आज पढ़िए अर्पण कुमार की कविताएँ। अर्पण पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लिखते हैं। नियमित कविताएँ भी लिखते हैं। उनकी कविताओं के विषय, उनकी शैली समकालीन कविता से नितांत भिन्न है। यहाँ उनकी कुछ कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर
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विश्वास अपना-अपना
कोई फेंक देता है सरे राह
आत्मीयता से दिए कंचे
जानकर उसे काँच की गोली मात्र,
स्नेह-पगे उन्हीं अंटों को
कोई मान देता है इतना
कि उसकी क्रिस्टल चमक
कुछ अधिक आबदार हो उठती है
बसा अपनी आँखों में आजीवन जिसे
वह धन्य समझता है स्वयं को
प्रदत्त में पाई
किसी ने तुच्छता
प्रदत्त में की
किसी ने प्राण-प्रतिष्ठा।
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थोड़ा वर्सेटाइल
मुख्य धारा से बढ़ते अलगाव में
नमी पीते, धूल फाँकते एकांत में
रिस रहा हूँ, पीला पड़ रहा हूँ
ख़ूब रौंदे गए जूते के टूटे तल्ले-सा
निस्पंदता, सन्नाटे के घूँट उतारता
तड़प रहा हूँ, नीला पड़ रहा हूँ
अप्रासंगिक होते जाने की नियति
है देर-सवेर
हर पथिक के हिस्से
सहना बारी-बारी जिसे;
अंत की ओर अग्रसर निष्पत्ति-
है यही हर निर्माण का सच
वक़्त की आँच में पिघलता
अमरता का हर लालच
तन्हाई में डूबते चले जाने से
बचने का उपाय
संस्था स्वयं बन जाने
या किसी संस्था के साथ
जुड़ जाने में है क्या!
मूँद अपनी आँखें
किनारे रख अपनी दलीलें
किसी विचारधारा के पीछे
झंडा उठानेवालों की जमात में
हो शामिल
हर ओर शोर से भरा जीवन
स्वीकार्य है क्या!
इस निराशा से बचने की दवा
हमारी उस सोच के सिरहाने तो नहीं रखी
जो लीक से परे
हमें चलने को है कहे
और कोई अपथ यूँ सुपथ बने
अँधेरा है अगर हमारे हिस्से फ़िलहाल
क्यों न हो
उसका भी भरपूर अभिनंदन
रोशनी ही क्यों रहे प्रेमिका अपनी हरदम!
हम मरे जा रहे
जिनके लाइक्स, समर्थन के लिए
अपना हर कौशल
जुगाड़ में झोंकने को हैं तत्पर,
महज कोई आमंत्रण पा लेने निमित्त
जिनसे हो रहा रोज़ तर्क-वितर्क
निरर्थक
उन स्वजनों, समानधर्मियों की
तयशुदा, छोटी परिधि से निकल बाहर
हम क्यों न फैलाएँ
अपनी बाँहें समुत्सुक
बाक़ी दुनिया की तरफ़,
बाक़ी दुनिया की तरह
क्यों न पालें कुछ अतरंगी शौक़
ठहरी, ठंडी दिनचर्या में
क्यों न लगाएँ कुछ छौंक!
क्यों न करें काम कुछ ऐसे
अब तक दूर-दूर रहे जिनसे
क्यों न सीखें
हम नए-नए करतब
क्यों न बनें थोड़ा वर्सेटाइल
छवि खंडित होती हो
हो
क्यों न अपनाएँ
कोई फ़िल्मी स्टाइल
मुर्झाने से पहले क्यों मुर्झाएँ
क्यों न कमाएँ थोड़ी-सी स्माइल!
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बचा ले जाओगे
अगर नहीं वह तुम्हारे साथ
तो यह संसार चाहे तुम्हें
सुंदर कम लगे, सुखकर कम लगे
मगर बेकार तो नहीं
ज़िंदगी यह
जेल की लंबी
कोई दीवार तो नहीं
प्यार नहीं मिला मनोवांछित
न सही,
निराशा होती रही संचित
बेशक सच यही
मगर इसमें क्यों हो डूब मरने वाली बात
हर्षोल्लास से हरदम मुकरते रहने की हालत
डूबने को लेकर आए तो आए यह भाव कि
तुम डूबते चले जाओ
प्रकृति की अनंत रचनावलियों में
जिनमें से कई छीज-छीजकर भी
समोए हैं अभी
सौंदर्य का लालित्य स्वयं में
निहारो उनकी भव्यता, विराटता निर्निमेष
माँगो दुआ कि
तुम्हारी दृष्टि दूर-दूर तक रहे अबाधित
प्रवहमान अंतरिक्ष में
मुक्त किसी आदि, अंत से
तुम विचरो अनंत में
चाहत का तुम्हारा पक्ष
क्यों न हो ऐसा उदात्त
कि पाला तुम्हें जिस माहौल ने
परिसंवाद कभी परिहास होता रहे
तुम्हारा उस परिवेश से
कि जितनी आकाशगंगाएँ आईं
तुम्हारी गणनाओं में,
तुम्हारी कल्पनाओं में
तुम हो अहं-शून्य,
बना विनम्रता को मूल्य
फैलते जाओ उन तक
तुम बड़े नहीं हो सकते इससे
(किसी महाकार की मनोकामना हो भी क्योंकर!)
मगर, निरंतर चहुँओर फैलते इस ब्रह्मांड के
तुम नन्हें, सचल हिस्सेदार
ज़रूर बन सकते हो
विखंडित होकर कोई नाभिक
टूटता है ज्यों हल्के नाभिकों में
उत्सर्जित होती जिससे अथाह ऊर्जा
प्रकाशमान होता जिससे कोना, कोना
तुम तब प्यार के अभाव वाले नहीं
प्यार से लगाव वाले गीत गाओगे
तुम तब टूटकर
उत्पन्न कर लोगे ऊर्जा
बिखरेगी रोशनी,
फैला सकोगे स्वयं को
देश-देशांतर तक
बचा ले जाओगे स्वयं को
पीढ़ियों तक।
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क्यों मेरे सहचर!
किन क्षणों में है दिखता
तुम्हें अपने लिए
मेरा अभिन्न सरोकार
किन क्षणों में है दिखती
मेरी जानलेवा नज़रअंदाज़ी
तुम्हें लेकर मेरे सरकार!
किन क्षणों में तुमपर
गिरती बिजली टूटकर
किन क्षणों में मैं हूँ होता
तुम्हारी नफ़रतों का शिकार
निःसंकोच बताओ मित्रवर!
आरोप लगाने भर से क्या
आरोप सिद्ध करो प्रियवर।
मूड्स तुम्हारे स्विंग करें
गुनहगार मैं बनूँ
मुझपर ऐसा अत्याचार
क्यों मेरे सहचर!
कब तक मेरे मनोहर!!
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प्रेम से छत्तीस का आँकड़ा
प्यार में हमारे
सौ में सौ नंबर
कभी नहीं दिए उसने स्वयं को
संभव होता अगर
वह काट लेता मेरे भी कुछ अंक
मगर इस इश्क़ में जितनी कुर्बानियाँ
मैं सहती हूँ आई
चोटें, तानें जितनें हूँ खायी
अपमान की लू सहे मैंने सालों-साल
वह चाहकर
दशमलव में भी मेरे अंक
काट नहीं सकता
आर्यभट्ट की कर्मभूमि पर पला-बढ़ा
वह है तो आख़िर पक्का ही
हिसाब का
वह रहा है मेरा सहपाठी
गणित सहित कई विषयों में
लाता रहा सौ में सौ नंबर
प्रेम में उसे फिर क्या हुआ
कि वह हुआ फ़ेल
मोहब्बत का किसी मेधावी के साथ
छत्तीस का आँकड़ा तो नहीं!
महत्त्वाकांक्षा का समर्पण के साथ
चल रहा झगड़ा तो नहीं!
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