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  • सविता सिंह और सिल्विया प्लाथ की कविता में अस्तित्व का जादुई यथार्थ

    प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह की एक कविता ‘सपने और तितलियाँ’ पर यह विश्लेषणात्मक टिप्पणी लिखी है हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और आलोचक रवि रंजन ने। इस टिप्पणी को पढ़कर कविता की व्याख्या सीखी जा सकती है। मूल कविता भी संलग्न है। आप चाहें तो पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    सविता सिंह समकालीन हिंदी कविता की एक ऐसी प्रखर आवाज़ हैं, जिन्होंने स्त्री-अस्तित्व, समय के दर्शन और मनोदैहिक संवेदनाओं को बड़ी सूक्ष्मता से अपनी रचनाओं में पिरोया है। उनकी कविता में स्त्री केवल एक ‘विषय’ बनकर नहीं आती, बल्कि वह सृष्टि, बोध और कर्म का मुख्य आधार बन जाती है। अपने जैसा जीवन‘, ‘नींद थी और रात थी‘, ‘स्वप्न समय‘, ‘प्रेम भी एक यातना है’, ‘खोई हुई चीज़ों का शोकऔर वासना एक नदी का नाम है जैसे उनके कविता-संग्रहों ने न केवल साहित्य जगत में अपनी जगह बनाई, बल्कि आधुनिक स्त्री-चेतना के स्वरूप को भी बदलने का काम किया है।

    रचनात्मक उपलब्धियों के साथ-साथ, शिक्षा और बौद्धिक जगत में भी उनका योगदान बेहद अहम रहा है। इग्नू के ‘स्कूल ऑफ जेंडर स्टडीज’ की संस्थापक-निदेशक और प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अकादमिक सिद्धांतों और समाज की कठोर सच्चाइयों के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण किया है और स्त्री-विमर्श को केवल किताबी बहसों तक सीमित न रखकर, उसे जीवन के व्यावहारिक और सांस्कृतिक अनुभवों से जोड़ा है।

    उनकी ‘सपने और तितलियाँ’ कविता समकालीन हिंदी कविता की उन विरल रचनाओं में से है, जिनमें प्रेम, स्मृति, स्वप्न, भय, मृत्यु और इतिहास की हिंसा एक-दूसरे से इस गहराई से गुंथ जाते हैं कि कविता किसी एक स्थिर अर्थ, अनुभव या संवेदना में सीमित नहीं रह जाती। यह कविता केवल प्रेम का आख्यान नहीं है, बल्कि प्रेम के भीतर सक्रिय उस अंधेरे और रहस्यमय क्षेत्र की खोज भी है जहाँ स्मृतियाँ स्वप्नों का रूप ले लेती हैं, मृत लोग लौट आते हैं, और बीता हुआ समय वर्तमान की चेतना में लगातार हस्तक्षेप करता रहता है। कविता का पूरा विन्यास ऐसा प्रतीत होता है मानो हम किसी अवचेतन प्रदेश में प्रवेश कर रहे हों, जहाँ दृश्य यथार्थ के नियमों से नहीं, बल्कि स्मृति, इच्छा, आघात और भय की अदृश्य संरचनाओं से संचालित होते हैं। यही कारण है कि इस कविता का मनोविश्लेषणात्मक पाठ बेहद चुनौतीपूर्ण किंतु अत्यंत सार्थक और संभावनाशील बन जाता है।

    परम्परा से प्राप्त आलोचनात्मक मुहावरे में कहें तो ‘सपने और तितलियाँ’ महाकाव्यात्मक विस्तार और गीतिकाव्यात्मक सघनता का एक अनूठा संगम है। यद्यपि इसका बाहरी ढांचा एक लम्बी आख्यानात्मक कविता का है, जिसमें समय की सदियों पुरानी यात्रा, युद्ध, आखेट और जन्म-जन्मांतर की स्मृतियाँ एक वृहत्तर फलक पर फैली हुई हैं, किंतु इसका अंतःस्वर पूरी तरह गीतिकाव्यात्मक (Lyrical) है। कविता का मूल मनोराग वैयक्तिक पीड़ा, प्रेम की सूक्ष्म तरंगों और स्मृतियों के स्पंदन से निर्मित है, जहाँ एक स्वप्निल संसार के भीतर कवयित्री अपनी आदिम और वर्तमान अस्मिता के बीच के द्वंद्व को स्वर देती हैं। महाकाव्य की तरह यहाँ भी जीवन-मृत्यु और नियति के बड़े प्रश्न मौजूद हैं, लेकिन उनका समाधान किसी बाहरी वीरता में नहीं, बल्कि आंतरिक भाव-भूमि पर ‘शोक’ के ‘श्लोक’ में बदल जाने की प्रक्रिया में निहित है। कविता का कथानक एक स्वप्न से शुरू होकर स्मृति के उस महाख्यान तक जाता है जहाँ ‘रक्त की उफनती नदी’ और ‘तितलियों के रहस्य’ साथ-साथ चलते हैं, जो इसे एक महाकाव्यात्मक गरिमा प्रदान करता है।

    गीतिकाव्यात्मकता का वैभव इस कविता में तब और गहरा हो जाता है जब कोमल बिम्ब अचानक कठोर यथार्थ और यातना के हमशक्लों में बदलने लगते हैं। जिस तरह सिल्विया प्लाथ के यहाँ पितृसत्तात्मक दमन और वैयक्तिक पीड़ा एक भयावह अजीबोगरीब अनुभव (अनकैनी) रूप में लौटती है, उसी तरह सविता सिंह की यह रचना प्रेम के तिलिस्म और उसके भीतर बहती रक्त की नदी को अनावृत करती है। यहाँ ‘तितलियाँ’ और ‘चुम्बन’ केवल रोमानी संकेत नहीं हैं, बल्कि वे उस जटिल देह की राजनीति और ऐतिहासिक पीड़ा के गवाह हैं, जहाँ रति-क्रीड़ा का ‘उद्दाम श्रृंगार’ स्त्री के लिए अस्तित्व का संकट बन जाता है। अंततः, यह कविता महाकाव्यात्मक शिल्प का सहारा लेकर उस गीतिकाव्यात्मक सत्य तक पहुँचती है, जहाँ प्रिय की यादों की हिफाजत करना और खोई हुई चीजों का शोक मनाना ही जीवन को जीवंत बनाए रखने की एकमात्र शर्त बन जाती है। इस प्रकार, ‘सपने और तितलियाँ’ अपने फैलाव में जितनी विशाल है, अपनी संवेदना में उतनी ही गहरी और आत्मनिष्ठ है।

    किन्तु, इस बहुस्तरीय रचना के बारे में बस इतना कह देना पर्याप्त नहीं है । वजह यह कि रचनात्मक अभिप्राय एवं प्रभाव की दृष्टि से ‘सपने और तितलियाँ’ राजनीति में विजय-पराजय के प्रचलित पितृसत्तात्मक मुहावरों की मुखालफ़त करती एक श्रेष्ठ कलात्मक युद्ध-विरोधी कविता भी है ।

    कविता का आरंभ एक स्वप्न से होता है, किंतु यह स्वप्न केवल निद्रा का दृश्य नहीं, बल्कि चेतना की गहरी तहों में दबे हुए अनुभवों की वापसी है। जंगल, नदी, घोड़ा, रक्त, मृत देह और तितलियाँ—ये सभी बिंब किसी प्रत्यक्ष यथार्थ से अधिक अवचेतन की प्रतीक-भाषा के रूप में उपस्थित होते हैं। स्त्री का बार-बार भागना, घोड़े पर सवार पुरुष का उसका पीछा करना, अतीत की हिंसक स्मृतियों का अचानक लौट आना, और अंततः प्रेमी तथा शिकारी की छवियों का एक-दूसरे में घुल जाना—ये सब मिलकर उस जटिल मानसिक संरचना को उद्घाटित करते हैं जिसमें प्रेम और भय, आकर्षण और आघात, स्मृति और इच्छा अलग-अलग नहीं रह जाते। इस दृष्टि से कविता फ्रायड की ‘स्वप्न-सिद्धि’ तथा दबी हुई स्मृतियों की वापसी संबंधी अवधारणाओं की याद दिलाती है, जहाँ स्वप्न अवचेतन की सांकेतिक अभिव्यक्ति बन जाता है। इसी प्रकार जुंग (Carl Gustav Jung) के ‘सामूहिक अवचेतन’ और ‘आद्य-प्रतीकों’ (Archetypes) के सिद्धांत भी कविता को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं, क्योंकि कविता के अधिकांश दृश्य और प्रतीक किसी व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर मानव-चेतना की आदिम स्मृतियों से जुड़े हुए हैं।

    कविता का सबसे जटिल पक्ष यह है कि यहाँ प्रेम किसी रोमानी मुक्ति का क्षेत्र नहीं है। जादुई यथार्थवाद के शिल्प में रचित इस कृति में प्रेम के भीतर रक्त की नदी बहती है, मृत्यु उपस्थित रहती है, और स्मृति एक यातना की तरह चेतना को घेरे रहती है। तितलियाँ चुंबनों का रूप लेती हैं, लेकिन वही तितलियाँ बाद में मृत्यु और क्षरण का संकेत भी बन जाती हैं। इस प्रकार यह कविता प्रेम के उस पारंपरिक मिथक को तोड़ती है जिसमें उसे केवल सौंदर्य, आत्मीयता और समर्पण की भावना के रूप में देखा जाता रहा है। यहाँ प्रेम अपने भीतर हिंसा, स्वामित्व, अभाव और खोने के भय को भी समेटे हुए है। यही जटिलता कविता को आधुनिक मनुष्य की गहरी मानसिक और अस्तित्वगत विडंबनाओं से जोड़ती है।

    इस रचना का स्वप्निल और दृश्यात्मक विन्यास भी गौरतलब है। यह किसी रैखिक कथा की तरह विकसित नहीं होती; स्मृतियाँ अचानक लौटती हैं, समय टूटता-बिखरता है, और दृश्य एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। इस कारण कविता का अनुभव किसी स्वप्न, फिल्म या अवचेतन की मुक्त प्रवाहमान चेतना जैसा बन जाता है। पाठ के बीच “याद करो / याद करो” जैसी आवृत्तियाँ सम्मोहक प्रभाव उत्पन्न करती हैं और पाठक को कविता के मानसिक परिदृश्य में और गहरे ले जाती हैं। यही शैलीगत संरचना कविता को मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन के लिए और अधिक महत्त्वपूर्ण बना देती है, क्योंकि इसका रूप स्वयं अवचेतन की कार्यप्रणाली का अनुकरण करता प्रतीत होता है।

    बोर्खेज़ (Jorge Luis Borges) की “जादुई किताब” का संदर्भ कविता को एक और गहरा आयाम प्रदान करता है। वह किताब स्मृति, समय और खोए हुए अनुभवों की अपरिवर्तनीयता का रूपक बन जाती है, जिसके पन्ने एक बार पढ़े जाने के बाद दोबारा नहीं मिलते। कविता बार-बार उस खोई हुई चीज़ की तलाश करती है जिसे पूरी तरह वापस नहीं पाया जा सकता। यही खोज स्मृति को स्वप्न में और स्वप्न को कला में रूपांतरित करती है। इस अर्थ में ‘सपने और तितलियाँ’ केवल प्रेम और स्मृति की कविता नहीं, बल्कि मनुष्य की उस गहरी मानसिक आवश्यकता की भी कविता है जिसके माध्यम से वह अपने खोए हुए अनुभवों, संबंधों और संवेदनाओं को भाषा में सुरक्षित रखने की कोशिश करता है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ का मनोविश्लेषणात्मक विवेचन करने पर इसका रचना-संसार बाहरी घटनाओं से अधिक आंतरिक अनुभवों का संसार मालूम पड़ता है। यहाँ अवचेतन की छायाएँ, दबी हुई स्मृतियाँ, आघात की पुनरावृत्ति, प्रेम की विडंबनाएँ और इच्छा की अस्थिर संरचनाएँ लगातार सक्रिय हैं। कविता हमें यह महसूस कराती है कि मनुष्य का मन केवल वर्तमान में नहीं जीता; वह स्मृतियों, भय, इच्छाओं और अधूरी आकांक्षाओं के जटिल तिलिस्म में निरंतर भटकता रहता है। ‘सपने और तितलियाँ’ इसी तिलिस्म की एक विलक्षण काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

    यह आलेख ‘सपने और तितलियाँ’ कविता के ज़रिए इतिहास में प्राय: दर्ज़ न की गयी हिंसा और  स्त्री की आंतरिक पीड़ा को लेकर सविता सिंह द्वारा रचित काव्यात्मक प्रतिरोध की पड़ताल करता है। सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ के साथ सिल्विया प्लाथ की दो कालजयी कविताओं ‘डैडी’ एवं ‘लेडी लाजरस’ को एक धरातल पर रखकर यह विश्लेषण दिखाता है कि कैसे स्त्री का अवचेतन मन एक ‘स्वप्निल बुनावट’ (dream-film aesthetic) के माध्यम से अपनी खोई हुई शक्ति और पहचान को वापस पाता है। इस विमर्श को और समृद्ध करने के लिए जहाँ एक ओर अश्वघोष, कालिदास और भवभूति सरीखे महाकवियों का सहारा लिया गया है, वहीं दूसरी ओर फ्रायड, लाकाँ (Lacan), जूलिया क्रिस्टेवा और देरिदा आदि के आधुनिक सिद्धांतों के आलोक में भी इसे देखने की कोशिश की गई है।

    आलेख में नोबेल पुरस्कार विजेता स्वेतलाना अलेक्सिएविच की कृति ‘द अनवुमनली फेस ऑफ वॉर’ का मार्मिक संदर्भ देते हुए युद्ध के दौर में स्त्रियों के उस ‘लंबे इंतज़ार’ और स्मृतियों के भारी बोझ को रेखांकित किया गया है, जो पुरुषों के अनुभव से एकदम भिन्न है। यहाँ प्रेम और स्मृतियाँ केवल रूमानी पनाहगाह नहीं हैं, बल्कि वे औरत के वजूद को दांव पर लगा देने वाले ऐसे मोर्चे हैं जहाँ ‘वीभत्स’ (रक्त, क्षत-विक्षत शरीर और लाशें) को जादुई यथार्थवाद के माध्यम से एक सशक्त प्रतीकात्मक भाषा में बदल दिया जाता है।

    अंततः, यह विश्लेषण स्थापित करता है कि कैसे सविता सिंह और सिल्विया प्लाथ, दोनों कवयित्रियाँ स्मृतियों की उथल-पुथल और ‘रक्त की नदी’ या ‘मरती हुई तितलियों’ जैसे मिथकीय प्रतीकों का उपयोग करती हैं। ऐसा करके वे पितृसत्तात्मक मूल्यों के तहत जारी युद्धों की विनाशलीला और समय की क्रूरता के खिलाफ स्त्री-इतिहास की एक निजी और सुरक्षित दुनिया रचती हैं।

    कविता का मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है:

    सपने और तितलियाँ

    एक लंबे सपने का यह छोटा हिस्सा है

    इसमें मैं बेदम भाग रही हूँ

    देखती हूँ एक घने जंगल में हूँ

    पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त

    जंगल के जीवों के बीच निर्भय

    उनके प्रलापों से अवगत

    इधर-उधर घूमती पास की नदी तक जाती

    बैठती किसी पुराने पत्थर पर

    तभी आता है कोई घोड़े पर सवार

    पास उतरता है मेरे

    फिर कहता है ढूँढ़ता रहा है वह कई जन्मों से मुझे

    कि मेरे पास उसके कुछ फल और नदियाँ हैं

    कि वह भूखा और प्यासा है

    पीने आया है अपने हिस्से का जल मुझमें

    मैं हतप्रभ हूँ

    वह नितांत अपरिचित

    उसके चेहरे पर कोई कोमलता नहीं

    समीप आने पर चेचक के दाग़ दिखते हैं उस पर

    आँखों में कठोर प्रतिज्ञा मुझे पाने की

    मुझे घबराया देख वह और दृढ़प्रतिज्ञ होता है

    फिर कहता है उसके सहस्र पुत्र और पुत्रियाँ

    मेरे पास हैं

    कि इस बार वह मुझे खो नहीं सकता

    सुनकर मैं पीछे हटती हूँ

    सपने में भी आभास होता है

    मेरा एकांत सदा के लिए नष्ट होने वाला है

    तभी वह मेरी तरफ़ लपकता है

    उसके हाथ उसके चेहरे से भी ज़्यादा सख़्त हैं

    उसके पैर उसके घोड़े के पैरों की तरह ही

    ऐसा लगता है कि वह ख़ुद भी एक घोड़ा है

    उसके भीतर भी एक वेग है

    एक सनक टापों के रौंदने की क्षमता से उपजी

    मैं जान रही हूँ मेरे पास फल और नदियाँ हैं

    लेकिन दुर्बल हैं मेरे पाँव

    उसके पास वेग और सख़्ती है

    पर भूख और प्यास भी

    अचानक मैं दौड़ पड़ती हूँ

    जाने कहाँ से पैदा होती है ऊर्जा

    कहीं से हवाओं का वेग समा जाता है मुझमें

    फिर लौटती हैं वे स्मृतियाँ भी

    और मैं याद कर पाती हूँ

    यह तो वही आखेट है जिसमें मेरी हार हुई थी

    मारी गई थी मैं इसी नदी के किनारे

    इसी पत्थर पर पड़ी रही थी मेरी मृत देह

    मेरी पुत्रियाँ और पुत्र छीने गए थे मुझसे

    मेरी नदियाँ और फल लौट गए थे अनंत में

    बेतहाशा दौड़ रही हूँ

    ऊपर आकाश में उड़ रही हूँ

    पानी पर चल रही हूँ

    मेरे लिए कहीं कोई बंधन नहीं

    मैं कुछ भी मनचाहा कर पा रही हूँ

    ऐसा लगता है चीज़ें इस बार दूसरी तरह घटित होंगी

    वह मेरे पीछे-पीछे है घोड़े पर

    थोड़ा सुस्त अब रह-रह कर दहाड़ता मगर

    फिर बिलखता और सिर को पटकता

    दिखाता अपने घाव और रक्तस्राव

    और मैं भागती जाती हूँ

    पेड़ों की फुनगियों पर पहुँच जाती हूँ

    डालों पर झूलती हूँ

    यह सब मुझे एक खेल-सा लग रहा है

    तभी वह फेंकता है संशय के बीज हवा में

    कहता है यह खेल नहीं क्रूरता है

    याद करो हम कौन हैं—एक दूसरे के हिस्से

    अलग कर दिए गए थे जो कई सदी पहले

    याद करो जब मैं लौटा था मृत इसी घोड़े की पीठ पर

    और तुम रोती रही थीं मेरे लिए अकेली

    जाने कितने वर्षों तक

    ख़ाली आसमान और मैदान देखती हुईं

    तुम्हें याद नहीं आख़िर क्या हुआ था

    कौन जीता था हारा था कौन

    रक्त की एक उफनती नदी हमारे बीच थी

    यह सच था और है भी शायद

    यों सच थीं वे तितलियाँ भी

    जो हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं

    बैठती थीं हमारे माथों और होंठों पर

    बदल जाती थीं फिर चुंबनों में

    हम भूल जाते थे रक्त की नदी और उसके हाहाकार को

    याद करो

    याद करो

    और सचमुच याद आता है

    कितना समय गुज़रा होगा

    सचमुच कई-कई सदियाँ

    मगर मेरा वर्तमान अब भी जैसे स्पंदित है

    उन घटनाओं से

    काँपती है अब भी साँस

    आँखों में आँसू अब भी बचे हैं

    आया था मेरे प्रिय को लेकर उसका घोड़ा

    जिस पर औंधी उसकी मृत देह पड़ी थी

    उसके प्रतिद्वंद्वियों ने षड्यंत्र कर युद्ध में उसे मारा था

    प्रेम की यह परीक्षा थी

    अब मुझे उसकी संपदा से अधिक

    उसकी यादों की हिफ़ाज़त करनी थी

    बिताने थे जीवन के बाक़ी वर्ष

    देखते हुए उन ख़ाली मैदानों और खेतों को

    जिनसे होकर आई थी उसकी शांत देह

    अब भी मारक आशंकाएँ

    मन में जागती हैं

    ज़िंदा अहसासों के मरने का ख़ौफ़ मन में

    करवटें लेता है

    कोई तितली मेरे पैरों के पास आ दम तोड़ती है

    और मुझे तब किसी घोड़े की टाप सुनाई देती है

    रक्त से लथपथ एक देह अपनी ही पीठ पर

    महसूस होती है

    एक गरम दोपहर जैसे भीतर शुरू हो जाती है

    कितना कुछ होता रहता है सतत एक सपने

    और यथार्थ के बीच

    प्रेम के भीतर कितनी मृत्यु कितना दुख

    बेआवाज़ उपस्थित होता रहता है…

    मगर कैसे जानूँ मैं

    कि जो यूँ बचा हुआ है याद में और जो है सपने में डराता मुझे

    एक ही है

    कि सख़्त हाथों और चेहरे वाला यह शख़्स ही

    था मेरा प्रिय

    कि यही वह घोड़ा था जिस पर मृत्यु आई तब

    जैसे आज मेरे लिए

    कि जो जानता था तितलियों का रहस्य

    वही हिस्सा था उस तिलिस्म का जिसे प्रेम कहते हैं

    जिसके बीचों-बीच आज भी रक्त की नदी बहती है

    और फिर आज…

    कितना अजीब है सब कुछ

    यह याद सपने और नींद के बीच का संसार

    जिसमें फूल हैं

    और सफ़ेद चाँद सीढ़ियाँ उतरता

    धरती सिर्फ़ वाष्प है या कि धुँध का कोई गोला

    कुछ लोग फिर भी दिखते कितने साफ़

    अपनी मुद्राओं में गंभीर

    भाषा में सचेत

    मग्न कामकाज में

    जैसे यह दुनिया उनके चलाए चलती हो

    भरी हुई है जो फिर भी

    अनगिनत तितलियों से

    उड़ती हैं परिचित शैलियों में जो

    महसूस होतीं उन चुंबनों की तरह

    टिके हैं जो अब भी देह पर

    सदियों से सँजोए गए उनके रंगों की तरह ही

    और आश्चर्य कि वह भी आता दिखता है इसी में

    जिसकी ये तितलियाँ हैं

    मृत उन्हीं की तरह

    फिर भी कितना सजीव, आह!

    लगता है जैसे यह सपने का हिस्सा नहीं

    स्मृति का ही विस्तार हो

    लगता है जब सरल हुआ सब कुछ

    आया सपनों के बाहर का वह ख़ाली मैदान

    जहाँ कोई घोड़ा नहीं न कोई रक्त से लथपथ देह

    तभी प्रवेश करता है वह माथे पर बिठाए रंग-बिरंगी तितलियाँ

    आता है कोई प्रिय कवि भी जाने कहाँ से

    थामे अपनी बहन के दो निष्पाप कटे हाथ

    जो किसी स्त्री के प्रेम की ख़ातिर थे

    आता है बोर्खेज़ की कहानी का एक पात्र

    लिए वह जादुई किताब

    जिसके पन्ने एक बार पढ़े जाने के बाद

    दोबारा नहीं मिलते

    आता है धीरे-धीरे लौटकर

    फिर सारा दुख सारा पश्चाताप

    जिनसे मेरी दुनिया तब भी जीवंत थी

    सिर्फ़ उसमें तितलियाँ चुंबनों की तरह नहीं

    यातनाओं में शामिल हमशक्लों की तरह थीं

    और प्रेम के लिए अस्तित्व ख़तरे में था

    बोर्खेज़ की किताब नहीं थी बेशक

    खोई चीज़ों का शोक था

    और तलाश उस सपने की

    जिसमें कोई भी पन्ना अपनी किताब में

    दोबारा लौट सकता था

                             -सविता सिंह : ‘स्वप्न समय’, पृ.47

    ‘सपने और तितलियाँ’ स्मृति, स्वप्न, प्रेम, हिंसा और स्त्री-अस्तित्व के गहन अंतर्संबंधों का एक बहुस्तरीय पाठ प्रस्तुत करती है। यह कविता किसी रैखिक कथा की तरह नहीं खुलती, बल्कि चेतना के उन धुँधले प्रदेशों में प्रवेश करती है जहाँ स्वप्न, अतीत, इतिहास, देह-स्मृति और वर्तमान का अनुभव एक-दूसरे में विलीन होते रहते हैं। कविता का आरंभ ही “एक लंबे सपने का यह छोटा हिस्सा है” जैसी पंक्ति से होता है, जो यह संकेत देती है कि जो कुछ घटित हो रहा है वह किसी एक रात का सपना नहीं, बल्कि अस्तित्व की दीर्घकालिक स्मृति का अंश है। “लंबा सपना” यहाँ मानवीय इतिहास, स्त्री-अनुभव और प्रेम की दीर्घकालिक यातना का रूपक बन जाता है, जबकि “छोटा हिस्सा” उस विराट अनुभव का केवल एक दृश्य है जिसे भाषा में पकड़ा जा सका है।

    कविता का प्रारंभिक दृश्य गौर करने लायक है। कविकुलगुरु कालिदास की शकुंतला की तरह इस रचना की प्रोटागोनिस्ट स्त्री एक जंगल में है, “पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त”। यहाँ जंगल भय का नहीं, बल्कि वह आत्मीयता और स्वाभाविक अस्तित्व का स्थल है। वह जंगल के जीवों के बीच “निर्भय” है; यानी प्रकृति उसके लिए हिंसक नहीं, बल्कि मानव-संस्कृति से अधिक विश्वसनीय है:

      एक लंबे सपने का यह छोटा हिस्सा है

      इसमें मैं बेदम भाग रही हूँ

      देखती हूँ एक घने जंगल में हूँ

      पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त

      जंगल के जीवों के बीच निर्भय

      उनके प्रलापों से अवगत

      इधर-उधर घूमती पास की नदी तक जाती

      बैठती किसी पुराने पत्थर पर

                                                        सविता सिंह : ‘सपने और तितलियाँ’ (स्वप्न समय,पृ.38-39)

    कहना न होगा कि यह बिंब कविता के आधुनिक सभ्यता के उस आलोचनात्मक पाठ बन जाने की ओर संकेत करता है जिसमें प्रकृति के भीतर मनुष्य की सहजता और सभ्यता के भीतर उसकी असुरक्षा को रेखांकित किया गया  है।स्त्री का नदी तक जाना, पुराने पत्थर पर बैठना—ये सभी क्रियाएँ स्मृति और समय के पुरातात्त्विक तल से जुड़ती हैं। “पुराना पत्थर” केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास का जड़ साक्षी है जिस पर अनेक जीवन की छाप मौजूद है।

    एंगेल्स की शब्दावली में कहें तो गहरी और सच्ची कला को महसूस करने के लिए अपरिहार्य ‘संगीत-धर्मा कान’ का इस्तेमाल करने पर सविता सिंह की इन काव्य-पंक्तियों और कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के बीच एक गहरा तात्विक और संवेदनात्मक संवाद सुनाई पड़ता है, जो युगों के अंतराल को पाटकर स्त्री और प्रकृति के शाश्वत संबंध को पुनर्स्थापित करता है। जहाँ सविता सिंह की आधुनिक स्त्री जंगल में “पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त” होकर अपने स्वाभाविक अस्तित्व को पाती है, वहीं कालिदास की शकुंतला भी वृक्षों को जल पिलाए बिना स्वयं जल ग्रहण न करने के अपने संस्कार में प्रकृति के साथ एकात्म है, जिसे कवि कुलगुरु ने एक ह्रदय विदारक मार्मिक छंद में पिरोया है और जिस पर रीझकर कालिदास के सर्वाधिक प्रामाणिक टीकाकार एवं सहृदय आचार्य मल्लिनाथ ने विवेचन के दौरान –‘धन्य कवि ! धन्य कवि !’ की झड़ी लगा दी है :

    पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या,

    नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।

    आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः,

    सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्॥

    (वह शकुंतला, जो तुम्हें जल पिलाए बिना स्वयं जल पीने का विचार तक नहीं करती थी; जो अलंकारों की शौकीन होने के बावजूद तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण कभी तुम्हारा एक कोमल पत्ता भी नहीं तोड़ती थी; और तुम्हारे प्रथम पुष्प खिलने के समय जो उत्सव मनाती थी; वही शकुंतला आज अपने पति के घर जा रही है, आप सभी उसे अनुमति दें)।

    अपनी ‘संजीवनी’ टीका में इस छंद की व्याख्या करते हुए आचार्य मल्लिनाथ ने शकुन्तला और तपोवन के वृक्षों के बीच आत्मीय संबंधों को शास्त्रीय एवं संवेदनात्मक धरातल पर प्रतिष्ठित किया है। उनका मूल मंतव्य है कि शकुन्तला वृक्षों को जड़ न मानकर उन्हें अपने सहोदर के समान स्नेह करती थी, जिसे मल्लिनाथ ने वृक्षों के प्रति उसके अनन्य अनुराग के रूप में रेखांकित किया है :

    “या शकुन्तला युष्मासु तरुषु अपीतेषु सत्सु प्रथमं जलं पातुं न व्यवस्यति न प्रयतते, प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन पल्लवं नादत्ते न च्छिनत्ति, वः युष्माकं प्रथमे पुष्पविकारसमये यस्या उत्सवो भवति, सेयं शकुन्तला पतिगृहं याति, सा सर्वैः अनुज्ञायताम् । अत्र वृक्षेषु सोदर्यस्नेहं व्यनक्ति।”

    अपनी इस विलक्षण व्याख्या के अंत में मल्लिनाथ लिखते हैं— “अत्र वृक्षेषु सोदर्यस्नेहं व्यनक्ति।”” अर्थात् इस कथन के द्वारा वृक्षों के प्रति शकुन्तला का ‘सहोदर स्नेह’ (सगे भाई-बहन जैसा प्रेम) अभिव्यक्त होता है। मल्लिनाथ ने यहाँ ‘अपीतेषु’ पद के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि शकुन्तला वृक्षों की प्यास बुझाने को अपने जल पीने से ऊपर रखती थी, जो केवल एक पारिवारिक सदस्य ही कर सकता है। उनके अनुसार, शकुन्तला की स्त्रियोचित स्वाभाविक ‘अलंकार-प्रियता’ उसके वृक्ष के प्रति स्नेह के सामने गौण थी, क्योंकि वह स्वयं सजने-संवरने की शौकीन होने के बावजूद वृक्षों को पीड़ा पहुँचने के भय से उनके कोमल पल्लव कभी नहीं तोड़ती थी (‘प्रियाभरणत्वेऽपि स्नेहवशात् पल्लवच्छेदं न करोतीति भावः’ – आभूषण प्रिय होने पर भी स्नेहवश पत्तों का विच्छेद नहीं करती थी।)।

    वे आगे स्पष्ट करते हैं कि वृक्षों पर प्रथम पुष्प खिलने के समय शकुन्तला द्वारा मनाया जाने वाला उत्सव उसके और प्रकृति के बीच के अभेद्य संबंधों का परिचायक है। महर्षि कण्व द्वारा वृक्षों से अनुमति माँगने के पीछे मल्लिनाथ का तर्क है कि ये वृक्ष शकुन्तला के वियोग में दुखी होने वाले उसके सगे संबंधियों के समान हैं, इसीलिए उनका आदेश अनिवार्य है (‘तपोवनतरूणां सचेतनत्वप्रतिपादनेन शकुन्तलाप्रस्थानविषयिणीं तेषामनुज्ञां प्रार्थयते’ – तपोवन के वृक्षों को सचेतन प्रतिपादित करते हुए शकुन्तला के प्रस्थान के विषय में उनकी आज्ञा की प्रार्थना करते हैं)। शास्त्रीय दृष्टि से मल्लिनाथ ने इसमें ‘स्वभावोक्ति अलंकार’ और ‘शार्दूलविक्रीड़ित छंद’ की गरिमा को स्वीकार किया है। अंततः उनका मानना है कि यह श्लोक केवल शकुन्तला की विदाई का गीत नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के विस्तार का चरमोत्कर्ष है, जहाँ प्रकृति ‘जड़’ न होकर एक ‘आत्मीय परिवार’ की भाँति स्पंदित होती है।

    गौरतलब है कि सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में “पुराना पत्थर” और स्त्री का नदी तक जाना, समय के उस पुरातात्त्विक और स्मृति-परक तल को छूता है जो कालिदास के काव्य में तपोवन की स्थिरता और वहाँ के निश्चल परिवेश के रूप में मौजूद है। शकुंतला का स्नेहवश पत्तों को न तोड़ना और फूलों के खिलने पर उत्सव मनाना—नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्/ आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः,’ —दरअसल उसी “आश्वस्त” भाव का आदिम विस्तार है जिसे सविता सिंह “जंगल के जीवों के बीच निर्भय” होने के रूप में रेखांकित करती हैं।

    यह विश्लेषण पुष्ट करता है कि चाहे सहस्त्राब्दियों पूर्व रचित कालिदास का क्लासिकी विन्यास हो या आज के दौर में सविता सिंह की इस रचना के रूप में समकालीन भारतीय स्त्री-कविता का बिंब, दोनों ही सभ्यता की हिंसक और असुरक्षित परिधि के बरक्स प्रकृति के भीतर मनुष्य की उस सहजता को खोजते हैं, जहाँ वह जड़-चेतन के साथ किसी उच्चतर विश्वसनीय धरातल पर जुड़ा होता है। यही कारण है कि शकुंतला का वन से गमन केवल एक विदाई नहीं, बल्कि एक पूर्णतः ‘प्राकृतिक मनुष्य’ का ‘सांस्कृतिक जटिलता’ की ओर प्रस्थान बन जाता है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ में इसी बिंदु पर घोड़े पर सवार पुरुष का प्रवेश होता है। यह प्रवेश आकस्मिक होते हुए भी नियतिपूर्ण है। वह कहता है कि वह “कई जन्मों से” उसे खोज रहा है। यहाँ पुनर्जन्म की अवधारणा किसी धार्मिक विश्वास की तरह नहीं आती, बल्कि स्मृति की अनश्वरता के रूप में आती है। पुरुष का दावा है कि स्त्री के पास “उसके कुछ फल और नदियाँ” हैं। “फल” और “नदियाँ” स्त्री की सृजनात्मकता, उर्वरता, भावात्मक संपदा और जीवन-ऊर्जा के प्रतीक हैं। पुरुष का यह कहना कि “वह भूखा और प्यासा है” और “अपने हिस्से का जल” पीने आया है । कविता की यह पंक्ति प्रेम और अधिकार के बीच के तनाव को खोलती है। यह प्रेम की भाषा भी हो सकती है, लेकिन इसी के भीतर स्वामित्व और उपभोग की हिंसा छिपी हुई है। स्त्री की दृष्टि में वह “नितांत अपरिचित” है, जबकि पुरुष उसे अपना अतीत मान रहा है। इस असमान स्मृति का तनाव पूरी कविता को संचालित करता है।

    कविता में चित्रण है कि पुरुष का चेहरा “चेचक के दागों” से भरा है और उसकी “आँखों में कठोर प्रतिज्ञा मुझे पाने की/मुझे घबराया देख वह और दृढ़प्रतिज्ञ होता/…इस बार वह मुझे खो नहीं सकता”। यह सौंदर्यहीनता केवल बाह्य नहीं, बल्कि ऐतिहासिक हिंसा का चिह्न है। चेचक के दाग किसी ऐसी सभ्यता की स्मृति की तरह प्रतीत होते हैं जिसने महामारी, युद्ध और विनाश झेला है। पुरुष की मुख-मुद्रा में कोमलता का अभाव उसे प्रेमी से अधिक विजेता या शिकारी बनाता है। स्त्री का भय यहाँ सिर्फ़ एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक पुरुष-सत्ता से है जो प्रेम के नाम पर भी अधिकार चाहती है। कविता में “मेरा एकांत सदा के लिए नष्ट होने वाला है”—यह पंक्ति स्त्री-अस्तित्व की मूल चिंता को प्रकट करती है। प्रेम यहाँ आत्म-विलय का संकट बन जाता है।

    कविता का सबसे तीखा रूपक “आखेट” का है। स्त्री को याद आता है कि वह पहले भी इसी नदी के किनारे मारी गई थी। उसकी “पुत्रियाँ और पुत्र” उससे छीन लिए गए थे। यह स्मृति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि स्त्री-इतिहास की सामूहिक स्मृति है जिसमें युद्धों, पितृसत्तात्मक हिंसा और स्त्री-अधिकार के हनन की अनुगूँज मौजूद है। “मेरी नदियाँ और फल लौट गए थे अनंत में”—यह काव्य-पंक्ति मार्मिक है, क्योंकि यहाँ स्त्री की सृजनात्मक सत्ता इतिहास और उससे भी आगे अनंत में विलीन हो जाती है। उसकी देह, उसकी संततियाँ, उसका प्रेम—सब उससे छीन लिया गया था।

    लेकिन इस बार स्त्री भागती है और उसके भीतर “हवाओं का वेग” समा जाता है जो ऋग्वेद के ‘ईषिरो वातः प्रवाति:’ छंद की याद दिलाता है । वह पानी पर चल सकती है, पेड़ों की फुनगियों तक पहुँच सकती है; यानी वह भौतिक सीमाओं से परे चली जाती है। यहाँ कविता प्रतिरोध की दिशा में मुड़ती है। यह स्त्री-चेतना की मुक्त कल्पनाशीलता है। किंतु, पुरुष उसे रोकने के लिए “संशय के बीज” फेंकता है, जो एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक क्षण है। विचारणीय है कि पितृसत्तात्मक हिंसा हो या ग्राम्शी की ‘हेज़ेमनी’, वह केवल बल से संचालित नहीं होती; वह स्मृति, अपराधबोध और भावनात्मक जाल से भी प्रेरित होती है।

    उल्लेखनीय है कि दुनिया के साहित्य में स्त्री-मुक्ति को बाधित करने के मक़सद से ‘संशय के बीज’ बोने का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण जॉन मिल्टन के महाकाव्य में मिलता है। जब ‘ईव’ (Eve) ज्ञान और स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाना चाहती है, तब शैतान (Satan) उसे शारीरिक बल से नहीं रोकता। वह उसके मन में “संशय” पैदा करता है। वह ईव के कानों में फुसफुसाता है और उसे अपनी ही सत्ता, अपनी सीमाओं और ईश्वर के प्रेम पर संदेह करने को मजबूर करता है। यहाँ “संशय” वह बीज है जो स्त्री की मुक्त उड़ान को अपराधबोध (Guilt) में बदल देता है।

    ‘पैराडाइज लॉस्ट’ (Paradise Lost) के नौवें खंड (Book IX) में शैतान (सर्फ़ेंट के रूप में) द्वारा ईव के मन में संशय बोने का यह प्रसंग अत्यंत प्रभावशाली है जहाँ शैतान ईव की तर्कशक्ति और उसकी सीमाओं पर प्रश्न उठाकर ‘संशय’ पैदा करता है:

    “ब्रह्मांड की रानी, मत करो विश्वास

    मृत्यु की उन कठोर धमकियों पर; तुम नहीं मरोगी:

    तुम भला क्यों मरोगी? क्या इस फल से? यह तो जीवन देता है

    ज्ञान के प्रति: क्या उस धमकाने वाले से? मुझे देखो,

    मैंने इसे छुआ है और चखा है, फिर भी जीवित हूँ…

    फिर यह वर्जित क्यों था? डराने के सिवा और क्यों,

    तुम्हें निम्न और अज्ञानी बनाए रखने के सिवा और क्यों,

    उसके उपासक के रूप में; वह जानता है कि जिस दिन

    तुम इसे खाओगी, तुम्हारी आँखें जो इतनी साफ़ दिखती हैं,

    पर हैं अभी धुंधली ही, तब वे पूर्णतः

    खुल जाएँगी और स्पष्ट हो जाएँगी, और तुम देवताओं के समान हो जाओगी,

    भले और बुरे को जानते हुए, जैसा वे जानते हैं।”

    (मूल अंग्रेज़ी काव्यांश संदर्भ के लिए):

    “Queen of this Universe, do not believe

    Those rigid threats of Death; ye shall not Die:

    How should ye? by the Fruit? it gives you Life

    To Knowledge: by the Threat’ner? look on mee,

    Mee who have touch’d and tasted, yet both live…

    Why then was this forbid? Why but to awe,

    Why but to keep ye low and ignorant,

    His worshippers; he knows that in the day

    Ye Eate thereof, your Eyes that seem so cleere,

    Yet are but dim, shall perfetly be then

    Op’nd and cleere, and ye shall be as Gods,

    Knowing both Good and Evil as they know.”

     (Paradise Lost, Book IX, Lines 684-709)

    महाकवि मिल्टन यहाँ दिखाते हैं कि शैतान ईव को यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाता है कि ईश्वर द्वारा लगाया गया प्रतिबंध प्रेम नहीं, बल्कि उसे ‘निम्न और अज्ञानी’ (low and ignorant) बनाए रखने का एक षड्यंत्र है। यही वह “संशय का बीज” है जो ईव की सहज निष्ठा को हिला देता है और उसके “हवाओं के वेग” (उसकी जिज्ञासा और स्वतंत्रता) को एक ऐसे मार्ग पर मोड़ देता है जिसका अंत ‘अपराधबोध’ में होता है।

    इसके बरअक्स सविता सिंह के एक काव्यांश को रखकर देखने पर कविता की गाँठ खुलती नज़र आती है:

    तभी वह फेंकता है संशय के बीज हवा में

    कहता है यह खेल नहीं क्रूरता है

    याद करो हम कौन हैं—एक दूसरे के हिस्से

    अलग कर दिए गए थे जो कई सदी पहले

    याद करो जब मैं लौटा था मृत इसी घोड़े की पीठ पर

    और तुम रोती रही थी मेरे लिए अकेली

    जाने कितने वर्षों तक

    ख़ाली आसमान और मैदान देखती हुई

    तुम्हें याद नहीं आख़िर क्या हुआ था

    कौन जीता था हारा था कौन

    रक्त की एक उफनती नदी हमारे बीच थी

    यह सच था और है भी शायद

    यों सच थीं वे तितलियाँ भी

    जो हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं

    बैठती थीं हमारे माथों और होंठों पर

    बदल जाती थीं फिर चुंबनों में

    हम भूल जाते थे रक्त की नदी और उसके हाहाकार को

    • सविता सिंह

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ और जॉन मिल्टन के ‘पैराडाइज लॉस्ट’ (Paradise Lost) के इन दोनों काव्यांशों का तुलनात्मक विश्लेषण पुरुष-सत्तात्मक ‘गैसलाइटिंग’ (Gaslighting) और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण की उस पितृसत्तात्मक वैश्विक चालाकी को उजागर करता है, जहाँ स्त्री की मुक्ति को ‘संशय’ और ‘अपराधबोध’ के माध्यम से रोकने का प्रयास किया जाता है । मिल्टन का शैतान (Satan) ईव के मन में ईश्वर के प्रति संशय पैदा करता है। वह कहता है कि ईश्वर ने फल इसलिए वर्जित किया ताकि वह तुम्हें ‘निम्न और अज्ञानी’ (low and ignorant) बनाए रख सके। यहाँ संशय का बीज ‘ज्ञान’ की आकांक्षा से जुड़ा है।

    इसके विपरीत, शताब्दियों बाद  सविता सिंह की रचना में पुरुष ईव जैसी ही एक मुक्त स्त्री (जो हवाओं के वेग से भरी है) के मन में स्वयं की संवेदना के प्रति संशय पैदा करता है। जब वह कहता है, यह खेल नहीं क्रूरता है”, तो वह स्त्री की मुक्ति की छटपटाहट को ही अनैतिक घोषित कर देता है। मिल्टन का शैतान ईव को ‘देवता’ बनाने का लालच देकर संशय बोता है, जबकि सविता सिंह का पुरुष स्त्री को ‘क्रूर’ बताकर उसके भीतर अपराधबोध का बीज बोता है।

    मिल्टन के काव्यांश में शैतान ईव से कहता है— मत करो विश्वास मृत्यु की उन कठोर धमकियों पर” (do not believe those rigid threats)। यहाँ वह स्त्री को वर्तमान यथार्थ और भविष्य के प्रति संशयग्रस्त करता है।

    सविता सिंह की रचना में पुरुष इसके बिल्कुल विपरीत प्रविधि अपनाता है। वह ‘स्मृति’ को हथियार बनाता है और बार-बार कहता है— याद करो / याद करो”। वह स्त्री को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी स्मृति ‘धुंधली’ है और केवल वही (पुरुष) सत्य का ज्ञाता है। वह उसे उसके अपने ‘अकेलेपन’ और ‘शोक’ की याद दिलाकर उसे भावनात्मक रूप से पंगु बनाना चाहता है। मिल्टन का शैतान ‘भविष्य’ का तर्क देता है, जबकि सविता सिंह का पुरुष ‘अतीत’ के भावनात्मक जाल का।

    सविता सिंह के यहाँ पुरुष एक कदम और आगे बढ़कर प्लेटो के ‘सिम्पोजियम’ सरीखा दार्शनिक तर्क देता है— याद करो हम कौन हैंएक दूसरे के हिस्से”। यह ‘हिस्सा’ होने का तर्क प्रेम का सबसे सुंदर और सबसे हिंसक तर्क है। जब वह स्त्री को अपना हिस्सा घोषित करता है, तो वह उसकी उस ‘हवाओं वाली’ स्वतंत्र सत्ता को नकार देता है। मिल्टन के यहाँ ‘देवता’ बनने का प्रलोभन है, सविता सिंह के यहाँ ‘पूर्णता’ प्राप्त करने का भावनात्मक जाल।

    मिल्टन के यहाँ ‘भले और बुरे’ (Good and Evil) का ज्ञान प्राप्त करना मुख्य लक्ष्य है। शैतान कहता है कि तुम देवताओं के समान सब जान जाओगी।

    सविता सिंह की कविता में ‘रक्त की नदी’ (इतिहास की हिंसा) और ‘तितलियाँ’ (प्रेम की कोमलता) के बीच एक निरंतर युद्ध है। पुरुष यहाँ ‘तितलियों’ और ‘चुंबनों’ का वास्ता देकर उस ‘हाहाकार’ को भुला देने का आग्रह करता है जो वास्तव में उसकी अपनी सत्ता का परिणाम है। वह संशय फेंकता है कि स्त्री का भागना गलत है क्योंकि उनका अतीत ‘प्रेम’ का था। मिल्टन का शैतान ‘ज्ञान’ के माध्यम से ईश्वर से अलग करना चाहता है, जबकि सविता सिंह का पुरुष ‘स्मृति’ के माध्यम से स्त्री को खुद से जोड़ने (यानी अधीन करने) का प्रयास करता है।

    इन दोनों काव्यांशों का संगम उस मनोवैज्ञानिक बिंदु पर होता है जहाँ पुरुष सत्ता स्त्री की ‘स्वायत्त गति’ को ‘संशय’ के माध्यम से बाधित करती है। मिल्टन के यहाँ यह ‘आदिम प्रलोभन’ है, सविता सिंह के यहाँ यह ‘ऐतिहासिक अधिकार’ है। दोनों ही स्थितियों में ‘संशय के बीज’ हवा में इसलिए फेंके जाते हैं ताकि स्त्री अपनी शक्ति (हवाओं का वेग या देवताओं जैसी दृष्टि) पर संदेह करने लगे और अंततः उस केंद्र (ईश्वर या पुरुष) की ओर लौट आए, जहाँ उसकी अधीनता सुनिश्चित है।

    सविता सिंह की कविता में यह खेल नहीं क्रूरता है” कहना, मिल्टन के शैतान द्वारा ईश्वर को धमकाने वाला” (Threat’ner) कहने की तार्किक निरंतरता ही है—दोनों ही मामलों में सत्य को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ा-मरोड़ा या ‘ट्विस्ट’ (Twist) किया गया है।

    सविता सिंह की रचना में “संशय के बीज” फेंकना वस्तुत: उस ‘गैसलाइटिंग’ (Gaslighting) का काव्यात्मक चित्रण है, जिसमें पुरुष स्त्री को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी मुक्ति, उसकी शक्ति या उसका “हवाओं का वेग” वास्तव में उसकी “क्रूरता” या उसका “भ्रम” है। पुरुष कहता है— यह खेल नहीं क्रूरता है/ याद करो हम कौन हैं”। यह सीधे तौर पर स्त्री की ‘स्वयं की पहचान’ (Self-identity) पर हमला है। दुनिया का साहित्य गवाह है कि जब-जब स्त्री ने भौतिक सीमाओं को लांघा है, पुरुष ने ‘स्मृति’ और ‘संशय’ के धागों से उसे वापस बांधने का प्रयास किया है। ‘सपने और तितलियाँ’ का यह बिंब उस ‘गैसलाइटिंग’ या पितृसत्तात्मक वैश्विक ऐतिहासिक चालाकी को एक ही पंक्ति में पकड़ लेता है।

    पितृसत्ता द्वारा स्त्री को नियंत्रण में लेने के लिए उसके दिलोदिमाग़ में ‘संशय के बीज’ बोने के उदाहरण अनेक हैं,जिनकी रचनात्मक प्रतिध्वनि ‘सपने और तितलियाँ’ में सुनाई पड़ती है, पर उन सब पर विस्तार-भय की वजह से मुकम्मल चर्चा यहाँ नामुमकिन है। बावजूद इसके, निवेदन है कि इब्सन के ‘ए डॉल्स हाउस’ (Henrik Ibsen’s A Doll’s House) नाटक की नायिका नोरा (Nora) जब अपनी स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाती है, तो उसका पति टॉर्वाल्ड उसे बेड़ियों से नहीं रोकता। वह उसके मन में “नैतिक संशय” और “ममत्व का संशय” पैदा करता है। वह उससे पूछता है— क्या तुम एक पत्नी और एक माँ के रूप में अपने पवित्रतम कर्तव्यों को भूल जाओगी?” यह “पवित्र कर्तव्य” का बोध वास्तव में वह संशय है जो स्त्री के पैरों में ‘हवाओं का वेग’ होने के बावजूद उसे ठहरने पर मजबूर करता है।

    मार्गरेट एटवुड की ‘द हैंडमेड्स टेल’ (Margaret Atwood’s The Handmaid’s Tale) सरीखे आधुनिक क्लासिक में पुरुष सत्ता (The Commanders) स्त्रियों को केवल दीवारों में कैद नहीं करती, बल्कि उनके भीतर यह संशय पैदा कर देती है कि बाहर की दुनिया उनके लिए विनाशकारी है और उनकी मुक्ति वास्तव में उनकी मृत्यु है। “संशय” यहाँ एक मनोवैज्ञानिक ‘चेकमेट’ है जहाँ स्त्री अपनी ही शक्ति (हवाओं के वेग) से डरने लगती है।

    ‘वनगिन स्टैंजा’ (Onegin Stanza) नामक एक विशिष्ट छंद में रूसी महाकवि पुश्किन रचित ‘यूजीन वनगिन’ ( Eugene Onegin) सरीखे उपन्यासनुमा काव्य या काव्यनुमा उपन्यास में जब तात्याना अपना प्रेम पत्र लिखती है (जो उसकी भावनाओं का मुक्त वेग है), तो वनगिन का प्रत्युत्तर उसमें संशय और आत्म-संदेह का ऐसा बीज बो देता है कि वह वर्षों तक अपनी स्वायत्तता और अपनी भावनाओं के प्रति संशयग्रस्त रहती है।

    ऊपर पितृसत्ता द्वारा स्त्री को नियंत्रित करने के लिए ‘संशय के बीज’ फेंकने को ‘गैसलाइटिंग’ कहा गया है ,जो शब्द 1938 के एक नाटक और बाद में 1944 की फिल्म ‘गैसलाइट’ (Gaslight) से आया है। इसमें एक पति अपनी पत्नी को पागल साबित करने के लिए घर की ‘गैस की लाइटों’ को धीरे-धीरे धीमा करता रहता है और जब पत्नी कहती है कि रोशनी कम हो गई है, तो वह उसे यक़ीन दिलाता है कि यह उसका भ्रम है। नतीजतन, पत्नी अपनी ही आँखों और दिमाग पर भरोसा करना छोड़ देती है।

    स्त्रीवादी चिंतन बतलाता है कि गैसलाइटिंग करने वाला व्यक्ति पीड़ित के अनुभवों को पूरी तरह नकार देता है। यदि पीड़ित को कुछ बुरा लगा है, तो उत्पीड़क कहेगा, “तुम बहुत संवेदनशील हो” या “ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं।” सविता सिंह की कविता में पुरुष कहता है, “तुम्हें याद नहीं आखिर क्या हुआ था”, जो सीधे तौर पर स्त्री की अपनी स्मृति पर हमला है।

    इसमें पीड़ित को यह विश्वास दिलाया जाता है कि जो वह देख रहा है या महसूस कर रहा है, वह गलत है। उत्पीड़क अपनी सुविधा के अनुसार ‘सत्य’ गढ़ता है। ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में पुरुष स्त्री के ‘हवाओं के वेग’ (शक्ति) को ‘क्रूरता’ (पाप) बताकर उसकी शक्ति की धारणा को ही बदल देता है।

    गैसलाइटिंग का मुख्य उद्देश्य पीड़ित के आत्मविश्वास को नष्ट करना होता है। जब पीड़ित अपनी ही बुद्धि पर संदेह करने लगता है, तो वह निर्णय लेने के लिए उत्पीड़क पर निर्भर हो जाता है।सविता सिंह की रचना में “संशय के बीज” फेंकना इसी प्रक्रिया का प्रतीक है, जहाँ स्त्री की ‘उड़ान’ संशय के कारण ‘भटकाव’ लगने लगती है। गैसलाइटिंग अक्सर “प्यार” या “आत्मीयता” के आवरण में की जाती है। उत्पीड़क पुराने सुखद समय का वास्ता देता है (जैसे कविता में तितलियों और चुंबनों का जिक्र)। वह कहता है, “मैं यह तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूँ” या “याद करो हम एक-दूसरे के हिस्से हैं।” यह पीड़ित को भावनात्मक रूप से पंगु बना देता है ताकि वह प्रतिरोध न कर सके।

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ में पुरुष का व्यवहार ‘गैसलाइटिंग’ का जबरदस्त उदाहरण है, क्योंकि वह स्त्री के ‘सशक्तीकरण’ को ‘विनाशकारी’ सिद्ध करने का प्रयास करता है। वह उसे यह याद दिलाता है कि उसका अपना ‘एकांत’ और उसकी ‘मुक्त ऊर्जा’ वास्तव में एक भूल है, और उसका वास्तविक वजूद पुरुष की स्मृतियों का हिस्सा बने रहने में ही है। यह “संशय” ही वह बेड़ी है जो भौतिक जंजीरों से कहीं अधिक मजबूत होती है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ में पुरुष का कथन—“याद करो हम कौन हैं—एक दूसरे के हिस्से”—प्रेम का सबसे आकर्षक और सबसे ख़तरनाक वाक्य है, क्योंकि इसमें आत्मीयता और स्वामित्व दोनों एक साथ मौजूद हैं। इन पंक्तियों पर ज़रा रुककर विचार करें। कविता में जब पुरुष कहता है— “याद करो हम कौन हैं—एक दूसरे के हिस्से, अलग कर दिए गए थे जो कई सदी पहले” तो वह अनजाने में प्रेम की उस दार्शनिक जड़ को स्पर्श करता है जिसका विस्तार हमें प्लेटो के ‘सिम्पोजियम’ में मिलता है। इस महाग्रंथ में एरिस्टोफेनिस के माध्यम से सुकरात एक आदिम प्रसंग का ज़िक्र करते हैं कि सृष्टि के आरंभ में मनुष्य आज की तरह अधूरा नहीं, बल्कि संपूर्ण और असीम शक्तिशाली था; उसके दो चेहरे, चार हाथ और चार पैर थे, और वह स्त्री-पुरुष के एक सम्मिलित स्वरूप में था। इन मनुष्यों की बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर स्वर्ग के राजा ज़ीउस ने उन पर प्रहार किया और उन्हें दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया, जिससे वे जीवन भर के लिए आधे रह गए। तभी से ये दोनों बिछड़े हुए हिस्से एक-दूसरे को पाने के लिए जिस आदिम व्याकुलता और छटपटाहट को झेल रहे हैं, वही ‘प्रेम’ कहलाया।

    इस प्रसंग के आलोक में देखें तो ‘सपने और तितलियाँ’ कविता का यह वाक्य – “हम एक दूसरे के हिस्से हैं”, एक ओर तो उस खोई हुई पूर्णता को पाने की आत्मीय पुकार है जो प्रेम को आकर्षक बनाती है, लेकिन दूसरी ओर यही विचार एक गहरे ख़तरे को भी जन्म देता है। वजह यह कि जब हम दूसरे को मात्र अपना एक ‘हिस्सा’ मान लेते हैं, तो आगे सामने वाले की स्वतंत्र सत्ता को नकार कर प्राय: उस पर अपना अधिकार और स्वामित्व आरोपित करने लग जाते हैं। इस प्रकार, जो प्रेम बुनियादी रूप  में एक आध्यात्मिक पुनर्मिलन की खोज है, वह व्यवहार में आकर अक्सर एक-दूसरे को अपनी इकाई में जकड़ लेने का भावनात्मक जाल बन जाता है, जहाँ आत्मीयता और आधिपत्य के बीच की रेखा अत्यंत धुंधली हो जाती है।

    इस रचना में “रक्त की उफनती नदी” और “तितलियाँ” दो केंद्रीय प्रतीक हैं। रक्त की नदी इतिहास, हिंसा, युद्ध और मृत्यु का प्रतीक है; जबकि तितलियाँ प्रेम, चुंबन, स्मृति और आत्मीयता की। कवयित्री के शब्दों में तितलियाँ “हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं”—यह समकालीन हिन्दी कविता में एक ख़ूबसूरत और दुर्लभ बिंब है। प्रेम यहाँ स्थूल देह-संबंध नहीं, बल्कि आत्माओं के बीच उड़ती हुई कोमल और रंगीन ऊर्जा है। तितलियाँ माथे और होंठों पर बैठती हैं और चुंबनों में बदल जाती हैं। किंतु इसी प्रेम के बीच रक्त की नदी भी बहती रहती है। यानी प्रेम और हिंसा अलग-अलग नहीं हैं; वे एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। कविता इसी असहज सत्य को उजागर करती है कि प्रेम जितना जीवनदायी है, उतना ही विनाशकारी भी हो सकता है।

    कहना न होगा कि श्रेष्ठ कविता में प्राय: अनेकार्थता होती है। इसलिए— रक्त की उफनती नदी हमारे बीच थी/यह सच था और है भी शायद/यों सच थीं वे तितलियाँ भी/जो हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं/बैठती थीं हमारे माथों और होंठों पर/बदल जाती थीं फिर चुंबनों में/हम भूल जाते थे रक्त की नदी और उसके हाहाकार को—सरीखे गहन ऐंद्रियबोध संपन्न काव्यांश की पहले की गई व्याख्या से भिन्न पाठ की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

    बहरहाल, किसी कवि पर विचार करने के लिए टी.एस. एलियट द्वारा ‘परम्परा और वैयक्तिक प्रज्ञा’ निबंध में दिए सुझाव के तहत सविता सिंह की इन पंक्तियों को हिंदी कविता की समृद्ध रचनात्मक परंपरा में रखकर देखने पर जयशंकर प्रसाद और दिनकर याद आते हैं। ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ की निम्न उद्धृत पंक्तियों को सामने ‘सपने और तितलियाँ’ के काव्यांश को रखकर विचार करें, तो सविता सिंह की ऊपर उद्धृत पंक्तियों का एक नया अर्थ उद्भाषित होता है:

    एक और फिर व्याकुल चुम्बन रक्त खौलता जिससे

    शीतल प्राण धधक उठता है तृषा तृप्ति के मिस से        (कामायनी)

    परिरम्भ पाश में बंधे हुए उस अम्बर तक उठ आओ रे

    देवता प्रेम का सोया है, चुम्बन से उसे जगाओ रे         (उर्वशी)

    जयशंकर प्रसाद, दिनकर और सविता सिंह के ये ‘टेक्स्ट’ संवेदना के एक उस धरातल पर मिलते हैं जहाँ प्रेम, देह और रक्त का द्वंद्व मनुष्य के अस्तित्व को परिभाषित करता है। जहाँ सविता सिंह की पंक्तियों में ‘रक्त की उफनती नदी’ उस बाहरी और आंतरिक हिंसा का हाहाकार है जिसे ‘तितलियाँ’ रूपी कोमल स्मृतियों और चुंबनों के माध्यम से भुलाने का प्रयास किया जाता है, वहीं प्रसाद और दिनकर के यहाँ यही ‘रक्त का खौलना’ या ‘शोणित का ज्वार’ विनाशकारी न होकर काम-ऊर्जा का वह ईंधन बन जाता है जो प्रेम की अग्नि को और अधिक प्रदीप्त करता है। दिनकर की उर्वशी कहती है:

    जितना ही वह खर अनल-ज्वार शोणित में उमह उबलता है

    उतना ही यौवन-अगरुदीप्त कुछ और धधककर जलता है

    मैं उसी अगरु की ताप तप्त मधुमयी गंध पीने आई

    निर्जीव स्वर्ग को छोड़ भूमि की ज्वाला में जीने आई

    याद रहे कि इन तीनों कवियों के यहाँ ‘चुंबन’ केवल एक दैहिक क्रिया नहीं, बल्कि एक रूपांतरणकारी सेतु है— प्रसाद के लिए शीतल प्राणों को धधकाने वाली एक अतृप्त प्यास, दिनकर के लिए सोए हुए देवत्व को जगाने वाला वह मंत्र जो रक्त के ‘खर अनल’ के बीच ही यौवन के अगरु को सुगंधित करता है और सविता सिंह के लिए यह हिंसा के विरुद्ध एक मानवीय हस्तक्षेप और विस्मृति की शरणस्थली है। अंततः, ये पाठ एक साझा रचनात्मक सत्य उद्घाटित करते हैं जिसके तहत प्रेम और हिंसा (या ताप) सह-अस्तित्व में हैं। सविता सिंह जिस ‘रक्त की नदी’ की बात करती हैं, वह संभवतः वही ‘खौलता हुआ रक्त’ है जिसे प्रसाद और दिनकर की कविताएँ  दैहिक स्तर पर अनुभव करती-कराती हैं । जहाँ जयशंकर प्रसाद और दिनकर ‘रक्त के ताप’ को प्रेम की तीव्रता का आधार मानते हैं, वहीं सविता सिंह उस ‘ताप’ (हाहाकार) से राहत पाने के लिए प्रेम की शरण में जाती हैं। दिनकर का ‘यौवन अगरु’ और सविता सिंह की ‘तितलियाँ’ दोनों ही उस कठोर सत्य (रक्त/अनल) के बीच पनपने वाली सुकुमार संवेदनाएँ हैं।

    इन तीनों पाठों से दार्शनिक निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रेम किसी निर्वात या शून्य में नहीं, बल्कि रक्त के ताप और संघर्ष के बीच ही घटित होता है; अंतर केवल इतना है कि जहाँ स्त्रीवादी संवेदना में प्रेम इस आदिम हिंसा से मुक्ति का मार्ग है, वहीं छायावादी और छायावादोत्तर संदर्भों में यह उसी ताप को सृजनात्मक ऊर्जा में बदल देने की व्याकुल प्रक्रिया प्रतीत होता है, जिसमें आत्मीयता और देह की तपन एक साथ उपस्थित रहती है। जयशंकर प्रसाद के यहाँ जो ‘तृप्ति के मिस’ से व्याकुल होना है, वही ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में ‘भूल जाने’ की प्रक्रिया है। अंततः, तीन पीढ़ियों के ये तीनों रचनाकार इस बात पर सहमत दिखते हैं कि मनुष्य की आदिम प्रवृत्तियों (रक्त) और उसकी सृजनात्मक व्याकुलता (चुंबन) के बीच का संघर्ष ही ‘प्रेम’ की वास्तविक आधारभूमि है। सविता सिंह जहाँ प्रेम को हिंसा के विरुद्ध एक ‘मरहम’ की तरह देखती हैं, वहीं प्रसाद और दिनकर उसे उस ‘अग्नि’ की तरह देखते हैं जो रक्त के ताप से ही प्रज्वलित होती है।

    “सपने और तितलियाँ” कविता का मध्य भाग स्मृति के पुनरागमन का क्षेत्र है। स्त्री को याद आता है कि उसका प्रिय युद्ध में मारा गया था और उसका शव घोड़े पर लौटा था। यहाँ घोड़ा मृत्यु का वाहक बन जाता है। स्त्री को पहले जो पुरुष हिंसक शिकारी प्रतीत हो रहा था, वही अब उसके मानस पटल पर मृत प्रिय के रूप में उभरने लगता है। यही कविता की सबसे जटिल संरचना है, जो उस सामंती-पूँजीवादी पितृसत्तात्मक मूल्यों की याद ताज़ा कर देती है जिसके तहत शिकार करने वाला और प्रेमी एक ही व्यक्ति हो सकता है।यहाँ प्रेम में हिंसा की संभावना और हिंसा में प्रेम की स्मृति—दोनों एक साथ मौजूद हैं। कवयित्री के शब्दों में स्त्री अब उस प्रिय की “यादों की हिफाज़त” करने के लिए अभिशप्त है। उसके हिस्से में आता है शोक, प्रतीक्षा और स्मृति का दीर्घ जीवन। इस बिंदु पर आकर ‘सपने और तितलियाँ’ कविता युद्धोत्तर स्त्री-अनुभव का पाठ बनने लग जाती है, जहाँ पुरुष युद्ध में मर जाते हैं और स्त्रियाँ उनकी स्मृतियों का बोझ उठाती रहती हैं।

    सविता सिंह की इस रचना में स्त्री के दिल दहला देने वाले कथन – प्रेम की यह परीक्षा थी/अब मुझे उसकी संपदा से अधिक /उसकी यादों की हिफ़ाज़त करनी थी/बिताने थे जीवन के बाक़ी वर्ष /देखते हुए उन ख़ाली मैदानों और खेतों को/जिनसे होकर आई थी उसकी शांत देह में “यादों की हिफाज़त” सरीखी काव्य-पंक्ति प्रसिद्ध बेलारूसी लेखिका और नोबेल पुरस्कार विजेता स्वेतलाना अलेक्सिएविच (Svetlana Alexievich) की कालजयी कृति “द अनवुमनली फेस ऑफ वॉर” (The Unwomanly Face of War) की याद दिलाती है, जिन्होंने अपनी इस पुस्तक में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ की उन लाखों महिलाओं की आवाज़ को दुनिया के सामने रखा, जिन्हें इतिहास के पन्नों ने लगभग भुला दिया था। अलेक्सिएविच की पुस्तक उस “पुरुषवादी इतिहास” को चुनौती देती है जो केवल जीत, पदकों और रणनीतियों की बात करता है। वह उस पक्ष को सामने लाती है जिसे एक  भारतीय स्त्री-कवि सविता सिंह ने “यादों की हिफाज़त” और प्रकारांतर से स्मृतियों का बोझ कहा है।

    अलेक्सिएविच लिखती हैं कि युद्ध खत्म होने के बाद पुरुष तो लौट आए या शहीद हो गए, लेकिन स्त्रियाँ उन यादों को सहेजने वाली जीवित ‘संग्रहालय’ बन गईं। उनके लिए युद्ध केवल मोर्चे पर समाप्त नहीं हुआ; वह उनके घरों, उनके विलाप और उनके अकेलेपन में जारी रहा। वे अपने मृत प्रेमियों, पतियों और बेटों की स्मृतियों की हिफाज़त करने के लिए अभिशप्त रहीं। पुस्तक में कई ऐसे प्रसंग हैं जहाँ स्त्रियाँ युद्ध समाप्त होने के दशकों बाद भी खिड़की के पास बैठकर प्रतीक्षा करती रहीं। यह प्रतीक्षा का दीर्घ जीवन ही उनका यथार्थ बन गया। स्वेतलाना की पुस्तक के अनेक प्रसंग युद्धोत्तर स्त्री-अनुभव के पाठ के तौर पर “सपने और तितलियाँ” पर विचार करते हुए पूरी तरह मेल खाते हैं, क्योंकि उनकी पुस्तक यह साबित करती है कि “स्त्री के लिए युद्ध का अर्थ…युद्ध के बाद के ख़ालीपन में उन स्मृतियों को जिंदा रखना था, जिन्हें समय मिटा देना चाहता था।

    मिखाईल बख्तिन की शब्दावली में अलेक्सिएविच की शैली को “पॉलीफोनिक” (बहुध्वन्यात्मक) कहा जा सकता  है, जहाँ वह खुद कम बोलती हैं और उन स्त्रियों की स्मृतियों को बोलने का मौक़ा देती हैं जो “यादों की हिफाज़त” करते-करते बूढ़ी हो गयीं । अपनी पुस्तक में वे उन स्त्रियों की आवाज़ दर्ज करती हैं जो कहती हैं कि “युद्ध के बाद हमें फिर से जीना सीखना पड़ा, लेकिन हमारी आँखें हमेशा पीछे की ओर मुड़ी रहीं” (“After the war, we had to learn how to live again, but our eyes were always turned backward” )। यह ‘पीछे मुड़कर देखना’ ही वह “प्रतीक्षा का दीर्घ जीवन” है जिसकी ओर ‘सपने और तितलियाँ’ कविता की प्रोटागोनिस्ट स्त्री इंगित कर रही है।

    दूसरे शब्दों में, सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ और स्वेतलाना अलेक्सिएविच की कृति ‘द अनवुमनली फेस ऑफ वॉर’ के मध्य एक गहरा और मर्मस्पर्शी अंतरसंबंध दिखाई देता है, जहाँ युद्धोत्तर स्त्री-अनुभव केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि स्मृतियों के एक अनंत और त्रासद विस्तार के रूप में उभरता है। सविता सिंह की रचना में स्त्री की मनोदशा उस ‘शोक और प्रतीक्षा के दीर्घ जीवन’ का जीवंत दस्तावेज़ है, जहाँ पति या प्रेमी की मृत्यु के बाद स्त्री का अस्तित्व केवल उसकी “यादों की हिफाज़त” (“To be a guardian of memories”) करने तक सीमित कर दिया गया है। कविता का वह अंश जहाँ स्त्री कहती है—”आया था मेरे प्रिय को लेकर उसका घोड़ा / जिस पर औंधी उसकी मृत देह पड़ी थी… अब मुझे उसकी संपदा से अधिक उसकी यादों की हिफ़ाज़त करनी थी”—सीधे तौर पर अलेक्सिएविच द्वारा वर्णित उन सोवियत स्त्रियों के अनुभवों से जुड़ता है, जिनके लिए युद्ध कभी समाप्त ही नहीं हुआ।

    अलेक्सिएविच की पुस्तक में स्त्रियाँ यह स्वीकार करती हैं कि पुरुषों के लिए युद्ध मोर्चे पर खत्म हो गया, परंतु स्त्रियों के लिए वह एक “स्मृतिगत युद्ध” (“Mental war of attrition”) बन गया, जिसे वे अपने एकांत और उन ख़ाली मैदानों को देखते हुए जीती रहीं। सविता सिंह के यहाँ ‘रक्त की उफनती नदी’ और ‘रक्त से लथपथ देह’ का बिंब उस पितृसत्तात्मक हिंसा और सत्ता-संघर्ष का प्रतीक है, जिसमें स्त्री की अपनी ‘नदियाँ और फल’ (तरलता और सर्जनात्मकता) छीन लिए जाते हैं। अलेक्सिएविच भी इसी सत्य को रेखांकित करती हैं कि युद्धोत्तर स्त्री का जीवन “विस्मृति के विरुद्ध एक अनवरत संघर्ष” (“An unceasing struggle against oblivion”) है । कविता में ‘तितलियों’ का चुंबनों से यातनाओं के ‘हमशक्लों’ में बदल जाना उस मानसिक विस्थापन को दर्शाता है, जहाँ प्रेम और मृत्यु के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।

    खुले दिमाग़ से विचारें,तो ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में  तितलियों का चुम्बनों से यातनाओं के हमशक्लों में बदल जाना सिर्फ़ एक बिम्ब मात्र नहीं है, बल्कि पितृसत्तात्मक भावभूमि पर रचित उन कामशास्त्रीय ग्रंथों की ऐतिहासिक निरंतरता का संकेत भी है, जहाँ प्रेमालाप के दौरान ‘उद्दाम शृंगार’ के नाम पर नखक्षत और दंतक्षत जैसे कृत्यों को रति-क्रीड़ा के अनिवार्य ‘रस’ के रूप में महिमामंडित किया गया है। जबकि यह प्रेम की इच्छा  (Eros) और मृत्यु की इच्छा (Thanatos) के बीच का वह बिंदु है जहाँ प्रेम अपनी स्वाभाविकता खोकर विनाशकारी होने लगता है।

    वात्स्यायन कृत ‘कामसूत्र’ के दूसरे अधिकरण (सांप्रयोगिक) के अंतर्गत नखविलेपन’ और दंशच्छेद’ (दंतक्षत) का विस्तार से वर्णन है। रति-क्रीड़ा के दौरान तीव्र आवेग में दिए जाने वाले इन घावों को कामशास्त्रीय परंपरा में प्रेम की अभिव्यक्ति का अभिन्न अंग माना गया है।इस प्रसंग में एक प्रामाणिक और प्रसिद्ध श्लोक इस प्रकार है:

    रागाधिक्ये तु संमोहादविवेकाच्च जायते।

    तत्र स्थानं च शास्त्रं च नैव दूतश्च विद्यते॥(कामसूत्र, 2.7.29)

    इस श्लोक में कामसूत्र के प्रणेता वात्स्यायन कहते हैं कि: “जब प्रेम का आवेग (राग) अपनी पराकाष्ठा पर होता है, तब रति-क्रीड़ा में जो सम्मोह और अविवेक (होश खो देना) उत्पन्न होता है, उस समय न तो शास्त्र के नियमों की मर्यादा रहती है, न उचित-अनुचित का विचार और न ही किसी स्थान का बंधन।”

    इसी अध्याय में वात्स्यायन ने ‘नखक्षत’ और ‘दंतक्षत’ के आठ-आठ प्रकार बताए हैं (जैसे: गूढ़क, उच्छूनक, प्रवालमणि आदि)। कामशास्त्र का तर्क यह है कि ये क्षत (घाव) ‘प्रेम के पदक’ या स्मृति-चिह्न हैं। वात्स्यायन कृत ‘कामसूत्र’ के ‘दंतक्षत’ (दंशच्छेद) प्रकरण में उन घावों को ‘स्मृति-चिह्न’ या प्रेम के प्रतीक के रूप में स्वीकार करने के संदर्भ में निम्नलिखित श्लोक मिलता है:

    “तद् यथास्थानं विहितं रागवृद्धिकरं मतम्।

    स्मरणाय च भवति कृतं दंशविलेपनम्॥” (कामसूत्र, 2.7.1)

    वात्स्यायन के अनुसार, रति-क्रीड़ा के समय शरीर के उचित अंगों पर किए गए ये दंतक्षत और नखक्षत न केवल काम-राग की वृद्धि करने वाले माने गए हैं, बल्कि ये प्रियतम द्वारा दिए गए उन स्मृति-चिह्नों के समान होते हैं जो मिलन के पश्चात भी उस सुखद क्षण का स्मरण कराते रहते हैं।

    यही वह शास्त्रीय आधार है जहाँ इन ‘क्षतों’ को ‘प्रेम के पदक’ के रूप में महिमामंडित किया गया है, जो सविता सिंह समेत किसी आधुनिक स्त्री-विमर्शकार को किसी कीमत पर स्वीकार्य  नहीं हो सकता।सविता सिंह इसे ‘यातना’ के सूक्ष्म रूप में देखती हैं ।

    यही वह बिंदु है जहाँ ‘रस’ और ‘यातना’ के बीच की लकीर बहुत बारीक हो जाती है। शास्त्र जिसे ‘रागाधिक्य’ (प्रेम की अधिकता) के कारण उत्पन्न ‘अविवेकी सुख’ कहता है, वह अनिवार्य रूप से पुरुष-प्रधान दृष्टि है। स्त्री के परिप्रेक्ष्य में, यह ‘शास्त्र-विहित’ हिंसा उसके शरीर पर उस पितृसत्तात्मक सत्ता का अंकन है, जिसे ‘उद्दाम शृंगार’ के आवरण में छिपाया जाता रहा है।

    जब कविता में कोमल तितलियाँ यातना के हमशक्लों में तब्दील होती हैं, तो वह इस रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक धारणा पर चोट करती हैं कि स्त्री की देह पर अंकित पीड़ा के चिह्न भी प्रेम के प्रतीक हो सकते हैं। यहाँ ‘चुंबन’ का ‘दंश’ में बदलना उस देह की राजनीति (Body Politics) को उजागर करता है, जहाँ पुरुष की आक्रामकता स्त्री की सहिष्णुता को अपना आधार बनाती है। यह उस भयावह मानसिक विस्थापन की स्थिति है जहाँ प्रेम की आड़ में की जाने वाली मादक कही जाने वाली हिंसा, स्पर्श की पवित्रता को सोख लेती है और जीवनदायी संवेदनाओं को मृत्युतुल्य पीड़ा के करीब ले आती है, जिससे प्रेम और यातना के बीच का भेद कई बार समाप्त होने लग जाता है।

    यह वही ‘अपरिवर्तनीय दुख’ है जिसे अलेक्सिएविच की स्त्रियाँ अपनी संदूकचियों में सहेज कर रखती हैं। अंततः, दोनों ही रचनाएँ इस बिंदु पर एकाकार हो जाती हैं कि युद्ध में पुरुष तो एक बार मरता है, किंतु उसकी स्मृतियों का बोझ उठाने वाली स्त्री उस मृत्यु को अपनी प्रतीक्षा और शोक में सदियों तक पुनर्जीवित रखती है, जहाँ उसका वर्तमान भी उन ‘मारक आशंकाओं’ से निरंतर स्पंदित रहता है।

    “कोई तितली मेरे पैरों के पास आ दम तोड़ती है”—यह दृश्य प्रेम की मृत्यु का सूक्ष्म दृश्य है। तितली, जो पहले चुंबन और आत्मीयता का प्रतीक थी, अब मर रही है। उसी क्षण घोड़े की टाप सुनाई देती है। यानी प्रेम की हर मृत्यु इतिहास की हिंसा को पुनर्जीवित कर देती है। कविता बार-बार स्वप्न और यथार्थ के बीच की सीमा को धुँधला करती है। स्त्री पूछती है—क्या यह वही प्रिय है? क्या वही घोड़ा है? क्या प्रेम का तिलिस्म वास्तव में रक्त की नदी के बीच ही जन्म लेता है? यह प्रश्न कविता का दार्शनिक केंद्रबिंदु है। प्रेम यहाँ निर्मल और निष्कलुष अनुभव नहीं, बल्कि हिंसा, वियोग और मृत्यु से होकर गुज़रने वाली जटिल मानवीय स्थिति है।

    कविता के अंतिम हिस्से में स्वप्न का संसार और अधिक अतियथार्थवादी हो जाता है। सफ़ेद चाँद सीढ़ियाँ उतरता है, धरती वाष्प जैसी लगती है, और संसार में तितलियाँ भरी हुई हैं। यहाँ वास्तविकता लगभग धुँधली हो चुकी है। फिर भी कुछ लोग “भाषा में सचेत” और “मग्न कामकाज में” दिखाई देते हैं। यह आधुनिक सामाजिक संसार की ओर संकेत है जो अपनी स्थिरता के भ्रम में जीता रहता है, जबकि उसके भीतर स्मृतियों और प्रेम की असंख्य तितलियाँ उड़ रही होती हैं।

    इस कविता में बोर्खेज़ (Jorge Luis Borges) का उल्लेख अर्थपूर्ण है। बोर्खेज़ की “जादुई किताब” जिसके पन्ने दोबारा नहीं मिलते, स्मृति और समय की अपरिवर्तनीय नियति का रूपक है। एक बार जो अनुभव बीत गया, वह उसी रूप में लौट नहीं सकता। सुकरात-पूर्व (Pre-Socratic) यूनानी दार्शनिक हेराक्लीटस (Heraclitus) के शब्दों में “आप एक ही नदी में दो बार पैर नहीं रख सकते, क्योंकि न तो वह नदी वही रहती है और न ही आप वही व्यक्ति रहते हैं।” (“No man ever steps in the same river twice, for it’s not the same river and he’s not the same man.”) हेराक्लीटस का यह रूपक समय और अस्तित्व की अनावर्तनीयता (Irreversibility) को दर्शाता है। वस्तुतः यह ‘स्मृति’ के बोझ को और गंभीर बना देता है—समय निरंतर आगे बह रहा है और पीछे केवल यादों का वह ‘अपरिवर्तनीय’ निशान रह जाता है जिसे हम दोबारा जी नहीं सकते, केवल सहेज सकते हैं।

    सच तो यह है कि सविता सिंह की रचना में बोर्खेज़ की ‘जादुई किताब’ का संदर्भ, जिसके पन्ने एक बार पढ़े जाने के बाद दोबारा नहीं मिलते, हेराक्लीटस के नदी वाले दर्शन का एक उच्च साहित्यिक और आधुनिक रूपक बनकर उभरता है। जिस प्रकार हेराक्लीटस कहते हैं कि हम एक ही नदी में दोबारा प्रवेश नहीं कर सकते क्योंकि जल और व्यक्ति दोनों निरंतर परिवर्तनशील हैं, ठीक उसी प्रकार बोर्खेज़ की वह किताब (जो संभवतः उनकी कहानी ‘द बुक ऑफ सैंड’ की ओर संकेत करती है) समय की उस भयावह और जादुई अनावर्तनीयता (Irreversibility) का प्रतीक है जहाँ एक बार बीता हुआ क्षण या अनुभव कभी अपने मूल स्वरूप में वापस नहीं लौटता। जब कवयित्री कहती हैं कि “बोर्खेज़ की किताब नहीं थी बेशक / खोई चीज़ों का शोक था”, तो वे स्पष्ट करती हैं कि स्मृति वास्तव में उस पन्ने की तरह है जिसे हमने पढ़ तो लिया है, लेकिन अब वह उस ‘अनंत किताब’ के भीतर कहीं खो गया है जिसे हम दोबारा कभी उसी रूप में नहीं पा सकते। हेराक्लीटस का दर्शन जहाँ नदी के प्रवाह के माध्यम से परिवर्तन की भौतिकता को दर्शाता है, वहीं बोर्खेज़ और सविता सिंह उस अनावर्तनीयता को ‘शोक’ और ‘स्मृति’ के मनोवैज्ञानिक धरातल पर ले जाते हैं। यहाँ स्त्री का अनुभव उस जादुई किताब के पाठक जैसा है, जो अपने प्रिय के साथ बिताए क्षणों के पन्ने पलट तो चुकी है, परंतु अब उसके पास केवल उन पन्नों के लुप्त होने का पश्चाताप और ‘यादों की हिफ़ाज़त’ का अनिवार्य बोझ शेष है। अंततः, यह अंतरबंध सिद्ध करता है कि समय का प्रवाह (नदी) और स्मृतियों का विलोपन (किताब) दोनों ही मनुष्य को एक ऐसे मुकाम पर छोड़ देते हैं जहाँ वह ‘अस्तित्व के खतरे’ के बीच केवल उन तितलियों और चुंबनों के रंगों के सहारे टिका रहता है, जो कभी लौटकर न आने वाले अतीत की मूक गवाहियाँ हैं।

    लेकिन कविता की प्रोटागोनिस्ट ऐसी किताब की तलाश में है जिसमें पन्ने लौट सकें। यह इच्छा वास्तव में खोए हुए प्रेम, खोए हुए समय और खोई हुई संभावनाओं को पुनः प्राप्त करने की मानवीय आकांक्षा है। बोर्खेज़ीय भूलभुलैया यहाँ स्त्री-स्मृति की भूलभुलैया से जुड़ जाती है।

    “आता है कोई प्रिय कवि भी जाने कहाँ से / थामे अपनी बहन के दो निष्पाप कटे हाथ”—यह दृश्य प्रेम, हिंसा और कला के त्रिकोण को उद्घाटित करता है। कटे हुए हाथ स्त्री के अस्तित्व पर हुए अत्याचार के प्रतीक हैं। यहाँ प्रेम के लिए अस्तित्व का खतरे में होना कविता का केंद्रीय कथ्य बन जाता है। अंततः कविता इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती कि प्रेम मुक्ति है या विनाश। वह केवल यह दिखाती है कि प्रेम के भीतर मृत्यु, स्मृति, हिंसा, करुणा के साथ ही तितलियों जैसी क्षणभंगुर सुंदरता एक साथ रहती हैं।

    इस कविता की एक बड़ी विशेषता इसका स्वप्न-सदृश प्रवाह है। यहाँ समय रैखिक नहीं है; सदियाँ एक क्षण में सिमट जाती हैं और एक चुंबन इतिहास के रक्तस्राव को ढँक देता है। भाषा अत्यंत दृश्यात्मक होते हुए भी प्रतीकात्मक है। घोड़ा, नदी, पत्थर, तितलियाँ, रक्त, जंगल—ये सब केवल दृश्य नहीं, बल्कि चेतना के गहरे रूपक हैं। कविता स्त्री-स्मृति की ऐसी संरचना निर्मित करती है जिसमें प्रेम किसी रोमानी आश्रय की तरह नहीं, बल्कि अस्तित्वगत जोखिम की तरह उपस्थित होता है। इसीलिए ‘सपने और तितलियाँ’ महज़ प्रेम-कविता के बजाय स्मृति, इतिहास, स्त्री-अनुभव और मानवीय असुरक्षा का एक गहन काव्य-दर्शन बन जाती है।

    चूँकि कविता की संरचना बहुस्तरीय है; इसलिए इस पर किसी एक आलोचनात्मक पद्धति से विमर्श करना पर्याप्त नहीं होगा। यह पाठ अपने भीतर स्वप्न, इतिहास, प्रेम, स्मृति, हिंसा, मिथकीय चेतना, स्त्री-अनुभव, अवचेतन और भाषा की जटिलताओं को एक साथ समेटता है। इसलिए अनेक वैचारिक और सौंदर्यात्मक नज़रिए से इस पर सार्थक चर्चा संभव है।

    मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता मानवीय चेतना, अवचेतन, स्मृति, भय, इच्छा और आघात की अत्यंत जटिल संरचनाओं को उद्घाटित करती दिखाई देती है। यह केवल स्वप्न का वर्णन नहीं करती; इसकी पूरी संरचना ही स्वप्न की तरह निर्मित है। यहाँ घटनाएँ किसी तर्कसंगत क्रम में नहीं घटतीं, बल्कि चेतना के गहरे स्तरों से उभरती हुई प्रतीत होती हैं। समय बार-बार टूटता है, वर्तमान में अतीत प्रवेश करता है, मृत व्यक्ति लौट आते हैं, प्रतीक लगातार रूपांतरित होते रहते हैं, और यथार्थ तथा स्वप्न की सीमाएँ धुँधली पड़ जाती हैं। यही कारण है कि कविता को फ्रायड (Sigmund Freud) की ‘स्वप्न-सिद्धि’ और जुंग (Carl Gustav Jung) की ‘सामूहिक अवचेतन’ की अवधारणाओं के आलोक में पढ़ना सार्थक है।

    कविता का पहला ही वाक्य—“एक लंबे सपने का यह छोटा हिस्सा है”—पूरे काव्य-विन्यास की मनोवैज्ञानिक प्रकृति को स्पष्ट कर देता है। यह कोई सामान्य स्वप्न नहीं, बल्कि चेतना के भीतर लंबे समय से सक्रिय किसी दबी हुई अनुभूति का पुनरागमन है। फ्रायड के अनुसार स्वप्न दबी हुई इच्छाओं, स्मृतियों और आघातों की सांकेतिक अभिव्यक्ति होते हैं। वे प्रत्यक्ष रूप में सामने नहीं आते, बल्कि रूपकों, विस्थापन (displacement), संक्षेपण (condensation) और प्रतीकात्मक रूपांतरणों के माध्यम से प्रकट होते हैं। ‘सपने और तितलियाँ’ में यही संरचना बार-बार पुनर्रचित होती दिखाई देती है। कविता किसी स्पष्ट कथा की तरह नहीं चलती; वह स्मृतियों, भय, इच्छाओं और प्रतीकों की ऐसी प्रवाहमान संरचना है जहाँ हर चीज़ अपने सीधे सामान्य अर्थ से अधिक कुछ और संकेत करती है।

    कविता में जंगल का दृश्य अवचेतन के प्रदेश की तरह उपस्थित होता है। स्त्री “घने जंगल” में है, “पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त”। मनोविश्लेषणात्मक अर्थों में जंगल चेतना के उस गहरे और अनियंत्रित क्षेत्र का प्रतीक हो सकता है जहाँ सामाजिक संरचनाओं का नियंत्रण कमज़ोर पड़ जाता है। यह अवचेतन का क्षेत्र है—रहस्यमय, आदिम, भयावह और साथ ही आत्मीय। स्त्री का वहाँ निर्भय होना यह संकेत देता है कि उसका वास्तविक भय बाहरी प्रकृति से नहीं, बल्कि उन दबी हुई स्मृतियों और संबंधों से जुड़ा है जो आगे चलकर सामने आने वाले हैं।

    घोड़े पर सवार पुरुष का प्रवेश स्वप्न की विशिष्ट संरचना के अनुरूप है। वह अचानक आता है, जैसे अवचेतन में दबा हुआ कोई चेहरा अचानक चेतना में लौट आया हो। वह कहता है कि वह “कई जन्मों से” उसे खोज रहा है। फ्रायडीय दृष्टि से देखें तो यह “कई जन्म” वास्तव में ‘मनोवैज्ञानिक समय’ का रूपक हैं—ऐसी स्मृतियाँ और इच्छाएँ जो कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। अवचेतन समय को रैखिक रूप में नहीं जीता; उसमें अतीत हमेशा वर्तमान में सक्रिय रहता है। इसलिए मृत प्रिय का लौटना, पुरानी घटनाओं का वर्तमान में पुनर्जीवित होना और इतिहास का फिर से घटित होना स्वप्न-तर्क की ही संरचना है।

    पुरुष का व्यक्तित्व द्वंद्वात्मक है। वह प्रेमी भी है और शिकारी भी; आकर्षक भी और भयावह भी। उसकी आँखों में अपनी प्रेमिका को हर हालत में पाने की “कठोर प्रतिज्ञा” है, उसके हाथ “सख़्त” हैं, और वह लगभग घोड़े में रूपांतरित होता दिखाई देता है। मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से यह द्वैत आधारभूत है। फ्रायड ने ‘प्रेम और मृत्यु-प्रेरणा’ (Eros and Thanatos) के सह-अस्तित्व की बात की थी। कविता में पुरुष इसी द्वैत का प्रतिनिधि बन जाता है। वह प्रेम चाहता है, लेकिन उसके भीतर अधिकार, हिंसा और विनाश की आकांक्षा भी मौजूद है। यही वजह है कि स्त्री उसके प्रति एक साथ आकर्षण और भय दोनों महसूस करती है। अवचेतन में प्रेम कभी पूरी तरह निर्मल नहीं होता; उसमें स्वामित्व, हिंसा, भय और खो देने की आशंका भी शामिल रहती है।

    “मेरा एकांत सदा के लिए नष्ट होने वाला है”—यह पंक्ति मनोवैज्ञानिक स्तर पर आत्म-सत्ता के विघटन के भय को व्यक्त करती है। प्रेम यहाँ आत्म-विस्तार के बजाय आत्म-लोप का संकट बन जाता है। स्त्री का भागना केवल किसी पुरुष से बचने की तरकीब के बजाय अपने मनोवैज्ञानिक अस्तित्व की रक्षा की कोशिश भी है। लेकिन भागते हुए भी वह उससे मुक्त नहीं हो पाती, क्योंकि वह पुरुष बाहरी व्यक्ति से अधिक उसकी याददाश्त और अवचेतन का हिस्सा बन चुका है।

    कविता में बार-बार लौटती स्मृतियाँ फ्रायड के ‘आघात की पुनरावृत्ति’ (repetition compulsion) की अवधारणा की याद दिलाती हैं। स्त्री को अचानक याद आता है कि वह पहले भी “इसी नदी के किनारे” मारी गई थी, उसके बच्चे उससे छीन लिए गए थे। यह स्मृति किसी ऐतिहासिक घटना की तरह नहीं, बल्कि आघात या ‘ट्रॉमा’ की पुनरावृत्ति की तरह लौटती है। मनोविश्लेषण सिद्धांत के अनुसार गहरा आघात कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता; वह अलग-अलग रूपों में बार-बार चेतना में लौटता रहता है। कविता में घोड़े की टाप सुनाई देना, रक्त की नदी का उभरना, मृत देह की अनुभूति—ये सब उसी आघात की पुनरावृत्तियाँ हैं।

    जुंग की अवधारणाओं के आलोक में देखें तो कविता के कई प्रतीक सामूहिक अवचेतन के आद्यरूपों (archetypes) की तरह कार्य करते हैं। घोड़ा आदिम ऊर्जा, प्रवृत्ति, शक्ति और अनियंत्रित वेग का प्रतीक है। वह केवल बाहरी प्राणी नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की आदिम पशु-ऊर्जा का रूपक भी है। नदी जीवन, समय, स्मृति और अवचेतन की प्रवहमानता का प्रतीक बनती है। रक्त की नदी हिंसा और ज़िंदगी दोनों का संकेत देती है। जंगल आदिम चेतना का क्षेत्र है जहाँ सभ्यता के नियम टूट जाते हैं। तितलियाँ सारगर्भित प्रतीक हैं। वे आत्मा, रूपांतरण, प्रेम और क्षणभंगुरता के आद्यरूप की तरह उपस्थित हैं। वे “हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं”—यह दृश्य मनोवैज्ञानिक स्तर पर आत्माओं या चेतनाओं के गहरे संवाद का प्रतीक बन जाता है।

    तितलियों का चुंबनों में बदल जाना इच्छा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। लेकिन वही तितलियाँ बाद में मरती हुई दिखाई देती हैं। इसका अर्थ है कि प्रेम की ऊर्जा स्वयं आघात और मृत्यु से आक्रांत हो चुकी है। फ्रायडीय अर्थों में यहाँ इच्छा और मृत्यु की प्रेरणा एक-दूसरे में उलझी हुई हैं। प्रेम सृजन और संहार दोनों का संगम हो सकता है।

    कविता में सपना और स्मृति लगातार एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। स्त्री बार-बार यह निश्चित नहीं कर पाती कि जो सामने है वह सपना है, अतीत है या वर्तमान। यह अस्थिरता अवचेतन की मूल प्रकृति को व्यक्त करती है। मनोविश्लेषण यह मानता है कि चेतना का सुव्यवस्थित संसार केवल सतह है; उसके नीचे इच्छाओं, भय, दमन और स्मृतियों का अराजक संसार सक्रिय रहता है। ‘सपने और तितलियाँ’ इसी गहरे आंतरिक संसार का काव्यात्मक रूप है।

    बोर्खेज़ (Jorge Luis Borges) की “जादुई किताब” का संदर्भ भी मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से अपरिहार्य है। वह किताब जिसके पन्ने एक बार पढ़ लेने के बाद फिर नहीं मिलते, स्मृति की उस अस्थिरता का रूपक है जिसमें अनुभव पूरी तरह पुनः प्राप्त नहीं किए जा सकते। लेकिन कविता की प्रोटागोनिस्ट उस सपने की तलाश करती है जिसमें “कोई भी पन्ना अपनी किताब में / दोबारा लौट सकता था।” यह इच्छा वास्तव में खोई हुई स्मृति, खोए हुए प्रेम और टूटे हुए आत्मानुभव को पुनः प्राप्त करने की गहरी मनोवैज्ञानिक आकांक्षा है।

    कविता के अंतिम हिस्सों में जब वास्तविकता लगभग धुँधली हो जाती है और स्वप्न, स्मृति, मृत्यु तथा प्रेम एक ही संवेदनात्मक प्रदेश में आ मिलते हैं, तब कविता अवचेतन की उस स्थिति तक पहुँच जाती है जहाँ व्यक्ति स्वयं को स्पष्ट सीमाओं में नहीं बाँध पाता। मृत प्रिय फिर भी जीवित लगता है, तितलियाँ चुंबनों की तरह देह पर टिकी रहती हैं, और रक्त की नदी आज भी बह रही होती है। यह सब मनोविश्लेषणात्मक अर्थों में दबी हुई इच्छाओं, अधूरे शोक और अपूर्ण प्रेम की निरंतर सक्रियता का काव्यात्मक रूपांतरण है।

    इस प्रकार ‘सपने और तितलियाँ’ मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से प्रेम और आघात, इच्छा और भय, स्मृति और अवचेतन के जटिल अंतर्संबंधों की एक विलक्षण कविता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी सिद्धांत को प्रत्यक्ष रूप से नहीं दोहराती, बल्कि स्वयं अस्पष्ट, प्रतीकात्मक, बहुव्यंजक और गहरे मानवीय अनुभवों से परिपूर्ण स्वप्न की तरह व्यवहार करती है।

    लाकाँ (Jacques Lacan) और उनके परवर्ती चिंतकों के सिद्धांत भी इस कविता के मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन में कुछ स्तरों पर उपयोगी और सूक्ष्म व्याख्यात्मक संभावनाएँ खोलते हैं। यह सही है कि ‘सपने और तितलियाँ’ जैसी कविता पर बुनियादी स्तर पर फ्रायड और जुंग की अवधारणाएँ अधिक सहज रूप से लागू होती दिखाई देती हैं, क्योंकि कविता की सतह पर स्वप्न, स्मृति, आद्य-प्रतीक और अवचेतन की गतियाँ स्पष्ट रूप से उपस्थित हैं। लेकिन यदि कविता की भाषिक संरचना, इच्छा (desire), अभाव (lack), आत्म-निर्माण, स्मृति की अस्थिरता और प्रेम की असंभवता की ओर गहराई से देखा जाए, तो लाकाँ की उपस्थिति सहायक सिद्ध होती है।

    लाकाँ का सबसे केंद्रीय विचार यह है कि मनुष्य की इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती; वह हमेशा किसी अभाव से संचालित होती है। प्रेम में मनुष्य वास्तव में दूसरे व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके भीतर उस चीज़ को खोजता है जिसकी कमी उसके अपने अनुभव में होती है। ‘सपने और तितलियाँ’ में यही संरचना बार-बार दिखाई देती है। घोड़े पर सवार पुरुष लगातार स्त्री तक पहुँचने की कोशिश करता है। वह कहता है कि उसके “फल और नदियाँ” स्त्री के पास हैं, कि वह “भूखा और प्यासा” है। यह केवल प्रेम की भाषा नहीं; यह अभाव की भाषा है। वह स्त्री में किसी ऐसी खोई हुई पूर्णता को खोज रहा है जो उसके अपने वजूद में मौजूद नहीं है। लेकिन विडंबना यह है कि स्त्री स्वयं भी आधी-अधूरी और डरी हुई है। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे के भीतर किसी खोई हुई संपूर्णता की तलाश कर रहे हैं, जो कभी मिल नहीं सकती। यही लाकाँ की इच्छा-संरचना का मूल है।

    कविता में बार-बार उपस्थित “याद करो” का आग्रह भी लाकाँनियन अर्थों में सारगर्भित है। स्मृति यहाँ स्थिर नहीं है; वह टूटी हुई, असंगत और पुनर्निर्मित होती रहती है। स्त्री स्वयं सुनिश्चित नहीं कर पाती कि सामने मौजूद आदमी प्रेमी है, शिकारी है, मृत प्रिय है या उसके अपने डर का ही रूप। लाकाँ के अनुसार आत्म की पहचान कभी स्थिर नहीं होती; वह हमेशा भाषा और ‘अन्य’ की दृष्टि के भीतर निर्मित होती है। कविता में स्त्री की चेतना लगातार इसी अस्थिरता से गुजरती है। वह अपने अतीत को भी पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। इसलिए कविता में स्मृति एक विश्वसनीय पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि बिखरे हुए संकेतों और छवियों का पुनर्गठन है।

    लाकाँ की “अन्य” (the Other) की अवधारणा भी यहाँ उपयोगी प्रतीत होती है। पुरुष केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि स्त्री की चेतना के भीतर उपस्थित एक जटिल “अन्य” है—वह आकर्षण भी है, भय भी; प्रेम भी है, हिंसा भी। स्त्री उससे भागती है, लेकिन उसी की ओर खिंचती भी है। वह उसे अस्वीकार करना चाहती है, फिर भी उसकी स्मृति में बसी रहती है। यह द्वंद्व लाकाँनियन मनोविश्लेषण की केंद्रीय संरचनाओं में से एक है, जहाँ इच्छा हमेशा निषेध और आकर्षण के बीच झूलती (oscillate) रहती है।

    कविता का एक और खास पहलू यह भी है कि यहाँ प्रेम कभी पूरी मौजूदगी में नहीं आता; वह हमेशा अनुपस्थिति, मृत्यु और स्मृति के माध्यम से उपस्थित होता है। मृत प्रिय लौटता है, लेकिन पूरी तरह नहीं। तितलियाँ चुंबनों की स्मृति हैं, स्वयं चुंबन नहीं। बोर्खेज़ की वह किताब जिसके पन्ने दोबारा नहीं मिलते, भी इसी असंभव पुनर्प्राप्ति का रूपक है। लाकाँ के अनुसार इच्छा हमेशा उस चीज़ के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे पूरी तरह पाया नहीं जा सकता। कविता में प्रेम इसी असंभव वस्तु की तरह उपस्थित है।

    लाकाँ के परवर्ती चिंतकों—विशेषकर जूलिया क्रिस्टेवा (Julia Kristeva), लूस इरिगरे (Luce Irigaray) और स्लावोय जिज़ेक (Slavoj Žižek)—की अवधारणाएँ भी इस कविता के विश्लेषण में एक हद तक उपयोगी प्रतीत होती हैं। उदाहरण के लिए, क्रिस्टेवा के ‘वीभत्सता के सिद्धांत’ (abjection theory) की सहायता से रक्त, मृत देह, भय और आकर्षण के उस मिश्रण को समझा जा सकता है जो कविता में बार-बार उभरता है। स्त्री उस पुरुष से भयभीत है, लेकिन वही उसका प्रिय भी है। प्रेम और विकर्षण का यह सह-अस्तित्व वीभत्सता (abjection) की संरचना के निकट जाता है।

    इरिगरे की स्त्रीवादी मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो कविता पितृसत्तात्मक इच्छा-संरचना की आलोचना भी करती है। पुरुष स्त्री की “नदियों” और “फलों” पर दावा करता है; यानी स्त्री को उसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी कमी को पूरा करने के साधन के रूप में देखता है। लेकिन कविता की स्त्री इस अधिग्रहण से बचने की कोशिश करती है। उसका भागना, उड़ना, पेड़ों की फुनगियों तक पहुँचना—ये सब स्त्री-इच्छा की स्वायत्तता के संकेत हैं।

    बावजूद इसके, यह सच है कि कविता का अध्ययन केवल लाकानियन ढाँचे में सीमित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा किया जाए तो उसके स्वप्निल, मिथकीय और भावात्मक पक्षों की कुछ विशिष्टताएँ दब सकती हैं। फ्रायड और जुंग की तुलना में लाकाँ भाषा, संरचना और इच्छा पर अधिक बल देते हैं, जबकि इस कविता में आद्य-प्रतीकों और दृश्यात्मक संवेदनाओं की भी बड़ी भूमिका है। इसलिए सबसे संतुलित दृष्टि शायद यही होगी कि कविता को बहुस्तरीय मनोविश्लेषणात्मक परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाए—जहाँ फ्रायडीय स्वप्न-संरचना, जुंगीय आद्यरूप (archetypes) और लाकाँनियन इच्छा-सिद्धांत एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करें। इस प्रकार कविता में जहाँ प्रेम, स्मृति, भाषा, भय और अभाव एक-दूसरे में उलझ जाते हैं, वहाँ लाकाँ और उनके परवर्ती चिंतक रचना के उन जटिल आयामों को खोलने में कहीं-कहीं सहायक ज़रूर हैं।

    ‘सपने और तितलियाँ’ को स्मृति और आघात (trauma) के अध्ययन की दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता केवल प्रेम या स्वप्न का आख्यान नहीं रह जाती, बल्कि ऐसी चेतना का दस्तावेज़ बन जाती है जो किसी गहरे ऐतिहासिक, भावात्मक और अस्तित्वगत आघात को लगातार अपने भीतर ढो रही होती लगती है। कविता की पूरी संरचना इस तथ्य पर आधारित है कि अतीत समाप्त नहीं हुआ है। वह वर्तमान के भीतर जीवित है, बार-बार लौटता है, और चेतना को लगातार विचलित करता रहता है। यही कारण है कि कविता का अनुभव रैखिक न होकर पुनरावर्ती (recursive) है। स्मृतियाँ यहाँ स्थिर या संग्रहित नहीं हैं; वे जीवित, सक्रिय और हिंसक हैं। वे केवल याद नहीं आतीं—वे पुनः घटित होती हैं।

    कविता का आरंभ जिस “एक लंबे सपने का यह छोटा हिस्सा है” जैसी पंक्ति से होता है, वह “लंबा सपना” वास्तव में उस दीर्घकालिक मानसिक स्थिति का संकेत है जिसमें आघातग्रस्त चेतना रहती है। ‘ट्रॉमा स्टडीज़’ यह मानती हैं कि गहरा आघात किसी घटना के बीत जाने से ही समाप्त नहीं हो जाता; वह व्यक्ति की स्मृति-संरचना में एक अनसुलझे अनुभव की तरह जमा रहता है और अलग-अलग रूपों में पुनः उभरता रहता है। कविता में भी प्रोटागोनिस्ट किसी एक अतीत को याद नहीं कर रही, बल्कि वह उस अतीत के भीतर लगातार लौटती जा रही है। यही कारण है कि स्वप्न और वर्तमान एक-दूसरे में घुल जाते हैं।

    जंगल का दृश्य पहली दृष्टि में शांत और आत्मीय प्रतीत होता है, लेकिन इसी के भीतर दबी हुई स्मृतियों का प्रदेश मौजूद है। वक्ता प्रकृति के बीच “निर्भय” है, किंतु जैसे ही घोड़े पर सवार पुरुष आता है, उसके भीतर किसी पुराने भय की हलचल शुरू हो जाती है। यहाँ ट्रॉमा की एक रेखांकनीय विशेषता दिखाई देती है—आघात अक्सर किसी अप्रत्याशित दृश्य, ध्वनि या उपस्थिति से पुनः सक्रिय हो जाता है। पुरुष का आगमन वर्तमान की घटना नहीं रह जाता; वह दबी हुई स्मृति को सक्रिय करने वाला ‘ट्रिगर’ बन जाता है।

    जब स्त्री को अचानक याद आता है कि “इसी नदी के किनारे / इसी पत्थर पर पड़ी रही थी मेरी मृत देह”, तब कविता सदमे के दोहराव (traumatic recurrence) की केंद्रीय संरचना तक पहुँच जाती है। यह याद किसी व्यवस्थित आत्मकथा की तरह नहीं आती। वह अचानक फूट पड़ती है, जैसे अवचेतन में दबा हुआ अनुभव चेतना को चीरकर बाहर आ गया हो। आघातग्रस्त स्मृतियाँ अक्सर खंडित, दृश्यात्मक और तीव्र रूप में इसी तरह लौटती हैं। “नदी”, “पत्थर”, “मृत देह”—ये सब केवल दृश्य नहीं, बल्कि ट्रॉमा के स्मृति-चिह्न हैं। खासतौर से “पत्थर” यहाँ अर्थपूर्ण प्रतीक बन जाता है। वह निर्जीव वस्तु होते हुए भी आघात का गवाह है, जैसे चेतना किसी स्थान विशेष से बँध गई हो और हर बार वहीं लौटने को विवश हो।

    ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में यह भी अहम है कि आघात केवल निजी नहीं है। स्त्री को याद आता है कि उसकी “पुत्रियाँ और पुत्र” उससे छीन लिए गए थे। यह केवल एक प्रेम-संबंध की त्रासदी के बजाय वंश, स्मृति, मातृत्व और अस्तित्व के संहार का अनुभव है। इस प्रकार कविता निजी आघात से आगे बढ़कर स्त्री-इतिहास की सामूहिक स्मृति को छूने लगती है। ट्रॉमा यहाँ व्यक्तिगत मनोविज्ञान से आगे बढ़कर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अनुभव का रूप ले लेता है।

    आघात का एक निर्णायक लक्षण यह है कि वह समय को विखंडित कर देता है। ट्रॉमा से ग्रस्त व्यक्ति के लिए अतीत वास्तव में “बीता हुआ” नहीं होता; वह वर्तमान में हस्तक्षेप करता रहता है। कविता में यही स्थिति बार-बार दिखाई देती है। घोड़े की टाप वर्तमान में सुनाई देती है, लेकिन वह अतीत की हिंसा को पुनर्जीवित कर देती है। मृत प्रिय आज भी उपस्थित लगता है। तितलियाँ अब भी देह पर चुंबनों की तरह टिकी हैं। यहाँ स्मृति संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत अनुभव है। इसीलिए कविता में समय चक्रीय और धुँधला हो जाता है।

    “कोई तितली मेरे पैरों के पास आ दम तोड़ती है / और मुझे तब किसी घोड़े की टाप सुनाई देती है”—यह दृश्य ट्रॉमा की साहचर्यपरक संरचना (associative structure) को व्यक्त करता है। किसी मामूली घटना से पूरा आघात अचानक लौट आता है। तितली का मरना केवल एक दृश्य नहीं रह जाता; वह स्मृति की पूरी हिंसक संरचना को सक्रिय कर देता है। यहाँ तितली खास तौर से अहम प्रतीक है। पहले वही तितलियाँ प्रेम, चुंबन और आत्मीयता का प्रतीक थीं; लेकिन अब वे मृत्यु और आघात से जुड़ जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि आघात ने प्रेम की स्मृतियों को भी दूषित कर दिया है। अब प्रेम और भय अलग-अलग नहीं रह गए हैं।

    कविता में बार-बार लौटती “रक्त की नदी” ट्रॉमा की केंद्रीय छवि है। रक्त यहाँ केवल हिंसा का संकेत नहीं; वह याददाश्त की लगातार बहती हुई धारा है। प्रेम और रक्त साथ-साथ उपस्थित हैं। तितलियाँ चुंबनों में बदलती हैं, लेकिन उनके बीच रक्त की नदी बहती रहती है। यह द्वैत ट्रॉमा की उस संरचना को व्यक्त करता है जिसमें सुखद स्मृतियाँ भी पीड़ा से मुक्त नहीं रह जातीं और प्रेम स्वयं आघात का स्रोत बन जाता है।

    ‘ट्रॉमा स्टडीज़’ में यह माना जाता है कि आघातग्रस्त चेतना अक्सर भाषा के संकट से भी जूझती है। वह अनुभव को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती; इसलिए वह प्रतीकों, स्वप्नों और विखंडित दृश्यों के माध्यम से बोलती है। ‘सपने और तितलियाँ’ की भाषा इसी अर्थ में सांघातिक (traumatic) भाषा है। कविता किसी सीधी कथा की दिशा में नहीं चलती। वह दृश्य-दर-दृश्य खुलती है, जैसे चेतना स्वयं अपने अनुभव को पकड़ने की कोशिश कर रही हो। स्वप्न, स्मृति, वर्तमान, मृत्यु और प्रेम एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। यह विखंडन केवल शैली नहीं, बल्कि आघातग्रस्त चेतना की संरचना है।

    कविता में मृत प्रिय की वापसी भी ट्रॉमा की दृष्टि से आधारभूत है। प्रिय वास्तव में लौटा है या केवल स्मृति में उपस्थित है—यह स्पष्ट नहीं। लेकिन आघातग्रस्त चेतना के लिए यह भेद महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता। मृत व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से जीवित बना रहता है। वक्ता के भीतर उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ। वह आज भी घोड़े की टापों, रक्त की गंध और तितलियों के रंगों में उपस्थित है। इस प्रकार कविता शोक (mourning) और विषाद (melancholia) के बीच की स्थिति को व्यक्त करती है। शोक समाप्त नहीं हुआ; इसलिए स्मृति लगातार सक्रिय है।

    बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का संदर्भ भी स्मृति और आघात की दृष्टि से अर्थपूर्ण है। वह किताब जिसके पन्ने एक बार पढ़े जाने के बाद फिर नहीं मिलते, स्मृति की अपूर्णता और समय की अपरिवर्तनीयता का रूपक है। लेकिन वक्ता उस सपने की तलाश करती है जिसमें पन्ने फिर लौट सकें। यह इच्छा वास्तव में ट्रॉमा से मुक्त होने की इच्छा है—उस क्षण को फिर से पाने की इच्छा जब इतिहास ने अभी सब कुछ नष्ट नहीं किया था। लेकिन कविता जानती है कि लौटना संभव नहीं। इसलिए उसकी संरचना लगातार पुनरावृत्ति और अनुपस्थिति के बीच झूलती रहती है।

    कविता का सबसे गहरा पक्ष यह है कि वह आघात को केवल संहार के रूप में नहीं दिखाती; वह यह भी दिखाती है कि स्मृति मनुष्य को जीवित रखती है। वक्ता की दुनिया “सारे दुख सारे पश्चाताप” से ही जीवंत थी। यानी स्मृति पीड़ा का स्रोत होते हुए भी अस्तित्व की निरंतरता का आधार है। यदि स्मृतियाँ समाप्त हो जाएँ, तो प्रेम भी समाप्त हो जाएगा, चाहे वह कितना ही पीड़ादायक क्यों न हो।

    वस्तुतः ‘सपने और तितलियाँ’ स्मृति और आघात की दृष्टि से ऐसी कविता बन जाती है जिसमें अतीत लगातार वर्तमान को आक्रांत करता रहता है। यहाँ ट्रॉमा किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि चेतना की स्थायी अवस्था है। प्रेम, मृत्यु, हिंसा, चुंबन, रक्त, तितलियाँ और घोड़े की टाप—ये सब मिलकर ऐसी स्मृति-संरचना निर्मित करते हैं जिसमें मनुष्य कभी पूरी तरह अपने अतीत से मुक्त नहीं हो पाता। कविता इसी असंभव मुक्ति की करुण और सुंदर अभिव्यक्ति है।

    इस रचना पर मिथकीय और आद्यरूपात्मक (archetypal) आलोचना के नज़रिए से गौर करने पर यह कविता आधुनिक अनुभवों की अभिव्यक्ति होते हुए भी मानवीय सभ्यता की उन आदिम स्मृतियों और संरचनाओं से जुड़ती दिखाई देती है जो सामूहिक चेतना में गहरे धँसी हुई हैं। यह कविता किसी विशिष्ट मिथक का पुनर्लेखन नहीं करती, न ही किसी एक पौराणिक आख्यान का प्रत्यक्ष उपयोग करती है; बल्कि वह स्वयं एक मिथकीय संसार का निर्माण करती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके प्रतीक और दृश्य इतने मूलभूत, आदिम और सांस्कृतिक रूप से गहरे हैं कि वे किसी एक समय, समाज या कथा से बँधकर नहीं रहते। जंगल, नदी, घोड़ा, आखेट, मृत प्रिय, रक्त, तितलियाँ और पुनरागमन—ये सब ऐसे आद्य-प्रतीक हैं जो मानव-चेतना के सामूहिक अवचेतन में बार-बार लौटते रहे हैं।

    मिथकीय आलोचना का एक केंद्रीय विचार यह है कि साहित्य में कुछ प्रतीक और कथात्मक संरचनाएँ बार-बार उपस्थित होती हैं क्योंकि वे मनुष्य के सार्वभौमिक अनुभवों से जुड़ी होती हैं। जुंग ने इन्हें ही आद्यरूप (archetypes) कहा था—ऐसे आद्यरूप जो सामूहिक अवचेतन में विद्यमान रहते हैं। ‘सपने और तितलियाँ’ इसी प्रकार के आद्यरूपात्मक संसार का निर्माण करती है। कविता की घटनाएँ भले आधुनिक भाषा में व्यक्त हों, लेकिन उनका भाव-संसार अत्यंत प्राचीन और आदिम है।

    कविता का आरंभ जंगल से होता है। मिथकीय और आद्यरूपात्मक दृष्टि से जंगल एक विशिष्ट प्रतीक है। लगभग सभी संस्कृतियों के मिथकों में जंगल अज्ञात, रहस्यपूर्ण और आत्म-परिवर्तनकारी क्षेत्र के रूप में उपस्थित होता है। वह सभ्यता के नियमों से बाहर का प्रदेश है, जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के गहरे सत्य से सामना करता है। यहाँ वक्ता “पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त” है। जंगल उसके लिए भय का स्थान नहीं, बल्कि मूल अस्तित्व का क्षेत्र है। यह प्रकृति और आत्मा के बीच की उस आदिम एकात्मता का संकेत है जिसे सभ्यता अक्सर नष्ट कर देती है। मिथकीय अर्थों में यह ‘प्रारंभिक संसार’ है—एक ऐसा प्रदेश जहाँ अभी सामाजिक संरचनाओं की कठोरता पूरी तरह नहीं पहुँची।

    लेकिन इसी जंगल में घोड़े पर सवार पुरुष का प्रवेश होता है। घोड़ा विश्व-मिथकों में शक्तिशाली प्रतीक रहा है। वह गति, शक्ति, वीरता, युद्ध, मृत्यु और आदिम ऊर्जा से जुड़ा हुआ है। कई मिथकों में घोड़ा मृत्यु और परलोक का वाहक भी होता है। इस कविता में भी घोड़ा केवल परिवहन का साधन नहीं है; वह एक ऐसी ताकत का प्रतीक बन जाता है जो आकर्षक भी है और भयावह भी। पुरुष स्वयं धीरे-धीरे घोड़े से एकाकार होता दिखाई देता है—“ऐसा लगता है कि वह खुद भी एक घोड़ा है।” यह मनुष्य के भीतर उपस्थित आदिम पशु-ऊर्जा का संकेत है। वह केवल प्रेमी नहीं, बल्कि शिकारी, योद्धा और मृत्यु का संवाहक भी है।

    कविता में “आखेट” का रूपक विशेष रूप से मिथकीय संरचना को सक्रिय करता है। आखेट मानव सभ्यता की सबसे पुरानी गतिविधियों में से एक है और मिथकों में वह केवल भोजन प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि शक्ति, वर्चस्व और अस्तित्व-संघर्ष का प्रतीक भी रहा है। यहाँ स्त्री को याद आता है कि वह पहले भी इसी आखेट में हार चुकी थी। वह मारी गई थी, उसकी संततियाँ उससे छीन ली गई थीं। यह स्मृति केवल व्यक्तिगत घटना नहीं रह जाती; वह स्त्री-अस्तित्व की आदिम ऐतिहासिक त्रासदी का रूप ले लेती है। मिथकीय स्तर पर यह उस चिरंतन संघर्ष की पुनरावृत्ति है जिसमें जीवनदायिनी स्त्री-शक्ति और हिंसक पुरुष-शक्ति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं।

    नदी इस कविता का एक केंद्रीय प्रतीक है। मिथकों में नदी जीवन, समय, स्मृति और मृत्यु—सभी का प्रतीक रही है। कई संस्कृतियों में नदी लोकों के बीच की सीमा होती है; वह जीवन और मृत्यु को जोड़ती है। इस कविता में भी नदी बहुआयामी प्रतीक बन जाती है। ‘मेघदूत’ (पूर्व मेघ) में कालिदास का यक्ष कहता है:

    त्वन्निष्यन्दोच्छ्वसितवसुधागन्धसम्पर्करम्यः

    स्रोतोमूर्त्या भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम्।

    दत्त्वा तस्याः परिणतफलप्राप्तये गन्धवाहं

    स्रोतःस्निग्धस्तरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु॥

    (हे मेघ! जब तुम रामगिरि से आगे बढ़ोगे, तब तुम्हारे जल से भीगी हुई पृथ्वी की सुगंध मनोहर लगेगी। वहाँ बहती नदी मानो राजा रंतिदेव की कीर्ति का तरल और प्रवहमान रूप बन गई है। तुम अपनी शीतल, सुगंधित वायु से उस प्रदेश को और भी जीवंत कर देना, जहाँ आश्रमों और वृक्षों के बीच स्निग्ध जलधाराएँ बहती हैं।)

    इस छंद में विश्व की संस्कृतियों और मिथकों में नदी के बहुआयामी प्रतीक बन जाने के उदाहरण के रूप में “स्रोतोमूर्त्या भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम्” अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि कालिदास यहाँ नदी को स्मृति और राजा रंतिदेव की कीर्ति के मूर्त, प्रवहमान रूप में देखते हैं।

    दुनिया के साहित्य में नदी और नदी का किनारा प्रेम की स्मृतियों के साथ ही मृत्यु और रक्तपात का स्थान भी रहा है। भारतीय महाकाव्य परंपरा में महाभारत का महायुद्ध जिस क्षेत्र में हुआ माना जाता है, वह कुरुक्षेत्र के समीप बहने वाली सरस्वती और दृषद्वती नदियों का ही क्षेत्र है। भारत में गांगेय क्षेत्र के साथ ही दुनिया के दूसरे भागों में भी दजला (Tigris), फरात (Euphrates), दान्यूब (Danube), वोल्गा और राइन आदि नदियों के क्षेत्र में हुए भयावह युद्धों के किस्सों से इतिहास भरा पड़ा है, जिनकी चर्चा वहाँ के साहित्य में भी खूब मिलती है।

     ‘सपने और तितलियाँ’ में “रक्त की एक उफनती नदी” का बिंब नदी को जीवन और हिंसा दोनों से जोड़ देता है। यह दोहरा अर्थ मिथकीय प्रतीकों की विशिष्टता है—वे एक ही समय में सृजन और संहार, दोनों का संकेत देते हैं।

    ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में ‘रक्त की उफनती नदी’ पंक्ति से गुज़रते हुए महाभारत के एक छंद की याद आती है जिसमें वर्णन है कि संध्या ढलते ही एक भयानक नदी प्रवाहित होने लगी, जिसकी तरंगें रक्त-प्रवाह से बनी थीं और जिसके तट गीदड़ों के झुंडों से भर गए थे:

    प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी।

    गोमायुगणसंकीर्णा क्षणेन रजनीमुखे॥

    यहाँ नदी केवल विनाश का दृश्य नहीं है। “तरङ्गिणी” और “प्रवाह” उसे जीवित, गतिशील और ऊर्जा से भरा रूप देते हैं, जबकि “शोणित” (रक्त) उसे हिंसा, मृत्यु और युद्ध से जोड़ देता है। यही मिथकीय प्रतीकों की द्वैधता है — वे एक ही समय में जीवन और मृत्यु, दोनों अर्थों को वहन करते हैं। सविता सिंह की “रक्त की एक उफनती नदी” भी इसी प्रकार प्रेम, जीवन, हिंसा और मृत्यु की संयुक्त छवि बन जाती है।

    तितलियों का रूपक कविता की सूक्ष्म मिथकीय संरचनाओं में से एक है। वैश्विक साहित्यिक–सांस्कृतिक परंपराओं में तितली आत्मा, रूपांतरण, पुनर्जन्म और क्षणभंगुर सौंदर्य का प्रतीक रही है। यूनानी परंपरा में ‘साइके’ (psyche) शब्द का अर्थ आत्मा और तितली दोनों से जुड़ता है।

    ‘कुमारसंभव’ के तृतीय सर्ग में वसंत के आगमन का वर्णन करते हुए कालिदास प्रकृति की चंचलता, कोमलता और क्षणभंगुर सौंदर्य को सूक्ष्म बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। इसी प्रसंग में ‘चित्रपतंग’ अर्थात् तितली का उल्लेख विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है:

    तथा विचित्रा व्यतनुत पुष्पशाखाः समन्ततः।

    चञ्चलाः प्रमदा इव ताः सलीलं चित्रपतङ्गाः॥

    इस श्लोक में कवि पुष्पों से लदी शाखाओं की तुलना चंचल तितलियों से करते हैं, जो किसी प्रमदा की भाँति लीलामय गति से इधर-उधर विचर रही हैं। यहाँ तितली केवल एक प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि सौंदर्य की उस क्षणिक सत्ता का प्रतीक है जो अपनी अस्थिरता में ही अर्थवान है। संस्कृत काव्य-परंपरा में ‘चित्रपतंग’ शब्द रंग, कोमलता और चपलता के सम्मिलित बोध को व्यक्त करता है। तितली एक फूल पर ठहरती है और अगले ही क्षण उड़ जाती है; उसका आकर्षण उसकी अनिश्चित गति और अल्पकालिक उपस्थिति में निहित है। इस प्रकार कालिदास के यहाँ तितली का बिंब सौंदर्य और नश्वरता के गहरे संबंध को उद्घाटित करता है।

    वस्तुतः तितली का सौंदर्य इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि वह स्थायित्व का नहीं, बल्कि क्षणभंगुरता का सौंदर्य है। वह मनुष्य को यह अनुभव कराती है कि जीवन की सबसे मोहक वस्तुएँ प्रायः सबसे अधिक अस्थायी होती हैं। यही कारण है कि तितली स्मृति, स्वप्न और विलुप्त होते अनुभवों का एक महत्त्वपूर्ण काव्य-प्रतीक बन जाती है।

    इस दृष्टि से सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ का भाव-संसार भी इसी क्षणभंगुर सौंदर्य, स्मृतियों की अस्थिरता और स्वप्नों की नाजुक संरचना से जुड़ता दिखाई देता है, जहाँ तितली केवल प्रकृति का जीव नहीं रह जाती, बल्कि मनुष्य के भीतर टूटते-बनते अनुभवों, इच्छाओं और स्मृतियों का जीवित रूपक बन जाती है। रचना में उल्लेख है कि तितलियाँ “हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं।” वे चुंबनों में बदल जाती हैं। यहाँ तितली आत्मा और प्रेम के बीच सेतु बन जाती है। लेकिन बाद में वही तितलियाँ मरने लगती हैं। इस प्रकार वे प्रेम की नश्वरता और स्मृति की कोमलता का भी प्रतीक बन जाती हैं। उनका लगातार उड़ना और फिर दम तोड़ देना जीवन और मृत्यु के शाश्वत चक्र का बिंब रचता है।

    विवेच्य कविता में मृत प्रिय का बार-बार लौटना भी एक आद्य बिंब (archetypal motif) है। संसार के मिथकों में मृत प्रेमी या मृत नायक का लौटना एक सामान्य संरचना है। वह कभी प्रेत बनकर लौटता है, कभी स्मृति बनकर, कभी देवत्व ग्रहण करके। यह संरचना मनुष्य की मृत्यु पर विजय पाने की आदिम आकांक्षा और स्मृतियों की अनावर्तनीयता (irreversibility) को दर्शाती है।

    यूनानी मिथकों में ओर्फियस और यूरीडिस (Orpheus and Eurydice) की कथा प्रसिद्ध है, जहाँ ओर्फियस अपनी मृत पत्नी को वापस लाने के लिए पाताल (Underworld) तक चला जाता है, जो प्रेम की उस पराकाष्ठा को दिखाता है जहाँ स्मृति भौतिक रूप धारण करने की कोशिश करती है। भारतीय पुराणों में सावित्री और सत्यवान की कथा में मृत पति का लौटना सतीत्व और संकल्प की शक्ति का प्रतीक है, जबकि लोक-कथाओं में ‘नल-दमयंती’ या मध्यकालीन प्रेमाख्यानों में नायक का प्रेत या हंस रूप में संदेश लेकर लौटना विरह की दार्शनिकता को गहरा करता है। इसी प्रकार, जापानी लोककथाओं में ‘युकी-ओना’ या भूतों की कहानियों में मृत प्रेमी (Yūrei) अक्सर अधूरे वादों को पूरा करने या प्रतिशोध के लिए छाया रूप में लौटते हैं, जो जूलिया क्रिस्टेवा के ‘वीभत्सता’ (Abjection) के सिद्धांत के निकट है—जहाँ मृत देह और जीवित स्मृति के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है। जापानी संस्कृति में यूरी (Yūrei) का अर्थ केवल “भूत” नहीं है, बल्कि यह उन आत्माओं को दर्शाता है जो मृत्यु के बाद भी इस संसार और परलोक के बीच फंसी रह जाती हैं। अंग्रेज़ी साहित्य और यूरोपीय लोकगाथाओं में ‘लियोनोर’ (Leonore) जैसी कहानियाँ विचलित करती हैं, जहाँ मृत प्रेमी घोड़े पर सवार होकर लौटता है और अपनी प्रेमिका को चिता तक ले जाता है। स्पष्ट ही यह सविता सिंह की रचना के उस ‘लथपथ देह’ वाले घोड़े के बिंब के अत्यंत निकट है।

    ये तमाम मिथक सिद्ध करते हैं कि नायक चाहे देवत्व ग्रहण करके लौटे या प्रेत बनकर, उसका लौटना वास्तव में स्त्री की उस ‘प्रतीक्षा के दीर्घ जीवन’ और ‘यादों की हिफाज़त’ की परिणति है, जिसमें समय का चक्र टूटकर स्मृति के एक अनंत दोलन (Oscillation) में बदल जाता है।

    “सपने और तितलियाँ” कविता में प्रिय का लौटना किसी भूत-प्रेत की कथा की तरह नहीं, बल्कि स्मृति और प्रेम की अनश्वरता की तरह घटित होता है। वह घोड़े के साथ जुड़ा हुआ है, इसलिए उसका आगमन हर बार मृत्यु और इतिहास की गूँज भी साथ लाता है। यहाँ प्रेम और मृत्यु अलग नहीं हैं; वे एक-दूसरे के भीतर स्थित हैं। इसमें विरोधी तत्त्व भी परस्पर जुड़े हुए हैं, जो मिथकीय चेतना की विशेषता है।

    कविता में समय की संरचना भी मिथकीय है। यहाँ समय रैखिक नहीं है। “कई जन्म”, “कई-कई सदियाँ”, मृत प्रिय की पुनरावृत्ति—ये सब समय को चक्रीय बना देते हैं। मिथकीय संसार में घटनाएँ एक बार घटकर समाप्त नहीं होतीं; वे लगातार लौटती रहती हैं। ‘सपने और तितलियाँ’ में भी अतीत वर्तमान में जीवित रहता है। यही कारण है कि कविता का अनुभव किसी आधुनिक यथार्थवादी कथा के बजाय एक स्वप्निल मिथकीय आवर्तन जैसा प्रतीत होता है।

    बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का प्रवेश कविता को एक और मिथकीय स्तर प्रदान करता है। वह किताब जिसके पन्ने फिर नहीं मिलते, समय और स्मृति की भूलभुलैया का प्रतीक बन जाती है। लेकिन कविता की वाचक ऐसे संसार की तलाश करती है जहाँ पन्ने लौट सकें। यह खोए हुए समय और खोई हुई आत्मीयता को पुनः प्राप्त करने की आदिम मानवीय आकांक्षा है। मिथक अक्सर इसी असंभव पुनर्प्राप्ति की इच्छा से जन्म लेते हैं—स्वर्णयुग, खोया हुआ प्रेम, मृत प्रिय या नष्ट हो चुकी दुनिया को फिर से पाने की इच्छा।

    कविता की स्त्री स्वयं भी एक आद्यरूपात्मक व्यक्तित्व (archetypal figure) प्रतीत होती है। वह केवल एक व्यक्तिगत चरित्र नहीं रह जाती, बल्कि स्मृति, प्रेम, शोक और जीवनदायिनी शक्ति की आदिम आकृति का रूप ग्रहण कर लेती है। उसके पास जीवन और सृजन के स्रोत के तौर पर “फल और नदियाँ” हैं। लेकिन वही स्त्री मृत्यु, हिंसा और स्मृति के बोझ को भी वहन करती है। इस प्रकार वह पोषण और पीड़ा के सहगामी स्त्री-भाव (simultaneously nurturing and suffering feminine principle) का प्रतिनिधित्व करती है।

    कविता का सबसे गहरा मिथकीय पक्ष शायद यही है कि वह प्रेम को केवल निजी भाव नहीं रहने देती; वह उसे जीवन और मृत्यु, स्मृति और विस्मृति, हिंसा और पुनर्जन्म के सार्वभौमिक मानवीय अनुभव से जोड़ देती है। इसीलिए कविता पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह किसी एक स्त्री की कथा नहीं, बल्कि मानव-चेतना के किसी बहुत पुराने स्वप्न की पुनरावृत्ति है। आधुनिक भाषा और संवेदना के भीतर छिपी यह आदिमता ही ‘सपने और तितलियाँ’ को मिथकीय और आद्यरूपात्मक (archetypal) आलोचना की दृष्टि से समृद्ध और संभावनाशील पाठ बनाती है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ को अस्तित्ववादी दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता प्रेम और स्मृति की साधारण कथा से बहुत आगे बढ़कर मनुष्य की अस्तित्वगत असुरक्षा, अकेलेपन, मृत्यु-बोध और अर्थ-संकट (crisis of meaning) की गहरी अभिव्यक्ति बन जाती है। कविता का मूल अनुभव किसी शाश्वत सत्य या आश्वस्त जीवन-दृष्टि का नहीं, बल्कि ऐसी चेतना का है जो लगातार अपने ही अनुभवों की अनिश्चितता से जूझ रही है। यहाँ व्यक्ति यह निश्चित नहीं कर पाता कि जो उसके सामने उपस्थित है वह प्रेम है या भय, स्मृति है या भ्रम, जीवन है या मृत्यु का विस्तार। यही अनिश्चितता कविता को अस्तित्ववादी संवेदना से गहराई से जोड़ती है।

    अस्तित्ववादी चिंतन का एक केंद्रीय बिंदु यह है कि मनुष्य एक ऐसे संसार में फेंक दिया गया प्राणी है जहाँ उसके जीवन का अर्थ पूर्वनिर्धारित नहीं है। उसे स्वयं अपने अनुभवों, संबंधों और स्मृतियों के बीच अर्थ की खोज करनी पड़ती है। कविता की स्त्री भी इसी प्रकार के अस्तित्वगत संकट (ontological anxiety) से घिरी है। वह किसी सुनिश्चित पहचान या निश्चित भावभूमि में नहीं रहती। उसका अनुभव लगातार बदलता है, टूटता है, पुनः निर्मित होता है। वह जिस पुरुष को देख रही है, वह उसके प्रिय के साथ-साथ भय का स्रोत भी हो सकता है। यही अस्थिरता कविता का केंद्रीय अस्तित्वगत तनाव है।

    कविता की शुरुआत में जंगल का दृश्य पहली दृष्टि में आत्मीय और सुरक्षित प्रतीत होता है। स्त्री “पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त” है। लेकिन यह आश्वस्ति स्थायी नहीं रहती। अचानक घोड़े पर सवार पुरुष का आगमन इस संसार की स्थिरता को भंग कर देता है। अस्तित्ववादी अर्थों में यही वह क्षण है जब व्यक्ति अपने अस्तित्व की अनिश्चितता से सामना करता है। दुनिया, जो अभी तक परिचित और सुरक्षित लग रही थी, अचानक भय और असुरक्षा से भर उठती है। हाइडेगर (Martin Heidegger) ने इसे विजातीय अपनापन (uncanniness) या ‘अनहोमलीनेस’ की स्थिति कहा था—एक ऐसा अनुभव जिसमें मनुष्य अचानक अपने ही संसार में अजनबी हो जाता है। कविता में स्त्री का भय इसी प्रकार का है। जंगल अब भी वही है, नदी वही है, पत्थर वही है, लेकिन उनके भीतर अब एक पुरानी मृत्यु और हिंसा की स्मृति सक्रिय हो उठती है।

    “मेरा एकांत सदा के लिए नष्ट होने वाला है”—यह पंक्ति अस्तित्ववादी दृष्टि से रेखांकन के योग्य है। यहाँ एकांत केवल सामाजिक अकेलापन नहीं है; वह व्यक्ति की आंतरिक सत्ता, उसकी स्वायत्त चेतना और उसके अस्तित्व की निजी भूमि है। पुरुष का आगमन उस एकांत को भंग करने का संकेत बन जाता है। अस्तित्ववादी चिंतन में व्यक्ति का अकेलापन एक मूलभूत स्थिति है। मनुष्य अंततः अपने अनुभवों और मृत्यु के साथ अकेला होता है। कविता की स्त्री इसी अकेलेपन को बचाने की कोशिश करती दिखाई देती है, क्योंकि वही उसका अस्तित्व है।

    कविता में मृत्यु-बोध गहरे रूप में उपस्थित है। स्त्री को याद आता है कि वह “इसी नदी के किनारे” मारी गई थी और उसकी मृत देह उसी पत्थर पर पड़ी रही थी। यह स्मृति केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि वर्तमान चेतना का हिस्सा है। हाइडेगर के अनुसार मनुष्य का सबसे प्रामाणिक अनुभव उसका मृत्यु-उन्मुख अस्तित्व (being-toward-death) है। यह एक ऐसी चेतना है जिसके अस्तित्व की अंतिम और अपरिहार्य संभावना मृत्यु है। ‘सपने और तितलियाँ’ में मृत्यु कोई बाहरी घटना नहीं रह जाती; वह चेतना की भीतरी संरचना में शामिल हो जाती है। घोड़े की टाप, रक्त की नदी, मृत प्रिय की वापसी—ये सब मृत्यु की निरंतर उपस्थिति के संकेत हैं।

    लेकिन कविता की जटिलता यह है कि मृत्यु और प्रेम एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जिससे स्त्री प्रेम करती थी, वही भय और हिंसा की स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ है। यही अस्तित्ववादी त्रासदी है—मनुष्य जिन संबंधों में अर्थ खोजता है, वही संबंध उसे असुरक्षा और पीड़ा भी देते हैं। यहाँ सार्त्र याद आ सकते हैं जिन्होंने “बीइंग एंड नथिंगनेस” (1943) में लिखा है कि मनुष्य के संबंध हमेशा जटिल शक्ति-संबंधों और असुरक्षाओं से भरे होते हैं— (Conflict is the original meaning of being-for-others.)। दूसरे की उपस्थिति हमें पूर्ण नहीं करती; वह हमें अस्थिर भी करती है। इस कविता में स्त्री लगातार इसी अस्थिरता से गुज़रती है। वह पुरुष से भागती भी है और उसकी स्मृति से बँधी भी रहती है।

    “कितना कुछ होता रहता है सतत एक सपने / और यथार्थ के बीच”—यह पंक्ति कविता की अस्तित्वगत संरचना को गहराई से व्यक्त करती है। यहाँ वास्तविकता स्थिर नहीं है। सपना और यथार्थ एक-दूसरे में घुल जाते हैं। व्यक्ति किसी अंतिम सत्य तक नहीं पहुँच पाता। अस्तित्ववादी चिंतन में भी मनुष्य का अनुभव मूलतः अनिश्चित और खुला हुआ माना गया है। अस्तित्ववादी विचारकों के अनुसार दुनिया किसी निश्चित अर्थ से भरी हुई नहीं है; अर्थ मनुष्य की चेतना और अनुभव के भीतर बनते-बिगड़ते रहते हैं। कविता इसी अनिश्चितता को सौंदर्यात्मक रूप देती है।

    कविता में बार-बार लौटती स्मृतियाँ भी अस्तित्ववादी अर्थ ग्रहण करती हैं। स्मृति यहाँ केवल अतीत को याद करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अस्तित्व का बोझ है। स्त्री वर्तमान में भी अतीत से मुक्त नहीं हो पाती। उसका वर्तमान “अब भी जैसे स्पंदित है / उन घटनाओं से।” इसका अर्थ है कि अस्तित्व कोई स्थिर वर्तमान नहीं, बल्कि अतीत, स्मृति और मृत्यु-बोध से निर्मित अनुभव है। मनुष्य अपनी स्मृतियों से बाहर नहीं जा सकता; वे उसके अस्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं।

    तितलियों का रूपक भी अस्तित्ववादी दृष्टि से सूक्ष्म अर्थ ग्रहण करता है। वे क्षणभंगुर हैं, सुंदर हैं, चुंबनों की तरह हैं, लेकिन नश्वर भी हैं। उनका उड़ना और फिर मर जाना जीवन की अस्थिरता और क्षणभंगुरता का बिंब है। मनुष्य प्रेम, आत्मीयता, स्मृति सरीखे जिन अनुभवों को स्थायी समझना चाहता है—वे भी समय के भीतर नश्वर हैं। लेकिन इसी नश्वरता के भीतर जीवन का अर्थ भी निर्मित होता है।

    बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का संदर्भ कविता को अस्तित्ववादी गहराई प्रदान करता है। वह किताब जिसके पन्ने दोबारा नहीं मिलते—समय की अपरिवर्तनीयता और अस्तित्व की एकमात्रता का प्रतीक है। जीवन का कोई क्षण सचमुच वापस नहीं आता। लेकिन वक्ता उस सपने की तलाश करती है जिसमें पन्ने लौट सकें। यह मनुष्य की उस अस्तित्वगत इच्छा का रूपक है जिसमें वह समय और मृत्यु पर विजय पाना चाहता है, जबकि जानता है कि यह संभव नहीं।

    कविता में बार-बार यह सवाल खड़ा होता है कि जो सामने है वह वास्तव में क्या है। “कैसे जानूँ मैं” जैसी पंक्तियाँ व्यक्ति की ज्ञानमीमांसीय अनिश्चितता (epistemological uncertainty) को व्यक्त करती हैं। अस्तित्ववादी चिंतन में मनुष्य किसी अंतिम सत्य का स्वामी नहीं होता; वह लगातार प्रश्नों और अस्थिरताओं के बीच जीता है। कविता की स्त्री भी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुँचती। वह भय, प्रेम, स्मृति, मृत्यु और अकेलेपन आदि का सिर्फ़ अनुभव करती है।

    कविता के अंतिम हिस्सों में संसार लगभग स्वप्निल हो जाता है—धरती धुँध जैसी लगती है, चाँद सीढ़ियाँ उतरता है, मृत लोग फिर भी जीवित प्रतीत होते हैं। यह दृश्य अस्तित्व की उस अनिश्चित और धुँधली प्रकृति को व्यक्त करता है जहाँ वास्तविकता स्वयं स्थिर नहीं रह जाती। व्यक्ति केवल अनुभवों, स्मृतियों और प्रतीकों के बीच भटकता रहता है।

    इस प्रकार ‘सपने और तितलियाँ’ अस्तित्ववादी दृष्टि से मनुष्य की उस मूल स्थिति का काव्यात्मक रूपांतरण है जिसमें प्रेम भी आश्रय नहीं देता, स्मृति भी मुक्ति नहीं देती, और मृत्यु लगातार चेतना के भीतर उपस्थित रहती है। कविता यह दिखाती है कि मनुष्य का अस्तित्व किसी निश्चित अर्थ या स्थिर पहचान पर नहीं टिका होता; वह भय, स्मृति, अकेलेपन और क्षणभंगुर आत्मीयताओं के बीच निरंतर निर्मित होता रहता है। यही उसकी करुणा है और यही उसकी गहरी मानवीयता भी।

    ‘सपने और तितलियाँ’ को उत्तर-आधुनिक दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता अर्थ, स्मृति, पहचान, समय और यथार्थ की स्थिर अवधारणाओं को निरंतर विघटित करती हुई दिखाई देती है। यह कविता किसी एक केंद्र, एक सत्य, एक अनुभव या एक निर्णायक अर्थ की ओर बढ़ने के बजाय निरंतर बहुविकल्पी अर्थ-संभावनाओं, अस्थिर स्मृतियों और विखंडित अनुभवों का संसार रचती है। इसकी संरचना ऐसी है कि पाठक लगातार यह महसूस करता है कि जो सामने है वह पूरी तरह निश्चित नहीं है—न प्रेम, न स्मृति, न पहचान, न ही स्वयं यथार्थ। यही अनिश्चितता इसे उत्तर-आधुनिक संवेदना के अत्यंत निकट ले आती है।

    उत्तर-आधुनिकता का एक उल्लेखनीय लक्षण यह है कि वह किसी स्थिर, अंतिम या सार्वभौमिक सत्य पर अविश्वास करती है। ‘सपने और तितलियाँ’ में भी कोई अंतिम व्याख्या संभव नहीं हो पाती। कविता की स्त्री लगातार यह समझने की कोशिश करती है कि जो सामने है वह प्रेम है या भय, सपना है या स्मृति, वर्तमान है या अतीत। लेकिन कविता इन प्रश्नों का कोई निर्णायक उत्तर नहीं देती। बल्कि उसकी पूरी संरचना ही इस प्रकार निर्मित है कि अर्थ लगातार स्थगित होता रहता है। प्रेमी और शिकारी एक ही व्यक्ति हो सकते हैं; मृत प्रिय वर्तमान में लौट सकता है; स्मृति सपना बन सकती है और सपना स्मृति। यह अर्थ का वही अस्थिर खेल है जिसे उत्तर-आधुनिक चिंतन विशेष महत्त्व देता है।

    इस कविता में समय का स्वरूप विशेष रूप से उत्तर-आधुनिक है। यहाँ समय रैखिक नहीं है। अतीत बीत नहीं जाता; वह वर्तमान में प्रवेश करता रहता है। “कई जन्म”, “कई-कई सदियाँ”, मृत प्रिय की पुनरावृत्ति, बची हुई तितलियाँ—ये सब समय को चक्रीय, विखंडित और बहुस्तरीय बना देते हैं। आधुनिक यथार्थवादी संरचनाओं में समय सामान्यतः क्रमिक होता है; लेकिन इस कविता में समय एक साथ कई दिशाओं में चलता है। वर्तमान में अतीत धड़कता है और स्वप्न भविष्य की तरह उपस्थित होता है। यह समय की उत्तर-आधुनिक विखंडित संरचना है जिसमें काल-क्रम का स्थायित्व टूट जाता है।

    पहचान (identity) का संकट भी कविता का केंद्रीय पक्ष है। स्त्री स्वयं सुनिश्चित नहीं कर पाती कि वह जिस पुरुष को देख रही है, वह वास्तव में कौन है। वही व्यक्ति हिंसक शिकारी भी है और प्रिय भी; वही भय का स्रोत है और स्मृति का केंद्र भी। इस प्रकार पहचान किसी स्थिर सार (essence) की तरह उपस्थित नहीं होती। उत्तर-आधुनिक चिंतन में व्यक्ति की पहचान हमेशा निर्मित, परिवर्तित और अस्थिर मानी जाती है। कविता में भी कोई चरित्र एकरेखीय नहीं है। पुरुष की छवि लगातार बदलती रहती है—वह योद्धा है, प्रेमी है, मृत देह है, घोड़े के साथ एकाकार होती आदिम शक्ति है। इसी प्रकार स्त्री भी केवल प्रेमिका नहीं; वह स्मृति, भय, प्रतिरोध, शोक और इच्छा आदि की बहुस्तरीय सत्ता है।

    कविता का स्वप्न-सदृश विन्यास उत्तर-आधुनिक यथार्थ-बोध को और अधिक जटिल बनाता है। यहाँ वास्तविकता किसी वस्तुनिष्ठ और ठोस अनुभव की तरह मौजूद नहीं है। पूरा संसार मानो स्वप्न, स्मृति और भाषा से निर्मित है। “कितना कुछ होता रहता है सतत एक सपने / और यथार्थ के बीच”—यह पंक्ति कविता के उत्तर-आधुनिक अनुभव को तीव्रता से व्यक्त करती है। सपना और यथार्थ दो पृथक क्षेत्रों की तरह नहीं रहते; वे एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ कविता आधुनिक यथार्थवाद से अलग हो जाती है। वह वास्तविकता को स्थिर वस्तु नहीं मानती; बल्कि उसे चेतना, स्मृति और भाषा के भीतर निर्मित होने वाली तरल संरचना की तरह देखती है।

    उत्तर-आधुनिक आलोचना भाषा को भी स्थिर अर्थ देने वाली प्रणाली नहीं मानती। भाषा में अर्थ लगातार सरकता रहता है। ‘सपने और तितलियाँ’ की भाषा भी इसी प्रकार बहुव्यंजक है। “फल”, “नदियाँ”, “तितलियाँ”, “रक्त की नदी”, “घोड़े की टाप”—ये सभी प्रतीक किसी एक अर्थ में स्थिर नहीं होते। तितलियाँ प्रेम भी हैं, स्मृति भी, चुंबन भी, आत्मा भी, और बाद में मृत्यु तथा यातना की छवि भी। घोड़ा शक्ति भी है, हिंसा भी, मृत्यु भी, स्मृति भी। यही अर्थ की अस्थिरता कविता को उत्तर-आधुनिक संवेदना से जोड़ती है।

    कविता में अंतर्निहित अंतर्पाठीयता (intertextuality) भी महत्त्वपूर्ण है। बोर्खेज़ का उल्लेख केवल एक साहित्यिक संकेत नहीं है; वह पूरी कविता की संरचना को एक वैश्विक और दार्शनिक संदर्भ से जोड़ देता है। उत्तर-आधुनिक साहित्य में यह बुनियादी मान्यता है कि कोई भी पाठ पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता; वह अन्य पाठों, स्मृतियों और सांस्कृतिक संकेतों से निर्मित होता है। बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का प्रवेश कविता को अनंत पाठ (infinite text), भूलभुलैया, स्मृति और पुनर्पाठ की अवधारणाओं से जोड़ देता है।

    बोर्खेज़ की वह किताब जिसके पन्ने एक बार पढ़े जाने के बाद दोबारा नहीं मिलते, समय और अर्थ की अनिश्चितता का शक्तिशाली रूपक है। हर पाठ अद्वितीय है; उसे उसी रूप में पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन कविता की वक्ता ऐसे सपने की तलाश करती है जिसमें “कोई भी पन्ना अपनी किताब में / दोबारा लौट सकता था।” यह इच्छा केवल खोए हुए प्रेम की नहीं, बल्कि अर्थ की स्थिरता और सत्य की पुनर्प्राप्ति की मानवीय आकांक्षा की भी है। किंतु कविता जानती है कि ऐसा संभव नहीं। स्मृति हमेशा अधूरी है, पाठ हमेशा खुला हुआ है, और अर्थ हमेशा स्थगित।

    बोर्खेज़ीय प्रभाव कविता की संरचना में भी दिखाई देता है। बोर्खेज़ की रचनाओं में अक्सर समय चक्रीय हो जाता है, पहचानें टूट जाती हैं, और वास्तविकता स्वयं पाठ में बदल जाती है। ‘सपने और तितलियाँ’ में भी अनुभव किसी ठोस जीवन-यथार्थ की तरह नहीं, बल्कि एक पाठ-सदृश भूलभुलैया की तरह खुलता है। स्त्री अपने ही अनुभवों को पढ़ने और समझने की कोशिश कर रही है, लेकिन वे लगातार बदलते रहते हैं। इस प्रकार कविता स्वयं एक “अनंत पाठ” बन जाती है जिसे किसी एक व्याख्या में सीमित नहीं किया जा सकता।

    उत्तर-आधुनिक दृष्टि से यह भी रेखांकन के योग्य है कि कविता उच्च और निम्न, निजी और ऐतिहासिक, स्वप्न और वास्तविकता, मिथक और आधुनिकता के बीच स्पष्ट विभाजन नहीं करती। व्यक्तिगत प्रेम-कथा अचानक युद्ध और रक्त की स्मृतियों में बदल जाती है; निजी अनुभव विश्व-साहित्यिक संकेतों से जुड़ जाता है; तितलियाँ चुंबन भी हैं और यातना की हमशक्ल भी। यह सीमाओं का धुँधलापन उत्तर-आधुनिक संरचना का केंद्रीय गुण है।

    कविता में उपस्थित विखंडन (fragmentation) भी उल्लेखनीय है। अनुभव किसी क्रमबद्ध कथा की तरह नहीं आता। दृश्य टूटते हैं, स्मृतियाँ अचानक लौटती हैं, समय छलाँगें लगाता है। यह विखंडन केवल शैलीगत प्रयोग नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य की चेतना की स्थिति का संकेत है। व्यक्ति अब किसी एक स्थिर कथा में नहीं जीता; उसका अनुभव बिखरा हुआ, असंगत और बहुवाचिक है। ‘सपने और तितलियाँ’ इसी बिखरी हुई चेतना का काव्यात्मक रूप बन जाती है।

    सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि कविता किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँचती। वह यह नहीं कहती कि प्रेम क्या है, स्मृति क्या है, या सत्य क्या है। वह केवल उन अनुभवों की जटिलता को सामने लाती है जिनमें मनुष्य जीता है। उत्तर-आधुनिक दृष्टि से यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। वह अर्थ को बंद नहीं करती; उसे खुला छोड़ देती है। इसीलिए कविता पढ़ने के बाद भी पाठक के भीतर उसकी छवियाँ—घोड़ा, रक्त की नदी, तितलियाँ, मृत प्रिय, जादुई किताब—लगातार सक्रिय बनी रहती हैं, जैसे पाठ स्वयं समाप्त न होकर पाठक की चेतना में आगे भी लिखा जा रहा हो।

    सिद्धांततः ‘सपने और तितलियाँ’ कविता का किसी निष्कर्ष तक न पहुँचना देरिदा की ‘पाठ को खुला रखने’ की अवधारणा का जीवंत उदाहरण है। देरिदा के अनुसार, भाषा में अर्थ कभी भी स्थिर या पूर्ण नहीं होता, बल्कि वह हमेशा ‘स्थगित’ (Différance) रहता है। जब कविता प्रेम, स्मृति या सत्य जैसी अवधारणाओं को किसी एक परिभाषा में नहीं बाँधती, तो वह वास्तव में उस ‘लोगोसेंट्रिज्म’ (Logocentrism) को चुनौती देती है जो एक अंतिम सत्य या केंद्र की खोज करता है। देरिदा का मानना है कि पाठ को बंद करना (Closure) उसकी संभावनाओं को मार देना है; इसके विपरीत, कविता अनुभवों की जटिलता को बिखेरकर पाठक को अर्थ-निर्माण की एक अनंत प्रक्रिया में छोड़ देती है। यह खुलापन ही पाठ को विखंडन (Deconstruction) के योग्य बनाता है, जहाँ कविता किसी सत्य का उपदेश देने के बजाय उस सत्य के होने की विभिन्न परतों और अंतर्विरोधों को उजागर करती है। उत्तर-आधुनिक संदर्भ में, कविता की यह निष्कर्षहीनता ही उसे एक ‘ओपन टेक्स्ट’ बनाती है, जो यह स्वीकार करती है कि मानवीय अनुभव इतने व्यापक हैं कि उन्हें किसी एक अंतिम वाक्य में कैद नहीं किया जा सकता।

    इस पाठ को इको-क्रिटिकल या पर्यावरणीय नज़रिए से पढ़ने पर यह मनुष्य, प्रकृति, स्मृति और हिंसा के संबंधों की सूक्ष्म और गहरी पड़ताल करती दिखाई देती है। पहली नज़र में यह कविता प्रेम, स्वप्न और स्मृति की गाथा लग सकती है, लेकिन इसके भीतर प्रकृति की जो उपस्थिति है, वह केवल सजावटी या पृष्ठभूमिगत नहीं है। जंगल, नदी, हवा, पेड़, पत्थर, तितलियाँ और घोड़ा—ये सभी कविता के सक्रिय नैतिक और संवेदनात्मक तत्त्व हैं। वे केवल दृश्य निर्मित नहीं करते, बल्कि मनुष्य की चेतना, उसके भय, उसकी स्मृतियों और उसकी हिंसक सभ्यता के प्रतिपक्ष के रूप में काम करते हैं। कविता में प्रकृति एक जीवित सत्ता है, जो मनुष्य के साथ संवाद करती है और कई बार मनुष्य-संस्कृति से अधिक विश्वसनीय और आत्मीय दिखाई देती है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ कविता का आरंभ ही एक घने जंगल से होता है, और यह आरंभ अर्थपूर्ण है। स्त्री “पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की तरह आश्वस्त” है। यह आश्वस्ति केवल भौतिक सुरक्षा का अनुभव नहीं, बल्कि अस्तित्वगत आत्मीयता का अनुभव है। वह जंगल के जीवों के बीच “निर्भय” है और “उनके प्रलापों से अवगत” भी। यहाँ मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई विभाजन नहीं है। स्त्री स्वयं को प्रकृति से अलग सत्ता की तरह नहीं देखती; वह उसी जैविक और संवेदनात्मक संसार का हिस्सा है। इको-आलोचना के लिए यह विचारणीय बिंदु है, क्योंकि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता ने मनुष्य और प्रकृति के बीच जिस द्वैत को निर्मित किया, यह कविता उसे अस्वीकार करती दिखाई देती है।

    ख़ास बात यह है कि कविता में भय प्रकृति से उत्पन्न नहीं होता। जंगल, नदी, हवा या पशु किसी भी स्तर पर हिंसक नहीं हैं। ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ की शकुंतला की तरह ‘सपने और तितलियाँ’ की स्त्री वहाँ स्वतंत्र और निर्भय है। भय तब पैदा होता है जब घोड़े पर सवार पुरुष प्रवेश करता है। यह विभाजन अर्थपूर्ण है। सभ्यता का प्रतिनिधि पुरुष—जो स्वामित्व, अधिकार, युद्ध और आखेट की मानसिकता लेकर आता है—वास्तविक हिंसा का स्रोत है। इस प्रकार कविता परोक्ष रूप से आधुनिक पितृसत्तात्मक और युद्धप्रधान सभ्यता की आलोचना करती है। प्रकृति के बीच जो संतुलन और सह-अस्तित्व था, वह मनुष्य की सत्ता-कामना से भंग होता है।

    कविता में “फल और नदियाँ” का रूपक खास तौर से विचारणीय है। पुरुष कहता है कि उसके कुछ “फल और नदियाँ” स्त्री के पास हैं। यहाँ फल और नदियाँ केवल प्राकृतिक वस्तुएँ नहीं हैं; वे जीवन, तरलता, उर्वरता, सृजन और पोषण के प्रतीक हैं। स्त्री का अस्तित्व स्वयं प्रकृति से जुड़ जाता है। वह जीवनदायिनी शक्ति की वाहक है। लेकिन पुरुष उन्हें अपने “हिस्से” के रूप में देखता है। इस प्रकार प्रकृति और स्त्री दोनों पर स्वामित्व की समान मानसिकता लागू होती है। इको-फेमिनिस्ट आलोचना लंबे समय से यह रेखांकित करती रही है कि स्त्री और प्रकृति दोनों का शोषण पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचनाओं द्वारा समान रूप से किया गया है। ‘सपने और तितलियाँ’ में यह संबंध सूक्ष्म रूप से व्यक्त होता है।

    कविता में नदी की उपस्थिति बहुआयामी है। नदी स्मृति का स्थल है, प्रेम का भी और मृत्यु का भी। “इसी नदी के किनारे / इसी पत्थर पर पड़ी रही थी मेरी मृत देह”—यह दृश्य प्रकृति को केवल सुंदर पृष्ठभूमि नहीं रहने देता; वह इतिहास और आघात की साक्षी बन जाती है। नदी यहाँ समय और स्मृति की तरह बहती है। वह मनुष्य की हिंसा को अपने भीतर सँजोए हुए है। लेकिन वही नदी जीवन का भी स्रोत है। इस प्रकार प्रकृति कविता में एक नैतिक उपस्थिति ग्रहण करती है—वह मनुष्य के इतिहास की मूक साक्षी है।

    संस्कृत काव्य-परंपरा में कालिदास रचित ‘मेघदूतम्’ का एक प्रसंग नदी को समय, स्मृति और विरह की साक्षी के रूप में देखने का उदाहरण है। इसमें निर्विन्ध्या नदी का वर्णन केवल प्रकृति चित्रण नहीं है, बल्कि वह यक्ष की विरह-अवस्था और उसकी स्मृतियों का प्रतीक बनकर उभरती है। कालिदास लिखते हैं:

    वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणिपांक्तिकाञ्ची, संसर्पन्ती स्खलितमभितो दर्शितार्तवावर्ता।

    निर्विन्ध्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः सन्निपत्य, स्त्रीणामार्द्यं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु॥

    यहाँ नदी के जल का उतार-चढ़ाव और उसके भँवर यक्ष की मानसिक उथल-पुथल और उसकी प्रेयसी की स्मृति को साकार करते हैं। नदी यहाँ समय के उस प्रवाह की तरह है जो अतीत की स्मृतियों को वर्तमान में जीवित रखती है। इसी प्रकार, भवभूति के नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ में तमसा और मुरला नदियाँ साक्षात पात्र के रूप में आती हैं। वे सीता के परित्याग, राम के शोक और पंचवटी के पुराने इतिहास की मूक साक्षी हैं। वहाँ नदी केवल जल की धारा नहीं, बल्कि मानवीय करुणा, समय के क्रूर प्रहार और स्मृतियों के ‘आघात’ को अपने भीतर सँजोए हुए एक नैतिक उपस्थिति है, जो मनुष्य के इतिहास की गवाही देती है।

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में नदी का बिंब संस्कृत काव्य की उस महान परंपरा का विस्तार करता है जहाँ प्रकृति केवल निर्जीव दृश्य नहीं, बल्कि मानवीय नियति की गवाह है। जिस तरह ‘उत्तररामचरितम्’ में तमसा नदी राम के विलाप और सीता के संताप की साक्षी बनती है, उसी तरह सविता सिंह की पंक्तियाँ—”इसी नदी के किनारे / इसी पत्थर पर पड़ी रही थी मेरी मृत देह”—प्रकृति के सौंदर्यबोध को एक ऐतिहासिक और वंचनापूर्ण आघात में बदल देती हैं।

    भवभूति के ‘उत्तररामचरितम्’ में करुण रस की जो व्याप्ति है, वह केवल पात्रों तक सीमित न रहकर संपूर्ण प्रकृति में एकाकार हो जाती है। विशेषकर तृतीय अंक में जब राम पंचवटी के उन्हीं स्थलों को देखते हैं जहाँ उन्होंने सीता के साथ सुखद समय बिताया था, तब उनकी अंतर्वेदना ‘पुटपाक’ के समान हो जाती है। भवभूति का प्रसिद्ध छंद है:

    अनिर्भिन्नो गभीरत्वात् अन्तर्गूढघनव्यथः।

    पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः॥

    (गंभीर स्वभाव होने के कारण जिनका शोक बाहर प्रकट नहीं हो पाता, (सीता के वियोग में) ऐसे राम का हृदय के भीतर ही छिपा हुआ सघन दुःख मिट्टी के लेप में बंद करके आग में पकाई जाने वाली औषधि (पुटपाक) के समान भीतर ही भीतर सुलग रहा है।)

    यहाँ तमसा नदी राम के उस विलाप की साक्षी है जिसे संसार नहीं देख पाता। इसी प्रकार सविता सिंह की पंक्तियाँ—”इसी नदी के किनारे / इसी पत्थर पर पड़ी रही थी मेरी मृत देह”—प्रकृति के पारंपरिक सौंदर्यबोध को एक ऐतिहासिक और वंचनापूर्ण आघात में रूपांतरित कर देने में समर्थ हैं।

    इन दोनों कवियों के यहाँ प्रकृति केवल एक जड़ वस्तु नहीं, बल्कि स्मृतियों का जीवंत साक्ष्य है। जहाँ भवभूति की तमसा नदी राम की आंतरिक पीड़ा को अपनी लहरों में समेटती है, वहीं सविता सिंह की नदी और पत्थर उस स्त्री-देह के साक्ष्य हैं जिसे इतिहास की मुख्यधारा ने त्याग दिया या भुला दिया। ‘उत्तररामचरितम्’ में राम की पीड़ा मर्यादा के कारण ‘अन्तर्गूढ’ (भीतर छिपी) है, तो सविता सिंह के यहाँ वह पत्थर पर पड़ी ‘मृत देह’ एक ऐसी वंचना का प्रतीक है जो सदियों के मौन और तिरस्कार से उपजी है। जिस प्रकार भवभूति ने ‘पुटपाक’ के माध्यम से एक बंद पात्र की तड़पन दिखाई है, वैसे ही सविता सिंह की पंक्तियों में पत्थर और नदी का सान्निध्य उस पीड़ा को एक ठोस आधार देता है। यहाँ प्रकृति सौंदर्य का विषय न रहकर उस ‘आघात’ की गवाह बन जाती है जहाँ एक देह का अंत होता है और एक अनकहे इतिहास का जन्म। इस तरह, भवभूति का करुण रस और सविता सिंह की ऐतिहासिक वंचना, दोनों ही प्रकृति को मानवीय यंत्रणा के एक शाश्वत गवाह के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

    दूसरे शब्दों में, ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में नदी का तट केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि उस ‘स्मृति’ का केंद्र है जहाँ देह का अंत और समय का साक्ष्य एक साथ मौजूद हैं। यह दृश्य कालिदास की निर्विन्ध्या या भवभूति की तमसा की भाँति ही नदी को समय के निरंतर प्रवाह और मनुष्य के निजी व सामाजिक इतिहास के मूक साक्षी के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ पत्थर और जल केवल प्रकृति के अवयव नहीं रह जाते; वे उस आघात को अपनी ओट में सँजोए हुए हैं जो मनुष्य ने समय के हाथों झेला है, जिससे प्रकृति एक गहरे नैतिक और दार्शनिक प्रश्न की तरह ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में उपस्थित होती है।

    घोड़े का प्रतीक भी इको-आलोचनात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। प्रारंभ में घोड़ा एक प्राकृतिक प्राणी है, लेकिन धीरे-धीरे वह युद्ध, शक्ति और हिंसा का माध्यम बन जाता है। पुरुष स्वयं “घोड़ा” प्रतीत होने लगता है। यहाँ प्रकृति का एक जीव मनुष्य की सत्ता-लिप्सा के साथ जुड़कर हिंसक शक्ति में रूपांतरित हो जाता है। यह उस प्रक्रिया की ओर संकेत है जिसमें मनुष्य प्रकृति को अपने वर्चस्व और युद्ध के औज़ार में बदल देता है।

    तितलियों का रूपक कविता की पर्यावरणीय संवेदना को बेहद सूक्ष्म रूप से व्यक्त करता है। तितलियाँ यहाँ केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं हैं; वे प्रेम, आत्मीयता, स्मृति और जीवन की कोमलता का प्रतीक हैं। कवयित्री के शब्दों में वे “हमारे भीतर से निकलकर” एक-दूसरे तक जाती हैं। यानी प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरा जैविक-संवेदनात्मक संबंध स्थापित होता है। लेकिन बाद में एक तितली “दम तोड़ती” है। यह दृश्य केवल प्रेम की मृत्यु नहीं, बल्कि उस कोमल जीवन-संवेदना की मृत्यु भी है जिसे इतिहास की हिंसा नष्ट कर देती है। तितली का मरना पूरी कविता में एक गहरे पर्यावरणीय शोक का भाव पैदा करता है। यह उस संसार की क्षति का संकेत है जहाँ प्रकृति और मनुष्य के बीच जीवित आत्मीयता संभव थी।

    कविता में हवा का रूपक भी उल्लेखनीय है। जब स्त्री भागती है, तो “हवाओं का वेग” उसमें समा जाता है। यहाँ प्रकृति उसे शक्ति देती है। उसका प्रतिरोध किसी बाहरी हथियार से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ उसके जीवित संबंध से जन्म लेता है। यह दृश्य मनुष्य और प्रकृति के पारस्परिक सह-अस्तित्व की संभावना को व्यक्त करता है। प्रकृति यहाँ निष्क्रिय संसाधन नहीं, बल्कि जीवित सहभागी है।

    इको-क्रिटिकल दृष्टि से कविता का एक अन्य विशिष्ट पक्ष यह है कि वह आधुनिक सभ्यता की हिंसक संरचना को अप्रत्यक्ष रूप से उजागर करती है। युद्ध, रक्त, आखेट, स्वामित्व और सत्ता—ये सब मनुष्य-निर्मित संरचनाएँ हैं। इनके बरक्स जंगल, नदी, तितलियाँ और हवा एक वैकल्पिक नैतिक संसार का संकेत देती हैं। यह संसार प्रतिस्पर्धा या अधिकार पर नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और संवेदनात्मक संबंध पर आधारित है। स्त्री का प्रकृति के बीच सुरक्षित होना और मनुष्य के साथ संबंधों में भयभीत होना इसी विभाजन को रेखांकित करता है।

    कविता का स्वप्न-सदृश संसार भी पर्यावरणीय अर्थ ग्रहण करता है। वहाँ धरती “वाष्प” है, चाँद सीढ़ियाँ उतरता है, तितलियाँ हर जगह उड़ रही हैं। यह दृश्य आधुनिक भौतिकवादी यथार्थ से अलग एक ऐसी चेतना की ओर संकेत करता है जिसमें प्रकृति केवल पदार्थ नहीं, बल्कि जीवित और रहस्यमय उपस्थिति है। इस दृष्टि से कविता आधुनिक मानव-केंद्रित (anthropocentric) दृष्टि की आलोचना करती दिखाई देती है। मनुष्य यहाँ केंद्र नहीं है; वह व्यापक जैविक और प्राकृतिक संसार का एक हिस्सा मात्र है।

    इको-फेमिनिस्ट संदर्भ में देखें तो कविता स्त्री और प्रकृति के साझा शोषण और साझा संवेदनात्मक शक्ति दोनों को सामने लाती है। स्त्री के पास “फल और नदियाँ” हैं; वह जीवन और स्मृति की वाहक है। लेकिन वही सत्ता-लोलुप संरचनाओं द्वारा आक्रांत भी है। प्रकृति भी कविता में इसी तरह उपस्थित है—जीवनदायिनी, सुंदर और संवेदनशील, किंतु युद्ध और हिंसा की साक्षी।

    “जादुई किताब” का संदर्भ भी यहाँ अर्थपूर्ण हो उठता है। वह किताब जिसके पन्ने खो जाते हैं, प्रकारांतर से आधुनिक मनुष्य की उस स्थिति का रूपक बन सकती है जिसमें उसने प्रकृति के साथ अपने मूल संबंध को खो दिया है। वक्ता उस सपने की तलाश करती है जिसमें खोए हुए पन्ने लौट सकें। यह केवल स्मृति की पुनर्प्राप्ति नहीं, बल्कि उस खोई हुई पारिस्थितिक आत्मीयता की खोज भी है जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

    इस प्रकार ‘सपने और तितलियाँ’ की इको-आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कविता प्रकृति को केवल दृश्य-सौंदर्य के रूप में नहीं देखती। वह उसे स्मृति, नैतिकता, प्रेम और प्रतिरोध की जीवंत शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। जंगल, नदी, हवा और तितलियाँ मनुष्य के भीतर बची हुई संवेदना और जीवन की संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि युद्ध, रक्त और आखेट आधुनिक सभ्यता की हिंसक संरचना को उद्घाटित करते हैं। कविता अंततः इस प्रश्न को सामने लाती है कि क्या मनुष्य अपनी स्मृतियों, प्रेम और प्रकृति से कटकर सचमुच जीवित रह सकता है।

    इस रचना को इतिहास और युद्ध की दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता केवल प्रेम, स्मृति और स्वप्न की निजी कथा नहीं रह जाती, बल्कि इतिहास की हिंसा से घायल मानवीय चेतना का गहरा दस्तावेज़ बन जाती है। कविता का एक सारगर्भित पक्ष यह है कि यहाँ प्रेम कभी इतिहास से बाहर नहीं घटित होता। निजी अनुभव लगातार युद्ध, षड्यंत्र, रक्त और मृत्यु की सामूहिक स्मृतियों से आक्रांत है। इस प्रकार कविता निजी और सार्वजनिक, आत्मीय और ऐतिहासिक, प्रेम और हिंसा के बीच उस गहरे अंतर्संबंध को उद्घाटित करती है जिसे आधुनिक इतिहास बार-बार निर्मित करता रहा है।

    कविता का स्वप्निल और मिथकीय विन्यास पहली दृष्टि में इतिहास से दूर प्रतीत हो सकता है, किंतु उसके भीतर बार-बार ऐसे संकेत उभरते हैं जो उसे युद्ध और सत्ता-संघर्ष की स्मृतियों से जोड़ देते हैं। “आखेट”, “घोड़े पर सवार”, “प्रतिद्वंद्वी”, “षड्यंत्र”, “रक्त की नदी”, “मृत देह”—ये सभी बिंब केवल व्यक्तिगत त्रासदी के नहीं हैं; वे युद्ध-संस्कृति की स्मृतियों से निर्मित हैं। कविता में इतिहास किसी कालक्रमिक विवरण की तरह उपस्थित नहीं होता, बल्कि एक गहरे मानसिक और भावात्मक आघात के रूप में उपस्थित होता है जो व्यक्ति की चेतना में लगातार जीवित रहता है।

    घोड़े का प्रतीक यहाँ खास तौर से गौरतलब है। इतिहास और युद्ध की परंपरा में घोड़ा केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति, विजय, साम्राज्य और हिंसा का प्रतीक रहा है। कविता में घोड़े पर सवार पुरुष का प्रवेश केवल प्रेमी का आगमन नहीं है; वह युद्ध-संस्कृति की पूरी स्मृति को साथ लेकर आता है। बाद में जब स्त्री को यह स्मरण होता है कि उसका प्रिय इसी घोड़े की पीठ पर मृत लौटा था, तब घोड़ा मृत्यु और युद्ध की ऐतिहासिक संरचना का वाहक बन जाता है। वह केवल पशु नहीं रह जाता; वह इतिहास की हिंसक गति का प्रतीक बन जाता है।

    कविता में प्रेम और युद्ध का रिश्ता बेहद जटिल है। अमूमन प्रेम को इतिहास की हिंसा से अलग, निजी और आत्मीय क्षेत्र माना जाता है, लेकिन ‘सपने और तितलियाँ’ इस विभाजन को असंभव बना देती है। स्त्री अपने प्रिय को केवल प्रेमी के रूप में याद नहीं करती; वह उसे युद्ध में मारे गए व्यक्ति के रूप में याद करती है। “उसके प्रतिद्वंद्वियों ने षड्यंत्र कर युद्ध में उसे मारा था”—यह पंक्ति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ मृत्यु आकस्मिक नहीं है; वह सत्ता, प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक हिंसा का परिणाम है। प्रेम इस हिंसा से बच नहीं पाता। इतिहास व्यक्ति के सबसे निजी अनुभवों तक में हस्तक्षेप करता है।

    “प्रेम की यह परीक्षा थी”—यह पंक्ति भी गहरी ऐतिहासिक विडंबना को व्यक्त करती है। युद्ध केवल शरीरों को नष्ट नहीं करता; वह प्रेम, स्मृति और आत्मीयता की संरचनाओं को भी बदल देता है। प्रिय की मृत्यु के बाद स्त्री के सामने जो संसार बचता है, वह शोक और स्मृति का संसार है। उसे “उसकी यादों की हिफ़ाज़त” करनी है। यहाँ स्मृति स्वयं ऐतिहासिक प्रतिरोध का रूप ले लेती है। युद्ध मनुष्य को समाप्त कर सकता है, लेकिन उसकी स्मृति को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाता। ‘सपने और तितलियाँ’ कविता इस प्रकार स्मृति को इतिहास के विरुद्ध एक मानवीय प्रतिरोध के रूप में भी प्रस्तुत करती है।

    कविता का “रक्त की एक उफनती नदी” वाला बिंब शक्तिशाली ऐतिहासिक अर्थ का वहन करता है। रक्त यहाँ केवल व्यक्तिगत पीड़ा का नहीं, बल्कि सामूहिक हिंसा का प्रतीक है। नदी का उफनना यह संकेत देता है कि हिंसा किसी एक घटना तक सीमित नहीं; वह इतिहास की निरंतर धारा बन चुकी है। प्रेमी और प्रेमिका के बीच भी रक्त की नदी बह रही है। इसका अर्थ यह है कि इतिहास की हिंसा निजी संबंधों को भी दूषित कर देती है और प्रेम कभी पूरी तरह निष्कलुष नहीं रह पाता।

    कविता में बार-बार लौटती मृत देह भी युद्ध की स्मृति का केंद्रीय चिह्न है। मृत प्रिय की देह घोड़े पर लौटती है, और यह दृश्य किसी प्राचीन युद्ध-कथा की तरह कविता में बार-बार प्रतिध्वनित होता है। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि यह केवल वीरगाथात्मक स्मृति नहीं है। कविता युद्ध का महिमामंडन नहीं करती; वह उसके बाद बची हुई शोकाकुल चेतना को सामने लाती है। स्त्री के लिए युद्ध कोई गौरवशाली घटना नहीं, बल्कि अस्तित्व को तोड़ देने वाला अनुभव है। वह खाली मैदानों और खेतों को देखती हुई जीवन बिताती है। यहाँ युद्ध का प्रभाव युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहता; वह प्रकृति, स्मृति और दैनिक जीवन तक फैल जाता है।

    इतिहास की दृष्टि से कविता का सबसे निर्णायक पक्ष शायद यही है कि वह “बड़े इतिहास” और “छोटे निजी अनुभव” के बीच की दूरी को समाप्त कर देती है। पारंपरिक इतिहास अक्सर युद्धों, युद्ध में विजयी राजाओं और विजय की कथा लिखता है, लेकिन कविता उस इतिहास के भीतर छिपे हुए निजी दुख को सामने लाती है। युद्ध का अर्थ यहाँ केवल राजनीतिक विजय या पराजय नहीं, बल्कि किसी स्त्री का अकेलापन, किसी प्रेम का विघटन, किसी स्मृति का बोझ और किसी जीवन का अंत भी है। इस प्रकार कविता इतिहास को मानवीय संवेदना के स्तर पर पुनर्परिभाषित करती है।

    स्त्री की स्मृति में बार-बार लौटता भय भी इतिहास की निरंतरता को व्यक्त करता है। अतीत समाप्त नहीं हुआ; वह वर्तमान में जीवित है। घोड़े की टाप आज भी सुनाई देती है। रक्त की स्मृति आज भी मौजूद है। इसका अर्थ है कि इतिहास केवल बीती हुई घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि चेतना में सक्रिय शक्ति है। युद्ध की हिंसा पीढ़ियों तक जीवित रहती है। इस दृष्टि से कविता युद्धोत्तर मानसिकता का भी दस्तावेज़ बन जाती है।

    कविता में “पुत्रियाँ और पुत्र छीने जाने” का उल्लेख इतिहास को और व्यापक बना देता है। ऐसे में यह केवल दो व्यक्तियों की प्रेम-कथा के बजाय वंश, परिवार, भविष्य और सामुदायिक अस्तित्व के विनाश की कथा बन जाती है। युद्ध केवल सैनिकों को नहीं मारता; वह आने वाली पीढ़ियों की संभावनाओं को भी नष्ट करता है। इस प्रकार कविता निजी शोक को सामूहिक ऐतिहासिक त्रासदी में रूपांतरित कर देती है।

    बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का संदर्भ भी इतिहास और स्मृति की दृष्टि से अर्थपूर्ण हो उठता है। वह किताब जिसके पन्ने दोबारा नहीं मिलते, इतिहास की अपरिवर्तनीयता का रूपक बन जाती है। जो घट चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन कविता की चेतना लगातार उस खोए हुए समय और खोए हुए प्रेम को पुनः पाने की इच्छा से भरी हुई है। यही इतिहास की सबसे गहरी मानवीय त्रासदी है—मनुष्य स्मृति को बचा सकता है, लेकिन समय को लौटा नहीं सकता।

    कविता में बार-बार दिखाई देने वाले “खाली मैदान” और “खेत” भी युद्धोत्तर संसार के शक्तिशाली प्रतीक हैं। वे केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि अनुपस्थिति और विनाश की स्मृति से भरे हुए स्थल हैं। वहाँ कभी जीवन था, प्रेम था, गति थी; अब केवल स्मृति बची है। इतिहास यहाँ स्मारकों में नहीं, बल्कि खालीपन में दर्ज है।

    विचारणीय यह भी है कि कविता युद्ध और हिंसा को केवल बाहरी राजनीतिक घटना की तरह नहीं देखती; वह यह दिखाती है कि इतिहास मनुष्य की आंतरिक संरचना को भी बदल देता है। प्रेम के भीतर भय प्रवेश कर जाता है। स्मृति के भीतर रक्त बहने लगता है। तितलियाँ चुंबनों से यातना के हमशक्लों में बदल जाती हैं। यानी इतिहास व्यक्ति की भावनात्मक और काल्पनिक दुनिया को भी रूपांतरित कर देता है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ इतिहास और युद्ध की दृष्टि से ऐसी कविता बन जाती है जिसमें निजी जीवन और सामूहिक हिंसा अलग-अलग नहीं रह जाते। सविता सिंह की इस कृति में प्रेम इतिहास से आक्रांत है, स्मृति युद्ध से घायल है, और वर्तमान अतीत की रक्तरंजित प्रतिध्वनियों से भरा हुआ है। कविता इतिहास के उन मौन और निजी आयामों को सामने लाती है जिन्हें आधिकारिक इतिहास अक्सर दर्ज नहीं करता—शोक, प्रतीक्षा, स्मृति, भय और प्रेम की असुरक्षा। यही उसकी गहरी मानवीय और ऐतिहासिक महत्ता है।

    प्रेम विषयक दार्शनिक चिंतन के आलोक में ‘सपने और तितलियाँ’ को पढ़ने पर यह कविता हिंदी की पारंपरिक प्रेम-कविता की संरचनाओं को गहरे स्तर पर विघटित करती हुई दिखाई देती है। यहाँ प्रेम केवल आत्मीयता, मिलन, सौंदर्य और भावुक समर्पण का अनुभव नहीं है; वह भय, हिंसा, स्मृति, असुरक्षा, मृत्यु और अभाव से निर्मित एक जटिल मानवीय स्थिति है। कविता प्रेम के उस रोमानी मिथक को तोड़ती है जिसमें प्रेम को जीवन की अंतिम मुक्ति या पूर्णता के रूप में देखा जाता रहा है। इसके विपरीत, ‘सपने और तितलियाँ’ यह दिखाती है कि प्रेम अपने भीतर ही विघटन, अनुपस्थिति और आघात के बीज लिए रहता है। प्रेम यहाँ आनंद का अनुभव है, किंतु साथ ही वह ऐसी चेतना भी है जो व्यक्ति को असुरक्षित, विखंडित और अनंत स्मृति के बोझ से भरा हुआ छोड़ देती है।

    तुलसीदास की “भय बिनु होइ न प्रीति” वाली शब्दावली की याद दिलाता इस कविता का पूरा भाव-संसार इस गहरे द्वंद्व पर टिका हुआ है कि प्रेम और भय को अलग नहीं किया जा सकता। घोड़े पर सवार पुरुष प्रेमी भी हो सकता है और शिकारी भी। स्त्री उसके प्रति आकर्षित भी है और उससे भयभीत भी। यही जटिलता कविता को सामान्य प्रेम-कविताओं से अलग करती है। प्रेम यहाँ आश्रय नहीं देता; वह व्यक्ति को अस्तित्वगत संकट में डाल देता है। विवेच्य संदर्भ में “मेरा एकांत सदा के लिए नष्ट होने वाला है”—पंक्ति खास तौर पर अहम है, क्योंकि यहाँ प्रेम को आत्म-विस्तार नहीं, बल्कि आत्म-भंग के रूप में अनुभव किया जा रहा है। प्रेम सिर्फ़ किसी सुरक्षित संलयन की प्रक्रिया नहीं; वह व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता और निजी एकांत के विघटन की संभावना भी है।

    कविता में बार-बार लौटती “रक्त की नदी” प्रेम की इसी त्रासदी को ज़बरदस्त ढंग से व्यक्त करती है। तितलियाँ चुंबनों में बदलती हैं, लेकिन उनके बीच रक्त बहता रहता है। यह बिंब प्रेम के भीतर मौजूद हिंसा और मृत्यु-बोध को उद्घाटित करता है। अश्वघोष, कालिदास, जयदेव और दिनकर के यहाँ ‘रक्त की उत्तप्त लहरों’ से प्रेरित प्रेम-देवता को जगाने के लिए लिए गए चुंबन का विशद वर्णन मिलता है।

    उल्लेखनीय है कि अश्वघोष के महाकाव्य ‘सौन्दरनन्द’ में नन्द और उनकी रूपवती पत्नी सुन्दरी के प्रेम का ऐंद्रियगोचर वर्णन है। यहाँ प्रेम केवल एक मानसिक अवस्था नहीं, बल्कि एक शारीरिक ‘जवर’ और ‘उन्माद’ है जो रक्त में तीव्र स्पंदन पैदा करता है। जब नन्द अपनी पत्नी सुन्दरी के सौंदर्य और स्पर्श के पाश में बँधते हैं, तो वह ‘प्रेम-देवता’ (कामदेव) उनके विवेक को पूरी तरह मिटा देता है। ‘सौन्दरनन्द’ (चतुर्थ सर्ग) के एक छंद में प्रेम के उस ‘उन्माद’ और ‘मद’ का वर्णन है जो रक्त में संचारित होकर मनुष्य की चेतना बदल देता है:

    तौ तत्र हर्म्ये विचरन्तौ चरु, परस्परं चाप्यनुरक्तचित्तौ।

    विजह्रतुर्मन्मथ-दत्त-हर्षौ, विमुक्तरोगौ मृग-मन्मथेव॥ (सौन्दरनन्द, 4.10)

    (वे दोनों उस सुंदर महल में विचरण करते हुए, एक-दूसरे के प्रति रक्त और चित्त से पूरी तरह आसक्त होकर, मन्मथ (कामदेव) द्वारा दिए गए हर्ष (उन्माद) में इस प्रकार रम गए, जैसे रोगों से मुक्त दो हिरण काम के वशीभूत होकर वन में विचरण करते हैं।)

    अश्वघोष ने एक अन्य स्थान पर उस शारीरिक प्रतिक्रिया का वर्णन किया है, जहाँ स्पर्श मात्र से नन्द का धैर्य (Fortitude) रक्त की उत्तप्त लहरों में बह जाता है। सुन्दरी जब नन्द को दर्पण पकड़ाती है और उनके शरीर का स्पर्श होता है:

    सा दर्पणं हस्तगतं ददानो, विभ्राजमाना वदनेन नन्दम्।

    करेण सव्येन च लम्बयित्वा, प्रवेपितं मन्मथ-विह्वलाक्षी॥ (सौन्दरनन्द, 4.13-14)

    (हाथ में दर्पण लिए हुए, मुख की आभा से चमकती हुई वह सुन्दरी जब नन्द को दर्पण देती है, तब मन्मथ (प्रेम-देवता) से विह्वल आँखों वाली वह अपने कांपते हुए हाथों से जब नन्द का स्पर्श करती है, तो वह स्पर्श नन्द के भीतर एक कंपन और उन्माद पैदा कर देता है।)

    यहाँ ‘मन्मथ-विह्वला’ में ‘विह्वल’ शब्द उस छटपटाहट को दिखाता है जो रक्त के गर्म होने (Uprising of blood) से पैदा होती है और ‘प्रवेपितं’ (कांपना) वस्तुतः शारीरिक कंपन है जो उस आंतरिक अग्नि का परिणाम है जिसे कालिदास ‘कुमारसंभव’ में ‘तप’ कहते हैं। अश्वघोष यहाँ दिखाते हैं कि यह स्पर्श इतना शक्तिशाली है कि नन्द जैसा राजकुमार अपने राज्य, अपने धर्म और यहाँ तक कि बुद्ध के आमंत्रण को भी भूलकर केवल उस ‘प्रेम-देवता’ के अधीन हो जाता है।

    ‘कुमारसंभवम्’ के आठवें सर्ग में कालिदास उस क्षण का वर्णन करते हैं जहाँ शिव, पार्वती के अधरामृत का पान करते हैं। यहाँ चुंबन ‘मन्मथ’ को जगाने की एक प्रक्रिया है:

    नखपदसुखदं च मन्मथस्य स्फुटमिव पत्रविशेषकं वहन्ती।

    अधरमधरपानलोलुपः स प्रियमिव बिम्बफलं ददंश शंभुः॥ (कुमारसंभवम्, 8.18)

    (मन्मथ (कामदेव) को जाग्रत करने वाले नख-निशानों (नखक्षत) को धारण किए हुए, अधर-पान के लोलुप शिव ने पार्वती के बिम्बाफल जैसे लाल अधरों को इस प्रकार चूमा (दंश लिया), जैसे वे कोई अत्यंत प्रिय फल हों।)

    कालिदास ने प्रेम की उस तीव्रता को रेखांकित किया है जहाँ कोमलता समाप्त हो जाती है और एक प्रकार की ‘रक्त रंजित’ आक्रामकता जन्म लेती है:

    दशनपदमुदङ्कितं प्रियायाः परिणतबिम्बफलाधरौष्ठबिम्बम्।

    अवलोक्य मुमोच हस्तमुच्चैर्न खलु सुखं समयाति हीनचिह्नम्॥

    (शिव जब पार्वती के अधरों पर अपने दाँतों के निशान (दशनपद) देखते हैं, तो वे उस सौंदर्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।)

    कालिदास यहाँ तर्क देते हैं कि “बिना चिह्नों के (बिना उस सूक्ष्म हिंसा या क्षत के) सुख की पूर्णता नहीं होती।” यहाँ ‘रक्त’ की वह सूक्ष्म उपस्थिति या लाली, प्रेम को केवल भावुकता से ऊपर उठाकर उसे ‘उत्तप्त’ जीवन का हिस्सा बनाती है।

    ऐसे क्लासिकी वर्णन-चित्रण से विलग अक्सर सामान्य रोमानी काव्य-परंपरा में चुंबन और रक्त दो विपरीत ध्रुवों की तरह देखे जाते हैं—एक प्रेम का प्रतीक, दूसरा हिंसा का। लेकिन ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में दोनों एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रेम केवल सुखद भाव नहीं; वह व्यक्ति को अपनी नश्वरता, अपनी असुरक्षा और अपने खोने की संभावना से भी सामना कराता है।

    प्रेम विषयक दार्शनिक चिंतन की ज़मीन पर ‘सपने और तितलियाँ’ कविता का सबसे विशेष पक्ष यह उभरता है कि यहाँ प्रेम कभी पूर्ण उपस्थिति (presence) में नहीं आता। वह हमेशा स्मृति, अनुपस्थिति और पुनरावृत्ति के माध्यम से उपस्थित होता है। प्रिय मृत है, फिर भी जीवित है। वह अनुपस्थित है, फिर भी हर जगह मौजूद है—घोड़े की टापों में, तितलियों के रंगों में, रक्त की स्मृति में। प्रेम यहाँ किसी वर्तमान मिलन का अनुभव नहीं, बल्कि अनुपस्थिति की पीड़ा से निर्मित अनुभव है। यही वह बिंदु है जहाँ लाकाँ की इच्छा और अभाव संबंधी अवधारणाएँ अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं।

    लाकाँ के अनुसार प्रेम मूलतः उस अभाव से संचालित होता है जिसे मनुष्य कभी पूरी तरह भर नहीं सकता। हम दूसरे व्यक्ति में उस खोई हुई संपूर्णता को खोजते हैं जो वास्तव में कहीं मौजूद नहीं होती। ‘सपने और तितलियाँ’ में प्रेम इसी असंभव खोज का रूप ले लेता है। पुरुष स्त्री में अपने “फल और नदियाँ” खोजता है; वह “भूखा और प्यासा” है। यह भूख केवल शारीरिक या भावनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत है। दूसरी ओर स्त्री भी उस मृत प्रिय की स्मृति से मुक्त नहीं हो पाती। दोनों के बीच जो संबंध है, वह किसी संतुष्टि तक नहीं पहुँचता; वह लगातार अधूरापन और पुनः खोज की प्रक्रिया बना रहता है। यही लाकाँनियन इच्छा (desire) की संरचना है—इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती; वह अपनी ही कमी से संचालित होती रहती है।

    गौरतलब है कि कविता में प्रेम और पहचान एक-दूसरे को स्थिर नहीं करते, बल्कि अस्थिर बना देते हैं। स्त्री अंत तक निश्चित नहीं कर पाती कि सामने उपस्थित व्यक्ति वास्तव में उसका प्रिय है या भय का रूप। “कैसे जानूँ मैं”—यह प्रश्न प्रेम की ज्ञानमीमांसीय अनिश्चितता (epistemological uncertainty) को व्यक्त करता है। प्रेम यहाँ ज्ञान नहीं देता; वह व्यक्ति को और अधिक असमंजस में डाल देता है। प्रेमी और शिकारी का एक-दूसरे में घुल जाना यह दिखाता है कि प्रेम अपने भीतर हिंसा और अधिकार की संभावनाएँ भी रखता है। इस प्रकार कविता प्रेम के आदर्शीकृत नैतिक रूप को चुनौती देती है।

    रोलां बार्थ की पुस्तक ‘ए लवर्स डिस्कोर्स: फ्रैगमेंट्स’ (A Lover’s Discourse: Fragments) में मौजूद प्रेम-विमर्श संबंधी अवधारणाओं के आलोक में देखें तो ‘सपने और तितलियाँ’ कविता प्रेम को एक स्थिर भाव नहीं, बल्कि भाषा, स्मृति और प्रतीकों से निर्मित विखंडित अनुभव की तरह प्रस्तुत करती है। बार्थ के लिए प्रेम का अनुभव हमेशा अस्थिर, एकाकी और भाषिक रूप से अपूर्ण होता है। प्रेमी लगातार संकेतों, स्मृतियों और प्रतीक्षाओं के बीच जीता है। ‘सपने और तितलियाँ’ में भी प्रेम प्रत्यक्ष अनुभव की तुलना में स्मृति, स्वप्न और पुनरावृत्ति के रूप में अधिक उपस्थित है। स्त्री के पास प्रेम का कोई ठोस वर्तमान नहीं; उसके पास केवल छवियाँ हैं—तितलियाँ, घोड़े की टापें, रक्त, मृत देह, चुंबनों की स्मृति। प्रेम यहाँ अनुभव से अधिक उसका भाषिक और स्मृतिगत अवशेष बन जाता है।

    बार्थ ने प्रेम को “प्रतीक्षा” और “अनुपस्थिति” की संरचना के रूप में भी देखा था। सविता सिंह की इस रचना में स्त्री का जीवन भी एक अंतहीन प्रतीक्षा में बदल जाता है। वह खाली मैदानों और खेतों को देखती रहती है जहाँ से प्रिय की मृत देह आई थी। यह प्रतीक्षा केवल व्यक्ति की नहीं; वह स्मृति की प्रतीक्षा है, पुनर्प्राप्ति की प्रतीक्षा है, उस असंभव क्षण की प्रतीक्षा है जब प्रेम फिर से जीवित हो सके। लेकिन कविता जानती है कि ऐसा संभव नहीं। इसलिए उसका प्रेम हमेशा विषादमय (melancholic) बना रहता है।

    कविता का एक और विचारणीय पहलू यह है कि वह प्रेम को केवल दो व्यक्तियों के बीच का निजी भाव नहीं रहने देती; वह उसे इतिहास और हिंसा से जोड़ देती है। प्रिय युद्ध में मारा गया है। उसके प्रतिद्वंद्वियों ने षड्यंत्र किया था। इसका अर्थ यह है कि प्रेम कभी इतिहास से बाहर नहीं रह सकता। सत्ता, हिंसा और सामाजिक संरचनाएँ प्रेम को भी प्रभावित करती हैं। इस प्रकार ‘सपने और तितलियाँ’ कविता रोमानी प्रेम के उस मिथक को तोड़ती है जिसमें प्रेम को संसार से अलग एक शुद्ध और निजी अनुभव माना जाता है।

    तिततलियों का रूपक इस पूरी प्रेम-दृष्टि का केंद्रीय प्रतीक बन जाता है। वे चुंबन हैं, आत्मीयता हैं, स्मृति हैं; लेकिन वे क्षणभंगुर भी हैं। उनका रंग समय के साथ बचा रहता है, पर उनका जीवन नश्वर है। इस प्रकार प्रेम भी कविता में किसी स्थायी मुक्ति का नहीं, बल्कि क्षणिक और असुरक्षित सौंदर्य का अनुभव बन जाता है। तितलियाँ जितनी सुंदर हैं, उतनी ही नाजुक भी। प्रेम भी उतना ही कोमल और उतना ही विनाशशील है।

    कविता अंततः प्रेम को किसी समाधान की तरह नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे जटिल और विरोधाभासी अवस्था की तरह प्रस्तुत करती है। प्रेम यहाँ जीवन देता भी है और घायल भी करता है; वह आत्मीयता भी है और भय भी; वह स्मृति का आधार भी है और आघात का स्रोत भी। इस प्रकार ‘सपने और तितलियाँ’ प्रेम के उस गहरे दार्शनिक सत्य को उद्गाटित करती है कि प्रेम कभी निष्कलुष नहीं होता। वह हमेशा अपने भीतर मृत्यु, अनुपस्थिति, असुरक्षा और खोने की संभावना को साथ लेकर चलता है। यही उसकी करुणा है, यही उसका आकर्षण और यही उसकी मानवीय सच्चाई।

    ‘सपने और तितलियाँ’ भाषिक और शैलीगत दृष्टि से समकालीन हिंदी कविता की एक विशिष्ट और जटिल रचना है। इसकी खासियत यह है कि कविता एक साथ कई स्तरों पर काम करती है—वह कथा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन पारंपरिक अर्थ में कथा नहीं है; वह दृश्यात्मक है, किंतु दृश्य उसके भीतर स्थिर नहीं रहते; वह अत्यंत सांकेतिक है, लेकिन उसके प्रतीक कभी किसी एक निश्चित अर्थ में बंद नहीं होते। पूरी कविता एक ऐसे भाषिक और संवेदनात्मक प्रवाह का निर्माण करती है जिसमें स्वप्न, स्मृति, दृश्य, संगीत, पुनरावृत्ति और आत्मसंवाद एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। यही कारण है कि इस कविता को पढ़ना केवल अर्थ ग्रहण करना नहीं, बल्कि एक विलक्षण अनुभव से होकर गुजरने की तरह है।

    इसकी भाषा का पहला उल्लेखनीय पक्ष उसकी दृश्यात्मकता है। लगभग हर खंड वीडियो कैमरे की आँखों से देखे गए किसी दृश्य की तरह खुलता है—घना जंगल, नदी के किनारे पुराना पत्थर, घोड़े पर सवार पुरुष, रक्त की नदी, उड़ती हुई तितलियाँ, खाली मैदान, सीढ़ियाँ उतरता चाँद, बोर्खेज़ की किताब। इन दृश्यों में इतनी तीव्र दृश्यात्मक ऊर्जा है कि कविता पढ़ते समय पाठक के सामने लगातार बदलते हुए दृश्य उभरते रहते हैं। लेकिन यह दृश्यात्मकता यथार्थवादी विवरण की तरह नहीं आती; उसमें स्वप्न की धुँधलाहट और प्रतीकात्मकता बनी रहती है। यही कारण है कि कविता का दृश्य-संसार ठोस होते हुए भी पूरी तरह पकड़ में नहीं आता।

    इस कविता की शैली में सिनेमाई गुण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दृश्य एक-दूसरे में कटते, घुलते और पुनः उभरते रहते हैं, ठीक किसी धीमी गति वाले सिनेमाई अनुक्रम की तरह। उदाहरण के लिए जंगल से नदी तक जाना, फिर अचानक घोड़े का प्रकट होना, फिर स्मृति में मृत देह का दृश्य खुलना, फिर वर्तमान में भागती हुई स्त्री—ये सब किसी क्रमबद्ध कथा की तरह नहीं, बल्कि दृश्य-संयोजन (cinematic montage) की तरह घटित होते हैं। सविता सिंह की काव्यानुभूति में दृश्यात्मक संक्रमण (visual transition) इतने तरल हैं कि समय और स्थान की सीमाएँ धुँधली हो जाती हैं। कविता का पाठ इसीलिए किसी फिल्मी अनुभव जैसा लगता है जिसमें स्मृति, वर्तमान और स्वप्न एक-दूसरे में विलीन (dissolve) होते रहते हैं।

    भाषा की सांकेतिकता भी काबिल-ए-गौर है। कविता सीधे अर्थों में नहीं बोलती; उसके लगभग सभी प्रमुख बिंब बहुस्तरीय संकेतों से निर्मित हैं। “फल और नदियाँ”, “रक्त की नदी”, “तितलियाँ”, “घोड़े की टाप”, “पुराना पत्थर”—ये सब प्रतीकात्मक संरचनाएँ हैं जिनके अर्थ लगातार फैलते और बदलते रहते हैं। यही कारण है कि कविता किसी एक व्याख्या में सीमित नहीं होती। उसकी भाषा पाठक को लगातार अर्थ-सृजन की प्रक्रिया में सक्रिय रखती है। उदाहरण के लिए तितलियाँ केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं; वे चुंबन हैं, आत्मा हैं, स्मृति हैं, क्षणभंगुरता हैं, और बाद में मृत्यु तथा यातना की छवि भी। इसी प्रकार “रक्त की नदी” प्रेम और हिंसा दोनों का संकेत बन जाती है।

    कविता की शैली में स्वप्निल संरचना का प्रभाव अत्यंत गहरा है। पूरी कविता एक लंबे स्वप्न की तरह बहती है जिसमें दृश्य अचानक बदलते हैं, समय टूटता है और स्मृतियाँ अनपेक्षित ढंग से लौटती हैं। यह स्वप्निलता केवल विषयगत नहीं, भाषिक भी है। वाक्य-रचना में निरंतर प्रवाह, संयोजक संरचनाओं का प्रयोग और दृश्यात्मक आवर्तन—ये सब मिलकर मनुष्य की चेतना के उस तरल रूप को व्यक्त करते हैं जो स्वप्न में अनुभव होता है। कविता में कहीं भी कठोर तार्किक क्रम नहीं है। उसकी गति साहचर्यपूर्ण (associative) है—एक दृश्य दूसरे दृश्य को जन्म देता है, जैसे चेतना स्वयं अपनी स्मृतियों और छवियों के भीतर बह रही हो।

    आवृत्ति (repetition) इस कविता की उल्लेखनीय शैलीगत विशेषताओं में से एक है। “याद करो / याद करो” जैसी पंक्तियाँ केवल भावनात्मक आग्रह नहीं हैं; वे सम्मोहनात्मक लय का निर्माण करती हैं। यह पुनरावृत्ति कविता को लगभग शास्त्रीय रागों में गाई जाने वाली बंदिश जैसी संगीतात्मकता प्रदान करती है। इसी प्रकार “घोड़ा”, “तितलियाँ”, “रक्त”, “सपना”, “स्मृति” जैसे शब्द और बिंब बार-बार लौटते हैं। लेकिन हर बार उनका अर्थ थोड़ा बदल जाता है। यह शैलीगत पुनरागमन कविता की स्मृति-संरचना को भी व्यक्त करता है, क्योंकि स्मृति स्वयं भी पुनरावृत्तिमूलक होती है। कुछ दृश्य और शब्द चेतना में बार-बार लौटते हैं और हर बार नए अर्थ ग्रहण करते हैं।

    कविता की लय अत्यंत धीमी और बहती हुई है। इसमें छोटे, तीखे और निर्णायक वाक्यों की अपेक्षा लंबे, साँसों की तरह फैलते वाक्य अधिक हैं। यह धीमा प्रवाह कविता के भाव-संसार के अनुरूप है। पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह किसी चेतना के भीतर धीरे-धीरे उतर रहा हो। इस प्रवाह में ठहराव भी हैं, विराम भी और अचानक उभरती हुई तीव्रताएँ भी। कविता का संगीत बाहरी तुक या छंद से नहीं, बल्कि वाक्यों की गति, पुनरावृत्ति और छवियों के लौटने से निर्मित होता है।

    शैलीगत दृष्टि से कविता की एक और विशेषता उसका कथात्मक भ्रम (narrative illusion) है। कविता पढ़ते समय ऐसा लगता है कि कोई कथा कही जा रही है—एक स्त्री, एक घोड़े पर सवार पुरुष, एक पुराना प्रेम, युद्ध, मृत्यु। लेकिन धीरे-धीरे स्पष्ट होता है कि यह कथा किसी रैखिक विकास की ओर नहीं बढ़ती। इसमें कोई निश्चित आरंभ, मध्य या अंत नहीं है। कथा बार-बार स्मृति और स्वप्न में टूट जाती है। इस प्रकार कविता कथा का उपयोग करती है, लेकिन उसे स्थिर रूप में विकसित नहीं होने देती। यही कारण है कि कविता का अनुभव कथात्मक होते हुए भी अत्यंत लिरिकल और स्वप्निल बना रहता है।

    नार्थ्रोप फ्राई की शब्दावली में कहें तो कवयित्री ने यहाँ पाठ को सुलिखित बनाने के लिए गद्य-रचना के काइनेटिक सिद्धांत का व्यावहारिक विनियोग प्रस्तुत किया है। फ्राई ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनाटॉमी ऑफ क्रिटिसिज्म’ (Anatomy of Criticism) में गद्य और कविता के छंदशास्त्र (Prosody) को समझने के लिए ‘काइनेटिक’ (Kinetic) और ‘स्टेटिक’ (Static) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, गद्य की लय अनिवार्य रूप से ‘काइनेटिक’ (गतिज) होती है। गद्य एक सीधी रेखा में आगे बढ़ता है। यहाँ लय शब्दों की ध्वनि से अधिक ‘विचार के तर्क’ और ‘वाक्य के प्रवाह’ से तय होती है और लेखक कृत्रिम छंदों के अनुशासन के बजाय भाषा की स्वाभाविक गति का अनुसरण करता है।

    सविता सिंह की इस रचना का सौंदर्य उसकी तुकबंदी में नहीं, बल्कि उसके वाक्यों के विन्यास ‘सिंटैक्स’ (Syntax) में है। कवयित्री ने जानबूझकर गद्य की ‘तार्किक गति’ को कविता की ‘संवेदनात्मक गहराई’ के साथ मिला दिया है। यह मुक्त छंद में रचित दुनिया भर की आधुनिक कविता की विशेषता है, जहाँ कविता ‘बोलती’ हुई प्रतीत होती है, ‘गाती’ हुई नहीं। फ्राई की शब्दावली में इसे ‘डिक्टम’ (Dictum) और ‘मेलोस’ (Melos) का संलयन कहा जा सकता है, जहाँ कविता गद्य की सहजता को आत्मसात कर लेती है, ताकि वह ‘सुलिखित’ (Well-composed) लग सके। सविता सिंह की कविताओं में अक्सर एक ‘नैरेटिव’ (Narrative) प्रवाह होता है। नार्थ्रोप फ्राई के ‘रिदम ऑफ डिक्शन’ (Rhythm of Diction) से तर्क उधार लेकर कहा जाए तो कवयित्री ने शब्दों को केवल सजाया नहीं है, बल्कि उन्हें एक ‘सक्रिय ऊर्जा’ (Kinetic Energy) दी है जो पाठक की चेतना में निरंतर प्रवाहित होती रहती है।

    इस रचना में भाषा की संवेदनशीलता भी उल्लेखनीय है। कविता केवल दृश्य नहीं रचती; वह ध्वनियों, स्पर्शों और गतियों का भी संसार निर्मित करती है। “घोड़े की टाप”, “दहाड़”, “सिर को पटकना”, “रक्तस्राव”, “हवाओं का वेग”—ये सब कविता को बहु-संवेदी (multi-sensory) अनुभव में बदल देते हैं। पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि सुनता, देखता और महसूस करता है। यही गुण कविता को अत्यंत जीवंत बनाता है।

    कविता में प्रयुक्त भाषा अत्यंत सहज और पारदर्शी दिखाई देती है, लेकिन उसके भीतर गहरी काव्यात्मक जटिलता है। यह भाषा दुरूह बौद्धिकता का प्रदर्शन नहीं करती, फिर भी अपने प्रतीकों और संरचनाओं के कारण अत्यंत बहुस्तरीय हो जाती है। यह सादगी और जटिलता का अद्भुत संतुलन है। कविता में कहीं भी कृत्रिम अलंकारिकता नहीं है; उसके बिंब स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, लेकिन उनका प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक है।

    बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का संदर्भ शैलीगत स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण है। यह कविता को एक अंतर्पाठीय और भूलभुलैया-सदृश संरचना प्रदान करता है। बोर्खेज़ की तरह यहाँ भी पाठ किसी स्थिर अर्थ तक नहीं पहुँचता; वह स्वयं एक भूलभुलैया (labyrinth) बन जाता है जिसमें स्मृति, पाठ और समय एक-दूसरे में उलझे रहते हैं। नतीजतन, ‘सपने और तितलियाँ’ कविता स्वयं ऐसी “जादुई किताब” की तरह लगने लगती है जिसके पन्ने पढ़ते हुए पाठक बार-बार खो जाता है और लौटता है।

    कविता की दृश्यात्मकता और प्रतीकात्मकता मिलकर उसे लगभग स्वप्न-फिल्म जैसी गुणवत्ता प्रदान करती हैं। यहाँ “स्वप्न-फिल्म” से आशय किसी स्थापित फिल्म-शैली (genre) से नहीं है, बल्कि उस कलात्मक अनुभव से है जिसमें दृश्य, स्मृतियाँ, समय और घटनाएँ बिल्कुल उसी तरह एक-दूसरे में घुलते-मिलते प्रतीत होते हैं जैसे स्वप्न में होता है।

    अमूमन जब हम कोई सपना देखते हैं, तब घटनाएँ सामान्य तर्क या क्रम का पालन नहीं करतीं। समय टूट जाता है, मृत व्यक्ति जीवित दिख सकते हैं, एक दृश्य अचानक दूसरे में बदल सकता है, भय और प्रेम साथ उपस्थित हो सकते हैं, और कई प्रतीक बिना स्पष्ट व्याख्या के गहरी भावात्मक छाप छोड़ जाते हैं। इसलिए “स्वप्न-फिल्म जैसी गुणवत्ता” कहने का अर्थ है कि कविता का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है—वह सीधे कथानक की तरह नहीं चलती, बल्कि दृश्य-दर-दृश्य खुलती है, जैसे कोई आंतरिक फिल्म चेतना के भीतर चल रही हो।

    कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस कविता में कई दृश्य अत्यंत सिनेमाई और अवचेतन-सदृश हैं—पुराने पत्थर पर पड़ी मृत देह, घोड़े की पीठ पर लौटता प्रिय, माथे पर बैठी रंग-बिरंगी तितलियाँ, खाली मैदानों में फैली स्मृति आदि। ये दृश्य केवल वर्णन नहीं रहते; वे पाठक के मन में चलने लगते हैं। यही कारण है कि कविता “पढ़ी हुई वस्तु” न लगकर “देखी हुई अनुभूति” बन जाती है।

    “स्वप्न-फिल्म” अभिव्यक्ति का आशय यह भी है कि कविता में यथार्थ और स्वप्न के बीच की सीमाएँ धुँधली हो जाती हैं। पाठक निश्चित नहीं कर पाता कि जो घट रहा है वह स्मृति है, सपना है, वर्तमान है या किसी आघात का पुनरागमन। यह तकनीक प्रायः अतियथार्थवादी (surrealist) सिनेमा और आधुनिक काव्य में मिलती है। उदाहरण के लिए आंद्रेई तारकोव्स्की (Andrei Tarkovsky), इंगमार बर्गमैन (Ingmar Bergman) या लुई बुनुएल (Luis Buñuel) की फिल्मों में स्मृति, स्वप्न और यथार्थ एक-दूसरे में इस प्रकार घुलते हैं कि दर्शक उन्हें केवल “समझता” नहीं, बल्कि “अनुभव” करता है।

    इसलिए यहाँ “स्वप्न-फिल्म” का अर्थ है—ऐसी काव्यात्मक संरचना जो तर्कपूर्ण कथा से अधिक दृश्यात्मक, प्रतीकात्मक, अवचेतन-सदृश और स्मृति में लंबे समय तक बनी रहने वाली अनुभूति रचती है। कुछ दृश्य इतने तीव्र हैं कि वे पाठ समाप्त होने के बाद भी चेतना में बने रहते हैं—पुराने पत्थर पर पड़ी मृत देह, घोड़े की पीठ पर लौटता प्रिय, माथे पर बैठी रंग-बिरंगी तितलियाँ, खाली मैदानों में फैली स्मृति। यह दीर्घकालिक प्रभाव (lingering effect) कविता की शैलीगत सफलता का प्रमाण है। ‘सपने और तितलियाँ’ कविता पाठक के मन में सिर्फ़ विचार पैदा नहीं करती; वह स्मृति में बस जाने वाले दृश्य निर्मित करती है।

    वस्तुतः “स्वप्न-फिल्म” की तकनीक आधुनिक काव्य को एक ऐसे दृश्य-मोंटाज में बदल देती है जहाँ समय की रैखिकता टूट जाती है और पाठक एक साथ कई मानसिक परतों पर यात्रा करता है। टी.एस. इलियट की ‘द वेस्ट लैंड’ इस प्रविधि का प्रस्थान बिंदु है, जहाँ ‘अनरियल सिटी’ के बिंबों में यथार्थ और दुस्वप्न इस कदर घुल जाते हैं कि शहर की गलियाँ प्रेतों के निवास में बदल जाती हैं। इसी प्रकार, पाब्लो नेरुदा की ‘वॉकिंग अराउंड’ में एक ऐसी सिनेमाई यात्रा है जहाँ सामान्य वस्तुएँ—जैसे दरवाजे, जूते या बर्तन—अचानक सजीव होकर डराने लगती हैं, जो लुई बुनुएल के अतियथार्थवादी दृश्यों की याद दिलाती हैं। सिल्विया प्लाथ की ‘डैडी’ में भी आघात का पुनरागमन एक ऐसी फिल्म की तरह घटित होता है जहाँ पिता की स्मृति नाज़ी प्रतीकों के साथ मिलकर एक भयावह फंतासी रचती है। इन सभी कविताओं में साझा तत्व यह है कि यहाँ घटनाएँ “घटती” नहीं हैं, बल्कि वे स्मृति और अवचेतन के परदे पर “प्रकट” होती हैं।

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ कविता का गहरा संबंध सिल्विया प्लाथ की ‘डैडी’ या उनके कविता-संग्रह ‘एरियल’ के शिल्प से जोड़ा जा सकता है। प्लाथ के यहाँ जिस तरह व्यक्तिगत पीड़ा और ऐतिहासिक आघात एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं, उसी तरह सविता सिंह के यहाँ ‘रक्त और चुंबन’ का द्वैत एक स्वप्निल विन्यास में आता है। प्लाथ की कविताओं में ‘रक्त’ केवल एक शारीरिक द्रव नहीं, बल्कि एक पहचान और विच्छेद का प्रतीक है, जहाँ वे अपनी नश्वरता को चुनौती देती हैं। सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ में भी तितलियाँ (जो कोमलता और नश्वरता का प्रतीक हैं) जब ‘रक्त’ की सघनता के साथ टकराती हैं, तो वह दृश्य तारकोव्स्की की किसी फिल्म जैसा बन जाता है—जहाँ एक शांत दृश्य के भीतर कोई गहरा आघात या हिंसक सत्य छिपा होता है।

    दोनों कवयित्रियों के यहाँ प्रेम और हिंसा दो विपरीत ध्रुव नहीं, बल्कि एक ही ‘स्वप्न-अनुभव’ की दो कड़ियाँ हैं, जहाँ शरीर की सीमाएँ (चुंबन) और जीवन का द्रव्य (रक्त) मिलकर ‘अपावनता’ (Abjection) के उस धुंधले क्षेत्र का निर्माण करते हैं जहाँ पाठक सत्य और कल्पना के बीच झूलता रह जाता है।

    सिल्विया प्लाथ की कविता ‘डैडी’ (Daddy) और सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ दोनों ही कविताएँ उस ‘स्वप्न-फिल्म’ तकनीक का उपयोग करती हैं जहाँ व्यक्तिगत पीड़ा, ऐतिहासिक आघात और देह की नश्वरता एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। प्लाथ के यहाँ आघात का रूप पितृसत्तात्मक और ऐतिहासिक (नाज़ी) है, जबकि सविता सिंह के यहाँ वह प्रेम और अस्तित्व के ‘अपावन’ (Abject) पक्ष से जुड़ा है।

    डैडी

    अब और नहीं, अब और नहीं सहूँगी,

    ओ काले जूते! जिसमें एक पाँव की तरह

    बीते तीस बरसों से मैं घुटती रही हूँ—

    बेचारी, सफेद और असहाय।

    जहाँ न साँस लेने की हिम्मत थी, न छींकने की।

    डैडी, मुझे तुम्हें मारना ही होगा।

    पर मेरे मारने से पहले ही तुम मर गए—

    संगमरमर की तरह भारी, ईश्वर से भरा एक थैला,

    एक डरावनी मूर्ति—जिसके पैर का अँगूठा

    किसी भूरे समुद्री-सील सा भारी और विशाल है…

     (मूल अंग्रेज़ी काव्यांश):

    “You do not do, you do not do

     Any more, black shoe

     In which I have lived like a foot

     For thirty years, poor and white,

     Barely daring to breathe or Achoo.

     Daddy, I have had to kill you.

     You died before I had time—

     Marble-heavy, a bag full of God,

     Ghastly statue with one gray toe

    Big as a Frisco seal…”

    सविता सिंह जब कहती हैं: “रक्त के भीतर भी एक और रक्त बहता है / जिसे चुंबन की उत्तप्त लहरें ही पहचान सकती हैं…” (या इसी भावभूमि का दृश्य), तो वे यहाँ देह और स्मृति का वह जटिल जाल बुनती हुई दिखाई पड़ती हैं जिसे हम प्लाथ के यहाँ भी देखते हैं।

    प्लाथ की कविता में ‘काला जूता’ (Black Shoe) एक दमघोंटू यथार्थ का बिंब है, जो ‘स्वप्न-फिल्म’ की तरह पाठक के सामने एक डरावनी छवि प्रस्तुत करता है। यहाँ स्मृति (पिता की मृत्यु) और वर्तमान (कवयित्री का संघर्ष) के बीच की सीमा धुंधली है। सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ में भी तितलियाँ कोमलता का नहीं, बल्कि उस ‘रक्त’ का हिस्सा बनती हैं जो जीवन के अंतर्द्वंद्व को दर्शाता है। दोनों कवयित्रियों के यहाँ कविता एक स्थिर चित्र नहीं, बल्कि चलती हुई एक ऐसी फिल्म है जहाँ आघात बार-बार लौटता है।

    जूलिया क्रिस्टेवा के ‘अपावनता’ (Abjection) सिद्धांत के अनुसार, लाश या क्षत-विक्षत शरीर हमें डराता है क्योंकि वह जीवन और मृत्यु के बीच की सीमा को मिटा देता है। प्लाथ जब अपने पिता को ‘संगमरमर जैसा भारी’ और ‘नीले अंगूठे वाली प्रतिमा’ कहती हैं, तो वे उस मृत देह के प्रति घृणा और आकर्षण (Repulsion and Attraction) को व्यक्त कर रही हैं। सविता सिंह के यहाँ भी जब ‘चुंबन’ और ‘रक्त’ एक साथ आते हैं, तो वे प्रेम के उस ‘अपावन’ पक्ष को उजागर करते हैं जहाँ शरीर केवल सुख का साधन नहीं, बल्कि पीड़ा और क्षरण का स्थल भी है।

    प्लाथ अपनी कविता में कहती हैं, “प्रत्येक स्त्री एक फासीवादी की पूजा करती है, तुम्हारे चेहरे पर एक जूता है, क्रूर हृदय…”-

    “Every woman adores a Fascist,

    The boot in the face, the brute

    Brute heart of a brute like you.”

    इन पंक्तियों में प्लाथ ने प्रेम और पितृसत्तात्मक दमन के बीच के उस भयानक अंतर्संबंध को उकेरा है, जहाँ वे तर्क देती हैं कि स्त्रियाँ अक्सर (सामाजिक कंडिशनिंग या मनोवैज्ञानिक जटिलता के कारण) उन पुरुषों के प्रति आकर्षित होती हैं जो उनके प्रति क्रूर और दमनकारी होते हैं। यहाँ ‘जूता’ (Boot) फासीवाद और निरंकुश सत्ता का प्रतीक है।

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ प्रेम के उस जटिल और रक्तरंजित इतिहास की पड़ताल करती है, जहाँ स्मृतियाँ और वर्तमान एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। कविता के अंतिम हिस्से में कवयित्री कहती हैं:

    जिनसे मेरी दुनिया तब भी जीवंत थी

     सिर्फ़ उसमें तितलियाँ चुंबनों की तरह नहीं

     यातनाओं में शामिल हमशक्लों की तरह थीं

     और प्रेम के लिए अस्तित्व ख़तरे में था”

                                                         सविता सिंह: ‘सपने और तितलियाँ’.

    सिल्विया प्लाथ के “हर स्त्री एक फासीवादी की पूजा करती है” (Every woman adores a Fascist) वाले बोध और सविता सिंह की इन पंक्तियों में एक गहरा साम्य है। जहाँ प्लाथ पितृसत्तात्मक दमन को ‘फासीवादी जूते’ के बिम्ब से उकेरती हैं, वहीं सविता सिंह ‘तितलियों’—जो कभी कोमल चुंबनों का प्रतीक थीं—के यातनाओं के ‘हमशक्लों’ में बदल जाने के माध्यम से उस मानसिक विस्थापन को दर्शाती हैं, जहाँ प्रेम और मृत्यु के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है। तितलियों का यह बदलाव असल में उस पुरानी सोच की याद दिलाता है, जहाँ प्रेम के नाम पर शरीर को दी जाने वाली खरोंचों और चोटों को ‘शृंगार का रस’ कहकर सही ठहराया गया है। यह कविता दिखाती है कि कैसे सदियों से चली आ रही इस देह-राजनीति में पुरुष की ज़बरदस्ती को स्त्री की सहनशीलता का नाम दे दिया जाता है। यहाँ ‘चुंबन’ अपनी कोमलता खोकर एक ऐसी पीड़ा बन जाता है, जहाँ यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जिसे प्रेम कहा जा रहा है, वह असल में स्त्री के लिए एक गहरी यातना ही है। यह आकस्मिक नहीं है कि कविता में प्रिय का चेहरा भी सख़्त टापों वाले ‘घोड़े’ जैसा डरावना और हिंसक प्रतीत होने लगता है।

     यहाँ प्रेम और हिंसा एक हो गए हैं। सविता सिंह की रचना में ‘रक्त की उत्तप्त लहरें’ और ‘चुंबन’ का मिलन भी इसी विरोधाभास को पुष्ट करता है। सामान्य रोमानी परंपरा में चुंबन कोमल है, लेकिन यहाँ वह ‘रक्त’ (हिंसा/जीवन का सत्य) को जाग्रत करने वाला औज़ार है। दोनों कवयित्रियाँ यह स्थापित करती हैं कि गहरा प्रेम या गहरा आघात कभी ‘पवित्र’ या ‘साफ़-सुथरा’ नहीं होता; वह हमेशा रक्त-रंजित और जटिल होता है।

    प्लाथ के लिए देह (Foot in a shoe) एक क़ैद है। सविता सिंह के लिए देह वह स्थल है जहाँ ‘सपने और तितलियाँ’ रक्त के साथ संघर्ष करती हैं। दोनों ही कवयित्रियाँ ‘निजी’ (Personal) को ‘वैश्विक’ (Universal) बनाती हैं। यदि प्लाथ के यहाँ पिता एक ‘नाज़ी’ है, तो सविता सिंह के यहाँ प्रेम-देवता को जगाने वाला चुंबन एक ऐसी ‘अग्नि’ है जो अस्तित्व को भस्म भी कर सकती है और नया जन्म भी दे सकती है।

    याद रहे कि सिल्विया प्लाथ और सविता सिंह की कविताओं के बीच का तुलनात्मक धरातल केवल बिंबों की समानता नहीं है, बल्कि वह उस ‘अपावनता’ (Abjection) और ‘देह-स्मृति’ का घर्षण है जहाँ प्रेम एक हिंसक यथार्थ में बदल जाता है।

    यहाँ प्लाथ की कविता ‘लेडी लाजरस’ (Lady Lazarus) का वह अंश उद्धृत है जो पुनर्जन्म, आघात और ‘आखेट’ के उस अनुभव को दर्ज करता है जिसे सविता सिंह अपनी कविता ‘सपने और तितलियाँ’ में “यह तो वही आखेट है जिसमें मेरी हार हुई थी” के माध्यम से व्यक्त करती हैं।

    ‘लेडी लाजरस’ के काव्यांश का हिंदी रूपांतरण और मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है:

    “मरना भी एक कला है, बाक़ी सब चीज़ों की तरह।

    मैं इसे बेहद ख़ूबसूरती से करती हूँ।

    मैं इसे इस तरह करती हूँ कि यह नरक जैसा महसूस हो।

    मैं इसे इस तरह करती हूँ कि यह वास्तविक लगे।

    मैं मानती हूँ, मेरे पास इसके लिए एक हुनर है…

    राख के बीच से

    मैं अपने लाल बालों के साथ उठती हूँ

    और मैं हवा की तरह मर्दों को खा जाती हूँ।”

    (काव्यांश का मूल पाठ):

    “Dying

     Is an art, like everything else.

     I do it exceptionally well.

     I do it so it feels like hell.

     I do it so it feels real.

     I guess you could say I’ve a call…

     Out of the ash

     I rise with my red hair

     And I eat men like air.”

    प्लाथ के बरक्स सविता सिंह की कविता में उस ‘आखेट’ और ‘मृत देह’ का दृश्य विचारणीय है जो प्लाथ की ‘राख से उठने’ की प्रक्रिया का पूर्व-इतिहास (Prequel) प्रतीत होता है:

    “और मैं याद कर पाती हूँ

     यह तो वही आखेट है जिसमें मेरी हार हुई थी

     मारी गई थी मैं इसी नदी के किनारे

     इसी पत्थर पर पड़ी रही थी मेरी मृत देह

     मेरी पुत्रियाँ और पुत्र छीने गए थे मुझसे

     मेरी नदियाँ और फल लौट गए थे अनंत में”

    सिल्विया प्लाथ के लिए मृत्यु एक ‘कला’ है जिसे वे बार-बार ‘परफॉर्म’ करती हैं। उनका “नरक जैसा महसूस कराना” (Feel like hell) और “वास्तविक लगना” (Feel real) उस ‘स्वप्न-फिल्म’ की तकनीक है जहाँ पाठक एक भयानक अनुभव के भीतर क़ैद हो जाता है। सविता सिंह की कविता में भी प्रोटागोनिस्ट उस ‘आखेट’ को याद करती है जहाँ वह पहले ही मारी जा चुकी है। यहाँ स्मृति, सपना और आघात का पुनरागमन एक हो जाता है। प्लाथ की तरह सविता सिंह भी यहाँ ‘पीड़िता’ (Victim) मात्र नहीं हैं; वे अपनी ‘मृत देह’ को एक तटस्थ दर्शक की तरह पत्थर पर पड़ा हुआ देखती हैं। यह स्वयं से अलगाव (Self-alienation) उस मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति अपने स्वयं के अंत को एक फिल्म के दृश्य की तरह देख रहा होता है।

    प्लाथ की कविता के अंत में “मर्दों को हवा की तरह खा जाना” (Eat men like air) एक प्रतिशोधात्मक शक्ति का संचार है। सविता सिंह की कविता में ‘घुड़सवार’ का बिंब इसी आदिम पुरुष सत्ता का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास “टापों के रौंदने की क्षमता” और “सनक” है। सविता सिंह जब लिखती हैं— “उसके पैर उसके घोड़े के पैरों की तरह ही / ऐसा लगता है कि वह ख़ुद भी एक घोड़ा है”—तो वे उस पशु-प्रवृत्ति (एनिमल इंस्टिंक्ट) को पकड़ने की कोशिश कर रही हैं जिसे प्लाथ ने ‘एरियल’ संग्रह  की अपनी कविताओं में बार-बार रेखांकित किया है। ‘सपने और तितलियाँ’ में ‘रक्त की उफनती नदी’ उस ऐतिहासिक और व्यक्तिगत हिंसा की गवाही है जो प्रेम के भीतर भी ‘बेआवाज़ उपस्थित’ रहती है।

    जूलिया क्रिस्टेवा के अनुसार ‘अपावन’ (abjection) वह है जो हमें अपनी नश्वरता की याद दिलाकर असहज करता है। प्लाथ जब अपनी ‘राख’ और ‘लाल बालों’ की बात करती हैं, तो वे एक ऐसी देह को प्रस्तुत कर रही हैं जो नष्ट होकर भी ‘विचित्र और भयावह’ या ‘अनकैनी’ (Uncanny) तरीके से लौट आई है। सविता सिंह की रचना में यह ‘अपावनता’ तब दिखती है जब ‘अपरिचित’ घुड़सवार के चेहरे पर ‘चेचक के दाग़’ और ‘सख़्त हाथ’ दिखाई देते हैं। प्रेम का यह पक्ष ‘कोमलता’ से रहित है। यह ‘रक्त से लथपथ देह’ का प्रेम है। तितलियाँ, जो चुंबन में बदल जाती थीं, अब “पैरों के पास आकर दम तोड़ती” हैं। यह बिंब दर्शाता है कि कोमलता (तितली) और हिंसा (रक्त/टापें) एक-दूसरे से अलग नहीं हैं; वे एक ही अनुभव के दो छोर हैं।

    प्लाथ की कविता जहाँ एक हिंसक उठान (राइज) पर खत्म होती है, वहीं सविता सिंह की कविता एक दार्शनिक ‘शोक’ और ‘तलाश’ पर समाप्त होती है। प्लाथ के यहाँ ‘फासीवादी’ से मुकाबला है, तो सविता सिंह के यहाँ उस ‘तिलिस्म’ को समझने की कोशिश है जिसे प्रेम कहते हैं। सविता सिंह का “बोर्खेज़ की जादुई किताब” का संदर्भ उस ‘अपूर्णता’ को दर्शाता है जिसकी बात रोलां बार्थ करते थे। प्रेम एक ऐसी किताब है जिसके पन्ने (स्मृतियाँ) एक बार खो जाने पर दोबारा नहीं मिलते।

    प्लाथ और सविता सिंह दोनों के यहाँ ‘चुंबन’ कोई रोमानी सुख नहीं है, बल्कि वह उस ‘रक्त की नदी’ को पार करने का एक असफल या जोखिम भरा प्रयास है। प्लाथ अपनी देह को नष्ट करके ‘स्वतंत्र’ होना चाहती हैं, जबकि सविता सिंह अपनी मृत देह और तितलियों के बीच उस ‘कवि’ और ‘किताब’ की तलाश करती हैं जो इस आघात को कोई अर्थ दे सके। दोनों ही कवयित्रियों ने ‘स्वप्न-फिल्म’ की तकनीक से यह सिद्ध किया है कि प्रेम के भीतर मृत्यु एक स्थायी अतिथि की तरह सदैव उपस्थित रहती है।

    सिल्विया प्लाथ और सविता सिंह की कविताओं का संगम उस बिंदु पर होता है जहाँ सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) और वेदना (Pathos) का अंतर समाप्त हो जाता है। प्लाथ की ‘डैडी’ जिस ‘भयावह प्रतिमा’ (Ghastly statue) के सामने खड़ी है, सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ उसी प्रतिमा के भीतर बहते ‘रक्त’ की ध्वनि सुनने का प्रयास है। दोनों ही कविताएँ पाठक को ‘सुलझाने’ के लिए नहीं, बल्कि उस ‘उन्माद’ का अनुभव कराने के लिए रची गई हैं जिसे रोलां बार्थ ने अस्थिर और एकाकी माना था।

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ तथा सिल्विया प्लाथ की ‘डैडी’ और ‘लेडी लाजरस’ का तुलनात्मक समाजशास्त्रीय विश्लेषण पितृसत्तात्मक संरचनाओं, ऐतिहासिक आघात (trauma) और स्त्री अस्मिता के संघर्ष को उजागर करता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से ये कविताएँ केवल व्यक्तिगत विलाप नहीं हैं, बल्कि उस दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक ‘मेनिफेस्टो’ हैं, जहाँ स्त्री की देह और उसकी चेतना पर पुरुषवादी सत्ता का नियंत्रण रहा है।

    प्लाथ की ‘डैडी’ में पितृसत्ता को नाज़ीवाद के रूपक के माध्यम से वैश्विक और ऐतिहासिक सन्दर्भ दिया गया है। यहाँ पिता केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक निरंकुश संस्था है। समाजशास्त्रीय रूप से यह उस ‘अधिनायकवादी पितृसत्ता’ को दर्शाता है जहाँ स्त्री स्वयं को एक ‘यहूदी’ की तरह उत्पीड़ित महसूस करती है। इसके विपरीत, सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ में पितृसत्ता का चेहरा युद्ध और राजनीति के उन मुहावरों में छिपा है, जहाँ विजय और पराजय के अर्थ पुरुष तय करते हैं। जहाँ प्लाथ के यहाँ विद्रोह ‘पवित्र अपवित्रता’ (sacred profanity) के माध्यम से फूटता है, वहीं सिंह के यहाँ वह एक ‘कलात्मक युद्ध-विरोधी’ विमर्श के रूप में सामने आता है, जो राजनीति के प्रचलित पितृसत्तात्मक प्रतिमानों को चुनौती देता है।

    ‘लेडी लाजरस’ में प्लाथ मृत्यु और पुनर्जन्म को एक ‘तमाशे’ (spectacle) के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो उस समाज पर कटाक्ष है जो स्त्री के दुःख का उपभोग एक वस्तु की तरह करता है। यहाँ स्त्री का बार-बार मरकर जीवित होना पितृसत्तात्मक शोषण के विरुद्ध एक प्रतिरोधी ‘एजेंसी’ है। इसी के समानांतर, सविता सिंह की कविता में ‘मृत देह’ का पत्थर पर पड़ा होना और बच्चों का छीना जाना उस ऐतिहासिक हिंसा की गवाही है, जो स्त्रियों ने सदियों से झेली है। सिंह के यहाँ ‘नदियों और फलों का अनंत में लौट जाना’ उस पारिस्थितिक और सामाजिक रिक्तता को दर्शाता है, जो युद्धोन्मादी पुरुष-संस्कृति की देन है।

    इन दोनों कवयित्रियों के यहाँ ‘जादुई यथार्थवाद’ (Magical Realism) एक समाजशास्त्रीय उपकरण की तरह कार्य करता है। प्लाथ के लिए ‘खून की नदी’ को पार करना एक जोखिम भरा अस्तित्ववादी प्रयास है, तो सिंह के लिए ‘तितलियाँ’ मात्र कोमल बिम्ब नहीं हैं, बल्कि वे ‘यातनाओं में शामिल हमशक्लों’ की तरह हैं। यह सामूहिक दुःख (collective suffering) की वह स्थिति है जहाँ व्यक्तिगत आघात सामाजिक इतिहास से जुड़ जाता है। अंततः, ये कविताएँ समाज को यह संदेश देती हैं कि स्त्री की मुक्ति केवल राजनीतिक अधिकारों में नहीं, बल्कि उन भाषाई और सांस्कृतिक मुहावरों को ध्वस्त करने में है, जो उसे एक ‘पराजित इकाई’ के रूप में देखते हैं। जहाँ प्लाथ राख से उठकर ‘पुरुषों को खाने’ की बात करती हैं, वहीं सिंह सपनों और यथार्थ के बीच एक ऐसी कलात्मक जमीन तैयार करती हैं जो युद्ध और पितृसत्ता, दोनों का निषेध करती है।

    सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से सविता सिंह की सपने और तितलियाँ’ तथा सिल्विया प्लाथ की ‘डैडी’ और ‘लेडी लाजरस’ का तुलनात्मक विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि ये कविताएँ ‘सुन्दर’ के पारम्परिक प्रतिमानों को तोड़कर ‘विद्रूप’ (Grotesque) और ‘उदात्त’ (Sublime) के नए आयाम रचती हैं। यहाँ सौन्दर्य केवल आनंद की वस्तु नहीं है, बल्कि वह एक तीखा हस्तक्षेप है।

    प्लाथ के सौन्दर्यशास्त्र में ‘विद्रूप’ की प्रधानता है। ‘डैडी’ और ‘लेडी लाजरस’ में वे अपने घावों, मृत्यु और अस्थियों को एक कलात्मक तमाशे (Spectacle) में बदल देती हैं। ‘लेडी लाजरस’ में जब वे कहती हैं कि उनकी त्वचा एक “नाज़ी लैंपशेड” की तरह है, तो वह एक भयावह सौन्दर्य (Morbid Beauty) पैदा करती हैं। इसके विपरीत, सविता सिंह के यहाँ सौन्दर्यबोध अधिक सूक्ष्म और दार्शनिक है। उनकी तितलियाँ कोमलता का प्रतीक नहीं, बल्कि ‘यातनाओं में शामिल हमशक्लों’ की तरह हैं। यहाँ सौन्दर्य का विद्रूप चेहरा सीधे प्रहार करने के बजाय एक गहरी उदासी और जादुई यथार्थवाद के माध्यम से प्रकट होता है।

    सविता सिंह के यहाँ बिम्बों का चयन एक ‘तरल यथार्थ’ का निर्माण करता है। ‘नदियों और फलों का अनन्त में लौट जाना’ एक ऐसा बिम्ब है जो विनाश को भी एक दार्शनिक गरिमा प्रदान करता है। उनका सौन्दर्यशास्त्र ‘स्मृति’ और ‘विस्मृति’ के बीच झूलता है। वहीं प्लाथ के बिम्ब हिंसक और स्पष्ट हैं—जूता, डंडा, खून, और राख। प्लाथ का सौन्दर्यशास्त्र एक ‘दहशत’ (Terror) पैदा करता है, जबकि सविता सिंह का सौन्दर्यशास्त्र एक ‘मौन प्रतिरोध’ (Silent Resistance) की रचना करता है। सविता सिंह की ‘मृत देह’ और प्लाथ की ‘पुनर्जीवित देह’—दोनों ही स्त्री देह को कलात्मक केंद्र में रखती हैं, जहाँ देह केवल हाड़मांस नहीं, बल्कि इतिहास का एक दस्तावेज़ बन जाती है।

    प्लाथ की भाषा में एक प्रकार का ‘हिस्टिरिया’ या उन्माद है जो कलात्मक रूप से नियंत्रित है। उनकी लय (Rhythm) नर्सरी राइम्स की तरह सरल है, लेकिन उसका प्रभाव घातक है। यह  स्वर-संवादहीनता (‘डिसोनेंस’) का सौन्दर्यशास्त्र है। इसके विपरीत, सविता सिंह की भाषा में एक विस्तार और ठहराव है। उनकी कविता में ‘सपने और यथार्थ के बीच’ का अंतराल ही उसका असली सौन्दर्य है। वे युद्ध की पितृसत्तात्मक भाषा के समानांतर एक ‘स्त्री-भाषा’ (Écriture féminine) निर्मित करती हैं जो अधिक समावेशी और संवेदी है।

    इन कविताओं का चरमोत्कर्ष ‘उदात्त’ की स्थिति में पहुँचता है। प्लाथ के लिए उदात्त वह है जहाँ वे राख से उठकर “पुरुषों को हवा की तरह खाती हैं”—यह संहारक शक्ति का सौन्दर्य है। सविता सिंह के लिए उदात्त वह स्थिति है जहाँ स्त्री अपनी हार और मृत्यु को स्वीकार करते हुए भी अपनी स्मृतियों की ‘हिफाज़त’ करती है। यह ‘उत्तरजीविता’ (Survival) का सौन्दर्यशास्त्र है।

     जहाँ प्लाथ का सौन्दर्यशास्त्र ‘आत्म-ध्वंस से सृजन’ की यात्रा है, वहीं सविता सिंह का सौन्दर्यशास्त्र ‘मृदुता के माध्यम से विध्वंसक सत्ता को चुनौती’ देने की कला है। दोनों ही कवयित्रियाँ पितृसत्तात्मक सौन्दर्यबोध के उस पूर्व-निर्मित आईने को चकनाचूर कर देती हैं, जिसमें स्त्री को सिर्फ़ एक ‘वस्तु’ या ‘सुन्दर दृश्य’ के रूप में देखा जाता रहा है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ भाषिक और शैलीगत स्तर पर ऐसी कविता है जिसमें कथा, स्वप्न, स्मृति, दृश्यात्मकता, संगीतात्मकता और प्रतीकात्मकता एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। उसकी भाषा अर्थ को स्थिर नहीं करती; उसे लगातार गतिशील बनाए रखती है। यही कारण है कि कविता का पाठ किसी बंद व्याख्या की ओर नहीं, बल्कि एक दीर्घ संवेदनात्मक अनुभव की ओर ले जाता है—ऐसा अनुभव जो पढ़ने के बाद भी भीतर लंबे समय तक चलता रहता है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ को स्मृति और कला के संबंध की दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता केवल प्रेम, स्वप्न या आघात का आख्यान नहीं रह जाती, बल्कि स्वयं कला की मानवीय आवश्यकता और उसकी नैतिक भूमिका पर गहरे विचार का रूप ले लेती है। कविता के भीतर बार-बार जो स्मृतियाँ लौटती हैं—घोड़े की टाप, मृत प्रिय की देह, तितलियाँ, चुंबन, रक्त की नदी, खाली मैदान, कटे हुए हाथ, जादुई किताब—वे केवल बीते हुए अनुभवों की पुनरावृत्ति नहीं हैं; वे उन चीज़ों को बचाने की कोशिश हैं जिन्हें इतिहास, समय और हिंसा लगातार मिटाते रहते हैं। इस अर्थ में कविता स्वयं स्मृति की एक रचनात्मक शरणस्थली बन जाती है। वह केवल अतीत को याद नहीं करती; वह उसे भाषा और रूप देकर उसके विनाश का प्रतिरोध भी करती है।

    कविता का अंतिम हिस्सा विशेष रूप से इस बात को स्पष्ट करता है कि कला का जन्म केवल सौंदर्य-बोध से नहीं, बल्कि “खोई चीज़ों के शोक” से भी होता है। यह आकस्मिक नहीं है कि ‘खोई हुई चीज़ों का शोक’ सविता सिंह का एक स्वतंत्र कविता संग्रह भी है। ‘सपने और तितलियाँ’ में यह शोक केवल व्यक्तिगत नहीं है; वह इतिहास, प्रेम, स्मृति और मानवीय संवेदना के क्षरण का शोक है। कविता जिस सपने की तलाश करती है “जिसमें कोई भी पन्ना अपनी किताब में / दोबारा लौट सकता था”, वह वास्तव में कला की उस गहरी आकांक्षा का रूपक है जिसमें मनुष्य समय के विनाशकारी प्रवाह के विरुद्ध स्मृति को बचाए रखना चाहता है। कला समय को रोक नहीं सकती, लेकिन वह उन अनुभवों को भाषा में संरक्षित कर सकती है जिन्हें वास्तविक जीवन बचा नहीं पाता।

    कविता का पूरा विन्यास स्मृति की पुनर्रचना की प्रक्रिया जैसा है। स्मृतियाँ यहाँ व्यवस्थित और शांत नहीं हैं; वे टूटे हुए दृश्यों, प्रतीकों और आवर्तनों में लौटती हैं। लेकिन यही टूटन कला की संरचना बन जाती है। कविता यह दिखाती है कि स्मृति स्वयं कभी पूर्ण नहीं होती। वह खंडित, अस्पष्ट और पीड़ादायक होती है। फिर भी मनुष्य उसे व्यक्त करने की कोशिश करता है, क्योंकि अभिव्यक्ति के बिना स्मृति धीरे-धीरे नष्ट हो सकती है। इस अर्थ में कविता स्मृति को केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं रहने देती; वह उसे कलात्मक रूप में रूपांतरित करती है।

    तितलियों का रूपक यहाँ विशेष रूप से सारगर्भित हो उठता है। वे केवल प्रेम के क्षणिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं हैं; वे स्मृति की कलात्मक प्रकृति का भी संकेत हैं। तितलियाँ नश्वर हैं, लेकिन उनके रंग स्मृति में बचे रहते हैं। कविता भी कुछ ऐसा ही करती है—वह नष्ट हो चुके अनुभवों के रंगों को बचा लेती है। चुंबन समाप्त हो सकते हैं, प्रेमी मर सकता है, युद्ध सब कुछ बदल सकता है, लेकिन कविता उन अनुभवों की सूक्ष्म संवेदनाओं को भाषा में संरक्षित कर लेती है। यही कला का प्रतिरोधी पक्ष है।

    कविता में बार-बार लौटती मृत देह और रक्त की छवियाँ भी स्मृति और कला के संबंध को गहरा बनाती हैं। इतिहास प्रायः युद्धों को विजय, पराजय और राजनीतिक घटनाओं के रूप में दर्ज करता है; लेकिन कविता उन भावनात्मक और मानवीय अवशेषों को सामने लाती है जो इतिहास के औपचारिक लेखन में गायब हो जाते हैं। मृत प्रिय की देह, रक्त की नदी, प्रतीक्षा करती स्त्री, दम तोड़ती तितली—ये सब इतिहास के “अनलिखे” हिस्से हैं। कविता उन्हें भाषा देती है। इस अर्थ में कला केवल सौंदर्य की सृष्टि नहीं, बल्कि विस्मृति के विरुद्ध संघर्ष भी है।

    “याद करो / याद करो”—यह आवृत्ति केवल स्मरण का आग्रह नहीं, बल्कि कलात्मक कर्म का नैतिक आग्रह भी है। कविता मानो यह कह रही हो कि यदि स्मृति समाप्त हो जाएगी, तो मनुष्य अपनी संवेदना भी खो देगा। प्रेम, पीड़ा, शोक और आत्मीयता को बचाए रखने के लिए उन्हें बार-बार भाषा में लौटाना आवश्यक है। यही कारण है कि कविता स्वयं एक स्मृति-क्रिया (act of remembrance) बन जाती है।

     “जादुई किताब” का संदर्भ स्मृति और कला के इस संबंध को गहरा बनाता है। किताब के पन्ने न मिलना समय और अनुभव की क्षणभंगुरता का रूपक है। लेकिन कविता जिस सपने की तलाश करती है, उसमें खोए हुए पन्नों की पुनर्प्राप्ति संभव है। यह कला की उस आकांक्षा का संकेत है जिसमें वह समय के विनाश के बावजूद अनुभवों को पुनः उपस्थित करना चाहती है। साहित्य कभी वास्तव में अतीत को लौटा नहीं सकता, लेकिन वह उसकी अनुपस्थिति को अर्थपूर्ण बना सकता है। बोर्खेज़ीय संकेत कविता को इसी गहरी साहित्यिक और दार्शनिक चेतना से जोड़ता है।

    कविता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह स्मृति को स्थिर संग्रहालय नहीं बनने देती। स्मृतियाँ यहाँ जीवित हैं; वे बदलती हैं, लौटती हैं, नए अर्थ ग्रहण करती हैं। यही कला की प्रकृति भी है। हर पुनर्पाठ में कविता नए अर्थ खोलती है, ठीक वैसे ही जैसे स्मृति हर बार नए रूप में लौटती है। इस दृष्टि से कविता स्वयं स्मृति की संरचना का अनुकरण करती है। उसका विखंडित, स्वप्निल और दृश्यात्मक विन्यास यह दिखाता है कि कला रैखिक पुनरुत्पादन नहीं, बल्कि अनुभव की पुनर्सृष्टि है।

    कविता में उपस्थित “कटे हुए हाथ”, “रक्तस्राव”, “खाली मैदान”, “मृत प्रिय” और “तितलियाँ” जैसे बिंब यह भी संकेत करते हैं कि कला केवल सुंदरता को नहीं बचाती; वह यातना और हिंसा को भी अभिव्यक्ति देती है। यदि ये अनुभव भाषा में न आएँ, तो वे केवल मौन पीड़ा बनकर रह जाएँगे। कविता उन्हें दृश्य और शब्द देती है। इस प्रकार कला मानवीय पीड़ा को साझा अनुभव में बदल देती है। पाठक उन अनुभवों को महसूस कर सकता है जिन्हें उसने स्वयं नहीं जिया। यही साहित्य की गहरी मानवीय शक्ति है।

    स्मृति और कला के अंतर्संबंध का वह  मार्मिक पक्ष इस कविता में उभरता है, जिसे आचार्य आनंदवर्धन ने वाल्मीकि रामायण के संदर्भ में रेखांकित करते हुए ‘शोकः श्लोकत्वमागतः’ कहा है। ‘सपने और तितलियाँ’ में भी कला स्वयं शोक की कोख से जन्म लेती हुई प्रतीत होती है। यहाँ प्रिय की अनुपस्थिति, युद्ध की बर्बरता, खोई हुई आत्मीयता और बीते हुए समय की टीस—ये सब कविता को सक्रिय करने वाली प्राण-शक्तियाँ हैं। लेकिन सविता सिंह के रचनाकार की विशिष्टता यह है कि उनकी कविता केवल शोक की जड़ता में नहीं ठहरती; वह उस शोक को एक कलात्मक रूप और लय प्रदान कर उसे व्यापक मानवीय अर्थ में रूपांतरित कर देती है। यही कला की परिवर्तनकारी शक्ति है, जो पीड़ा को मिटाती तो नहीं, लेकिन उसे अभिव्यक्ति की गरिमा देकर साझा करने योग्य बना देती है।

    कविता की दृश्यात्मकता और संगीतात्मक पुनरावृत्ति भी स्मृति की कलात्मक प्रकृति को व्यक्त करती है। कुछ दृश्य बार-बार लौटते हैं, जैसे चेतना उन्हें छोड़ नहीं पा रही हो। लेकिन हर बार लौटते हुए वे नए भाव और अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। यही कला का कार्य है—वह अनुभव को स्थिर नहीं करती, बल्कि उसे लगातार पुनर्जीवित करती रहती है।

    इस दृष्टि से ‘सपने और तितलियाँ’ सिर्फ़ स्मृति की कविता नहीं, बल्कि स्वयं कविता की ज़रूरत पर भी एक कविता है। यह रचना दिखाती है कि मनुष्य क्यों लिखता है, क्यों याद करता है, और क्यों खोई हुई चीज़ों के लिए भाषा खोजता है। यदि कला न हो, तो इतिहास केवल घटनाओं का रूखा-सूखा क्रमबद्ध विवरण मात्र रह जाएगा और मनुष्य की संवेदना धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगी। कविता उन चीज़ों को बचाती है जिन्हें समय और सत्ता मिटा देना चाहते हैं—एक चुंबन से महसूस होने वाला अवर्णनीय रोमांच, एक स्पर्श से शिराओं में रक्त-प्रवाह की तीव्रता, एक तितली का रंग, एक मृत देह का मौन, एक स्त्री की प्रतीक्षा, एक अधूरी स्मृति की कंपन। यह कविता संकेत देती है कि कला मनुष्य की स्मृति का सबसे गहरा आश्रय है। वह खोए हुए को लौटा नहीं सकती, लेकिन उसे विस्मृति में डूबने से बचा सकती है। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी मानवीय भूमिका है।

    ‘सपने और तितलियाँ’ पर जादुई यथार्थवाद (magical realism) की दृष्टि से विचार करना न केवल सार्थक है, बल्कि कई स्तरों पर बेहद सर्जनात्मक भी है। विशेषतः कविता के उत्तरार्ध में बोर्खेज़ की “जादुई किताब” का संदर्भ इस संभावना को और अधिक गहरा बना देता है। हालाँकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह कविता सीधे-सीधे लातिनी अमेरिकी जादुई यथार्थवाद की पुनरावृत्ति के बजाय उसके कुछ बुनियादी संवेदनात्मक और संरचनात्मक गुणों को अपनी विशिष्ट काव्यात्मक भूमि में रूपांतरित करती है।

    अमूमन जादुई यथार्थवादी रचनाओं की एक केंद्रीय विशेषता यह होती है कि उनमें असाधारण, अलौकिक, स्वप्नवत या चामत्कारिक घटनाएँ संसार के सामान्य यथार्थ के भीतर इस तरह उपस्थित रहती हैं कि वे विस्मय पैदा करने के बजाय जीवन की स्वाभाविक निरंतरता का हिस्सा लगती हैं। ‘सपने और तितलियाँ’ में यही संरचना दिखाई देती है। कविता में प्रोटागोनिस्ट पानी पर चलती है, पेड़ों की फुनगियों तक पहुँच जाती है, सदियों पुरानी स्मृतियाँ वर्तमान में लौट आती हैं, मृत प्रिय फिर उपस्थित हो जाता है, तितलियाँ चुंबनों में बदल जाती हैं, और सपना तथा स्मृति एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। लेकिन कविता इन घटनाओं को किसी चमत्कार या अस्वाभाविक रूप में प्रस्तुत नहीं करती। वे चेतना के अनुभव-संसार में उतनी ही स्वाभाविक हैं जितना जंगल, नदी या पत्थर। यही वह बिंदु है जहाँ कविता जादुई यथार्थवादी संरचना के निकट आती है।

    कविता में समय का व्यवहार भी जादुई यथार्थवाद के अनुरूप है। यहाँ समय रैखिक नहीं है। “कई जन्म”, “कई-कई सदियाँ”, मृत प्रिय का पुनरागमन, घटनाओं की पुनरावृत्ति, अतीत का वर्तमान में स्पंदित बने रहना—ये सब समय को घड़ी या इतिहास की क्रमिक इकाई न मानकर एक जीवित, चक्रीय और बहुस्तरीय अनुभव में बदल देते हैं। जादुई यथार्थवादी लेखन में अक्सर अतीत वर्तमान के भीतर सक्रिय रहता है; स्मृतियाँ वस्तुओं और देहों में जीवित रहती हैं। इस कविता में भी पुराना पत्थर, नदी, घोड़ा और तितलियाँ स्मृति के संवाहक बन जाते हैं।

    तितलियों का रूपक विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे केवल प्रकृति का दृश्य नहीं हैं; वे प्रेम, चुंबन, आत्मा और स्मृति की जीवित आकृतियाँ हैं। वे “हमारे भीतर से निकलकर एक दूसरे तक जाती थीं”। यह बिंब जादुई यथार्थवादी संवेदना का उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ आंतरिक भावनाएँ मूर्त, दृश्य और लगभग भौतिक रूप ग्रहण कर लेती हैं। इसी प्रकार घोड़ा केवल घोड़ा नहीं रह जाता; वह मृत्यु, इतिहास, युद्ध और लौटती हुई स्मृति का जीवंत प्रतीक बन जाता है।

    मार्खेज़ (Gabriel García Márquez) के जादुई यथार्थवाद में जैसे मृत लोग जीवितों के संसार में सहज रूप से आते-जाते हैं, वैसे ही इस कविता में मृत प्रिय की उपस्थिति किसी प्रेतलोक की भयावहता नहीं रचती; वह स्मृति और प्रेम की स्वाभाविक वापसी की तरह घटित होती है। कविता बार-बार यह धुँधला करती है कि जो उपस्थित है वह सपना है, स्मृति है, मृत्यु है या वर्तमान। यही जादुई यथार्थवाद का मूल क्षेत्र है—जहाँ यथार्थ स्वयं अद्भुत हो उठता है।

    बावजूद इसके, ‘सपने और तितलियाँ’ कविता को केवल “जादुई यथार्थवादी ” कह देना पर्याप्त न होगा, क्योंकि इसका जादू किसी बाहरी लोककथा या चमत्कार से नहीं पैदा होता; वह स्मृति, प्रेम और आघात की आंतरिक संरचना से पैदा होता है। यही इसे विशिष्ट बनाता है। कविता में जो अतियथार्थवादी या अलौकिक अनुभव हैं, वे मनोवैज्ञानिक और भावात्मक स्तर पर पूरी तरह विश्वसनीय लगते हैं। यानी यहाँ जादुई तत्त्व चेतना की गहरी वास्तविकता को व्यक्त करने का माध्यम हैं।

    बोर्खेज़ की रचनाओं में जिस प्रकार स्मृति, भूलभुलैया, अनंत पुस्तकें, समय की पुनरावृत्ति और वास्तविकता की अस्थिरता जैसे तत्त्व बार-बार आते हैं, ठीक उसी प्रकार इस कविता में जिस “जादुई किताब” का उल्लेख है, उसके पन्ने “एक बार पढ़े जाने के बाद / दोबारा नहीं मिलते”। यह समय और स्मृति की अनावर्तनीयता (irreversibility) का रूपक है। लेकिन कविता की वक्ता उस सपने की तलाश करती है “जिसमें कोई भी पन्ना अपनी किताब में / दोबारा लौट सकता था।” यह इच्छा जादुई यथार्थवाद के उस मानवीय स्वप्न से जुड़ती है जिसमें खोई हुई चीज़ें, मरे हुए लोग और बीता हुआ समय किसी गहरे भावात्मक स्तर पर पुनः लौट सकते हैं।

    साथ ही, यह भी ध्यान देने योग्य है कि ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में जादुई यथार्थवाद केवल सौंदर्यात्मक उपकरण के बजाय अस्तित्वगत आवश्यकता बनकर आता है। यथार्थ इतना हिंसक, रक्तरंजित और आघातपूर्ण है कि उसे सिर्फ़ यथार्थवादी भाषा में पकड़ना संभव नहीं। इसलिए स्वप्न, तितलियाँ, उड़ान, मृत देह की वापसी और समय का टूटना—ये सब कवयित्री के उस गहरे मानवीय अनुभव को व्यक्त करने के माध्यम बनते हैं जिसे साधारण यथार्थवादी भाषा सीमित कर देती।

    बावजूद इसके, इस कविता को पूरी तरह जादुई यथार्थवादी कृति घोषित कर देना शायद इसके बहुआयामी स्वरूप को सीमित कर देगा। कारण यह कि इसमें मनोविश्लेषणात्मक, स्त्रीवादी, स्मृति-आधारित और अस्तित्ववादी संरचनाएँ भी उतनी ही मजबूत हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि कविता जादुई यथार्थवाद को अपने भीतर आत्मसात करके उसे स्त्री-स्मृति और प्रेम के आघात के अनुभव से जोड़ देती है। इस तरह यह कविता जादुई यथार्थवाद का अनुकरण नहीं करती, बल्कि उसकी संवेदना को भारतीय स्त्री के अनुभव और हिंदी काव्य-परंपरा के भीतर रूपांतरित करती है।

    अंततः ‘सपने और तितलियाँ’ ऐसी कविता के रूप में सामने आती है जो पाठक को किसी निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय उसे संवेदना, स्मृति और अनुभव की अनिश्चितताओं के बीच ठहरा देती है। इस पाठ की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह मनुष्य के भीतर मौजूद उन धुँधले और कठिन क्षेत्रों को भाषा देती है जिन्हें सामान्यतः स्पष्ट विचारों या स्थिर भावनाओं में व्यक्त नहीं किया जा सकता। कविता बार-बार यह संकेत करती है कि मनुष्य का आंतरिक जीवन किसी सरल नैतिक विभाजन से संचालित नहीं होता; उसमें प्रेम और भय, करुणा और हिंसा, आत्मीयता और विघटन, उपस्थिति और अनुपस्थिति साथ-साथ निवास करते हैं। यही कारण है कि कविता का प्रभाव उसके कथ्य से अधिक उसकी आंतरिक प्रतिध्वनियों में निहित है। पाठ समाप्त होने के बाद भी उसके दृश्य, ध्वनियाँ और प्रतीक पाठक की चेतना में बने रहते हैं—मानो कविता पढ़ी नहीं गई, बल्कि भीतर कहीं घटित हुई हो। समकालीन हिंदी कविता में ‘सपने और तितलियाँ’ इसलिए विशिष्ट और दुर्लभ सृजन है क्योंकि यह केवल अनुभव का वर्णन नहीं करती, बल्कि अनुभव की रहस्यमयता, उसकी अस्थिरता और उसकी अव्याख्येय गहराई को स्वयं अपनी संरचना का हिस्सा बना देती है।

    सविता सिंह की ‘सपने और तितलियाँ’ कविता की भावभूमि में अन्तर्निहित  स्त्री-अस्तित्व, स्मृति और इतिहास की हिंसा के जटिल अंतर्संबंधों की इस पड़ताल और पूरे विवेचन का सार यह है कि यह कृति सिर्फ़ निजी प्रेम-आख्यान के बजाय संवेदनशील एवं जागरूक स्त्री की उस ‘स्मृति-चेतना’ का तहज़ीबी दस्तावेज़ है जहाँ व्यक्तिगत आघात और सामूहिक ऐतिहासिक त्रासदी एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। आलेख यह स्थापित करता है कि सविता सिंह ने जादुई यथार्थवाद और ‘स्वप्न-फिल्म’ की तकनीक का सहारा लेकर उस सत्य को भाषा दी है, जिसे पारंपरिक यथार्थवादी साँचों में नहीं बाँधा जा सकता था।

    अगर जूलिया क्रिस्तेवा की शब्दावली में कहें तो विभिन्न आलोचनात्मक पद्धतियों के निकष पर पाठ को परखने के दौरान यह स्पष्ट होता है कि ‘सपने और तितलियाँ’ कविता में ‘रक्त की उफनती नदी’ और ‘तितलियाँ’ जैसे बिंब प्रेम के भीतर मौजूद उस ‘अपावन’ (Abject) और हिंसक पक्ष को उजागर करते हैं, जिसे सिल्विया प्लाथ जैसी वैश्विक कवयित्री ने भी अपनी रचनाओं का आधार बनाया है। अश्वघोष, कालिदास, भवभूति, जयशंकर प्रसाद और दिनकर के क्लासिकी संदर्भों से लेकर बोर्खेज़ की दार्शनिक भूलभुलैया तक का अवगाहन करता यह आलेख सिद्ध करता है कि कविता समय की क्रूरता के विरुद्ध एक मानवीय हस्तक्षेप है।

    अंततः, यह संपूर्ण विश्लेषण इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ‘सपने और तितलियाँ’ कविता मौजूदा सत्यातीत (पोस्ट ट्रुथ) समय में व्याप्त स्मृतिहीनता के इस दौर में स्मृति को एक रचनात्मक शरणस्थली के रूप में प्रतिष्ठित करती है, जहाँ कला का मुख्य कार्य खोई हुई चीज़ों के शोक को एक जीवंत और प्रतिरोधी अर्थ प्रदान करना है। यह विश्लेषण रचना के टेक्स्ट या मूल पाठ को किसी बंद निष्कर्ष पर पहुँचाने के बजाय पाठक को कृति से गहरे जोड़कर उसे अनुभवों की उस निरंतरता में छोड़ देने का हिमायती है जहाँ प्रेम, मृत्यु और स्मृति एक अखंड सत्य की तरह साथ-साथ निवास करते हैं।

    रवि रंजन

    सन्दर्भ

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    रवि रंजन

    जन्म :  1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार

     रूचि के क्षेत्र :  भक्तिकाव्य,  आधुनिक हिन्दी कविता,  आलोचना,  साहित्य का समाजशास्त्र,

    प्रकाशित कृतियाँ :   ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’,  ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011),  ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली

    विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.

    राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.

    ‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान  (2023)

    प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर

    प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद  

    ई.मेल. :  raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742

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