प्रसिद्ध लेखक आनंद नीलकंठन की किताब ‘अजेय: दुर्योधन की महाभारत’। यह किताब महाभारत के खलनायक समझे जाने वाले दुर्योधन के नज़रिए से लिखी गई है। यानी महाभारत की कथा दुर्योधन के नज़रिए से। यह कथा उन्होंने क्यों लिखी इसके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। आइये मंजुल प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब की भूमिका पढ़ते हैं। अनुवाद किया है रचना भोला ‘यामिनी’ ने- मॉडरेटर
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अनेक वर्ष पूर्व, मैं एक ऐसे कौतुकपूर्ण दृश्य का साक्षी रहा था, जिसे अनेक पाठकों ने देखना तो दूर रहा, उसके बारे में कभी सुना तक नहीं होगा। यह एक महान समारोह का दिवस था। यहाँ तक कि सिरों पर चमकते सूर्य की रौद्र व प्रखर किरणें भी वहाँ व्याप्त उत्सव की भावना को घटा नहीं सकीं। वहाँ एक लाख से भी अधिक व्यक्ति शोभायात्रा देखने तथा मंदिर के इष्ट देव के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए एकत्र हुए थे। वे भक्तगण सभी जातियों तथा संप्रदायों से थे और उनका उत्साह मंत्रमुग्ध करने के लिए पर्याप्त था। यह बात बहुत ही विचित्र थी, कि वह भव्य उत्सव जिस व्यक्ति के सम्मान में मनाया जा रहा था, मेरा यही मानना था कि यदि कोई उसके प्रशंसक थे भी, तो बहुत ही कम लोग रहे होंगे। केरल के पोरूवज्जी ग्राम के मालंद मंदिर, के इष्ट देव और कोई नहीं अपितु भारतीय पौराणिक गाथाओं का सर्वाधिक धिक्कारा जाने वाला खलनायक दुर्योधन है। यदि उन भक्तों की बातों पर विश्वास किया जाए तो इस शोभायात्रा की परंपरा, सदियों पूर्व, महाभारत के काल से ही चली आ रही है।
इस मंदिर के साथ एक बहुत ही रोचक कथा जुड़ी है: जब पांडव वनवास में थे तो दुर्योधन उनकी तलाश में यहाँ आया था। प्यास लगने पर, उसने एक वृद्धा से जल माँगा। उसने अधीरतापूर्वक, उसे वह ताड़ी ही पिला दी, जिसे वह अपने साथ ले जा रही थी। प्यासे राजकुमार ने उसे बड़े ही आनंद से पीया और प्यास मिटा ली। तभी उस स्त्री ने लक्ष्य किया कि वह एक क्षत्रिय योद्धा था और उसके जैसी अस्पृश्य कुरथी स्त्री द्वारा परोसी गई ताड़ी पीने से, उसकी जाति जा सकती थी। वह स्त्री अपने किए पर भयभीत हो उठी, उसे निश्चित रूप से पता था कि ज्यों ही क्षत्रिय को सत्यता का पता चलेगा वह उसे मृत्यु के घाट उतार देगा। यद्यपि, वह किसी ऐसे व्यक्ति के साथ छल नहीं करना चाहती थी, जिसने उस पर विश्वास किया था अत: उसने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए, अपना अपराध कबूल कर लिया। वह किसी निश्चित दंड के लिए प्रतीक्षा करती रही परंतु दुर्योधन की प्रतिक्रिया ने उसे आश्चर्य मे डाल दिया। उसने कहा, “माता! भूखे व प्यासे के लिए जाति के नियम कोई मायने नहीं रखते। तुम धन्य हो कि तुमने अपनी सुरक्षा को परे रखते हुए, एक प्यासे के हित को आगे रखा। उसकी प्यास बुझाई।”
ग्रामीण जन ऐसे उच्च जाति में जन्मे व्यक्ति को देखने के लिए उमड़ पड़े जो कि उन घमंडी उच्चवर्गीय लोगों से बिल्कुल ही भिन्न था, जो केवल उन्हें दंड देने अथवा उनसे कीट-पतंगों की तरह पेश आने के लिए ही आते थे। हस्तिनापुर के राजकुमार ने घोषणा की कि वह एक मंदिर को आसपास स्थित ग्राम उपहार में दे रहा था, जो कि वहाँ निर्मित किया जाना था परंतु उसमें कोई प्रतिमा नहीं होगी। एक कुर्व अछूत उसका पुरोहित होगा। आज भी, उस बूढ़ी स्त्री के परिवार के व्यक्ति ही पैतृक रूप से उस मंदिर के पुरोहित बनते आ रहे हैं, जिसमें कोई प्रतिमा अथवा मूर्ति नहीं है। इसकी बजाए, दुर्योधन वहाँ का इष्ट देवता है। इसके अतिरिक्त उसकी पत्नी भानुमती, माता गांधारी व मित्र कर्ण को भी उपदेवों के रूप में पूजा जाता है। साधारण रूप से मान्यता यही है कि वहाँ दुर्योधन की आत्मा का वास है जो दरिद्रों तथा निर्बलों की रक्षा करती है। वह निराश्रितों की प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। रोगी, निर्धन या अपने से किसी बलशाली द्वारा सताए गए व्यक्ति भी अपनी प्रार्थनाओं का फल पाते हैं। यह इष्ट दुर्बल व शोषितों का संरक्षक है।
पहले-पहल इस कथा को सुनते ही मेरी प्रतिक्रिया अविश्वास के रूप में प्रकट हुई। देश की उत्तरी सीमा पर स्थित हस्तिनापुर राज्य का राजकुमार, इतनी लंबी यात्रा करके, भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित ग्राम में क्योंकर आया होगा? उसने हजारों वर्ष पूर्व – लगभग तीन हजार किलोमीटर की यह दूरी क्यों तय की होगी? मेरे प्रश्न का उत्तर, मेरे मुख पर पड़े किसी तमाचे से कम नहीं था। ग्रामीण ने मुझसे प्रतिप्रश्न किया कि आदि शंकराचार्य ने मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में केरल के एक ग्राम से, बदरीनाथ व केदारनाथ तक; अनेक बार यात्रा क्यों की होगी? यह सुन कर मैंने निर्णय लिया कि घर जाते ही उस महाभारत का पुन: पठन करूंगा, वह एक ऐसा महाकाव्य है जो असंख्य लेखकों को सदियों से प्रेरित करता आया है। जब मैंने एक बार कौरवों के राजकुमार को पोरुवज्जी ग्राम के नागरिकों की दृष्टि से देखना आरंभ किया तो दुर्योधन की एक विभिन्न छवि ही उभर कर सामने आने लगी – यह तो उस षड़यंत्रकारी, गरजने वाले, लोकप्रिय टी वी. धारावाहिक के दंभी खलनायक तथा पारंपरिक गाथाओं के खलनायक से कहीं परे थी। उनकी बजाए, यहाँ तो एक निर्दयता की सीमा तक ईमानदार, वीर व पराक्रम, स्वाभिमानी तथा अपनी मान्यताओं के लिए लड़ने वाला राजकुमार सामने खड़ा था। दुर्योधन ने कभी अपने चचेरे भाईयों के दैवीय मूल के दावे को नहीं स्वीकारा; यदि आधुनिक मस्तिष्कों की बात करें तो पांडवों का वह विचित्र दावा ठीक वैसा ही जान पड़ता है जैसा कि वर्तमान में भोली-भाली अबोध जनता को मूर्ख बनाने के लिए राजनीतिक प्रचार के रूप में प्रयुक्त होता है।
जब दुर्योधन, अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण क्षणों में से एक में, अपनी जाति के कारण तिरस्कृत हो रहे कर्ण को अंग देश का राजा बना देता है तो उसका अपना व्यक्तित्व भी जीवंत हो उठता है। कौरव राजकुमार एक सूत को राजा बना कर, रूढ़िवादिता को खुलेआम चुनौती देता है और इसके पीछे उसका अपना कोई स्वार्थ भी निहित नहीं है। उसका एकलव्य के प्रति व्यवहार; सुभद्रा को पाने के लिए लड़ने से इंकार; पांडवों से लोहा लेने में उसका साहस और अपने मित्रों पर उसका अखंड विश्वास ही; उसे एक निंदनीय खलनायक की अपेक्षा एक नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वह कभी द्रौपदी के प्रति अपने व्यवहार की सफ़ाई देने का प्रयत्न नहीं करता। उसके यह दोष ही उसे अधिक मनुष्य तथा विश्वसनीय बनाते हैं। वह उन नायकों में से नहीं जो अपने कृत्यों की सफ़ाई देने के लिए स्वयं को धर्म, चमत्कारों व दिव्यता के आवरण में छिपा लेते हैं। पांडवों तथा कृष्ण के कृत्यों की प्रशंसा में अनेक बृह्त ग्रंथ लिखे गए हैं। कर्ण व द्रौपदी के विषय में भी बहुत अच्छी पुस्तकें उपलब्ध हैं। भीम, अर्जुन व कुंती के विषय में भी मातृभाषा में अनेक साहित्यिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। यद्यपि, केवल उरूभंग ही इनका अपवाद है, यह नाटक शास्त्रीय संस्कृत में भास द्वारा लिखित है; जो कि दुर्योधन के जीवन के अंतिम क्षणों को रूपायित करता है। इसके अतिरिक्त मध्ययुगीन कन्नड कवि रान के गदायुद्ध का भी नाम लिया जा सकता है। किसी भी अन्य लेखक ने हस्तिनापुर के राजकुमार के प्रति सहानुभूतिपरक दृष्टिकोण नहीं दिखाया है।
एक ऐसा प्रयास है जिसमें युद्ध में परास्त होने वाले पक्ष के दृष्टिकोण को सामने रखने का प्रयत्न किया गया है। दुर्योधन के नाम का एक अर्थ यह भी निकलता है कि ‘ऐसा व्यक्ति जिस पर विजय प्राप्त करना कठिन हो,’ दूसरे शब्दों में ऐसा व्यक्ति अजेय “ (जिसे जीता न जा सके) कहलाता है। यद्यपि उसका नाम सुयोधन था, परंतु पांडवों ने उसे नीचा दिखाने के लिए, उसके नाम के आगे ‘सु’ के स्थान पर ‘दु’ शब्द का प्रयोग करना आरंभ कर दिया अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसे अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग नहीं करना आता। दुर्योधन की इस कथा में कर्ण, अश्वत्थामा, एकलव्य, भीष्म, द्रोण, शकुनि तथा और भी अनेक पात्र सम्मिलित हैं। यह उन सबकी भी कथा है – जो पराजित, अपमानित व कुचले हुए थे – जो किसी भी दैवीय मध्यस्थता की अपेक्षा के बिना लड़े; सदा अपने काज व उद्देश्य के न्याय पर ही विश्वास किया। संभवत: अजेय ही मेरा उस ग्रामीण के लिए विलंबित उत्तर है, जिसने मुझे उस उमस से भरी दोपहरी में अपने उस सादे से प्रश्न से स्तंभित कर दिया था, जब सुयोधन के सम्मान में निकल रही वह शोभायात्रा, पोरूवज्जी के हरे-भरे धान के खेतों से निकल कर जा रही थी: यदि हमारे इष्ट दुर्योधन एक दुष्ट व्यक्ति थे तो भीष्म, द्रोण, कृपा जैसे महान व्यक्तियों तथा कृष्ण की संपूर्ण सेना ने, उनकी ओर से युद्ध क्यों लड़ा?
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