कर दी।

    एक बात तो बताना भूल ही गया। अब याद आ गया तो बता ही देता हूँ। परिचर्चा की अध्यक्षता कर रहीं थीं हिंदी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका, प्रो० हेमलता महिश्वर। स्वागत वक्तव्य देने हेतु उपस्थित थे हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष, प्रो० नीरज कुमार। जिन 3 वक्ताओं को विभाग ने आमंत्रित किया था। उनमें प्रो० फ़िरदौस अजमत सिद्दीकी, प्रो० गोमती बोदरा हेमब्रोम और प्रो० शिमी मोनी डोले थीं।

    बतौर संचालिका, प्रो० कहकशां जी ने बहुत सी कविताओं का हवाला देते हुए वर्तमान में स्त्रियों के साथ हो रहे अत्याचारों पर अपनी बातों को रखा। फ़िर उन्होंने प्रो० नीरज कुमार को स्वागत वक्तव्य हेतु आमन्त्रित किया। प्रो० नीरज जी ने सर्वप्रथम सभी आमंत्रित वक्ताओं का स्वागत किया। फ़िर हर परिचर्चा की तरह उन्होंने विषय प्रवेश कराया। स्त्री आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई? उसको बड़े सिलसिलेवार ढंग से पेश किया। कई किताबों का उल्लखे करते हुए छात्रों को पढ़ने की नसीहत भी दी। उसी कड़ी में उन्होंने 1792 ई० में आई किताब ‘A Windication of the Rights of Woman’ जिसे Mary Wollstonecraft ने लिखा था उसे भी पढ़ने को कहा। गार्गी, अपाला, मैत्रेयी से लेकर ताराबाई शिंदे और रुक्मा बाई के जीवन संघर्ष से सभी को रूबरू कराया।

    अब वक़्त आ चुका था आमंत्रित वक्ताओं को सुनने का। उसी कड़ी में प्रथम वक्ता के रूप में माइक प्रो० शिमी मोनी डोले को थमा दिया गया। प्रो० शिमी जी ने सभी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं पेश की। उन्होंने बड़ी विनम्रता से स्वीकारा कि उनकी हिंदी उतनी अच्छी नहीं है। बावजूद इसके उन्होंने अच्छा बोला। उनका पूरा वक्तव्य अपने क्षेत्र तक सीमित रहा यानी उत्तर-पूर्वी तक। भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में किस प्रकार असमानताएं हैं उन सभी बिंदुओं को उन्होंने श्रोताओं तक प्रेषित किया। बीच-बीच में उनका अंग्रेज़ी बोलना इस बात की ओर इशारा कर रहा था कि हिंदी पढ़ने-लिखने वालों को भी कामचलाव अंग्रेज़ी आनी ही चाहिए।

    इसके बाद आवाज़ दी गई प्रो० फ़िरदौस अजमत सिद्दीकी को। उन्होंने आते के साथ साल 1949 की क्रांतिकारी पुस्तक ‘The Second Sex’ की पंक्तियाँ कह डालीं। पंक्तियाँ तो आपने सुन रखी होंगी। फ़िर भी बता ही देता हूँ।  “One is not Born but rather becomes a WOMEN” इसी कड़ी में उन्होंने जे०एस० मील की पुस्तक ‘The Subjection of Women’ का हवाला देते हुए पूरे वक्तव्य को East और West की धुरी पर घुमाए रखा। फ़िर उन्होंने बड़ी तेज़ी से कहा कि “मुझे यानी स्त्रियों को को कोई नहीं सिखाए कि हमें क्या करना है और क्या नहीं?” उनका बोलने का लहजा तो वाकई में लाजवाब था। हालांकि प्रश्नोत्तर-सत्र में उनमें बड़ी हड़बड़ाहट दिखी और ठीक-ठीक उत्तर भी नहीं दे पा रहीं थीं। एक और वाक्य उन्होंने कहा कि “क्या मुस्लिम औरत जानवर हैं?”
    लेकिन जवाब देने के क्रम में वो धर्म के सवालों का जवाब देने से कतरा रहीं थीं। अब ये क्या बात हुई एक ओर प्रहार वहीं दूसरी ओर बचाव!

    अब मौक़ा था अंतिम वक्ता यानी प्रो० गोमती बोदरा हेमब्रोम को सुनने का। उनकी बातों को उद्धृत करने से पूर्व अर्ज़ करता चलूं कि उन्होंने बड़े सलीके से ‘समाजशास्त्रीय’ परिप्रेक्ष्य को चुना और बख़ूबी निभाया भी। उनके वक्तव्य को सुनकर लग रहा था कि वे पूरी तैयारी के साथ आईं हैं। उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से एक-एक बिंदुओं को काफ़ी स्पष्टता के साथ रखा। जल, जंगल और ज़मीन की बातें की। उन्होंने वर्तमान में दो देशों के मध्य चल रहे युद्ध का हवाला देते हुए बड़ी प्यारी बात कही कि “युद्ध में महिलाओं का ही सबसे अधिक नुकसान होता है।”
    इसका जीता-जागता उदाहरण है हाल में 165 बच्चियों का नरसंहार। अपनी बातों को ख़त्म करते हुए उन्होंने जसिंता केरकेट्टा की कविता ‘नदी पहाड़ और बाज़ार’ का पाठ किया।

    अब तक तीनों वक्ताओं ने अपनी-अपनी बातों को रख दिया था। समय आ चुका था अध्यक्षता कर रहीं प्रो० हेमलता महिश्वर को सुनने का। प्रो० हेमलता जी ने सभी आमंत्रित वक्ताओं का आभार प्रकट किया कि आपने इस चर्चा में शामिल होने की अनुमति दी। अपने वक्तव्य में उन्होंने हर एक वक्ता की एक-एक बातों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्त्री आंदोलन की सबसे पहली सामूहिक आवाज उठाने वाली महाप्रजापति गौतमी का उल्लेख किया। साथ ही बताया कि किस प्रकार उन्होंने गौतम बुद्ध से भिक्षुणियों को संघ प्रवेश करने का रास्ता खोला। तत्पश्चात् गौतम बुद्ध को उनका अधिकार देना पड़ा। उन्होंने आगे कहा कि “थेरी का मतलब ही महान् है।” उन्होंने दलित स्त्रियों के संदर्भ में कई बातें बताईं। एक बात वे बड़ी पुष्टि के साथ बोलीं कि “दलित स्त्रियों की आवाज़ ने देश को ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाया है।” बीच-बीच में उन्होंने नारीवादी चरणों (Feminist Waves) का भी उल्लेख किया।
    बतौर अध्यक्ष के रूप में प्रो० हेमलता जी विषय पर एकदम टिकी रहीं। उनकी बातों में कहीं भी विषयांतर नहीं दिखा।

    अब परिचर्चा अपने अंतिम कगार पर थी। धन्यवाद ज्ञापन के लिए प्रो० दिलीप शाक्य को मंच दे दिया गया। उन्होंने सारी औपचारिकताएं निभाई। उन्होंने श्रोताओं के लिए श्रोताओं से हीं तालियां बजवाई जो एक नया प्रयोग दिखा।

    चलते-चलते ये बताता चलूं कि पूरे दो घंटे की परिचर्चा में ख़ूब कविताएं और अशआर पढ़े गए जिसने माहौल को साहित्यिक बनाए रखा।

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